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भारत के कानून
भारत में 1857 के पहले ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन हुआ करता था वो अंग्रेजी सरकार का सीधा शासन नहीं था. 1857 में एक क्रांति हुई जिसमे इस देश में उपस्थित 99 % अंग्रेजों को भारत के लोगों ने चुन चुन के मार डाला था और 1% इसलिए बच गए क्योंकि उन्होंने अपने को बचाने के लिए अपने शरीर को काला रंग लिया था. लोग इतने क्रोध में थे कि उन्हें जहाँ अंग्रेजों के होने की भनक लगती थी तो वहां पहुँच के वो उन्हें काट डालते थे. हमारे देश के इतिहास की पुस्तकों में उस क्रांति को सिपाही 'विद्रोह' के नाम से पढाया जाता है. Mutiny और Revolution में अंतर होता है किन्तु इस क्रांति को विद्रोह के नाम से ही पढाया गया हमारे इतिहास में. 1857 की गर्मी में मेरठ से आरम्भ हुई ये क्रांति जिसे सैनिकों ने प्रारंभ किया था, परन्तु 'एक साधारण व्यक्ति' [Common people ] का आन्दोलन बन गया और इसकी अग्नि पूरे देश में प्रज्वलित हो गयी और 1 सितम्बर तक पूरा देश अंग्रेजों के चंगुल से स्वतंत्र हो गया था. भारत अंग्रेजों और अंग्रेजी अत्याचार से पूरी तरह मुक्त हो गया था परन्तु नवम्बर 1857 में इस देश के कुछ गद्दार रजवाड़ों ने अंग्रेजों को वापस बुलाया और उन्हें इस देश में पुनर्स्थापित करने में हर प्रकार से योगदान दिया. धन बल, सैनिक बल, खुफिया जानकारी, जो भी सुविधा हो सकती थी उन्होंने दिया और उन्हें इस देश में पुनर्स्थापित किया और आप इस देश का दुर्भाग्य देखिये कि वो रजवाड़े आज भी भारत की राजनीति में सक्रिय हैं. अंग्रेज जब वापस आये तो उन्होंने क्रांति के उद्गम स्थल बिठुर (जो कानपुर के समीप है) पहुँच कर सभी 24000 लोगों का मार दिया चाहे वो नवजात हो अथवा मरणासन्न. बिठुर के ही नाना जी पेशवा थे और इस क्रांति की सारी योजना यहीं बनी थी इसलिए अंग्रेजों ने ये बदला लिया था. उसके पश्चात उन्होंने अपनी सत्ता को भारत में पुनर्स्थापित किया और जैसे एक सरकार के लिए आवश्यक होता है वैसे ही उन्होंने कानून बनाना प्रारंभ किया. अंग्रेजों ने कानून तो 1840 से ही बनाना आरम्भ किया था और मोटे रूप में उन्होंने भारत की अर्थव्यवस्था को ध्वस्त कर दिया था परन्तु 1857 से उन्होंने भारत के लिए ऐसे-ऐसे कानून बनाये जो एक सरकार के शासन करने के लिए आवश्यक होता है. आप देखेंगे कि हमारे यहाँ जितने कानून हैं वो सब के सब 1857 से लेकर 1946 तक के हैं.
