Jat- the term origins, history, etymology etc

arvind ji,
... I had taken up the issue of the term 'jaatyah' in yaska's nirukta, i.14,explained as 'aatnarah'. I had pointed out that the term here has no reference to our caste term 'jaata', but only refers to a roaming mendicant(with long hair locks). You may like to revisit my post on the issue.
...when friffith uses the term 'singer' we have to give him the allowance of limitations of a translator and interpret the term 'singer' (for jaritaa) in light of the nuances it conjures up in our mind. After all we do sing songs in praise of paramapitaa parameshvara. I believe in keeping a window open in my well protected house.

इस पर मेरा मत इस प्रकार है कि,
आटन शब्द से मुझे ध्यान आता है कि खैबर के दर्रे में रहने वाले मोमांद पठानों में मंगल पठान जाति जिसका वर्णन वेदों में मधुमंत के नाम से भी है, एक विशेष प्रकार की गायन शैली का प्रयोग करते हैं जिसे कि आटन कहा जाता है । मंगल पठानों कि विशेषता है कि वे साधारणतया लम्बे केश रखने के शोकीन रहे हैं । कई पठान जातियाँ लम्बे केश की शौकीन हैं, जैसे कि मेहसूद ।
इस गायन शैली की विशेषता यह है कि इसे अर्ध-चंद्राकार घेरे में केवल पुरुषों द्वारा गाया जाता है । तथा इसमें हाथों से ताली पीटने के साथ ही सिर को आगे की तरफ जोर से हवा में पटका जाता है, जिससे कि केश पीछे से आगे की तरफ जोर से झूल जाते हैं, फिर तुरंत ही सिर को पीछे की तरफ पटका जाता है ताकि केश पुनः पहले कि अवस्था में आ जाएं ।
एक मत के अनुसार पाणिनि का संबंध इन मंगल पठानों से है ।
धन्यवाद
अम्बरीष ढाका
 
Ambrish Ji,
Thanks for the information.But I hesitate to rush to find any connection of this'aatan' (excuse me for my lack of skills in hindi font)with the term 'aatnarah' used by Yaska (800 B.C.E.) for wanderer (ghumantu in Hindi), derivable from the Sanskrit root 'aTa'- to wander. My position is that the term 'jATyah' is not a derivative of our caste name Jaat.
Thanks
s.s.rana
 
*पठ एक परस्मैपदी धातु है जिसका अर्थ है पढ़ना

*पठ से पाठ बनता है जिसका अर्थ है शब्दों या पैराग्राफों का समूह जिसका पूरा अर्थ निकलता है और जो एक उद्देश्य पूरा करता है

*पठ से पाठ्य भी बनता है

*जट भी एक परस्मैपदी धातु है जिसका अर्थ है जुड़ना

*पठ से पाठ के अनुसार ही जट से जाट बनेगा जिसका अर्थ है कई गोत्रों का समूह या संघ जो किसी उद्देश्य के लिए है

*इसी तरह जट से जाट्य बनेगा
 
*पठ एक परस्मैपदी धातु है जिसका अर्थ है पढ़ना
*पठ से पाठ बनता है जिसका अर्थ है शब्दों या पैराग्राफों का समूह जिसका पूरा अर्थ निकलता है और जो एक उद्देश्य पूरा करता है

*पठ से पाठ्य भी बनता है

*जट भी एक परस्मैपदी धातु है जिसका अर्थ है जुड़ना

*पठ से पाठ के अनुसार ही जट से जाट बनेगा जिसका अर्थ है कई गोत्रों का समूह या संघ जो किसी उद्देश्य के लिए है

*इसी तरह जट से जाट्य बनेगा


Laxman ji,

Please bear with me a moment. If you take the term 'jATa' as a word of the Sanskrit language(you appear to be doing so in this post), then you must deal with in totality in accordance with the rules of Sanskrit grammar. Presumptions have no relevance in matters of rules. Simply analogy of similar structures like 'pATha' is not enough.You must proceed by demonstrating that so and so suffix is adde to the root paTha to obtain pATha and so and so suffix is addedto jaT to obtain jATa and you should quote the relevant rules applicable in the whole process of obtaining the end product in each case. My above argument also stands as a question for your deriving jATya from jATa. Please visit my post about Panini and the term j'aata' in your thread 'Jats in the Epics and the PURANAS'.Further if the term 'jaatyah' was derived from the word 'jATa', a caste name(according to your belief), how could Yaska have included the same in the list of words whose meaning was obscure? Certainly if it were based on a caste name its meanig could not have become obscure.
Incidentally I may inform you(in case you are not already aware of it) that thyere several other roots in addition to jaTa-jhaTa sanghaate in Panini's Dhaatupaatha conveying the meaning of 'sanghaata'.
Regards
s.s.rana
 
राणा साहब इस धागे में अंग्रेजी में बहुत स्पस्ट नहीं हो पा रहा है. इसलिए हिंदी में लिख रहा हूँ. आप भी हिंदी में लिख सकते हैं. यह आसान है. जाट लैंड विकी के पहले पेज पर हिंदी लिखने का तरीका दे रखा है.

