Kanyaa bhurna hatyaa

saluram

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KANYAA BHURNA HATYAA​



Gaonvon maine hamare aaj bhi choriyaan, aapshakun ke jaise hoti hain∫
Inke janma par aaj bhi maiyen , aankh minch minch kar roti hain∫
Aur inke babuji ke dil par, patthron ki barish hoti hain∫
Katha yahi kanyaa bhurna hatyaa ki, aabhishaap sa jivan dhoti hain∫
Gaonvon maine hamare aaj bhi choriyaan, aapshakun ke jaise hoti hain∫∫

Jayon khile ful si chandani chamke, maa- baap ko bojhe si lagti hain∫
Yo roti khati aadhi aur, pani ek aadh glass piti hain∫
Aur aakhir maine sab garhajanon ke, jhhute sare bartan dhoti hain∫
Vah dukh main bhi hansti rahti hain, aur raton ko nind main roti hain∫
Gaonvon maine hamare aaj bhi choriyaan, aapshakun ke jaise hoti hain∫∫

Pani lakdiyan naddi se lati hain ghar, ghar ko banana chaaye sundartar∫
Badhiya se badhiya vynjan pakati, khud rah jati hain upvaas par∫
Aakshaar karuna svaar maine gati hain, maa ke gam khati peeta ke dukh dhoti hain∫
Rishton maine ho bhikhrav nahin, iss tarah ki mala piroti hain∫
Gaonvon maine hamare aaj bhi choriyaan, aapshakun ke jaise hoti hain∫∫

Jaan garbh maine aagar beta ho to, hardyaa banshen khil si jati hain∫
Bhale baad maine jhhel usse, kevaal aah si bhar aati hain∫
Aagar kanyaa ka gyaan hua to, maa nichkaruna krur ho jati hain∫
Ek aaurat-aaurat ka katla kar, dekhon kaise chain se soti hain∫
Gaonvon maine hamare aaj bhi choriyaan, aapshakun ke jaise hoti hain∫
Gaonvon maine hamare aaj bhi choriyaan, aapshakun ke jaise hoti hain∫∫

Doston iss jatland ke madhyaam se aap sab ko mera yahi sandesh hain ki kanyaa ek anmol ratna hain yaha ek laxmi ka roop hain iski raksha karna∫∫
Dhanyawad
AAPKE VICHAR BHI SADAR AAMTARIT HAIN
SALURAM D.SIYOL

DAVANGERE KARNATAKA :eek:
 
Last edited:
dear salu ram ji aapki bat sahi he ..........ganvo me kai sahra me bhi larka larki me farak chale........dekho dhire dhire kam hosi
 
dear salu ram ji aapki bat sahi he ..........ganvo me kai sahra me bhi larka larki me farak chale........dekho dhire dhire kam hosi


Bhout Badiya Saluram Ji .......................Baki Thooda Design Change Ker Deta t Or Badiya Rehta............

Saree Eksee Kaithee Ho Gayooo Bhagwan Tumnoo Santi Dewoo.............
 
