Khap par unbiased article

samarkadian

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खाप पर चर्चा का आरम्भ पहले प्रचलित गलतफहमियों के जाल को हटाने के साथ होना चाहिये। सवाल पर भ्रम रचना के अनेक कारण बने हैं। एक-एक को परखना होगा। इस चर्चा की आवश्यकता पड़ने का कारण यह बना है कि एक दशक से अधिक हो गया जब खाप के विरुद्ध देश के प्रचार माध्यमों, विशेष कर अखबारों में चले एकतरफा अभियान के कारण अब तक ग्रामीण भारत की जीवनशैली ही शक के घेरे में पड़ गयी है। उसे दकियानूसी बताने वाले उछाल पर हैं और स्वयं आधुनिक बने हुए हैं। आधुनिकता का पैमाना भी अपना।

इस दुष्प्रचार की कसरत में जिस तरह की शब्दावली व वाक्यविन्यास का प्रयोग हुआ है उससे इस अभियान के असली मकसद पर ही शक खड़ा होता है। तब पूरे सवाल को सामने रखना जरूरी बन गया है। भाषा-विज्ञान के जानकार जानते हैं कि वाक्यविन्यास व शब्दावली का प्रयोग खास प्रभाव छोड़ता है, यही भाषा का प्रयोजन है। फिर, प्रचार चलाने वाले कोई बच्चा बुद्धि नहीं हैं कि भाषा का प्रयोग प्रयोजन रहित हो। कुछ ‘ऑनर किलिंग’ की घटनाओं को लेकर विगत एक दशक से अधिक चलते आ रहे इस अभियान पर ध्यान देेने से स्पष्ट होता है कि निशाना मात्र इन घटनाओं पर रोष जताना नहीं है, बल्कि इसके पीछे मकसद कहीं अधिक गहरा है। प्रचार का रूप प्रयोजन हेतु संगठित प्रयास का है, इसीलिए इसे अभियान कहना सर्वथा उचित है। खाप के सवाल पर यह चर्चा आरम्भ करने में संवाद की हमारी जरूरत का यह बुनियादी कारण है।

इस प्रचार द्वारा लांछन अभियान का परिणाम है कि ग्रामीण भारत की ऐसी प्रथा पर गलतफहमियों का अंधकार छा चुका है जो उसके सामाजिक जीवन कों सांस देती है। उत्तर भारत के एक विशेष क्षेत्र में खाप शब्द प्रचलित है। दूसरे भागों में इस प्रथा के लिए अलग अलग शब्द प्रयोग में आतें हैं। अनेक जगह इसें केवल पंचायत भी कहा जाता है तो कहीं पॉल शब्द का प्रयोग होता है।

जब इस अभियान का निशाना वह क्षेत्र आया जहां इस प्रथा के लिए खाप शब्द का प्रयोग होता है तब मकसद का एक दूसरा कोणा भी खुला। यह अधिक गम्भीर है। इन सब पहलुओं को ध्यान में रख कर चर्चा का आरम्भ हुआ है, क्योंकि स्वयं ग्रामीण क्षेत्रों में भी नासमझी का आलम देखने में आता है, खास कर नयी पीढी के लोगों में यह कमजोरी व्याप्त है।

खाप कोई संस्था नहीं

यह पहले दर्जे का भ्रम है कि खाप कोई बनी बनाई संस्था है। इस भ्रम के कारण खाप के खाते में अनेक बेमतलब लांछन जुड़ गये हैं। खाप कोई संस्था या संगठन नहीं, प्रथा (व्यवहार) है। ध्यान से परखें तो खाप पद्धति का स्वरूप स्वयं बताता है कि मानव जाति ने जब से खेती-बाड़ी के लिए एक जगह टिक कर रहना आरम्भ किया तभी से यह पद्धति उसकी फितरत का हिस्सा बन गयी है। बस, आगे चलकर क्षेत्र विशेष में इसे खाप का नाम दे दिया गया और जरूरत के अनुसार इसे तराश लिया गया है जिससे खाप लोकतन्त्र का अनुपम रूप बन चुकी है। भारत के पुराने इतिहास में जिसे अनेक पर्यटकों ने ‘लिटिल रिपब्लिक’ यानी लघु लोकतन्त्र का नाम दिया था खाप उसी का नाम है।

पूंजी कमाने की अंधी दौड का आरम्भ होते ही, सन् 1991 के बाद से अपने को अति आधुनिक होने का गुमान लेकर चलने वाले लोगों को भ्रम हो गया लगता है कि वे ग्रामीण भारत को जैसा चाहेंगे हांकेंगे और उसे भी अपने जैसा आधुनिक बना कर छोडेंगे। अभियान का सुर यही है। देहात को भी बता देना चाहिए कि वह ऐसा आधुनिक बनने से इंकार करता है। स्पष्टता अच्छी बात है। देश इन मुट्ठीभर लोगों का ही नहीं देहातियों का भी है। ये लोग खाप को अपनी जहर भरी शब्दावली में पेश करने पर जुटे हुए हैं। खाप वह नहीं है, जैसा वे कहते हैं। यह मानने को दिल नहीं करता कि ये लोग अनजान या बेवकूफ हैं। लेकिन चालाक हैं और अनेक धूर्त हैं, यह अब तक साफ हो चुका है। एक खास मकसद लेकर चलने वाले लोगों का देहात विरोधी अभियान चल रहा है जिसका सीधा सम्बंध धन की अंधी दौड़ के साथ जुड़ा हुआ है। यह हम आगे देखेंगे।

देश के प्रचार माध्यमों, खासकर अखबारों में खाप के विरुद्ध लांछन अभियान वह मान कर चल रहा है कि यह एक संस्था है। इधर, इस दुष्प्रचार अभियान के दौरान खाप के कुछ चौधरियों द्वारा बिना सोचे बयानबाजी में अपनाये लहजे के चलते अखबारों को अवसर मिल गया है कि खाप को एक संस्था बताया जाए तभी विरोधियों का मकसद पूरा होगा। संस्था को ही उनका तन्त्र कानूनन प्रतिबंधित कर पायेगा, पद्धति को रोक पाना सांप की बूम्बी में हाथ देने जैसा कर्म होगा, यह बात ये लोग जानते हैं। किन्तु, खाप के इतिहास व कार्यपद्धति पर ध्यान दिया जाए तो स्वयं स्पष्ट है कि यह धारणा गलत है। असल में खाप एक प्रथा का नाम है। इसे संस्था या संगठन मानना या रूप देना विरोधियों के जाल में फंसने जैसा होगा!