असल में जाट को तो आज भी लोग जाट लैंड से बाहर नहीं समझ पाते हैं. जैसे मध्य प्रदेश ही लें तो यहाँ जाट हैं फिर भी जाट की पहचान बताना मुस्किल पड़ता है. कहीं ठाकुर की तुलना करके बताना पड़ता है तो कहीं पटेल की तुलना करके बताना पड़ता है. इसलिए प्राचीन समय में सूचना का आदान प्रदान मुस्किल होने से यस्क को जाट शब्द को पहचानने में दिक्कत आई होगी.

जहाँ तक जाति वाचक जाट की पहचान है यह भारत में बहुत लेट स्टेज में आई लगती है. बोद्ध धर्म के प्रचार में जाटों का ही अधिक योग दान है और वह समय संघों का था. लोग संघम शरणम गच्छामि का नारा बोलते थे. इसलिए जाट को संघ के रूप में पहचान करना ज्यादा समीचीन लगता है. पाणिनि ने कोई गलती नहीं की है.

जट धातु परस्मैपदी धातु है इससे आप इनकार नहीं कर रहे हैं. पठ भी परस्मैपदी धातु है. दोनों का रूपांतरण तो एक ही तरीके से होगा. संस्कृत में यही तो फायदा है. यह अंग्रेजी जैसी भाषा नहीं है. जट धातु से जाट बनाना धर्मपाल जी डूडी की इतिहास की किताब पहले पेज में दिया है तो वे भी इस फोरम के सदस्य हैं सो और खुलासा कर सकते हैं.

वैसे पठ से पाठ और जट से जाट बनने में क्या आपति हो सकती है?
 
Last edited:
I have written an article on Jhanwar village in Jodhpur. You my see it here.

http://www.jatland.com/home/Jhanwar_Jodhpur

The Kalirana Chaudharies of this village are noted for justice and recognized as such by the Maharaja of Jodhpur as well as Delhi Badshah. One of Chaudhary was Purkhoji. I quote from this article in Hindi:

कहते हैं कि झंवर के चौधरियों को दिल्ली बादशाह ने ताम्र पत्र दिया था. आजादी से पूर्व रियासत क़ी तरफ से इन्हें प्रति वर्ष पाग (सफ़ा) बंधाई जाती थी. इसी वंश के एक पुरखोजी के बारे में कहा जाता था-

पुरखो पढ्यो पाटवी, गेण हुई गज बम्ब ।
न्याय करे नव लाखो, जटियायत रो थम्ब ।।

अर्थात - पुरखो चौधरी अपने बाप का सबसे बड़ा पुत्र यानि पाटवी है . यह गजब का बुद्धिशाली है , जोकि नौ लखां (अनुपम) न्याय करता है . यह जाट समाज का स्तम्भ है .

What is our interest here is about the word जटियायत used for Jats.
 
राणा साहब इस धागे में अंग्रेजी में बहुत स्पस्ट नहीं हो पा रहा है. इसलिए हिंदी में लिख रहा हूँ. आप भी हिंदी में लिख सकते हैं. यह आसान है. जाट लैंड विकी के पहले पेज पर हिंदी लिखने का तरीका दे रखा है.

असल में जाट को तो आज भी लोग जाट लैंड से बाहर नहीं समझ पाते हैं. जैसे मध्य प्रदेश ही लें तो यहाँ जाट हैं फिर भी जाट की पहचान बताना मुस्किल पड़ता है. कहीं ठाकुर की तुलना करके बताना पड़ता है तो कहीं पटेल की तुलना करके बताना पड़ता है. इसलिए प्राचीन समय में सूचना का आदान प्रदान मुस्किल होने से यस्क को जाट शब्द को पहचानने में दिक्कत आई होगी.

जहाँ तक जाति वाचक जाट की पहचान है यह भारत में बहुत लेट स्टेज में आई लगती है. बोद्ध धर्म के प्रचार में जाटों का ही अधिक योग दान है और वह समय संघों का था. लोग संघम शरणम गच्छामि का नारा बोलते थे. इसलिए जाट को संघ के रूप में पहचान करना ज्यादा समीचीन लगता है. पाणिनि ने कोई गलती नहीं की है.

