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hoodarajesh
Guest
एक बार एक जाट मुशायरे में चला गया . एक पतला सा लखनवी सायर खड़ा हुआ .
मंच पै आके सायरी पड़ने लगा -- एक तरफ़ तुम बैठे .. एक तरफ़ हम बैठे ..
बीच में हमारे चिलमन .. एक बार तुम झाको ... एक बार हम झाके ..
फ़िर तुम झाको ... फ़िर हम झाके .. फ़िर तुम झाको ... फ़िर हम झाके .
अब उसने कई बार ये लाइन दोहरा दी . जाट के गुस्सा उठ गया . वो
पीछे से आगे मंच के पास आकर खड़ा हो गया . की अब की बार बोलने दे
इस सायर के बच्चे को यही लाइन .
सायर फ़िर बोला - एक बार फ़िर तुम झाको .. एक बार फ़िर हम झाके .. तुम फ़िर से झाको ..
हम फ़िर से झाके . जाट बोल्या तेज आवाज में -- आग लगा दो एसे चिलमन में नै तुम झाको
नै हम झाके .
मंच पै आके सायरी पड़ने लगा -- एक तरफ़ तुम बैठे .. एक तरफ़ हम बैठे ..
बीच में हमारे चिलमन .. एक बार तुम झाको ... एक बार हम झाके ..
फ़िर तुम झाको ... फ़िर हम झाके .. फ़िर तुम झाको ... फ़िर हम झाके .
अब उसने कई बार ये लाइन दोहरा दी . जाट के गुस्सा उठ गया . वो
पीछे से आगे मंच के पास आकर खड़ा हो गया . की अब की बार बोलने दे
इस सायर के बच्चे को यही लाइन .
सायर फ़िर बोला - एक बार फ़िर तुम झाको .. एक बार फ़िर हम झाके .. तुम फ़िर से झाको ..
हम फ़िर से झाके . जाट बोल्या तेज आवाज में -- आग लगा दो एसे चिलमन में नै तुम झाको
नै हम झाके .