सर्वप्रथम एक बात स्पष्ट होनी चाहिए। यह प्रथा जिसका रूप खाप शब्द के साथ जुड़ा हुआ है दुनियां का ऐसा कोई कोणा नहीं जहां के ग्रामीण क्षेत्र में इसका प्रयोग न होता हो। मनुष्य के साथ यह सार्वभौमिक प्रथा है। जैसे जैसे मनुष्य ने समूह में रहना, जीना सीखा यह प्रथा उसका अंग बनती चली गयी। यह प्रथा है अपनी समस्याओं को मिल बैठ कर आपस में सुलझाना। शहरों में जो लोग बसते चले गये इसका उनके जीवन से सम्बंध टूटता चला गया, क्योंकि शहरी जीवन समूह की जगह व्यक्ति केन्द्रित होता है। शहरी जीवन का समूह मात्र व्यक्ति का जोड़ रहता है जबकि ग्रामीण क्षेत्र में जीवन रिश्तो पर टिके समूह का होता है, दोनों में यह बुनियादी फर्क है जिसे आम तौर पर चर्चा में अनदेखा किया जाता है और भ्रम का लाभ कुछ लोग उठा ले जाते हैं। यह बात खाप शब्द प्रयोग होने वाले क्षेत्रों में तो पूरी तरह सच है।

खाप शब्द प्रयोग होने वाले क्षेत्र में मनुष्यजाति की इस प्रथा का सबसे ंअच्छा रूप बन पाया। इसका इतिहासिक कारण है। इस क्षेत्र में पारिवारिक खेती करने वाले कबीलों, जातियों में अपने कर्म पर अधिक भरोसा रहा है। यहां कबीलों व जातियों-गोत्रों के रिश्तों पर टिके गांव बसे। यह क्षेत्र किसी बाहरी परम शक्ति पर विश्वास न करके अपनों में मिलकर रहने, सोचने-समझने व कर्म पर अधिक विश्वास करता आया है जिनकी जिंदगी खेती व खेती से जुडे काम पर चलती है। यह भी एक कारण है कि खाप के विरोधी इससे इतने परेशान नज़र आते हैं।

चूंकि भारत में व्यक्ति अधिकार वाली चुनाव पद्धति का चलन आजादी के बाद आरम्भ हुआ जिसका सम्बंध राज की ताकत में साझेदारी का सवाल प्रमुख है, उससे यहां राजनीतिक पार्टियों अथवा संगठन बना कर इस दौड़ में शामिल होने का रिवाज हो गया है। उससे महत्वाकांक्षी लोगों में संगठन की अजब तरह की समझ बन गयी है और इसे वे ‘संगठन में शक्ति’ की कहावत के अनुसार प्रयोग करने में लगे रहते हैं। इसका प्रभाव देहात के लोगों पर भी पड़ा है। किन्तु यह मानना पड़ेगा कि यह परायी पद्धति है जिसका कृषि पर आधारित मौलिक ग्रामीण जीवन शैली से कोई मेल नहीं बैठता है। खाप शब्द को लेकर ग्रामीण क्षेत्र में बहुत महानुभाव इसका एक राजनीतिक पार्टी की तरह प्रयोग करने लगे हैं जिससे इस प्रथा को हानि पहुंच रही है। वर्तमान में टकराव का यह मूल कारण है जब दोनो में अन्तर को न समझ कर व्यवहार किया जाता है। खाप को संगठन या संस्था की तरह मान कर चलने वाले स्वयं उसके हिमायती महानुभाव इस खतरे को अनदेखा करते हैं और इस प्रथा को चोट पहुंचाने का कारण बनते हैं, भले अनजाने सही। खाप के विरुद्ध अभियान चलाने वाले चालबाज लोग तो इसे संस्था बताने पर जुटे हुए ही हैं, इससे उनको शिकार करने की सुविधा होती है। यह पहली बात है जिसपर समझ को स्पष्ट करना होगा। (क्रमशः)
 
संस्था व खाप प्रकृति से भिन्न

चर्चा का सन्दर्भ खाप को लेकर है। प्रश्न यह है कि खाप को संस्था/सभा मानकर चर्चा हो अथवा उसे ग्रामीण भारत के लोगों की जीवनशैली समझा जाए; उसे उनका एक रिवाज, जीवन पद्धति माना जाए और क्यों? एक दशक से ऊपर हो गया है अपनी उधार की शक्ति का गुमान लेकर खाप के विरुद्ध जो दुष्प्रचार अभियान चला रहे हैं वे इसे संस्था/सभा का रूप मान कर बात कर रहे है। जब वे कहते हैं कि खाप विकास विरोधी, राष्ट्र-विरोधी है, इसलिए उसपर सख्त कानून बना कर पाबंदी लगे तो वे इसे एक संस्था मान कर चल रहे होते हैं। इस लहजे में बात करने वाले लोग या तो देहाती जीवन से पूरी तरह अनजान हैं या फिर उसे लांछित करके खत्म करने को लगे हुए चालाक लोग हैं। संस्था और खाप बुनिायदी तौर पर अलग हैं; खाप की प्रकृति अनौपचारिक है तो संस्था औपचारिक नस्ल की देन है। अनौपचारिक रूप से विकसित खाप पद्धति अथवा परविार, बिरादरी जैसी संस्था को कोई एक योजना से बनाता नहीं है विकसित हुई हैं। उनका कोई लिखित विधि-विधान नहीं होता आचरण-व्यवहार से जन्मी परम्परा होती है जिनसे उनका गति-विज्ञान बनता-चलता है। औपचारिक संस्था किसी निर्धारित लक्ष्य को लेकर बनाई होती हैं।

खाप पर टेढी नजर लेकर चलने वाले लोग लोग उनके महानुभानों के नाती हैं जिन्हें ग्रामीण आंचल में शादी व गौणे के बीच भेद का ज्ञान नहीं और चले हैं सब के लिए एक समान विवाह कानून बनाने! सन् 1956 में बना हिंदू विवाह कानून इसी शहरी सोच का परिणाम था। इससे समस्याएं घटी नहीं, बढी ही हैं। ज्यो ज्यों पता चलता जाता है कि यह कानून किस तरह सब के जीवन को एक सूत्र में बांधने की साजिश थी इसका विरोध उठता रहता है। इसमें ऐसे प्रावधान रखे गये जिनका हिंदू कोड बिल बनाते समय 1951 में विरोध हुआ था। वे भारत में सब को एक समान मनु के कोड पर चलने वाले हिंदू मान कर चलते हैं जबकि हिंदूओं में ऐसे समुदायों समूहों की भरमार है जिन्होंने मनु की व्यवस्था के विरुद्ध रेखा खींच कर अपनी व्यवस्था बना कर जीवन चलाया उनमें जाट बिरादरी समेत कृषि कर्म पर टिके बहुत कबीले हैं। रीति-नीति से विविधताओं भरे देश की असलियत को नकार कर सभी पर मनुवादी बाध्यताओं को राज की ताकत के सहारे लादने पर तुले हुए लोग हैं जो देश की एकता को हानि पहुंचाने का काम कर रहे हैं।

