ravindersura
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http://www.bhaskar.com/article/HAR-HAR-HIS-khapon-british-state-2314348.html?C3-HAR=
हिसार. बाकी हरियाणा की तरह खाप फिल्म हिसार में भी रिलीज नहीं हुई। कुछ संगठनों का कहना है कि इसमें खापों को तुगलकी स्वरूप में दिखाया गया है। उन्होंने फिल्म का ‘कड़ा विरोध’ करने का एलान कर दिया।
कुछ संगठनों ने कहा फिल्म देखने के बाद फैसला करेंगे। हालांकि न ही उन्हें ये मौका मिला न आम लोगों को। मगर फिल्म के बहाने लोगों में एक बार फिर खापों को लेकर चर्चा है। ऐसे में भास्कर आपके सामने लाया है दो विचार, खापों पर।
कभी नहीं सुनाया आनर किलिंग जैसा फैसला
देश में छोटी बड़ी 600 खाप हैं। खाप का इतिहास काफी पुराना है। पहले खाप गणों के नाम से जानी जाती थीं। 643 में महाराजा हर्ष वर्धन ने गणों को खापों में परिवर्तित किया। पहले सभी धर्मो में खाप होती थीं। पंजाब और राजस्थान में भी खापों का दबदबा था। उत्तर भारत में यूपी के बिजनौर से राजस्थान के भरतपुर तक और हिसार से अलीगढ़ तक खापों का अपना अलग ही महत्व है। राजस्थान में राजपूतों के शासन में खापों का नाम मिटा दिया गया। पंजाब में खालिस्तान आंदोलन के समय खापों को खत्म कर दिया गया। हरियाणा में भी पंजाब से सटे हुए फतेहाबाद, डबवाली और सिरसा की तरफ खाप नहीं है।
मध्ययुग में खापों का मकसद सुरक्षा और सामाजिक कार्यो में आम लोगों को भागीदार बनाना था। खापों की अपनी सेना होती थी। जिसमें पहलवान शामिल होते थे। खापों की सेना ने मुगलों से कई युद्ध लड़े और जीते भी। 1857 की क्रांति के बाद अंग्रेजों ने खापों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। यह 90 सालों तक यह प्रतिबंध रहा। लोग खापों को भूल गए। 1947 में देश आजाद होने के बाद खाप दोबारा सामने आईं।
खाप ने कभी ऑनर किलिंग जैसा कोई फैसला नहीं सुनाया है। अंतरजातीय शादी पर किसी खाप या सर्व खाप की पंचायत नहीं हुई है। खाप में फैसला न होने पर सर्व खाप फैसला सुनाती है। सर्व खाप में कोई प्रधान नहीं होता। फैसलों से पहले प्रधान और सचिव चुने जाते हैं।
कमांडेंट हवा सिंह सांगवान, प्रदेश अध्यक्ष, अखिल भारतीय जाट आरक्षण संघर्ष समिति (इन्होंने अपनी किताब ‘चौधरी छोटू राम हत्यारा कौन’ में खाप पर विशेष लेख लिखा है।)
समाज का बड़ा तबका खाप से जुड़ा ही नहीं
मध्यकाल में यह व्यवस्था विदेशी आक्रांताओं से बचने और आपसी विवाद को घर में ही निपटाने के लिए बनाई गई थी। मगर अब इनका इस्तेमाल सामंतवाद को आगे बढ़ाने में किया जा रहा है। इनकी न तो कोई जवाबदेही है और न ही इनमें न्याय। बदलते परिवेश में इनकी कोई आवश्यकता भी नहीं है। समाज को नियंत्रित करने के लिए पुलिस और अदालतें ही पर्याप्त हैं। खाप पंचायतों के फैसलों में अब न्याय नहीं तुगलकी फरमान होता है। यह कुछ जातियों तक सीमित हो गई हैं।
नैतिकता से परे खाप पंचायतें घर निकाला, पति पत्नी को भाई-बहन बनाने, हत्याओं को शह देने में संलिप्त हैं। यह न केवल गैर कानूनी है बल्कि गैर संवैधानिक भी है। अगर खाप पंचायतों को किसी से कोई ऐतराज है तो वह उस व्यक्ति से अपने सामाजिक संबंध तोड़ ले लेकिन हत्या जैसा जघन्य अपराध को किसी तरह से सही नहीं ठहराया जा सकता है।
खाप पंचायतों में महिलाओं पर फैसले लिए जाते हैं, मगर उन्हें बोलने का भी मौका नहीं दिया जाता है। यह एक निरंकुश शासक की तरह है। इनका नियंत्रण बहुत ही आवश्यक हो गया है। सरकारें वोट बैंक के दबाव में कार्रवाई नहीं करती हैं लेकिन उन्हें शायद यह नहीं मालूम की समाज का बड़ा वर्ग इनसे जुड़ा हुआ नहीं। दिल्ली की सीमा से सटे रोहतक, झज्जर, सोनीपत, पानीपत, कैथल और करनाल में ही केवल इनका प्रभाव है।