जट धातु परस्मैपदी धातु है इससे आप इनकार नहीं कर रहे हैं. पठ भी परस्मैपदी धातु है. दोनों का रूपांतरण तो एक ही तरीके से होगा. संस्कृत में यही तो फायदा है. यह अंग्रेजी जैसी भाषा नहीं है. जट धातु से जाट बनाना धर्मपाल जी डूडी की इतिहास की किताब पहले पेज में दिया है तो वे भी इस फोरम के सदस्य हैं सो और खुलासा कर सकते हैं.

वैसे पठ से पाठ और जट से जाट बनने में क्या आपति हो सकती है?

लक्ष्मण जी ,
मार्गदर्शन के लिए धन्यवाद ,
अष्टाध्यायी का सूत्र 'अकर्तरी च कारके संज्ञायां ' (३ . ३ . ११९ ) बतलाता है कि किसी धातु से संज्ञा बनानी हो तो उस में घयँ प्रत्यय तभी लगेगा
जब वह संज्ञा करता करक के रूप में प्रयुक्त न हो सकती हो . पठ ऐसी धातु है जिस से घयं प्रत्यय लगाकर बनी संज्ञा पाठ करता करक में प्रयोग नहीं की जा सकती .अतः यह सूत्र उस पर लगता है . परन्तु 'जट' धातु से यदि 'जाट' संज्ञा बनाना चाहें तो वह तो कर्ता कारक में भी प्रयुक्त हो सकेगी .और इस प्रकार से सूत्र के अर्थ के खिलाफ बात होगी . सो ऊपर लिखा सूत्र उस में नहीं लगेगा . दोनों धातु परस्मैपदी हैं इस से कोई यह सिद्ध नहीं होता कि दोनों सभी कार्यों में सामान रहें.अष्टाध्यायी के समीचीन अध्ययन से यह चर्चा अधिक उपयोगी हो सकती है .
Thanks.
s.s.rana







s.s.rana
 
जहाँ तक जाति वाचक जाट की पहचान है यह भारत में बहुत लेट स्टेज में आई लगती है. बोद्ध धर्म के प्रचार में जाटों का ही अधिक योग दान है और वह समय संघों का था. लोग संघम शरणम गच्छामि का नारा बोलते थे. इसलिए जाट को संघ के रूप में पहचान करना ज्यादा समीचीन लगता है. पाणिनि ने कोई गलती नहीं की है. quote]

लक्ष्मण जी ,
आप ने मेरे मन की बात कही है . 'जाट' शब्द और 'जाट लोग ' को अलग अलग करके देखना चाहिए .'जाट लोग' अत्यंत प्राचीन हैं . इनके अपने अपने गोत्र या गोत्र-समूह के आधार पर अनेक संघ (संघात नहीं ) थे. .इन में से अनेक संघ अपने मूल नाम अथवा कुछ परिवर्तित रूप में प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में तथा विदेशी लेखकों के संस्मरणों में उपलब्ध हैं . पाणिनि ने भी ऐसे कई संघों का (जाट शब्द का नहीं ) उल्लेख किया है जो बाद में 'जाट' नाम से जाने गए आर्य लोगों के संघ थे. 'आज 'जाट' कहलाये जाने वाले लोगों को गोत्र (पुराने) से जल्दी व्यापक रूप से मझा जा सकता है. परन्तु इन गोत्र-नामों के अध्ययन करते समय धर्मशास्त्रों तथा संस्कृत ग्रंथों में आये गोत्रों के साथ तुलना करते हुए यह भी देख लें कि किन किन प्रवृत्तियों द्वारा प्रभावित होकर इनके रूप में बहुत परिवर्तन आ गए हैं . हम केवल ध्वनि साम्य पर न जाएँ . इतिहास के सूत्र को भी पूरा महत्व दें. मेरा निवेदन इतना मात्र है कि इन दोनों ( ' जाट' शब्द एवं 'जाट लोग') को खोजिये, परन्तु अलग अलग. 'जाट लोग' व्यापक हैं ,'जाट' शब्द नहीं. क्यों ? आईये मिल कर खोजें. आप के ही ऊपर के वक्तव्य में भी संकेत है (ठीक ही !) कि जाति विशेष के लिए 'जाट' शब्द का प्रयोग काफी बाद का है . मेरा भी यही मत है .अब तो यह देखना है कि यह प्रयोग कब , किसने , क्यों किया? आईये, खोजें.
धन्यवाद
सूबेसिंह राणा
 
Last edited:
abb kuchh baat banti lag rahi hey, jab vidvaano mey ek mat honey ki surwaat ho jaaye to yahi samjhaa jaa saktaa hey ki sahi dishaa mey aagey badh rahey hein.aap sab ko dhanaywaad.
 