गांव में हमारे आज भी छोरियां अपशकुन के जैसी होती हैं
क्योंकि अगर वे सुंदर हों तो मुश्किल और सुंदर न हों तो मुश्किल,
सुंदर हों तो गांव के सारे लफंडर उनके पीछे पड़ जाते हैं,
सुंदर न हों तो फिर रिश्ते के लिए लड़के मिलने मुश्किल हो जाते हैं.
कितनी लड़कियां ऐसी हैं, जिनके जवानी में कदम नहीं बहकते,
लगभग सबके ही तो बहकते हैं, तो कैसे कह दें कि लड़कियां वरदान के जैसे होती हैं,
खुद भूखी रहकर और सारे घरवालों को खिलाकर जब वे मौका ढूंढ़ती हैं अपने प्रेमी से मिलने का,
तब होती है असली दिक्कत, ऐसे में अगर सगोत्रीय लड़के के साथ ही प्रेम संबंध जोड़ लें तो कहने ही क्या,
तब वे समझाती हैं 'चुप रहो मूर्ख, समाज के ठेकेदारों, तुम क्या जानो मोहब्बत क्या होती है.'
ऐसे में अगर पल रहा हो गर्भ भी उनके पेट में, तब उनके घरवालों की आंखें खून के आंसू रोती हैं,
गांव में हमारे आज भी छोरियां अपशकुन के जैसी होती हैं
छोरियां निसंदेह वंदनीय हैं, उनका सम्मान किया जाना चाहिए,
लेकिन छोरियों को भी अपनी गरिमा और सीमाएं समझनी चाहिए,
प्यार करना नहीं है कोई गुनाह, लेकिन अपने गौत्र में प्यार नहीं करना चाहिए,
छोरियां चाहें तो अपने प्रेमी को काबिल इंसान बना सकती हैं,
उन्हें शादी से पहले ही सारी मर्यादाएं तोड़कर अपने को 'मॉडर्न' शो नहीं करना चाहिए,
समस्याएं छोरियों से और भी बहुत सी हैं समाज को, जिनका निदान छोरियों को ही ढूंढ़ना है,
ना करें खुद को एक पल में ही लड़कों के हवाले, लड़कों को कुछ बनकर दिखाने की चुनौती देनी चाहिए,
नहीं तो ये समाज हमेशा ही ये कहता रहेगा कि हे भगवान, मुझे तो लड़का ही देना,
क्योंकि लड़की होने से ढेरों समस्याएं पैदा होती हैं,
गांव में हमारे आज भी छोरियां अपशकुन के जैसी होती हैं.
 
गांव में हमारे आज भी छोरियां अपशकुन के जैसी होती हैं
क्योंकि अगर वे सुंदर हों तो मुश्किल और सुंदर न हों तो मुश्किल,
सुंदर हों तो गांव के सारे लफंडर उनके पीछे पड़ जाते हैं,
सुंदर न हों तो फिर रिश्ते के लिए लड़के मिलने मुश्किल हो जाते हैं.
कितनी लड़कियां ऐसी हैं, जिनके जवानी में कदम नहीं बहकते,
लगभग सबके ही तो बहकते हैं, तो कैसे कह दें कि लड़कियां वरदान के जैसे होती हैं,
खुद भूखी रहकर और सारे घरवालों को खिलाकर जब वे मौका ढूंढ़ती हैं अपने प्रेमी से मिलने का,
तब होती है असली दिक्कत, ऐसे में अगर सगोत्रीय लड़के के साथ ही प्रेम संबंध जोड़ लें तो कहने ही क्या,
तब वे समझाती हैं 'चुप रहो मूर्ख, समाज के ठेकेदारों, तुम क्या जानो मोहब्बत क्या होती है.'
ऐसे में अगर पल रहा हो गर्भ भी उनके पेट में, तब उनके घरवालों की आंखें खून के आंसू रोती हैं,
गांव में हमारे आज भी छोरियां अपशकुन के जैसी होती हैं
छोरियां निसंदेह वंदनीय हैं, उनका सम्मान किया जाना चाहिए,
लेकिन छोरियों को भी अपनी गरिमा और सीमाएं समझनी चाहिए,
प्यार करना नहीं है कोई गुनाह, लेकिन अपने गौत्र में प्यार नहीं करना चाहिए,
छोरियां चाहें तो अपने प्रेमी को काबिल इंसान बना सकती हैं,
उन्हें शादी से पहले ही सारी मर्यादाएं तोड़कर अपने को 'मॉडर्न' शो नहीं करना चाहिए,
समस्याएं छोरियों से और भी बहुत सी हैं समाज को, जिनका निदान छोरियों को ही ढूंढ़ना है,
ना करें खुद को एक पल में ही लड़कों के हवाले, लड़कों को कुछ बनकर दिखाने की चुनौती देनी चाहिए,
नहीं तो ये समाज हमेशा ही ये कहता रहेगा कि हे भगवान, मुझे तो लड़का ही देना,
क्योंकि लड़की होने से ढेरों समस्याएं पैदा होती हैं,
गांव में हमारे आज भी छोरियां अपशकुन के जैसी होती हैं.

Uppu very good, accha likh rakha hai. Baki bhai nira chhoriyan ka dosh kona, ye to dono ko sochana chahiye. Chhore ki bhi kime responsiblity bane hai.
 
