" जाट कौम अपनी ताक़त को पहचानो "
-- कमांडेंट हवा सिंह सांगवान
न. +919416056145
स्वर्ण जातियों के संगठन आज़ादी के सैकड़ों वर्षों पहले से कार्य कर रहे थे लेकिन जाट कौम ने अपना अलग से संगठन का पहली बार सन 1907 में ख्याल आया और जाट सभा बनाई | लेकिन फिर भी जाट कौम ने सर्व जातीय खापो में विश्वास रखा क्योंकि जाट कौम का स्वभाव सभी को साथ लेकर चलने का रहा जिसका मूल कारण था की उत्तर भारत का जाट (किसान) अपने क्षेत्र में अपनी जातियों के लिए रोज़गार का एकमात्र साधन था | इसलिए उसने अपने संगठन और अपनी ताक़त की ओर कभी ध्यान नहीं दिया | जाटों के संगठन और उनके अधिकारों की मांग पहली बार दीनबंधु सर चौधरी छोटूराम ने उठाई | उनकी राजनीति का आधार आर्थिक होते हुए भी जातीय संगठन पर आधारित था | चौ.छोटूराम ने नारा दिया की 'राज करेगा जाट' | कांग्रेस के असहयोग आन्दोलन के विरोध में सन 1920 में उन्होंने कांग्रेस से अपना नाता तोड़ा और सन 1927 में साईमन कमीशन का स्वागत किया तथा स्वागत कमेटी के वे अध्यक्ष थे | उन्होंने बार-बार कहा की काले अंग्रेज गोरे अंग्रेजो से बुरे साबित होंगे | चौ. सर छोटूराम की इन सभी नीतियों को जानने के लिए हमे गहराई से अध्ययन करने की आवश्यकता हैं की किस प्रकार उन्होंने अपनी कौम के लिए अंग्रेजी हुकूमत और कांग्रेस का तेल निकाला ? ( पुस्तक -पंजाब पोलिटिक्स रोल ऑफ़ सर छोटूराम )
आज़ादी से पहले स्वर्ण जातियों में ब्राह्मण और कायस्थों के संगठन अधिक सक्रिय थे और इन्ही जातियों का अंग्रेजी सरकार के प्रशासन में अधिक दखल और भागेदारी थी क्योंकि यही लोग पढ़े लिखे थे लेकिन शासन में अधिक हिस्सा पाने के लिए इनमे जबरदस्त होड़ थी | सन 1857 के संग्राम में जाट और इसकी सहयोगी जातियां देश की आज़ादी के लिए खून बहा रही थी तो पं.नेहरु के दादा पं.गंगाधर कौल तथा कायस्थ नेता जीवन लाल में आपसी होड़ थी की कौन कितना अपने आप को अंग्रेजों का वफादार साबित करता हैं | इसी हौड़ में उन्होंने क्रांतिकारियों से गद्दारी व अंग्रेजों की वफादारी करके अपना तथा अपनी जाति के लिए बड़े-बड़े पद हासिल किये | ( पुस्तक-राजा नाहर सिंह का बलिदान तथा ट्रेटर्स आफ 1857 ) |
जब 15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ तो भारत के 15 राज्यों में से 12 राज्यों की कांग्रेस कमेटियों ने प्रथम प्रधानमंत्री पद के लिए सरदार पटेल का नाम का अनुमोदन किया लेकिन ब्राह्मण कायस्थ और बणिया जातियों के संगठन ने अंग्रेजों के आशीर्वाद से पं.