राणा जी

हाँ वो शिवजी की जटाओं वाली theory बिलकुल हास्यापद है और कदापि स्वाकार नहीं की जा सकती

******************************
शिव की जटाओं से जाट की उत्पति का पौराणिक सिद्धांत है. इसको वैज्ञानिक आधार पर नहीं समझाया जा सकता है. उस समय विज्ञानं इतना विकसित नहीं था और उत्पति की उल जलूल थ्योरियाँ दी जाती थी.
यह थ्योरी जाट का शिव से सम्बन्ध स्थापित कराती है. शिव के गणों से कई जाट गोत्र उत्पन्न हुये हैं

शिव अति प्राचीन हैं. रामायण और महाभारत दोनों में शिव की भक्ति का उल्लेख होता है. इस का अर्थ है कि जाट एक अति प्राचीन समुदाय है.

जटा से उत्पति वैसे ही है जैसे ब्राह्मण ब्रह्मा के मुख से पैदा होते हैं. इसका अर्थ है कि जाट का स्थान ब्राह्मण या अन्य समुदायों से उपर है.
 
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abb kuchh baat banti lag rahi hey, jab vidvaano mey ek mat honey ki surwaat ho jaaye to yahi samjhaa jaa saktaa hey ki sahi dishaa mey aagey badh rahey hein.aap sab ko dhanaywaad.

बलहारा साहब,
जब लक्ष्मण जी ने अपनी पिछली पोस्ट में यह कहा -कि जाट'' शब्द एक जाति के रूप में बहुत बाद में प्रयुक्त हुआ है- तो मुझे भी लगा कि हम एक सही बिन्दु की ओर जा रहे हैं . परन्तु उनका अगला पोस्ट पढ़ कर लगा कि उनहोंने 'जाट' ओर शिव कि जटाओं के सम्बन्ध को एक दूसरे तरीके से प्रस्तुत कर दिया है . इस सूत्र में एक जाति के लिए प्रयुक्त 'जाट' शब्द के ऐतिहासिक अध्ययन कि बात चल रही है . हमारे प्राचीन मिथकों का अपना स्थान है .उसका अध्ययन एक अलग विषय के रूप में किया जा सकता है . भारत में अति प्राचीन काल
' से ही देवता रूप में शिव की महिमा है .वे आम आदमी के देवता रहे हैं..उन में सभी जाति के लोग शामिल रहे हैं. पूजा-पद्धति एवं विभिन्न मान्यताओं के आधार पर शैव मत के अनेक संप्रदाय बने . जिन लोगों को आज 'जाट' शब्द से जाना जाता है उन्हों ने भी शिव और स्कन्द - कार्त्तिकेय को अपना अभीष्ट देव माना. यौधेयों ने तो कार्त्तिकेय को षडानन रूप में अपने सिक्कों पर छापा .पर ये सब बातें मान्यताओं की हैं, न कि यह सिद्ध करने की कि शिव और कार्त्तिकेय कोई इतिहासिक व्यक्ति थे.
आप विचार करें कि जब अधिकांश जाति नाम व्यवसाय पर आधारित हैं . यह बात 'जाट' जाति पर घटित क्यों नहीं होती . 'जाट' का अटूट सम्बन्ध कृषि कर्म से है उसका जाति नाम तो इसी से मिलता जुलता होना चाहिए . जैसे कृषक, कृषिवल,क्षेत्री , कुटुम्बी (कुनबी.इन शब्दों का प्रयोग प्राचीन काल से आज तक चलता आया है. मुझे याद है बहुत पहले गोबर कूड़ा उठाने वाली जाति के लोग जाट महिलाओं को किसानी कहती थी न कि जाटनी.
हमें यह भी विचारना है कि अरब लोग 'जत' अथवा 'अज्जत' /(अल +जत) शब्द से क्या अर्थ लेते थे . आर्येतर सिंध पार के गडरिये लोगों को या ऊँट-पाल
और शायद कृषि कर्म करने वाले लोगों को यह नाम दिया गया था और ऐसे लोगों को हेय दृष्टि से देखा जाता था. ऊपरी सादृश्य के आधार पर सिंध नदी के पार पूर्व के लोगों को उसी अपने 'जत' शब्द से चिन्हित कर लिया . उच्चारण भेद से 'जत' का 'जट' या 'जाट' होना कोई बड़ी बात नहीं.
धन्यवाद
सूबे सिंह राणा

 
Again we are reaching times where we dont have anything sure to say about.