राजाओं का अपना एक रिवाज, एक राजकला हैः कुत्ते को गाली दो, पागल बताओ और गोली मारो। अभियान चलाने वाले ये लोग आधुनिक राजा हैं जिन्हें पूंजी के मोह ने डस लिया है। इसलिए हम परखना चाह रहे हैं कि खाप व देहात को विकास विरोधी कहने के पीछे इनका असली मकसद क्या है?

संस्था व पद्धति (रिवाज) के अन्तर को नजरन्दाज करके जो लोग खाप पर चर्चा करते हैं वे अक्सर नासमझ हैं अथवा फिर धूर्त। नासमझ को समझाया जा सकता है, धूर्त के इरादे को पकड़ना होता है ताकि वह नुक्सान कम से कम कर सके। यहां इरादा देहात की जीवनशैली को बचाने का है जो अन्तत इस देश के भविष्य को सम्भाल कर आगे ले जाने का रास्ता है, क्योंकि शहरी जीवन ऊपरी चकाचौंध को छोड़ कर मूल में विष भरा मटका है जिसके सहारे पर कोई समाज सुख, चैन और आपसदारी से नहीं रह सकता है।

जैसा पहले कहा, संस्था/सभा एक औपचारिक किस्म का संगठन है तो खाप की प्रकृति अनौपचारिक है। दोनों के बीच यह मूल भेद है। इस फर्क को समझे बिना बात करने का परिणाम भला नहीं हो सकता। इसे मिसाल के तौर पर एक पाठशाला और घर-परिवार के बीच भेद से समझ लें। पाठशाला की प्रकृति औपचारिक है, तो घर-परिवार अनौपचारिक किस्म का सामाजिक उभार है जो किसी कानून के कारण नहीं रिश्तों पर टिका है। इसी तरह गांव, बिरादरी रिश्तों पर आधारित सामाजिक गठन उभर कर अस्तित्व में आए हैं।

पाठशाला या फिर कोई राजनीतिक दल, सेवा समिति, एन.जी.ओ. मंच, सभा आदि ऐसे औपचारिक रूप में बनाए गये संगठन है जिनकी प्रकृति औपचारिक है। ऐसे संगठन या संस्था को किन्हीं सीमित संख्या के लोग एक निश्चित लक्ष्य की खातिर अपने निर्धारित विधि-विधान के तहत कानूनी रूप में बनाते हैं। उधर, जीवनपद्धति (रिवाज) अपनी स्वाभाविक गति से विकसित एक अनौपचारिक प्रकृति का तरीका है। इसे कोई निर्णयानुसार बनाता नहीं है। घर-परिवार, गांव बिरादरी अथवा खाप अनौपचरिक प्रकृति की विकसित सामूहिक शैली हैं। इनमें पदाधिकारियों की जगह नहीं है केवल रिश्तों का सरोकार है, बराबरी का बर्ताव है, लक्ष्य व हितों की साझेदारी है। आपस का लगाव/जुडाव जीवन पर्यन्त है।

संस्था में निर्र्धाित लक्ष्य की खातिर जिम्मेदारियों, अधिकारों का वर्णित डांचा तय रहता है जिसके बाहर जाने की मनाही होती है, क्योंकि इसका रूप एक कान्ट्रेक्ट का होता है। इसके उलंघन पर या तो उसका विघटन होता है या मुकदमेबाजी। इसके पदाधिकारियों की निश्चित सीमाएं बंधी रहती हैं, उलंघन लक्ष्य को काटता है तो कलह खड़ी होती है। इसमें गैर-बराबरी निहित है-पदाधिकारी व सदस्यों का अन्तर तय है। निर्धारित सीमा से बाहर सदस्य अपने जीवन के अन्य दायरे में स्वतन्त्र हैं। घर-परिवार में भी कलह होती है किन्तु इस कलह की प्रकृति मूल रूप में हितों की साझेदारी के दायरे में मिलनात्मक है, जब वह ध्वंसमूलक हो तो वह परिवार परिवार नहीं रहता, टूटता है। औपचारिक व अनौपचारिक रूप के गठन या रिवाज में बुंनियादी अन्तर उनके सरोकारों को तय करता है।

अनौपचारिक जीवनपद्धति की खाप को शहरी सभ्यता के राजनीतिक, प्रशासनिक व न्यायिक ढांचे से बराबरी नहीं की जा सकती है न उसे एक दूसरे क्षेत्र पर जबरन लादा जा सकता है क्योंकि दोनो का आधार ही अलग-अलग है। कोई जबरन प्रयास होगा तो कलह होगी। गुलामी दौर में यह जबरन प्रयास अंग्रेजों ने किया था जिसका यहां के सामाजिक जीवन पर भयंकर प्रभाव पड़ा। घाटा लोग अभी तक उठाते आ रहे हैं। स्वतन्त्रता आन्दोलन में भी इसका विरोध हुआ।

महात्मा गांधी ने जब स्वतन्त्रता आन्दोलन की बागडोर सम्भाली तो जनता के इस दर्द को समझ लिया और ग्राम स्वराज की अपनी धारणा में इसे वाणी दी। इनके इलावा, महाराष्ट्र में तुकडोजी महाराज ने इसे अपना धर्म ही बना लिया था जिसे वे ग्रामगीता कहते थे। सही है कि ग्रामीण जीवन शैली के प्रश्न और उसके महत्व पर अलग अलग व्याख्या है। महात्मा गांधी मूलतः एक राजनीतिक लक्ष्य लेकर चल रहे थे तो तुकडोजी महाराज समाज सुधारक की भूमिका में रहे। फिर, इन दोनों से अलग हट कर ग्रामीण जीवन केे महत्व को देखने वाले लोग भी हैं। स्वतन्त्रता आन्दोलन में भी शहरी व ग्रामीण जीवन पर मतभेद चला। यह सही है कि महात्मा गांधी के ग्रामस्वराज का यह एजेण्डा बीच में कहीं रुक गया। अब खाप विरोधी अभियान असल में अंग्रेजों के दिये हुए कार्यक्रम को और आगे बढाने का पुरजोर प्रयास है। यह दुखदायी है कि चंद अपवादों को छोड़ कर सब पढे-लिखे इस साजिश में अनजाने ही सही कंधा लगाते दिखते है। परेशानी इसलिए नहीं कि ये लोग मैकॉले वाली पढायी की सृष्टि हैं, यह तो होना ही था! भाजपा ने इस स्वराज की धारणा को पलीता लगाने के लिए ही इसे सुराज में बदलने का नारा उठाया है और संस्कृत शब्दावली में शासन-प्रशासन के प्रश्न पर अंग्रेजों की लीक पीट रहे हैं।