नेहरु को प्रधानमंत्री नियुक्त किया जो गैर लोकतान्त्रिक था | इसलिए भारत में रहे एक अंग्रेज उच्च अधिकारी मिस्टर क्रिप्स ने सन 1948 में इंग्लैंड में बाद में दिए ब्यान में कहा की अंग्रेज भारत में व्यापर के लिए गए थे और उन्होंने 200 साल तक ये कार्य किया जब इसमें विघ्न पड़ने लगे तो अपने व्यापार के हित में भारत की बागडोर अपने एजेंटों को दे आये (पुस्तक- किसान विद्रोह और संघर्ष तथा पार्टीसियन आफ इंडिया ) | यहाँ विशेष ध्यान देने की बात हैं की जब तक पहला चुनाव सन 1952 में नहीं करवाया गया , पं. नेहरु ने सभी राज्यों में अपनी ब्राह्मण जाति से मुख्यमंत्री मनोनीत किये | इससे पहले देश की सत्ता के बंटवारे में प्रधानमंत्री का पद ब्राह्मण जाति को गया और राष्ट्रपति का पद डा. राजेन्द्र प्रसाद कायस्थ के हिस्से में आया तथा बाद में राष्ट्रपति का पद बणिया जाति को गया | सन 1947 के बाद कायस्थ जाति ब्राह्मण जाति से पीछे चली गई जिसमे सबसे बड़ा हाथ पं. नेहरु का था जो उस समय के प्रशासनिक आंकड़े स्वयं ही बोल रहे हैं | दुर्भाग्यवश दीनबंधु चौ. छोटूराम का 9 जनवरी 1945 को अकस्मात निधन होने पर जाटों का हर दावा दफ़न हो गया वर्ना इसी संयुक्त पंजाब के बारे में नेहरु कहा करते थे की संयुक्त पंजाब उनकी पहुच से बाहर हैं और उनका सबसे बड़ा सिरदर्द हैं | डा. आंबेडकर को भारतीय संविधान का निर्माता कहा जाता हैं और उन्होंने कहा था ' जब तक जातीयता का अहसास न हो राष्ट्रीयता हो ही नहीं सकती ' | यह कटु सत्य हैं इसलिए तो अंग्रेजों ने जाति पर आधारित जाट और राजपूत रेजिमेंट बनाई थी ( बाकि रेजिमेंट क्षेत्रीय आधार पर हैं ) | आज़ादी के बाद जब स्वर्ण जातियों ने अपने संगठन मजबूत करने शुरू कर दिए और प्रशासन में अपने हिस्से की मांग करने लगे तो शिखर पर बैठे स्वर्ण जातियों के इन लोगो ने सरकारी तौर पर प्रचार करना शुरू कर दिया की कोई जात-पात नहीं होनी चाहिए इससे देश कमजोर होता हैं | जबकि वास्तविकता ये हैं की जब जातियां मजबूत होंगी तो देश भी मजबूत होगा क्योंकि यही जातियां इस देश के स्तंभ हैं | ये लोग यही बतालने में पूर्णत: असमर्थ हैं की जाति विहीन समाज की व्यवस्था कैसे होगी ? इस पर ये लोग यूरोपीय देशो के उदाहरण देने लग जाते हैं जबकि वहां की संस्कृति और सामाजिक व्यवस्था भारत से पूर्णतया: भिन्न हैं लेकिन दुःख की बात हैं की हमारी कौम अधिक भावुक होने के कारण इस दुष्प्रचार की चपेट में आ रही हैं जबकि दुष्प्रचार करने वाले स्वर्ण जातियों के लोग अपने नामो के साथ जातीय पहचान के सरनेम व गौत्र का खुलकर इस्तेमाल करते हैं इसके लिए उदाहरण देने की आवश्यकता नहीं हैं ( जाट कौम न तो स्वर्ण जाति हैं न ही दलित यह ब्राह्मनिक वर्ण व्यवस्था से अलग हैं ) लेकिन बड़े दुःख की बात हैं की हमारी नई पीढ़ी इस दुष्प्रचार से बुरी तरह से प्रभावित हैं ( पुस्तक- आंबेडकर विचारावाली तथा राष्ट्र में अनेक राष्ट्र ) |