Why not talk about 2 centuries earlier than 3,4,5 and so on ... rather than picking up backwords.

You people really have knowledge and I request you to put forward things in an present-to-past order.

I find myself agreed more to Dr. Rana that why we dont have our race name according to our profession. It may be the reason that this varn system came later than this word for our race?
 
भारत में जाति व्यवस्था

हमें इस पर विचार करना चाहिए कि भारत में जाति व्यवस्था कब से प्रचलित हुई. वैदिक काल में वर्ण व्यवस्था थी. यह कार्य के आधार पर थी. वर्ण बदलने का भी प्रावधान था. वेदों में वर्ण व्यवस्था विज्ञान सम्मत है और उसको कोई माने या न माने किन्तु प्रत्येक मनुष्य उन ४ वर्गों में से ही एक होता है। जाति शब्द वेदों या प्रमाणित शास्त्रों में इस तरह से आया है मनुष्य जाति, अश्व जाति, मार्जार जाति, वानर जाति आदि और इन विभिन्न जातियों में विवाह निषेध है. मनु स्मृति या किसी भी आर्ष ग्रन्थ में आज की जाति व्यवस्था नहीं लिखी है.

बोध साहित्य में जाति-प्रथा प्रधान नहीं थी. वहां संघ प्रधान थे. संघ भी कार्य आधारित थे. जाट संघ का विकास भी उसी समय हुआ है. जाटों में सभी एक समान माने जाते हैं. ऊँचे नीचे का कोई भेदभाव नहीं था इसलिए काफी अन्य संघ भी इसमें सामिल हुए. नागवंश के अधिकांश लोग जाट वंश में सामिल हो गए.

मुसलिम धर्म के उदय के साथ ही हिन्दू धर्म सक्रीय हुआ और तभी जाति व्यवस्था मजबूत हुई. भारत में विदेशी आक्रमणों के आगमन के साथ जाति व्यवस्था कठोर बन गयी है.

सन १९३० में प्रसिद्द समकालीन अमेरिकी इतिहासकार विल ड्यूरेंट ने एक पुस्तक लिखी थी जिसमें उसने उसने भारत की वर्तमान अवस्था पर कटाक्ष करते हुए टिप्पणी की थी की " वर्तमान में भारत की जाति व्यवस्था ४ भागो में विभाजित है ब्रह्मण अर्थात अंग्रेज नौकरशाही, क्षत्रिय अर्थात अंग्रेज सेना, वैश्य अर्थात अंग्रेज व्यपारी और अछूत शूद्र अर्थात हिन्दू जनता" इस पुस्तक में और भी अंग्रेजो की मक्कारियों का चिटठा खोला था और इसको अंग्रेजो ने प्रतिबंधित कर दिया था.

हमें इस बात से परेशान नहीं होना चाहिए कि कोई हमें नीचा समझ रहा है. ऊपर के उल्लेख से तो यह स्पस्ट होता है कि अंग्रेज सारे हिन्दुओं को नीचा समझते थे. मुसलिम हिन्दुओं को नीचा समझते हैं और हिन्दू मुसलिमों को. ऊँचा नीचा तो एक सापेक्ष शब्द है. यह तो समझने वाले के ऊपर निर्भर करता है.

यह खोज का विषय है कि जाट कब जाति बनी?
 
Last edited:
जाट शब्द को हम , इस से मिलते जुलते दूसरे शब्दों के साथ मिला कर देखें , एक पर्योग:-
जाट -(जट्ट)-जत्था-एक बड़ा समूह या-- कबीला |
गाथ-यौरोप मे जाटों का नाम-से गुट या ग्रुप बना |
गुट-एक समूह --कबीला
गूंथना -इक्कठा करना-इक्कठे लोगों का समूह-कबीला |
ग्रुप --आपस मे आछी तरह गूंथे हुएय लोग --कबीला |
जयांट(इंग्लिश) -विशाल बड़ी कद काठी का(एक व्यक्ति या समूह ) जो जाटों पर लागू होता हे |
जूट--एकजुट-एक समूह - कबीला
जटा--गूंथे हुएय बाल--जबर्दस्सत तरीके से गूंथे हुएय लोगों का समूह-कबीला |
जोत-जिसका मतलब समूह मे खेती किसानी करना होता हे- समूह और खेती से जुड़ा हे, जो की जाटों पर दोनों ही लागू होते हैं |
इस परकार हम देखते हैं की जाट शब्द से मिलते जुलते संसार(एशिया यूरोप ) मे जितने शब्द हैं उनका मतलब
एक विशाल समूह या जैसे की आजकल हम ये मान कर चल रेहे हैं की जाट एक रेस हे पर खरा उतरता हे|
 