1840 तक का भारत जो था उसका विश्व व्यापार में 33% की भागीदारी थी, संसार के कुल उत्पादन का 43% भारत में उत्पन्न होता था और संसार की आय में भारत का भाग 27% था. ये अंग्रेजों को बहुत खटकती थी, इसलिए आधिकारिक रूप से भारत को लूटने के लिए अंग्रेजों ने कुछ कानून बनाये थे और वो कानून अंग्रेजों के संसद में बहस के पश्चात तैयार हुई थी, उस बहस में ये निश्चित हुआ कि "भारत में होने वाले उत्पादन पर टैक्स लगा दिया जाये क्योंकि सारे संसार में सबसे अधिक उत्पादन यहीं होता है और ऐसा हम करते हैं तो हमें टैक्स के रूप में बहुत पैसा मिलेगा." तो अंग्रेजों ने सबसे पहला कानून बनाया Central Excise Duty Act और टैक्स तय किया गया 350% अर्थात 100 रूपये का उत्पादन होगा तो 350 रुपया Excise Duty देना होगा. इसके पश्चात अंग्रेजों ने सामान के बेचने पर Sales Tax लगाया और वो तय किया गया 120% अर्थात 100 रुपया का माल बेचो तो 120 रुपया CST दो. इसके पश्चात एक और टैक्स आया Income Tax और वो था 97% अर्थात 100 रुपया कमाया तो 97 रुपया अंग्रेजों को दे दो. ऐसे ही Road Tax, Toll Tax, Municipal Corporation tax, Octroi, House Tax, Property Tax लगाया और ऐसे करते-करते 23 प्रकार के टैक्स लगाये अंग्रेजों ने और खूब लूटा इस देश को. 1840 से लेकर 1947 तक टैक्स लगाकर अंग्रेजों ने जो भारत को लूटा उसके सारे रिकार्ड बताते हैं कि लगभग 300 लाख करोड़ रुपया लूटा अंग्रेजों ने इस देश से. तो भारत में जो निर्धनता आयी है वो लूट में से आयी निर्धनता है. विश्व व्यापार में जो हमारी भागीदारी उस समय 33% थी वो घटकर 5% रह गयी, हमारे कारखाने बंद हो गए, लोगों ने खेतों में काम करना बंद कर दिया, हमारे मजदूर बेरोजगार हो गए. इस प्रकार से बेरोजगारी उत्पन्न हुई, निर्धनता-बेरोजगारी से भूखमरी उत्पन्न हुई और आपने पढ़ा होगा कि हमारे देश में उस समय कई अकाल पड़े, ये अकाल प्राकृतिक नहीं थे अपितु अंग्रेजों के ख़राब कानून से उत्पन्न हुए अकाल थे, और इन कानूनों के कारण से 1840 से लेकर 1947 तक इस देश में साढ़े चार करोड़ लोग भूख से मरे. तो हमारी निर्धनता का कारण ऐतिहासिक है कोई प्राकृतिक, आध्यात्मिक अथवा सामाजिक कारण नहीं है. हमारे देश में अंग्रेजों ने 34735 कानून बनाये शासन करने के लिए, सब का उल्लेख करना तो कठिन है परन्तु कुछ मुख्य कानूनों के बारे में मैं संक्षेप में लिख रहा हूँ:-
भारत में 1857 के पहले ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन हुआ करता था वो अंग्रेजी सरकार का सीधा शासन नहीं था. 1857 में एक क्रांति हुई जिसमे इस देश में उपस्थित 99 % अंग्रेजों को भारत के लोगों ने चुन चुन के मार डाला था और 1% इसलिए बच गए क्योंकि उन्होंने अपने को बचाने के लिए अपने शरीर को काला रंग लिया था. लोग इतने क्रोध में थे कि उन्हें जहाँ अंग्रेजों के होने की भनक लगती थी तो वहां पहुँच के वो उन्हें काट डालते थे. हमारे देश के इतिहास की पुस्तकों में उस क्रांति को सिपाही 'विद्रोह' के नाम से पढाया जाता है. Mutiny और Revolution में अंतर होता है किन्तु इस क्रांति को विद्रोह के नाम से ही पढाया गया हमारे इतिहास में. 1857 की गर्मी में मेरठ से आरम्भ हुई ये क्रांति जिसे सैनिकों ने प्रारंभ किया था, परन्तु 'एक साधारण व्यक्ति' [Common people ] का आन्दोलन बन गया और इसकी अग्नि पूरे देश में प्रज्वलित हो गयी और 1 सितम्बर तक पूरा देश अंग्रेजों के चंगुल से स्वतंत्र हो गया था. भारत अंग्रेजों और अंग्रेजी अत्याचार से पूरी तरह मुक्त हो गया था परन्तु नवम्बर 1857 में इस देश के कुछ गद्दार रजवाड़ों ने अंग्रेजों को वापस बुलाया और उन्हें इस देश में पुनर्स्थापित करने में हर प्रकार से योगदान दिया. धन बल, सैनिक बल, खुफिया जानकारी, जो भी सुविधा हो सकती थी उन्होंने दिया और उन्हें इस देश में पुनर्स्थापित किया और आप इस देश का दुर्भाग्य देखिये कि वो रजवाड़े आज भी भारत की राजनीति में सक्रिय हैं. अंग्रेज जब वापस आये तो उन्होंने क्रांति के उद्गम स्थल बिठुर (जो कानपुर के समीप है) पहुँच कर सभी 24000 लोगों का मार दिया चाहे वो नवजात हो अथवा मरणासन्न. बिठुर के ही नाना जी पेशवा थे और इस क्रांति की सारी योजना यहीं बनी थी इसलिए अंग्रेजों ने ये बदला लिया था. उसके पश्चात उन्होंने अपनी सत्ता को भारत में पुनर्स्थापित किया और जैसे एक सरकार के लिए आवश्यक होता है वैसे ही उन्होंने कानून बनाना प्रारंभ किया. अंग्रेजों ने कानून तो 1840 से ही बनाना आरम्भ किया था और मोटे रूप में उन्होंने भारत की अर्थव्यवस्था को ध्वस्त कर दिया था परन्तु 1857 से उन्होंने भारत के लिए ऐसे-ऐसे कानून बनाये जो एक सरकार के शासन करने के लिए आवश्यक होता है. आप देखेंगे कि हमारे यहाँ जितने कानून हैं वो सब के सब 1857 से लेकर 1946 तक के हैं.