उत्तर भारत में बाडमेर - बीकानेर से बिजनौर तथा कठुआ से गवालियर तक का क्षेत्र जाट बाहुल्य क्षेत्र हैं जिसमे 5 करोड़ जाट 35 हजार गावों व कस्बो में 4800 गौत्रो के साथ रहते हैं जिनके बीच अहीर , गुर्जर और मीणा जातियों के छोटे छोटे पैकेट हैं | इसके अतिरिक्त जाटों के गावों में उनकी सह्जातियाँ भी रहती हैं | उत्तर भारत को 65 लोकसभा क्षेत्रो में जाट वोट निर्णायक स्थिति में हैं तथा 32 क्षेत्र जाट बाहुल्य हैं | जाट कौम का देश के लिए हर क्षेत्र में भारत की किसी भी एक जाति से अधिक योगदान हैं | जाट कौम का देश के लिए तीन क्षेत्र में भारत की किसी भी एक जाति से अधिक योगदान हैं | ( मंडी चोर और पाखंडी छोड़कर ) चाहे वह लड़ाई का मैदान हो या खेती का मैदान या फिर खेल का मैदान हो | केन्द्रीय अनाज भंडार में जाटों का 80 प्रतिशत योगदान हैं | लगभग आधा दर्जन रियासतों को जब्त करने पर भी 15 अगस्त 1947 को जाटों की छोटी बड़ी 26 रियासते थी अर्थात राज करना जाटों का स्वाभाविक गुण और अधिकार रहा हैं | दिल्ली का राष्ट्रपति भवन , संसद भवन और इंडिया गेट जाटों के रायसीना गावं की ज़मीन पर हैं | आज भी दिल्ली में जाटों के 245 गावं हैं कहने का अर्थ हैं की दिल्ली भी जाटों की रही और दिल्ली के चारों और का घेरा भी जाटों का रहा फिर दिल्ली जाटों से दूर क्यों ? सोची समझी चाल के तहत सन 1947 में दिल्ली से एक लाख मुस्लिम जाने पर उनकी जगह 4 लाख 80 हजार पाक शरणार्थी अपने चहेतों के नाम कालोनिया बनाकर बसाये और सन 1959 में हजारो तिब्बती बसाये और उसके बाद उत्तरांचलियों के साथ-साथ विदेशियों ( बंगलादेशी ) तक को दिल्ली में बसाकर गावों के साथ-साथ जेजे कालोनियां खड़ी कर दी जिसका एकमात्र उद्देश्य जाटों को अल्पमत में लाकर उनकी पहचान और संस्कृति को मिटाना था | वर्ना 12 लाख नागाओ का नागालैंड , 3 लाख बोडो को बोडोलैंड और 2 लाख गोरखों का गोरखालैंड इसी देश में हैं तो फिर देश में 5 करोड़ जाटों का जटलैंड क्यों नहीं ? क्योंकि आज़ादी मिलने पर जाटों ने सोचा की उन्होंने सब कुछ पा लिया वर्ना यह कैसे हो सकता था की जो राज कर रहे थे वो राज से दूर रहे और जिनके पूर्वज अंग्रेजों के पिट्टठु व मुंशी थे वे ही सन 1947 के बाद राज करने लगे | इसका मूल कारण जाटों की इच्छा शक्ति और महत्वाकांक्षा का पतन होना | जबकि पाकिस्तान से शरणार्थी बनकर आये श्री मनमोहन सिंह कोहली और श्री लाल कृष्ण आडवाणी दोनों ही प्रधानमंत्री पद के दावेदार बने और सुषमा स्वराज तथा अरुण जेटली लोकसभा व राज्यसभा में विपक्ष के उपनेता बने , ये सभी इच्छा शक्ति और महत्वाकांक्षा का ही करिश्मा हैं वर्ना इन्ही के पूर्वजो ने कभी दीनबंधु सर छोटूराम को काले झंडे दिखाए थे | जाट कोई जाति नहीं , जाट एक कौम हैं | वास्तव में जाट कौम ही नहीं