Uppu very good, accha likh rakha hai. Baki bhai nira chhoriyan ka dosh kona, ye to dono ko sochana chahiye. Chhore ki bhi kime responsiblity bane hai.

हौसलाअफजाई के लिए शुक्रिया भाई संजय.
बिलकुल ठीक कही, दोनों को सोचना चाहिए और छोरे की भी पूरी-पूरी जिम्मेदारी बनती है...लेकिन भाई ये बातें कहने-भर की रह जाती हैं...क्योंकि दुनिया को रचने वाले ने दोनों को अलग-अलग ढंग का बनाया है. सबसे बड़ी समस्या यह है कि जन्मदात्री का दर्जा औरत को हासिल है. अगर ये दर्जा पुरुष को हासिल होता तो यकीन मानो लड़के घर से बाहर निकलते हुए डरा करते और परिवार की बदनामी का सबब भी वे ही बना करते.
इस स्थिति में हम चाहे जितनी बड़ी-बड़ी बातें कर लें, इसके बावजूद लड़कियों पर अतिरिक्त जिम्मेदारी हो जाती है. इस दुनिया में समाज की मुख्य धारा में या तो पुरुष है या स्त्री. स्त्रियां अगर अपने चरित्र की मजबूत हो जाएं तो पुरुष तो अपने आप सुधर जाएंगे. इसके बावजूद माता-पिता को चाहिए कि वे लड़का-लड़की में फर्क न करें और लड़का अगर गलत चले तो उसे कड़ी सजा दें...लेकिन इतने जागरूक अभिभावक होते ही कितने हैं...इसलिए मेरा तो यही कहना है कि चूंकि स्त्रियों में आत्मसंयम ज्यादा होता है, अतः वे अपनी ताकत को समझें और जो पुरुष उनके संपर्क में आएं, उन्हें भी सही रास्ता दिखाएं...नहीं तो अगर यही सब चलता रहा तो ये दुनिया अधिकतर तो नरक बन ली है...बची-खुची आने वाले समय में बन जाएगी...इससे होगा ये कि इंसान की जिंदगी और ज्यादा दुखी हो जाएगी.
अगर ऐयाशी करने वालों को भी सुखी जीवन दे दिया गया तो फिर उन्हें क्या दिया जाना चाहिए, जो ऐयाशी नहीं करेंगे? उन्हें भी सुखी जीवन दिया जाएगा. ऐसे में वे कहेंगे कि हमने तो ऐयाशी नहीं की, इसलिए हमें सुखी जीवन मिला, लेकिन जो ऐयाशी कर रहे हैं, उन्हें भी सुखी जीवन...ये तो कोई बात नहीं हुई...इसका मतलब इस दुनिया में कोई इंसाफ नहीं है...लेकिन यह इतनी बड़ी धरती...सूरज...चांद-सितारे...यह ब्रह्मांड बिना किसी कायदे-क़ानून के तो नहीं रचा गया हो सकता....नियम...इंसाफ हैं मेरे ख्याल से तो...

नोट : किसी को यह बेफालतू का भाषण लगे तो कृपया नजरअंदाज कर देना...पता नहीं क्यों बात-बात में भाषण झाड़ने लगता हूं मैं भी...;)
 