षहर और गांव का फर्क तहजीब में हैं

चकाचौंध किसी बस्ती को शहर नहीं बनाती। इसका प्राण कहीं दूसरी जगह बसा है। धूल उडती गलियां इसे गांव नहीं बनातीं, उसके जीवन का मूल आधार दूसरा है। धूल भरी गलियां तो गांव के निर्मम दोहन-शोषण के कारण है जो बड़े-बड़े तमाम किसान मसीहाओं के राज में रहने के बवाजूद नहीं मिटा हैं। शहर और गावं के बीच का फर्क दोनों की तहजीब, जीवनशैली व जीवन मूल्यों में निहित है। इस फर्क का कारण इनके काम-धंधों की मौलिक प्रकृति के कारण बनता-बिगड़ता है। पारिवारिक खेती व उद्योग-व्यापार की प्रकृति में मूल भेद इस अन्तर की जननी हैं; मामला चाहने, न चाहने का नहीं है।

शहरी तहजीब औद्योगिक-व्यापारिक कारोबार पर बनती/बिगडती है जिसमें अपने हितों तक रमा हुआ व्यक्ति मौलिक इकाई है, जबकि गांव की सभ्यता का आधार पारिवारिक श्रम की खेती व इसके साथ लगे अन्य धंधों में रमा हुआ स्वाभिमानी परिवार है, निर्लज्य स्वार्थ में डूबा हुआ व्यक्ति नहीं। दोनों में भेद है जो इनकी प्रकृति को तय करते हैं। नियम ऐसा है। खाप इसीलिए ग्रामीण जीवनशैली का भूषण है जहां धनवान की हैकड़ी नहीं चलती, बराबरी का मोल है तो भाईचारे की समझ पर जीवन चलता है। कोई करता है तो सामाजिक सरोकार चोट खाते हैं। इसका खाप नहीं, व्यक्ति विशेष दोषी है। यदि व्यक्ति विशेष के दोष से खाप को नकारा जाए तो नीयत का खोट जाहिर होता है।


ग्रामीण जीवन पराई कमजोरियों से जकड़ गया है

खाप के सवाल पर अब तक सिद्धान्त के सन्दर्भ में चर्चा हुई है ताकि ग्रामीण भारत की जीवनशैली को दकियानूसी, पिछड़ेपन, देश विरोधी तथा विकास विरोधी संस्था कह कर गाली देने वालों या नासमझी में गलतफहमी के शिकार बंधुओं के सामने इतिहास का पन्ना खोल कर रखा जाए। आजादी के बाद देश में चालू चुनावी व्यक्तिमुखी प्रणाली से संक्रमण में खाप पर चिपकी कमजोरयिों के छोड़ कर विचार करें तो खाप कोई नफरत के लायक संस्था नहीं है, बल्कि बहुसंख्यक लोगों की जीवनशैली है। ठीक से समझे तो यह भागीदार लोकतन्त्र की सबसे विकसित प्रणाली है जिसपर नाज किया जाना चाहिए। सम्भत संसार में ऐसा विकसित रूप कहीं नहीं उपलब्ध है। एक समय 1917 के इंकलाब से पहले व बाद में प्रचलित सोवियत प्रणली से भी कहीं अधिक उन्नत। फिर भी हम जानते है कि जिनके हित पूंजी समेटने वाली चालबाजियों से रंगे हुए हैं वे खाप को लांछित करके लोगों में भ्रम रचना करते रहेंगे। नम्र निवेदन इतना है कि शक्ति के दुरुपयोग से समाज का अहित करते समय ध्यान रखें कि दूसरे भी बराबर के इंसान हैं। उनकी गैरत को न ललकारें।

किन्तु, हम अब 21वीं सदी में जी रहे हैं और सिद्धान्तों की दुनियां पर कालिख पोतने वाले बेसब्र हैं। उन्हें जल्दीं भी है। सोचने-सझने का समय वे छोड़ना नहीं चाहते। उनकी कारस्तानियों से अब तक समाज को बहुत हानि उठानी पड़ी है। दुनियां में लगभग चार सौ साल से जिस शहरी सभ्यता की गंदगी का साम्राज्य चलता आ रहा है उसका बीते 67 साल से भारत पर भी दुष्प्रभाव बहुत तेजी के साथ फैला है। ग्रामीण आंचल शहरी तामझाम और जीवनशैली के जहरीले प्रभाव से अछूता नहीं रह सका है।
 
चालाकी यह हुई कि शिक्षा को रोजगार के साथ बांध दिया गया। इसके चलते ग्रामीण घर-परिवार के बच्चे पढाई के लिए उनकी आत्मघाती सभ्यता के दरवाजे पर पहुंचते हैं जिससे ये कीटाणुओं को लेकर आते हैं। ंघर-परिवार टूटन की दहलीज पर पहुंच गये हैं। ग्रामीण आंचल के आदमी/औरत को भी उसी तरह व्यक्तिमुखी बना दिया है, निजी स्वार्थ से आगे न सोचने की प्रवृति यहां भी बढी है। सत्ता-राजनीति का चस्का और राज का पिच्छलग्गु बन कर काम निकालने की मानसिकता ने इन्हें भी सरमायेदारों की दहलीज पर नाक रगडना सिखा दिया है। सरकार के साथ लग कर ताकत पाने की हवस बढी है ताकि स्वार्थ-सिद्धि की राह खुले। इसके लिए खाप का दुरुपयोग होने लगा है। ताकत समाज हित के लिए प्रयोग होने की बात पीछे जा पड़ी है। रोग फैला है, फैलाने वाले लोग खुश हैं। उनकी इसी से सधती है। पुरानी पीढी दुखी है। रोग की जड़ पकड़ने में कमी से बचाव का काम धीमी गति का है। किन्तु ये व्यति की कमजोरियां हैं, खाप प्रक्रिया इसकी दोषी नहीं है जिसे नफरत की जाए।