एक राष्ट्र हैं | यह बात विद्वान इतिहासकार कालीरंजन कानूनगो तथा उपेन्द्रनाथ शर्मा ने अपने इतिहासों में लिखी हैं लेकिन यहाँ तो जाट हरियाणा तथा पंजाब की कुर्सियों तक ही सीमित रह गए | जाट दिल्ली की राजसत्ता से पीछे रहने के लिए स्वयं जिम्मेदार हैं क्योंकि इसी जाति का एक पढ़ा लिखा वर्ग जात पात का विरोध करने लगा हैं लेकिन हैरत की बात हैं की यही लोग अपने बच्चो के रिश्तो के लिए जाटों को ही ढूंढ़ते हैं | दूसरा यही लोग दुष्प्रचार करते हैं की जाट कौम कभी इकट्ठा नहीं हो सकतीं | जबकि सच्चाई यह हैं की कोई भी परिवार , गावं , समाज और जाति किसी मुद्दे पर इकट्ठा हुआ करती हैं जब कौम के पास 65 साल से ( चौ. छोटूराम के देहांत के बाद ) कोई कौमी मुद्दे ही नहीं तो फिर किस बात के लिए इकट्ठा हो ? इसलिए आज कौम को अपने हक के आधार पर मुद्दे बनाने की आवश्यकता हैं | उदाहरण के लिए पूरे भारत में जाटों का सामान रूप से आरक्षण हो | यह पहला ज्वलंत मुद्दा हो , दूसरा मुद्दा जाटों की दिल्ली देश की राजधानी में जाटों की एक चौपाल हो जिसे जाट हाउस के नाम से जाना जाए | साथ-साथ तीसरा मुद्दा हो दिल्ली की कुर्सी | जब एक नेता 10 -12 सांसद लेकर दिल्ली की कुर्सी का दावा करता हैं तो उनसे दुगुने जाट सांसद होने पर भी जाट क्यों नहीं ? इसलिए जाट कौम को अपनी ताक़त को जानना और अधिकारों को पहचानना होगा |
-- कमांडेंट हवा सिंह सांगवान
न. +919416056145
स्वर्ण जातियों के संगठन आज़ादी के सैकड़ों वर्षों पहले से कार्य कर रहे थे लेकिन जाट कौम ने अपना अलग से संगठन का पहली बार सन 1907 में ख्याल आया और जाट सभा बनाई | लेकिन फिर भी जाट कौम ने सर्व जातीय खापो में विश्वास रखा क्योंकि जाट कौम का स्वभाव सभी को साथ लेकर चलने का रहा जिसका मूल कारण था की उत्तर भारत का जाट (किसान) अपने क्षेत्र में अपनी जातियों के लिए रोज़गार का एकमात्र साधन था | इसलिए उसने अपने संगठन और अपनी ताक़त की ओर कभी ध्यान नहीं दिया | जाटों के संगठन और उनके अधिकारों की मांग पहली बार दीनबंधु सर चौधरी छोटूराम ने उठाई | उनकी राजनीति का आधार आर्थिक होते हुए भी जातीय संगठन पर आधारित था | चौ.छोटूराम ने नारा दिया की 'राज करेगा जाट' | कांग्रेस के असहयोग आन्दोलन के विरोध में सन 1920 में उन्होंने कांग्रेस से अपना नाता तोड़ा और सन 1927 में साईमन कमीशन का स्वागत किया तथा स्वागत कमेटी के वे अध्यक्ष थे | उन्होंने बार-बार कहा की काले अंग्रेज गोरे अंग्रेजो से बुरे साबित होंगे | चौ. सर छोटूराम की इन सभी नीतियों को जानने के लिए हमे गहराई से अध्ययन करने की आवश्यकता हैं की किस प्रकार उन्होंने अपनी कौम के लिए अंग्रेजी हुकूमत और कांग्रेस का तेल निकाला ? ( पुस्तक -पंजाब पोलिटिक्स रोल ऑफ़ सर छोटूराम )