जाट शब्द या सामाजिक तथ्य

राणा जी के शब्द विन्यास के आधार पर यदि चर्चा को आगे बढाया जाय तो बेहतर होगा । जो पौराणिक है उस पर अभी छिद्रांवेषण न करके यह स्थापित किया जाये कि किस प्रकार तत्कालीन सामाजिक घटकों का वर्तमान जातीय स्वरूप के साथ क्या संबंध है । तथा क्या इसके पुख्ता साक्ष्य भी मिल सकते हैं । और ऐसा सिद्धांत क्या अन्य जाति समूहों की व्याख्या करने में सक्षम है ।
 


बलहारा साहब,

हमें यह भी विचारना है कि अरब लोग 'जत' अथवा 'अज्जत' /(अल +जत) शब्द से क्या अर्थ लेते थे . आर्येतर सिंध पार के गडरिये लोगों को या ऊँट-पाल
और शायद कृषि कर्म करने वाले लोगों को यह नाम दिया गया था और ऐसे लोगों को हेय दृष्टि से देखा जाता था. ऊपरी सादृश्य के आधार पर सिंध नदी के पार पूर्व के लोगों को उसी अपने 'जत' शब्द से चिन्हित कर लिया . उच्चारण भेद से 'जत' का 'जट' या 'जाट' होना कोई बड़ी बात नहीं.
धन्यवाद
सूबे सिंह राणा


हमें कुछ और प्रश्नों पर भी विचार करना चाहिय्र यथा -
जाट तो सिन्ध नदी के उस पार भी थे, पूर्वी लोगों को ही यह नाम जत क्यों दिया गया?

जत का मूल अर्थ क्या है?

खेती तो जाट ही नहीं अन्य जातियां भी करती हैं उनको जत क्यों नहीं बोला गया?

क्या सारे भारतीय जत कहलायेंगे?

हम केवल यही क्यों स्वीकार करें कि जत से जट बना है इसका उलटा अर्थात जट से जत क्यों नहीं बना?
 
हमें कुछ और प्रश्नों पर भी विचार करना चाहिय्र यथा -
जाट तो सिन्ध नदी के उस पार भी थे, पूर्वी लोगों को ही यह नाम जत क्यों दिया गया?

जत का मूल अर्थ क्या है?

खेती तो जाट ही नहीं अन्य जातियां भी करती हैं उनको जत क्यों नहीं बोला गया?

क्या सारे भारतीय जत कहलायेंगे?

हम केवल यही क्यों स्वीकार करें कि जत से जट बना है इसका उलटा अर्थात जट से जत क्यों नहीं बना?


लक्ष्मण जी ,
सूत्र की चर्चा जारी रखने का धन्यवाद. हमारी से सिंध पार के गडरिये, ऊंटपाल, छोटी मोटी खेती करने वाले अपनी तरफ के लोगों को इरानी और अरब लोग 'जत' नाम से जानते थे .यह शब्द उनके शब्द समूह मोजूद था (आज भी है) . हमारी तरफ से सिंध पार का प्रदेश नस्ली तौर पर आर्य नहीं था . हेर्बर्ट रिसले ने इसे तुर्को इरानियन अताया है . राजनीतिक दृष्टि से भी यह प्रदेश आर्यव्यवस्था का हिस्सा नहीं था . अरबों व ईरानी लोगों ने तो मिथ्या सादृश्य के हिसाब से इस पर के समूचे समुदाय को एक ही शब्द 'जत' से चिन्हित कर दिया . उसी प्रकार जैसे हम उत्तर भारतीयों ने शुरू शुरू में दक्षिण भारत के सभी प्रान्तों के लोगों को एक ही संज्ञा ' दे डाली थी . आज भी उत्तर भारत में शहर के लोग देहात से आने वाले हर व्यक्ति को (यदि पूर्व परिचय नहीं है तो) 'जाट'समझता है. खुलासा होने पर ही j आती सही होती है. चाहे ब्राह्मण भी क्यों न हो, वह भी इस लपेट में आयेगा ही .अतः हम यह अनुमान लगा सकते हैं कि 'जत' और ध्वनि भेद से 'जाट' शब्द का बाहिर वालों ने पहले हिंद (बाद के हिन्दोस्तान ) के समग्र जन के लिए प्रयोग किया . परन्तु जो व्यवसाय परक जाति नाम थे उनका प्रचलन निरंतर रहा . कृषक - प्राय ग्रामों में बहुसंख्या होने के कारण पूरा कृषक समूह 'जाट' नाम से चिन्हित हो गया. इस बहुसंख्य समुदाय में भी अनेक कारणों से इनेक विघटन हुए. हर घटक ने अपनी पहचान अलग बनाने के लिए अलग नाम धरा . लेकिन इन सब का अतीत तो साझा था. उस साझ्ले अतीत के निशान हमें जाट, राजपूत, गुजर और अहीर ' लोगों के असंख्य गोत्र नामों में मिलते हैं . मेरे विचार से तो इस विघटन का एक कारण तो 'जाट ' शब्द के साथ जुडा ( कम से कम उत्तर पश्चिम भारत में) अर्थ अपकर्ष है
.धन्यवाद
सूबे सिंह राणा
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किसी जाति के चरित्र का पता इस बात से चलता है कि उसने कैसा इतिहास लिखा, या लिखने से चूक गयी .
 