आजादी के बाद की इस अवधि में अनेक पीढियां चली गयीं। इससे पहले अंग्रेजों के राज्य ने यहां की सभ्यता को पलटने का पूरा प्रबंध किया ही था। परिणाम है कि स्वयं देहात में निवास करने वाले बहुत लोग अब अपने इन सिद्धान्तों को भूलने लगे हैं जो ग्रामण जीवन को रस देते थे। यह याद नहीं रहा कि इन सिद्धान्तों पर अमल करते रहने से ही एक समय भारत खास बना था।

खेद की बात है कि आज के देहात और स्वयं उसकी जीवनपद्धति पर पराये लक्षणों का प्रभाव रंग जमाने लगा है। खाप प्रणाली में बहुत कमजोरियां इसी कारण आ बैठी हैं। इनसे मुक्त होना बड़ी चुनौती है। जानते हैं इन कमजोरियों का लाभ जिन्हें मिलेगा वे ग्रामीण जीवन के हिमायती कतई नहीं हैं। शहरी सभ्यता असल में कोई जीने लायक सभ्यता नहीं है, वह औद्योगिक व व्यापारिक हितों के मुताबिक रहने सहने की प्रणाली है जहां मनुष्यता का मेल नहीं बैठता है। देहात व उसकी जीवनशैली एवं सिद्धान्तों पर पलने वाली सभ्यता को इस शक्तिशाली एवं मोहक विष से खतरा है। शहरों में रोजगार व धंधा पीटने के वास्ते ग्रामीण आंचल के मजबूर लोग भी रहते हैं। वे एक दुविधा के बीच झूलने वाले प्राणी हैं जिन्हें दोनों पद्धतियों के बीच फर्क को समझ कर जीना सीखना चाहिए। शहरी शैली के मोह में फंस कर पीढियों के भविष्य पर अंधेरा न छाने दें तभी बचेंगे। धंधे की मजबूरी में शहरी निवास के रहते भी ग्रामीण शैली से जिया जा सके तो बेहतर विकल्प है। यह एक सचेत संघर्ष की मांग करता है।

चर्चा के मूल बिंदु पर कहना उचित होगा कि ग्रामीण जीवनपद्धति पर पराये असर को मुक्त करके ही आगे बढा जा सकेगा। इनमें एक कमजोरी खाप पर स्थाई चौधरी बैठाने की है। एक बार हो गयी गलती को सुधारना भी आसान नहीं रहता है, यह ठीक है। किन्तु रोग से मुक्ति पाना ही जीवन है। इसमें खाप पर जमें चौधरियों को सहमत कराने का काम होना चाहिए तभी खाप की ताकत लौटेगी और सब को फायदा रहेगा। यह अभियान चलना चाहिए।

दूसरा पहलू खाप व गोत्र खाप में भेद को समझने का है। किसी खास बिरादरी की खाप जब मामलों पर विचार करे तो बात स्पष्ट होनी चाहिए कि यह गोत्र खाप यानी बिरादरी विशेष की खाप का मामला है। खाप सब को साथ लेकर भाईचारे के सम्बंधित गांवों कीे बनती है और सही में जनसमर्थन प्राप्त वही शक्तिशाली पद्धति होगी जिसे अधिक जीवन्त करना चाहिए। खाप पद्धति पर देश का चित्र बने तो बेमतलब के बहुत झगड़े तो अपने आप समाप्त होगें जैसे भाषाई भेद, क्षेत्रीय असन्तुलन, जिला और प्रान्तों में बंटवारे की मांग आदि आदि। सही मायने में तभी यहां लोकतन्त्र पनपने की स्थिति बन सकेगी। बिरादरियां मिलवर्तन का आधार हैं, रहनी चाहिएं। ये बंटवारे का कारण नहीं हैं, न रहनी चाहिएं। आपसी मिलवर्तन से सब की ताकत बढती है। जहां कहीं इनमें भेद है उसे मिलकर हल किया जा सकता है। वर्तमान में तरह तरह की फैली कलह से यह कहीं आसान रास्ता है। बशर्ते खाप प्रक्रिया को समझने का ईमानदार प्रयास हो और इनके प्रति बेवजह की नफरत से मुक्त होंकर विचार हो। बिरादरियों में कलह का आजकल बड़ा कारण चुनाव बन गये हैं। चुनाव राज की लडाई है समाज को ताकत देना इसका न काम है, न ऐसा वह होगा। समाज की ताकत समाज के भीतर है जिसे सचेत लोग मिल कर बचा सकते हैं। चुनाव की दौड़ में शामिल लोग अपने मकसद के लिए अलग अलग जातिगत जत्थेबंदी करते हैं, एक दूसरे के विरुद्ध नफरत फैला कर अपना काम साधते है जिससे बिरादरी को कुछ लाभ नहीं पहुंचता। यह राज वालों की लडाई है। खाप का इस चुनावगत राजनीति से कोई सम्बंध नहीं है। न होना चाहिए। जहां होगा, वहीं घाटा होगा क्योंकि यह दूसरे किस्म का खेल है जो राजनीतिक दलों का धंधा है।

खाप पर बिरादरियों को बांट कर रखने की चाल

खाप पद्धति किसी खास बिरादरी तक सीमित पद्धति नहीं है। एक निश्चित स्थान पर टिक कर खेती करने वाले सब कबीलों में इस पद्धति का एक तरह का विकास हुआ था और अब तक गांवों में रहने वाली सब बिरादरियों में मौजूद है। यह सार्वभौम है। पहचानने की आवश्यकता है। कौन बिरादरी समूह ऐसा है जो अपनी समस्याओं पर मिल बैठ कर निर्णय नहीं लेता है, विचार नहीं करता है? हर बिरादरी में यह पद्धति है। मूलतः यह प्रचलन ग्रामीण जीवनशैली का अंग बन गया है जहां परिवार के श्रम पर चलने वाली खेती-किसानी जीवनयापन का धंधा है। इस पद्धति का उत्तर भारत में नाम खाप है। इस क्षेत्र में लोकतन्त्र के व्यवहार को विकसित करने में खास भूमिका बनी जिसे खाप पद्धति जाहिर करती है।