आज़ादी से पहले स्वर्ण जातियों में ब्राह्मण और कायस्थों के संगठन अधिक सक्रिय थे और इन्ही जातियों का अंग्रेजी सरकार के प्रशासन में अधिक दखल और भागेदारी थी क्योंकि यही लोग पढ़े लिखे थे लेकिन शासन में अधिक हिस्सा पाने के लिए इनमे जबरदस्त होड़ थी | सन 1857 के संग्राम में जाट और इसकी सहयोगी जातियां देश की आज़ादी के लिए खून बहा रही थी तो पं.नेहरु के दादा पं.गंगाधर कौल तथा कायस्थ नेता जीवन लाल में आपसी होड़ थी की कौन कितना अपने आप को अंग्रेजों का वफादार साबित करता हैं | इसी हौड़ में उन्होंने क्रांतिकारियों से गद्दारी व अंग्रेजों की वफादारी करके अपना तथा अपनी जाति के लिए बड़े-बड़े पद हासिल किये | ( पुस्तक-राजा नाहर सिंह का बलिदान तथा ट्रेटर्स आफ 1857 ) |
जब 15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ तो भारत के 15 राज्यों में से 12 राज्यों की कांग्रेस कमेटियों ने प्रथम प्रधानमंत्री पद के लिए सरदार पटेल का नाम का अनुमोदन किया लेकिन ब्राह्मण कायस्थ और बणिया जातियों के संगठन ने अंग्रेजों के आशीर्वाद से पं.नेहरु को प्रधानमंत्री नियुक्त किया जो गैर लोकतान्त्रिक था | इसलिए भारत में रहे एक अंग्रेज उच्च अधिकारी मिस्टर क्रिप्स ने सन 1948 में इंग्लैंड में बाद में दिए ब्यान में कहा की अंग्रेज भारत में व्यापर के लिए गए थे और उन्होंने 200 साल तक ये कार्य किया जब इसमें विघ्न पड़ने लगे तो अपने व्यापार के हित में भारत की बागडोर अपने एजेंटों को दे आये (पुस्तक- किसान विद्रोह और संघर्ष तथा पार्टीसियन आफ इंडिया ) | यहाँ विशेष ध्यान देने की बात हैं की जब तक पहला चुनाव सन 1952 में नहीं करवाया गया , पं. नेहरु ने सभी राज्यों में अपनी ब्राह्मण जाति से मुख्यमंत्री मनोनीत किये | इससे पहले देश की सत्ता के बंटवारे में प्रधानमंत्री का पद ब्राह्मण जाति को गया और राष्ट्रपति का पद डा. राजेन्द्र प्रसाद कायस्थ के हिस्से में आया तथा बाद में राष्ट्रपति का पद बणिया जाति को गया | सन 1947 के बाद कायस्थ जाति ब्राह्मण जाति से पीछे चली गई जिसमे सबसे बड़ा हाथ पं. नेहरु का था जो उस समय के प्रशासनिक आंकड़े स्वयं ही बोल रहे हैं | दुर्भाग्यवश दीनबंधु चौ. छोटूराम का 9 जनवरी 1945 को अकस्मात निधन होने पर जाटों का हर दावा दफ़न हो गया वर्ना इसी संयुक्त पंजाब के बारे में नेहरु कहा करते थे की संयुक्त पंजाब उनकी पहुच से बाहर हैं और उनका सबसे बड़ा सिरदर्द हैं | डा. आंबेडकर को भारतीय संविधान का निर्माता कहा जाता हैं और उन्होंने कहा था ' जब तक जातीयता का अहसास न हो राष्ट्रीयता हो ही नहीं सकती ' | यह कटु सत्य हैं इसलिए तो अंग्रेजों ने जाति पर आधारित जाट और राजपूत रेजिमेंट बनाई थी ( बाकि रेजिमेंट