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हौसलाअफजाई के लिए शुक्रिया भाई संजय.
बिलकुल ठीक कही, दोनों को सोचना चाहिए और छोरे की भी पूरी-पूरी जिम्मेदारी बनती है...लेकिन भाई ये बातें कहने-भर की रह जाती हैं...क्योंकि दुनिया को रचने वाले ने दोनों को अलग-अलग ढंग का बनाया है. सबसे बड़ी समस्या यह है कि जन्मदात्री का दर्जा औरत को हासिल है. अगर ये दर्जा पुरुष को हासिल होता तो यकीन मानो लड़के घर से बाहर निकलते हुए डरा करते और परिवार की बदनामी का सबब भी वे ही बना करते.
इस स्थिति में हम चाहे जितनी बड़ी-बड़ी बातें कर लें, इसके बावजूद लड़कियों पर अतिरिक्त जिम्मेदारी हो जाती है. इस दुनिया में समाज की मुख्य धारा में या तो पुरुष है या स्त्री. स्त्रियां अगर अपने चरित्र की मजबूत हो जाएं तो पुरुष तो अपने आप सुधर जाएंगे. इसके बावजूद माता-पिता को चाहिए कि वे लड़का-लड़की में फर्क न करें और लड़का अगर गलत चले तो उसे कड़ी सजा दें...लेकिन इतने जागरूक अभिभावक होते ही कितने हैं...इसलिए मेरा तो यही कहना है कि चूंकि स्त्रियों में आत्मसंयम ज्यादा होता है, अतः वे अपनी ताकत को समझें और जो पुरुष उनके संपर्क में आएं, उन्हें भी सही रास्ता दिखाएं...नहीं तो अगर यही सब चलता रहा तो ये दुनिया अधिकतर तो नरक बन ली है...बची-खुची आने वाले समय में बन जाएगी...इससे होगा ये कि इंसान की जिंदगी और ज्यादा दुखी हो जाएगी.
अगर ऐयाशी करने वालों को भी सुखी जीवन दे दिया गया तो फिर उन्हें क्या दिया जाना चाहिए, जो ऐयाशी नहीं करेंगे? उन्हें भी सुखी जीवन दिया जाएगा. ऐसे में वे कहेंगे कि हमने तो ऐयाशी नहीं की, इसलिए हमें सुखी जीवन मिला, लेकिन जो ऐयाशी कर रहे हैं, उन्हें भी सुखी जीवन...ये तो कोई बात नहीं हुई...इसका मतलब इस दुनिया में कोई इंसाफ नहीं है...लेकिन यह इतनी बड़ी धरती...सूरज...चांद-सितारे...यह ब्रह्मांड बिना किसी कायदे-क़ानून के तो नहीं रचा गया हो सकता....नियम...इंसाफ हैं मेरे ख्याल से तो...

नोट : किसी को यह बेफालतू का भाषण लगे तो कृपया नजरअंदाज कर देना...पता नहीं क्यों बात-बात में भाषण झाड़ने लगता हूं मैं भी...;)

भाई ऊपू मैं आपसे और आपकी बातो से पूरी तरह सहमत हूँ, आप अच्छा ज्ञान वर्धन करते हैं.
 
हौसलाअफजाई के लिए शुक्रिया भाई संजय.
बिलकुल ठीक कही, दोनों को सोचना चाहिए और छोरे की भी पूरी-पूरी जिम्मेदारी बनती है...लेकिन भाई ये बातें कहने-भर की रह जाती हैं...क्योंकि दुनिया को रचने वाले ने दोनों को अलग-अलग ढंग का बनाया है. सबसे बड़ी समस्या यह है कि जन्मदात्री का दर्जा औरत को हासिल है. अगर ये दर्जा पुरुष को हासिल होता तो यकीन मानो लड़के घर से बाहर निकलते हुए डरा करते और परिवार की बदनामी का सबब भी वे ही बना करते.
इस स्थिति में हम चाहे जितनी बड़ी-बड़ी बातें कर लें, इसके बावजूद लड़कियों पर अतिरिक्त जिम्मेदारी हो जाती है. इस दुनिया में समाज की मुख्य धारा में या तो पुरुष है या स्त्री. स्त्रियां अगर अपने चरित्र की मजबूत हो जाएं तो पुरुष तो अपने आप सुधर जाएंगे. इसके बावजूद माता-पिता को चाहिए कि वे लड़का-लड़की में फर्क न करें और लड़का अगर गलत चले तो उसे कड़ी सजा दें...लेकिन इतने जागरूक अभिभावक होते ही कितने हैं...इसलिए मेरा तो यही कहना है कि चूंकि स्त्रियों में आत्मसंयम ज्यादा होता है, अतः वे अपनी ताकत को समझें और जो पुरुष उनके संपर्क में आएं, उन्हें भी सही रास्ता दिखाएं...नहीं तो अगर यही सब चलता रहा तो ये दुनिया अधिकतर तो नरक बन ली है...बची-खुची आने वाले समय में बन जाएगी...इससे होगा ये कि इंसान की जिंदगी और ज्यादा दुखी हो जाएगी.
अगर ऐयाशी करने वालों को भी सुखी जीवन दे दिया गया तो फिर उन्हें क्या दिया जाना चाहिए, जो ऐयाशी नहीं करेंगे? उन्हें भी सुखी जीवन दिया जाएगा. ऐसे में वे कहेंगे कि हमने तो ऐयाशी नहीं की, इसलिए हमें सुखी जीवन मिला, लेकिन जो ऐयाशी कर रहे हैं, उन्हें भी सुखी जीवन...ये तो कोई बात नहीं हुई...इसका मतलब इस दुनिया में कोई इंसाफ नहीं है...लेकिन यह इतनी बड़ी धरती...सूरज...चांद-सितारे...यह ब्रह्मांड बिना किसी कायदे-क़ानून के तो नहीं रचा गया हो सकता....नियम...इंसाफ हैं मेरे ख्याल से तो...