1840 तक का भारत जो था उसका विश्व व्यापार में 33% की भागीदारी थी, संसार के कुल उत्पादन का 43% भारत में उत्पन्न होता था और संसार की आय में भारत का भाग 27% था. ये अंग्रेजों को बहुत खटकती थी, इसलिए आधिकारिक रूप से भारत को लूटने के लिए अंग्रेजों ने कुछ कानून बनाये थे और वो कानून अंग्रेजों के संसद में बहस के पश्चात तैयार हुई थी, उस बहस में ये निश्चित हुआ कि "भारत में होने वाले उत्पादन पर टैक्स लगा दिया जाये क्योंकि सारे संसार में सबसे अधिक उत्पादन यहीं होता है और ऐसा हम करते हैं तो हमें टैक्स के रूप में बहुत पैसा मिलेगा." तो अंग्रेजों ने सबसे पहला कानून बनाया Central Excise Duty Act और टैक्स तय किया गया 350% अर्थात 100 रूपये का उत्पादन होगा तो 350 रुपया Excise Duty देना होगा. इसके पश्चात अंग्रेजों ने सामान के बेचने पर Sales Tax लगाया और वो तय किया गया 120% अर्थात 100 रुपया का माल बेचो तो 120 रुपया CST दो. इसके पश्चात एक और टैक्स आया Income Tax और वो था 97% अर्थात 100 रुपया कमाया तो 97 रुपया अंग्रेजों को दे दो. ऐसे ही Road Tax, Toll Tax, Municipal Corporation tax, Octroi, House Tax, Property Tax लगाया और ऐसे करते-करते 23 प्रकार के टैक्स लगाये अंग्रेजों ने और खूब लूटा इस देश को. 1840 से लेकर 1947 तक टैक्स लगाकर अंग्रेजों ने जो भारत को लूटा उसके सारे रिकार्ड बताते हैं कि लगभग 300 लाख करोड़ रुपया लूटा अंग्रेजों ने इस देश से. तो भारत में जो निर्धनता आयी है वो लूट में से आयी निर्धनता है. विश्व व्यापार में जो हमारी भागीदारी उस समय 33% थी वो घटकर 5% रह गयी, हमारे कारखाने बंद हो गए, लोगों ने खेतों में काम करना बंद कर दिया, हमारे मजदूर बेरोजगार हो गए. इस प्रकार से बेरोजगारी उत्पन्न हुई, निर्धनता-बेरोजगारी से भूखमरी उत्पन्न हुई और आपने पढ़ा होगा कि हमारे देश में उस समय कई अकाल पड़े, ये अकाल प्राकृतिक नहीं थे अपितु अंग्रेजों के ख़राब कानून से उत्पन्न हुए अकाल थे, और इन कानूनों के कारण से 1840 से लेकर 1947 तक इस देश में साढ़े चार करोड़ लोग भूख से मरे. तो हमारी निर्धनता का कारण ऐतिहासिक है कोई प्राकृतिक, आध्यात्मिक अथवा सामाजिक कारण नहीं है. हमारे देश में अंग्रेजों ने 34735 कानून बनाये शासन करने के लिए, सब का उल्लेख करना तो कठिन है परन्तु कुछ मुख्य कानूनों के बारे में मैं संक्षेप में लिख रहा हूँ:-