क्षेत्रीय आधार पर हैं ) | आज़ादी के बाद जब स्वर्ण जातियों ने अपने संगठन मजबूत करने शुरू कर दिए और प्रशासन में अपने हिस्से की मांग करने लगे तो शिखर पर बैठे स्वर्ण जातियों के इन लोगो ने सरकारी तौर पर प्रचार करना शुरू कर दिया की कोई जात-पात नहीं होनी चाहिए इससे देश कमजोर होता हैं | जबकि वास्तविकता ये हैं की जब जातियां मजबूत होंगी तो देश भी मजबूत होगा क्योंकि यही जातियां इस देश के स्तंभ हैं | ये लोग यही बतालने में पूर्णत: असमर्थ हैं की जाति विहीन समाज की व्यवस्था कैसे होगी ? इस पर ये लोग यूरोपीय देशो के उदाहरण देने लग जाते हैं जबकि वहां की संस्कृति और सामाजिक व्यवस्था भारत से पूर्णतया: भिन्न हैं लेकिन दुःख की बात हैं की हमारी कौम अधिक भावुक होने के कारण इस दुष्प्रचार की चपेट में आ रही हैं जबकि दुष्प्रचार करने वाले स्वर्ण जातियों के लोग अपने नामो के साथ जातीय पहचान के सरनेम व गौत्र का खुलकर इस्तेमाल करते हैं इसके लिए उदाहरण देने की आवश्यकता नहीं हैं ( जाट कौम न तो स्वर्ण जाति हैं न ही दलित यह ब्राह्मनिक वर्ण व्यवस्था से अलग हैं ) लेकिन बड़े दुःख की बात हैं की हमारी नई पीढ़ी इस दुष्प्रचार से बुरी तरह से प्रभावित हैं ( पुस्तक- आंबेडकर विचारावाली तथा राष्ट्र में अनेक राष्ट्र ) |
उत्तर भारत में बाडमेर - बीकानेर से बिजनौर तथा कठुआ से गवालियर तक का क्षेत्र जाट बाहुल्य क्षेत्र हैं जिसमे 5 करोड़ जाट 35 हजार गावों व कस्बो में 4800 गौत्रो के साथ रहते हैं जिनके बीच अहीर , गुर्जर और मीणा जातियों के छोटे छोटे पैकेट हैं | इसके अतिरिक्त जाटों के गावों में उनकी सह्जातियाँ भी रहती हैं | उत्तर भारत को 65 लोकसभा क्षेत्रो में जाट वोट निर्णायक स्थिति में हैं तथा 32 क्षेत्र जाट बाहुल्य हैं | जाट कौम का देश के लिए हर क्षेत्र में भारत की किसी भी एक जाति से अधिक योगदान हैं | जाट कौम का देश के लिए तीन क्षेत्र में भारत की किसी भी एक जाति से अधिक योगदान हैं | ( मंडी चोर और पाखंडी छोड़कर ) चाहे वह लड़ाई का मैदान हो या खेती का मैदान या फिर खेल का मैदान हो | केन्द्रीय अनाज भंडार में जाटों का 80 प्रतिशत योगदान हैं | लगभग आधा दर्जन रियासतों को जब्त करने पर भी 15 अगस्त 1947 को जाटों की छोटी बड़ी 26 रियासते थी अर्थात राज करना जाटों का स्वाभाविक गुण और अधिकार रहा हैं | दिल्ली का राष्ट्रपति भवन , संसद भवन और इंडिया गेट जाटों के रायसीना गावं की ज़मीन पर हैं | आज भी दिल्ली में जाटों के 245 गावं हैं कहने का अर्थ हैं की दिल्ली भी जाटों की रही और दिल्ली के चारों और का घेरा भी जाटों का रहा फिर दिल्ली जाटों से दूर क्यों ? सोची समझी चाल के तहत सन 1947 में दिल्ली से एक लाख मुस्लिम जाने पर उनकी जगह 4 