नोट : किसी को यह बेफालतू का भाषण लगे तो कृपया नजरअंदाज कर देना...पता नहीं क्यों बात-बात में भाषण झाड़ने लगता हूं मैं भी...;)

बढ़िया लिख्या शब्द आप श्री उपेन्द्र जी
आप जैसा मानवी मिले बहोत कम हैं। आज काल रा लोग धन्धा में ध्यान ज्यादा समाज में कम देवें हैं |
 
Last edited by a moderator:
बढ़िया लिख्या शब्द आप श्री उपेन्द्र जी
आप जैसा मानवी मिले बहोत कम हैं। आज काल रा लोग धन्धा में ध्यान ज्यादा समाज में कम देवें हैं।



बहुत-बहुत धन्यवाद, सालूराम जी.
 
bahot badhiyaa uppu bhai ,jinney virodh karnaa hogaa wey to karengey, tu haathi ki dhaal chaaley jaa,wey aapney aap triskrit ho jyaangey
 
satyamevjayte

KANYAA BHURNA HATYAA​



Gaonvon maine hamare aaj bhi choriyaan, aapshakun ke jaise hoti hain∫
Inke janma par aaj bhi maiyen , aankh minch minch kar roti hain∫
Aur inke babuji ke dil par, patthron ki barish hoti hain∫
Katha yahi kanyaa bhurna hatyaa ki, aabhishaap sa jivan dhoti hain∫
Gaonvon maine hamare aaj bhi choriyaan, aapshakun ke jaise hoti hain∫∫

Jayon khile ful si chandani chamke, maa- baap ko bojhe si lagti hain∫
Yo roti khati aadhi aur, pani ek aadh glass piti hain∫
[FONT=Monotype C
 
ए़क माँ ने सामाजिक दबाब में आकर
कन्या भ्रूणहत्या के लिए दवा खा ली है अब
कन्या भ्रूण के पास जो थोड़ा सा समय शेष
है उसमें वह अपनी माँ से कुछ दिन की बात
... कहती है वो कया हैॽ
मैं आती तो घर के अंदर ... गुड़िया घर
बनवाती माँ
मैं आती तो संग तेरे... पूजा की थाल
सजवाती माँ
चूड़ी कंगन पहन के मैं ... खन खन खन
खनाती माँ
मैं आती तो पैरो मैंपायल ... छन छन छन
छनकाती माँ
साड़ी तेरी तह करके... आलमारी में
रखवाती माँ
रंग बिरंगी रंगोली से ... घर आँगन
सजवाती माँ
दीवाली में दियों में बाती ... तेरे संग
लगवाती माँ
परेशानी में सहेली बनकर ... तुझको में
समझती माँ
नाना-नानी कौन कहेगा ... मामा-मामी के
संग रहेगा
जब कन्या भ्रूण मारी जायेगी ... तब रिश्ते
भी मर जायेगे
ये शब्द अनसुने रह जायेंगे ... खैंर छोड़ इन
बातों को
तूझे मैं ये बतलाती माँ ... तेरे लिये सब से
लड़ती
मेरे लिये कौन लड़ेगा ... माँ तेरा आँचल क्यूँ
भीगा है
तूँ अब क्यूँ रोती है ... छोड़ स्वप्न कीबातें
तेरी बिटिया अब ... चिर निद्रा में
सोती है..…
 
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