राणा साहब आप ने जत से जट या जाट बनाने का जो विचार दिया है यह सर्व मान्य नहीं है.

संस्कृत या हिंदी भाषा औए अन्य प्राकृत भाषाओँ में जट शब्द पहले से विद्यमान है.

शल्यपर्व, महाभारत पुस्तक ९ अध्याय ४४ में जटः परभुः का उल्लेख है जो कार्तिकेय के लिए भेंट लाकर सम्मान देते हैं:

एकाक्षॊ द्वादशाक्षश च तदैवैक जटः परभुः
सहस्रबाहुर विकटॊ वयाघ्राक्षः कषितिकम्पनः (IX.44.54)

जत शब्द हिंदी की शब्दावली में नहीं है. मैंने इन्टरनेट पर शर्च की तो एक जगह जत मिला हिंदी शब्दावली में जो इस प्रकार है:

जत वि. [सं.यत्] जितना। जिसे मात्रा का। क्रि.वि जिस मात्रा में। पुं. [सं.यति] ढोलक,तबले आदि में,एक प्रकार का ठेला या ताल। स्त्री. =यति (कविता की)। समानार्थक शब्द - कोई नहीं (देखें:http://pustak.org/bs/home.php?mean=31496)

इसका अर्थ भी अपकर्ष नहीं है जैसा आपने लिखा है.

अरबी भाषा में ट वर्ग नहीं है इसलिए वे जट को जत ही बोलेंगे और जाट को जात. इसका अर्थ यह नहीं हो जाता कि हमको यह शब्द ही अरबी भाषा से मिला है.

वैसे जाट शब्द की उत्पति के सम्बन्ध में किसी भी जाट इतिहास कार ने आपकी परिभाषा का समर्थन नहीं किया है. जाट की उत्पति और अर्थ जाटलैंड विकी पर भी दिए गए हैं जो यहाँ पढ़े जा सकते हैं :

http://www.jatland.com/home/Etymology_of_Jat
 
राणा साहब आप ने जत से जट या जाट बनाने का जो विचार दिया है यह सर्व मान्य नहीं है.

संस्कृत या हिंदी भाषा औए अन्य प्राकृत भाषाओँ में जट शब्द पहले से विद्यमान है.

शल्यपर्व, महाभारत पुस्तक ९ अध्याय ४४ में जटः परभुः का उल्लेख है जो कार्तिकेय के लिए भेंट लाकर सम्मान देते हैं:

एकाक्षॊ द्वादशाक्षश च तदैवैक जटः परभुः
सहस्रबाहुर विकटॊ वयाघ्राक्षः कषितिकम्पनः (ix.44.54)

जत शब्द हिंदी की शब्दावली में नहीं है. मैंने इन्टरनेट पर शर्च की तो एक जगह जत मिला हिंदी शब्दावली में जो इस प्रकार है:

जत वि. [सं.यत्] जितना। जिसे मात्रा का। क्रि.वि जिस मात्रा में। पुं. [सं.यति] ढोलक,तबले आदि में,एक प्रकार का ठेला या ताल। स्त्री. =यति (कविता की)। समानार्थक शब्द - कोई नहीं (देखें:http://pustak.org/bs/home.php?mean=31496)

इसका अर्थ भी अपकर्ष नहीं है जैसा आपने लिखा है.