लाख 80 हजार पाक शरणार्थी अपने चहेतों के नाम कालोनिया बनाकर बसाये और सन 1959 में हजारो तिब्बती बसाये और उसके बाद उत्तरांचलियों के साथ-साथ विदेशियों ( बंगलादेशी ) तक को दिल्ली में बसाकर गावों के साथ-साथ जेजे कालोनियां खड़ी कर दी जिसका एकमात्र उद्देश्य जाटों को अल्पमत में लाकर उनकी पहचान और संस्कृति को मिटाना था | वर्ना 12 लाख नागाओ का नागालैंड , 3 लाख बोडो को बोडोलैंड और 2 लाख गोरखों का गोरखालैंड इसी देश में हैं तो फिर देश में 5 करोड़ जाटों का जटलैंड क्यों नहीं ? क्योंकि आज़ादी मिलने पर जाटों ने सोचा की उन्होंने सब कुछ पा लिया वर्ना यह कैसे हो सकता था की जो राज कर रहे थे वो राज से दूर रहे और जिनके पूर्वज अंग्रेजों के पिट्टठु व मुंशी थे वे ही सन 1947 के बाद राज करने लगे | इसका मूल कारण जाटों की इच्छा शक्ति और महत्वाकांक्षा का पतन होना | जबकि पाकिस्तान से शरणार्थी बनकर आये श्री मनमोहन सिंह कोहली और श्री लाल कृष्ण आडवाणी दोनों ही प्रधानमंत्री पद के दावेदार बने और सुषमा स्वराज तथा अरुण जेटली लोकसभा व राज्यसभा में विपक्ष के उपनेता बने , ये सभी इच्छा शक्ति और महत्वाकांक्षा का ही करिश्मा हैं वर्ना इन्ही के पूर्वजो ने कभी दीनबंधु सर छोटूराम को काले झंडे दिखाए थे | जाट कोई जाति नहीं , जाट एक कौम हैं | वास्तव में जाट कौम ही नहीं एक राष्ट्र हैं | यह बात विद्वान इतिहासकार कालीरंजन कानूनगो तथा उपेन्द्रनाथ शर्मा ने अपने इतिहासों में लिखी हैं लेकिन यहाँ तो जाट हरियाणा तथा पंजाब की कुर्सियों तक ही सीमित रह गए | जाट दिल्ली की राजसत्ता से पीछे रहने के लिए स्वयं जिम्मेदार हैं क्योंकि इसी जाति का एक पढ़ा लिखा वर्ग जात पात का विरोध करने लगा हैं लेकिन हैरत की बात हैं की यही लोग अपने बच्चो के रिश्तो के लिए जाटों को ही ढूंढ़ते हैं | दूसरा यही लोग दुष्प्रचार करते हैं की जाट कौम कभी इकट्ठा नहीं हो सकतीं | जबकि सच्चाई यह हैं की कोई भी परिवार , गावं , समाज और जाति किसी मुद्दे पर इकट्ठा हुआ करती हैं जब कौम के पास 65 साल से ( चौ. छोटूराम के देहांत के बाद ) कोई कौमी मुद्दे ही नहीं तो फिर किस बात के लिए इकट्ठा हो ? इसलिए आज कौम को अपने हक के आधार पर मुद्दे बनाने की आवश्यकता हैं | उदाहरण के लिए पूरे भारत में जाटों का सामान रूप से आरक्षण हो | यह पहला ज्वलंत मुद्दा हो , दूसरा मुद्दा जाटों की दिल्ली देश की राजधानी में जाटों की एक चौपाल हो जिसे जाट हाउस के नाम से जाना जाए | साथ-साथ तीसरा मुद्दा हो दिल्ली की कुर्सी | जब एक नेता 10 -12 सांसद लेकर दिल्ली की कुर्सी का दावा करता हैं तो उनसे दुगुने जाट सांसद होने पर भी जाट क्यों नहीं ? इसलिए जाट कौम को अपनी ताक़त को जानना और अधिकारों को पहचानना होगा |