खाप का विकास व नामकरण गांव में कृषिकर्म से जुड़ी जीवनशैली से हुआ जिसमें मिलनसारी व भाईचारे का भाव इसका सार है। इसके बिना खेती-किसानी चल नहीं सकती जबतक कि पूंजी को खेती का मूल साधन न बना लिया जाए। परिवार के श्रम पर खेती की जीवनशैली व संस्कृति का मिलनसारी व भाईचारा आधार है और खाप उस शैली की एक आवश्वयक पद्धति। भारत के आर्थिक जीवन का यह बुनियादी सच है। इसे मिटाने का अर्थ भारत के ग्रामीण जीवन में पारिवारिक श्रम पर चलने वाली खेती-किसानी को पलट कर राज की ताकत पर पूंजी की गुलाम खेती में जबरन बदलने की चेष्टा है। भारत में ऐसा कर्म करोड़ो लोगों को जबरन तबाह करने से बड़ा दूसरा कोई अपराध नहीं होगा जहां इज्जत से जीने लायक रोजगार के दरवाजे पहले ही बंद हैं। कारखानेदारी व व्यवसाय में यह कुव्वत ही नहीं बची है कि वह कुछेक लोगों को छोड़ कर देश-दुनियां कीं पूरी आबादी को इज्जतदार रोजगार दे सके। बहुसंख्यक आबादी के लिए यह पूंजी व बाजारू स्पर्धा की गुलाम पद्धति अभिशाप है।

सरकार नहीं चाहती कि लोगों में मिलनसारी व भाईचारे की यह प्रक्रिया बनी रहे; वह चाहती है कि हर व्यक्ति अकेला रहे और हर मामले में उस पर (सरकार पर ) निर्भर हो कर रहे। व्यक्ति को अपने समाज से काट कर कमजोर करने की चाल हर राजा चलता आया है। अब भी यही प्रयास है। राज-काज अलग चीज है समाज दूसरा गठन है। राज सरकार जिन लोगों के लिए काम करती है उसमें निस्हाय व्यक्ति की जरूत है जबकि समाज को समरस आदमी की आवश्यकता है। दोनों में अन्तर है। इसे समझना चाहिए। सरकार की जरूरत के लिए अखबारी दुनियां ने अपने मकसद को आगे बढाने हेतु ऑनर किलिंग का बहाना लेकर खाप विरोधी एक अभियान चलाया हुआ है। इस साजिश को ठीक से नहीं समझा गया जिससे लाभ उन ताकतों को मिल रहा है जो समाज को नाथना चाहती हैं ताकि उनका वर्चस्व बना रहे। अखबार, केन्द्र सरकार व एन.जी.ओ सैक्टर की इस बात पर मिलीभगत सामने आ चुकी है जिसमें इनका प्रयास अदालतों को प्रयोग करने का भी रहा है।

सम्भवतः बहुत कम लोगों को पता है कि खाप के विरुद्ध जब अभियान चरम पर पहुंचा तो केन्द्र सरकार के गृहमन्त्री ने लोगों में मिल बैठ कर चर्चा व सलाह करने की पद्धति पर पाबंदी लगाने के लिए सख्त कानून बनाने की वकालत की थी और देश के विधि आयोग ने इस सम्बंध में जो कानून का प्रारूप सरकार को सन् 2012 में भेजा उसमें प्रावधान रखा गया था कि कोई पांच से अधिक व्यक्तियों का समूह पारिवारिक मामलों पर विचार के लिए बैठेगा तो सभी को कर्म का दोषी माना जायेंगां। उसमें अलग से कहीं जाट बिरादरी के लोगों का जिक्र नही था कि कानून उनपर ही लागू होगा। इसका अर्थ हुआ कि किसी बिरादरी के भी लोग मिल कर विचार करेगें वह गैरगानूनी माना जायेगा। यह प्रारूप हमारी बात की पुष्टि करता है कि सरकार की मंशा लोगों की पहल को रोकने की है केवल जाट बिरादरी की बात नहीं है। मिल बैठ कर विचार करने जैसे मौलिक जनतान्त्रिक अधिकार पर खतरा सब के ऊपर है।
 
देखने में आया कि खाप के विरुद्ध छेड़े गये प्रचार अभियान के असर में आ कर अनेक बिरादरियों ने खाप शब्द को नकारना आरम्भ कर दिया था, क्योंकि अनजाने ही यह मान लिया गया कि खाप केवल जाट बिरादरी की पहचान है। इस तरह की बात खाप विरोधी प्रचार अभियान में खूब चलाई थी। जातिगत विरोध के बावजूद जाट बिरादरी केे पढे-लिखे लोगों का बड़ा हिस्सा भी नफरत करता है; इन्हें पढाया गया कि जाट गांव का कुलक है (कुलक रूसी भाषा का शब्द है जिसे जारशाही के विरुद्ध जनता को तैयार करने में वहां की कम्यंनिष्ट पार्टी ने जमीनों पर कब्जा जमा कर बैठे धनी लोगों के इस तबके के विरोध में किसानों को लामबंद किया था। अब यह शब्द ग्रामीण क्षेत्रों के बदनाम लुटेरों के लिए प्रयोग होता है)।

जाट बिरादरी सामान्यत पारिवारिक श्रम पर निर्भर खेती करने वाला समूह है जिसे खाप के नाम पर निशाना बना कर हमला हुआ तो उन लोगों को बहुत अच्छा लगा जो खेती को पिछड़ेपन व सामंती/कुलक काम मान कर प्रगतिशील होने में मस्त रहते हैं। यह नहीं समझा गया कि इस अभियान को चलाने वाला अत्यन्त छोटा सा समूह है और वे खाप के सवाल पर जाट बिरादरी को अलग थलग करने की चालाकी बरत रहा है ताकि बांटों और राज करो की नीति पर चल कर इस प्रथा को समाप्त करने में सफल हो सके। वे चाहते है कि सरकार का हाथ खुला रहे जिस पर इनका वर्चस्व है। पूंजी के साम्राज्य को आगे बढाने में जो ग्रामीण क्षेत्र का खाप नामक रोड़ा है उसे हटाया जा सके। वे चाहते थे कि इस सवाल पर बिरादरियों को बांट कर रखा जाए और एक एक करके इस सवाल पर सब को पीटा जाए। यदि सब बिरादरियां कहीं मिल कर सरकार के इरादे का विरोध करतीं तो किसकी हिम्मत थी जो लोगों को मिल बैठ कर विचार करने से रोकने का कानूनी प्रबंध करे। इस एकता का लाभ सब को रहता। सरकार इस प्रचार अभियान के जरिये बिरादरियों को अलग थलग करने में कामयाब हुई और जनशक्ति को घाटा पहंुचा। अभियान चलाने वालों के इरादे को समझनें में गलती हुई है और आपसी भाईचारे पर चोट आई है। यह नहीं होना चाहिए था।