अरबी भाषा में ट वर्ग नहीं है इसलिए वे जट को जत ही बोलेंगे और जाट को जात. इसका अर्थ यह नहीं हो जाता कि हमको यह शब्द ही अरबी भाषा से मिला है.

वैसे जाट शब्द की उत्पति के सम्बन्ध में किसी भी जाट इतिहास कार ने आपकी परिभाषा का समर्थन नहीं किया है. जाट की उत्पति और अर्थ जाटलैंड विकी पर भी दिए गए हैं जो यहाँ पढ़े जा सकते हैं :

http://www.jatland.com/home/etymology_of_jat

लक्ष्मण जी ,
'जाट' (जातिसूचक ) शब्द का मूल, इसका (इसी अर्थ में प्रयोग) इतिहास एवं इसकी व्युत्पत्ति इत्यादि वर्त्तमान 'सूत्र' हमारी चर्चा का विषय है. आप ने स्वयं कहा है कि जाति के लिए जाट शब्द का प्रयोग बहुत बाद का है. तो फिर पाणिनि के काल में यह शब्द कहाँ है?
,जाट इतिहास लिखने वाले लेखकों कि कही बातें ही जो जाटलैंड विकी पर मिलाती हैं यदि उन्ही को सही मान लेना है तो नई चर्चा का उद्देश्य क्या है ? यदि नई व्याख्या प्रमाण पर आधारित है तो उसे स्वीकारने में आपत्ति नहीं होनी चाहिए और पुरानी व्याख्या को छोड़ देना चाहिए.
इन लेखकों में से अनेक को तो यह भी स्पष्ट नहीं था कि 'जट' धातु अष्टाध्यायी में नहीं अपितु 'धातुपाठ' (एक अलग ग्रन्थ )में आती है. कुछ तो यह भी लिख गए कि पाणिनि ने अपने एक श्लोक में 'जट' धातु का उल्लेख किया है.क्या ऐसे वक्तव्यों कि छटनी नहीं करनी चाहिए जाटलैंड विकी से ? 'अकर्तरि च कारके संज्ञायां ' ( ३.१९ ) सूत्र कि सही व्याख्या करके में ने पहले ही दर्शाया कि 'जट' धातु से 'जाट' शब्द कि सिद्धि करने के लिए ऊपर के सूत्र से 'घयँ' प्रत्यय लगाने कि व्यवस्था नहीं है.आपने जो जटः के उद्धरण दिए हैं वहां अर्थ जटाओं का है न कि 'जाट' रूप में जाति के अर्थ में .
मेरा यह भी कहना है कि 'जाट' शब्द भारतीय भाषाओँ का नहीं है. तब 'जत' 'और 'जाट' के परस्पर सम्बन्ध या पौर्वापर्य के प्रसंग में 'जाट' शब्द को पुनः संस्कृत निष्ठ मान कर चलने कि जरूरत कहाँ है ? और हिंदी शब्द कोष में 'जत' को किस लिए खजा जाए . हमें अरबी शब्द कोष देखना चाहिए . इतना कहना क्या गलत होगा कि जिस ध्वनी को अरब 'त' से प्रकट कटे थे उसी को भारत की ओर 'ट' द्वारा प्रकट किया गया. मुग़ल दरबार मैं उनका चिर परिचित 'जत' शब्द 'घुड़सवार' से निम्न दर्जे के 'प्यादे जवान' (फुट- सोल्जर ) प्रयुक्त हुआ है . शहंशाह द्वारा स्वीकृत किये गए 'घुड़सवार 'एवं 'जत' संख्या अमीरों की हैसियत की सूचक होती थी .
यह ठीक है कि जाट इतिहास लेखकों ने जो लिखा है मेरी कई बातें उस के अनुसार नहीं हैं . जो तो अब नहीं हैं उनके लेख तो सदा यथावत बने रहेंगे . परन्तु जो हैं उनके बारे में तो में इतना कह सकता हूँ कि यदि सम्यक तर्क जब उनके सामने आएगा तो वे अवश्य अपनी अवधारणाओं पर पुनर्विचार करेंगे . व्यक्तिगत रूप से में कोई चीज सिद्ध करने पर नहीं तुला हूँ . में सोच कि सीमा को भी समझता हूँ और आवश्यक हो तो उसे बदलने में
संकोच नहीं करता .
धन्यवाद
सूबे सिंह राणा
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किसी जाति के चरित्र कि पहचान इस बात से होती है कि उस ने अपना कैसा इतिहास लिखा. या लिखने से चूक गयी .
 
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