डीआर चौधरी
(हरियाणा लोकसेवा आयोग के अध्यक्ष और हरियाणा प्रशासनिक सुधार आयोग के सदस्य रहे हैं)
कुछ संगठनों ने कहा फिल्म देखने के बाद फैसला करेंगे। हालांकि न ही उन्हें ये मौका मिला न आम लोगों को। मगर फिल्म के बहाने लोगों में एक बार फिर खापों को लेकर चर्चा है। ऐसे में भास्कर आपके सामने लाया है दो विचार, खापों पर।
कभी नहीं सुनाया आनर किलिंग जैसा फैसला
देश में छोटी बड़ी 600 खाप हैं। खाप का इतिहास काफी पुराना है। पहले खाप गणों के नाम से जानी जाती थीं। 643 में महाराजा हर्ष वर्धन ने गणों को खापों में परिवर्तित किया। पहले सभी धर्मो में खाप होती थीं। पंजाब और राजस्थान में भी खापों का दबदबा था। उत्तर भारत में यूपी के बिजनौर से राजस्थान के भरतपुर तक और हिसार से अलीगढ़ तक खापों का अपना अलग ही महत्व है। राजस्थान में राजपूतों के शासन में खापों का नाम मिटा दिया गया। पंजाब में खालिस्तान आंदोलन के समय खापों को खत्म कर दिया गया। हरियाणा में भी पंजाब से सटे हुए फतेहाबाद, डबवाली और सिरसा की तरफ खाप नहीं है।
मध्ययुग में खापों का मकसद सुरक्षा और सामाजिक कार्यो में आम लोगों को भागीदार बनाना था। खापों की अपनी सेना होती थी। जिसमें पहलवान शामिल होते थे। खापों की सेना ने मुगलों से कई युद्ध लड़े और जीते भी। 1857 की क्रांति के बाद अंग्रेजों ने खापों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। यह 90 सालों तक यह प्रतिबंध रहा। लोग खापों को भूल गए। 1947 में देश आजाद होने के बाद खाप दोबारा सामने आईं।
खाप ने कभी ऑनर किलिंग जैसा कोई फैसला नहीं सुनाया है। अंतरजातीय शादी पर किसी खाप या सर्व खाप की पंचायत नहीं हुई है। खाप में फैसला न होने पर सर्व खाप फैसला सुनाती है। सर्व खाप में कोई प्रधान नहीं होता। फैसलों से पहले प्रधान और सचिव चुने जाते हैं।
कमांडेंट हवा सिंह सांगवान, प्रदेश अध्यक्ष, अखिल भारतीय जाट आरक्षण संघर्ष समिति (इन्होंने अपनी किताब ‘चौधरी छोटू राम हत्यारा कौन’ में खाप पर विशेष लेख लिखा है।)
समाज का बड़ा तबका खाप से जुड़ा ही नहीं
मध्यकाल में यह व्यवस्था विदेशी आक्रांताओं से बचने और आपसी विवाद को घर में ही निपटाने के लिए बनाई गई थी। मगर अब इनका इस्तेमाल सामंतवाद को आगे बढ़ाने में किया जा रहा है। इनकी न तो कोई जवाबदेही है और न ही इनमें न्याय। बदलते परिवेश में इनकी कोई आवश्यकता भी नहीं है। समाज को नियंत्रित करने के लिए पुलिस और अदालतें ही पर्याप्त हैं। खाप पंचायतों के फैसलों में अब न्याय नहीं तुगलकी फरमान होता है। यह कुछ जातियों तक सीमित हो गई हैं।
नैतिकता से परे खाप पंचायतें घर निकाला, पति पत्नी को भाई-बहन बनाने, हत्याओं को शह देने में संलिप्त हैं। यह न केवल गैर कानूनी है बल्कि गैर संवैधानिक भी है। अगर खाप पंचायतों को किसी से कोई ऐतराज है तो वह उस व्यक्ति से अपने सामाजिक संबंध तोड़ ले लेकिन हत्या जैसा जघन्य अपराध को किसी तरह से सही नहीं ठहराया जा सकता है।
खाप पंचायतों में महिलाओं पर फैसले लिए जाते हैं, मगर उन्हें बोलने का भी मौका नहीं दिया जाता है। यह एक निरंकुश शासक की तरह है। इनका नियंत्रण बहुत ही आवश्यक हो गया है। सरकारें वोट बैंक के दबाव में कार्रवाई नहीं करती हैं लेकिन उन्हें शायद यह नहीं मालूम की समाज का बड़ा वर्ग इनसे जुड़ा हुआ नहीं। दिल्ली की सीमा से सटे रोहतक, झज्जर, सोनीपत, पानीपत, कैथल और करनाल में ही केवल इनका प्रभाव है।
डीआर चौधरी
(हरियाणा लोकसेवा आयोग के अध्यक्ष और हरियाणा प्रशासनिक सुधार आयोग के सदस्य रहे हैं)
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