इसे स्वीकार कर लेने में सब का भला है कि खाप सब बिरादरियों की पद्धति है और इसकी रक्षा होनी चाहिए।

शहरी लोग सड़ी संस्कृति देहात पर जबरन न लादें

ग्रामीण परिवार का पहला सम्बंध अपनी बिरादरी से है, दूसरे वह किसी गांव व खाप का अंग है। बिरादरी की तरह गांव व खाप से परिवार का सम्बंध जन्मजात है। क्षेत्र छोड़ कर कहीं जा बसने पर ही गांव व खाप से सम्बंध टूट सकता है। किसी गांव में किसी बिरादरी का अकेला परिवार भी हो सकता है तो पूरे गांव में एक बिरादरी का ही वर्चस्व रह सकता है। दोनो स्थिति में परिवार का अपना महत्व है और जिंदगी को चलाने वाले उसके सवाल। उसे दो तरह के मामलों से वास्ता रहता हैः पहले, परिवार के अपने अन्दरूनी मामले रहते हैं जिनपर अक्सर बिन आमन्त्रण बाहर का दखल नहीं रहता है। आवश्यकता होने पर ही परिवार को पहले अपने कुटुम्ब/कुल और फिर भी जरूरत रह जाए तो बिरादरी से विचार अथवा मामला निपटाने के लिए कहना पड़ सकता है। बिरादरी बैठे तो इसे बिरादरी खाप पद्धति कहते हैं। घर-परिवार के मामला न हों तो गांव के बाद एक से अधिक भाईचारे के निर्धारित गांव के लोग बैठते है जिसे खाप कहा जाता है। दोनों के बीच के अन्तर को न समझ कर शहरी लोग खाप की बात करतंे हैं तो गलतफहमी बनती है। ऑनर किलिंग के मामलों में अखबारी दुनियां ने अपने अभियान में बिरादरी खाप को खाप कह कर नफरत पैदा की है और इस तरह अपना जाट विरोधी अभियान चलाया।

परिवार, कुटुम्ब व बिरादरी निजता का समब्ंध है और गांव व खाप के साथ अपनापन है। दोनो में भाईचारे का दायरा इन्हंे एक रखता है। दोनों तरह के रिश्तों में आपसी द्वंद्व मिलनात्मक प्रकृति का होने से यह एकता बनी रहती है जबतक कि कोई इसे तोड़ने पर उतारू न हो। यह बात घर पर भी लागू होती है और गांव व खाप पर भी। खाप आपसी विवाद सुलझाने की स्वीकार्य पद्धति है जिसपर अब इन महानुभावों को बड़ा एतराज है कि ये गवांर लोग शहरियों से पूछे बिना अपने विवाद सुल्झाने का काम क्यों कर लेते हैं! इस एतराज का कारण ये उस संविधान को बताते हैं जो 65 साल पहले लागू किया गया था। इनका दूसरा बड़ा एतराज इस बात का है कि ये जाट लोग 1956 में बने हिंदु विवाह अधिनियम को क्यों नहीं मानते जो एक ही गोत्र, एक ही गांव में शादी को गैर-कानूनी नहीं कहता है। इनका कहना है कि इस कानून की बजाए इन लोगों को अपने रिवाजों को बदलना होगा। कोई पूछे तब आप लोगों ने सन् 1956 में कानून क्यों बना कर रख लिया था जो अनेक बिरादरियों की प्रथा के उलट मात्र द्विजों की परम्परा है? आगे चल कर पूरी कौम को नाथने के लिए न? चालाकी से समाज नहीं चलता, कानून भी नहीं!

इस खाप विरोधी अभियान के दौरान जब कुछ लोगों ने 1956 के कानून में तबदीली करने की बात उठायी तो इन महानुभावों ने हल्ला मचा कर आसमान सिर पर उठा लिया। एक मांग उठाने से इतनी तिलमिलाहट और बेचैनी किस लिए हो गयी, नहीं बताया। कारण है कि ये लोग सरकार की ताकत से ग्रामीण भारत पर अपनी आधुनिकता को जबरन लादने पर बजिद्द हैं और देहात को जीने का अधिकार देना पसंद नहीं करते। ताकत का नशा इसे ही कहते हैं। यह देश विविधता में एकता का है। एकता इस बात की है कि सब एक देश को अपना मानते हैं। विविधता का मायने है कि हजारों बिरादरियों के देश में यह किसी को अधिकार नहीं है कि धर-परिवार चलाने में बाहरी दखल हो और उनकी रीति-नीति पर दूसरे अपनी संस्कृति जबरन थौंपेंगे। यह उसी संविधान की बात भी है। शहरी लोग संविधान को कितना मानते हैं, यह हम जानते हैं। भूले नहीं हैं कि संविधान का उलंघन करते करते ही यहां गैर-बराबरी का राज कायम हो सका है।

बाहर से आने वाले सेठों के लिए और स्वयं देश के बिगडैल धनवानों के लिए लफंगेपन को आधुनिक संस्कृति कह कर देहात पर लादने के प्रयास ताजा आरम्भ नहीं हुए हैं। बात बहुत आगे बढ चुकी है। स्कूल-कालिज में पढने जाने वाले हमारे देहाती बच्चों के पांव में घंुघरू और हाथ में कटोरा थमा देने वाले लोग उन्हें सैक्स में स्वतन्त्रता का पाठ पढाने आज से नहीं लगे हैं। उन्हें सेठों का बढिया नौकर बनाने के पूरे प्रबंध 1986 की शिक्षा नीति के जरिये पहले ही चालू हैं। देहात के लिए आजादी का अब तक यही अर्थ हुआ है। लेकिन इस सब की सीमा है, यह समझ लेना चाहिए। अन्यथा अपने लिए कांटे तो ये बो ही चुके हैं।

इस हालत में, देहात के लोग बता देना चाहते हैं कि उन्हें ऐसा आधुनिक नहीं बनना है जो पूंजीशाही अपने लिए हमे बनाना चाहती है। इसे वे अपने लिए रख लें। देहात अपनी संस्कृति के दम पर ही आधुनिक बनेगा। यदि वे अपने बच्चों के साथ खिलवाड़ करने पर तुले हैं तो उनका अपना निर्णय होगा। हमें अपनी जिंदगी और अपने बच्चों से मोहब्बत है। अपने जीवन को अपने हाथ संवारेंगे, यह हमारा नैसर्गिक अधिकार है।
 
रिश्तांे का कत्ल और खाप

खाप को निशाना बनाने का ताजा प्रसंग कथित ऑनर किलिंग का बना। अभियान बीते लगभग पन्द्रह साल से चला है। किन्तु, देश-प्रदेश में खाप का चलन हजारों साल से है। कथित ऑनर किलिंग भी बीते बीस साल से ही होंने लगी हों, ऐसा नहीं है। इसलिए ऑनर किलिंग का प्रसंग लेकर खाप को निशाना बनाये जाने का यह समय चुनना खास मायने रखता है जो अभियान के मकसद को समझने के लिए काफी है।

पहली बात, ग्रामीण समाज में रिश्तों को जाने-अनजाने कत्ल करने वाले युवक-युवतियों के कत्ल की घटनाओं को ऑनर किलिंग की संज्ञा देना मीडिया की चालाकी का प्रयाप्त प्रमाण है। अपने मकसद के लिए मीडिया द्वारा शब्दों की बाजीगिरी इसकी सृजनशील कुव्वत असल में उस प्रशिक्षण कला का कारनामा है जो इन्हें सिखाया जाता है। मीडिया की सर्तकता को जमीनी स्तर के स्थानीय पत्रकार की बौद्धिक गरीबी से आंकना गलत है; मीडिया अब सरमायेदारों के हाथ में बेहद सतर्क औजार है। इसका चलन खास तरह के लक्ष्य को लेकर होता है जिसका जनहित से कुछ मतलब नहीं है।

ऑनर यानी इज्जत-आबरू इतना हल्का-फुलका मामला नहीं है जितना मीडिया अथवा इसके मददगार ‘बुद्धिजीवि’ लोग इन हत्याओं के वृतान्त में अक्सर जाहिर करते हैं। फिर इन हत्याओं का कारण इज्जत का सवाल नहीं है। असल मामला ग्रामीण आंचल में प्रचलित रिश्तों का कत्ल है। फिर, अपने जिग्र के टुकड़ों की अपने हाथ हत्या इतना हल्का मामला नहीं है जितना मीडिया कहता लगता है। कत्ल करना खेल जितना सरल कृत्य भी नहीं है कि किसी ने जीन पहन ली हो गया कत्ल। कत्ल के पीछे उकसावे की प्रकृति को न समझ कर या गलत बयान की आड़ में बात करने का तात्पर्य तब क्या है? रिश्तों का उलंघन गल्ती है किन्तु उनकी हत्या सामान्य बात नहीं है। इस अभियान में पूरा मीडिया जगत और उसके पीछे पूरा राजतन्त्र तब रास्ते से भटकने वाले अथवा जानबूझ कर इन्हें कत्ल करने वाले युवक युवतियों की हिमायत करके समाज में किस तरह के आचरण को बढावा दे रहे हैं, क्या इस पहलू को नजरन्दाज किया जा सकता है? इन लोगों का यह आचरण सामाजिक अपराध को उकसावा (चतवअवबंजपवद) व बढावा (ीमसच) ही माना जायेगा जिसका परिणाम कत्ल में होता हो। तब, मूल में कानून कौन तोड़ रहा है? यह नौजवान पीढी के साथ निपट खिलवाड़ है।

दूसरा पहलू ऐसी हत्याओं के साथ खाप को जोड़ने का है। जिन हत्याओं के साथ खाप को जोड़ने की चालबाजी मीडिया ने की है वे मामले परिवार व रिश्तेदारों द्वारा हत्या के है। एक मामला भी ऐसा सामने नहीं आया जिसमें कातिल खाप है। जब यह प्रश्न उठा तो खाप का शिकार करने निकले जिहादियों ने पल्टा मार कर कहना आरम्भ कर दिया कि खाप कत्ल को उकसावा देती हैं? जब इस पर भी सबूत नहीं मिला तो बात बदल ली और कहने लगे हैं कि खाप कातिलों की मदद करती हैं और इन्हें सम्मानित करती हैं। मिसाल में किसी कुरुक्षेत्र में हुई ‘खाप पंचायत’ को गिनाया जाता है।

सच यह है कि कुरुक्षेत्र का वह जमावड़ा किसी अर्थ में खाप पंचायत नहीं थी न उसे किसी खाप ने बुलाया था, न ऐसा कोई एजेण्डा था। वह एक पत्रकार द्वारा अपनी पत्रिका के उत्सव के लिए बलाया गया जमावड़ा था जिसे एक खास माहौल में किन्ही ‘नेता’ नुमा लोगों ने प्रयोग करने की चेष्टा की, जो अन्तत सफल नहीं हो सकी थी। शिकार के लिए उत्सुक मीड़िया ने इसे खाप कहना आरम्भ कर दिया। बताने के बाद भी यही चित्रण जारी है! हर जमावड़ा खाप की पंचायत नहीं होती यह जानते हुए भी इसे दोहराते जाने का अर्थ गम्भीर है।

मीडिया किस तरह भ्रम-रचना का दोषी है उसकी ताजा मिसाल है। अभी रोहतक में मीडिया द्वारा घोषित दो ‘वीरांगनाओं’ की ताजा घटना को लेकर सीपीएम के अपने 18 संगठनों के 18 लोंगों द्वारा इन ‘वीरांगनाओं’ का समर्थन इस तरह पेश हुआ जैसे सारा सामाजिक-राजनीतिक जगत मीडिया के सच की हिमायत में उतर पड़ा हो जबकि सम्बंधित पत्रकार इस तथ्य से अनभिज्ञ नहीं थे कि ये सब एक ही राजनीतिक दल के अपने संगठनों के लोग हैं जिनकी नारीवादी बोली ये कमसिन लडकियां पहले दिन से ही बोलती आ रही हैं! इन्हें स्मझना चाहिए था कि ये एक खास अन्दाज से प्रेरित बच्चियां हैं जिन्हें गलत या सही, हर पुरुष में उत्पीडक नज़र आता है और यह ‘उत्पीडित होने की मानसिकता’ का उकसावा भी हो सकता है जिसे उद्धार करने के लिए कुछ वीरांगना निकली हैं!

रिश्तों को लेकर किसी घटना/दुर्घटना पर गांव में चर्चा अथवा मिल बैठना आम रिवाज है, व्यवहार है। इसे खाप की पंचायत कह कर चित्रित करना कौन सच्चाई का चित्रण है जो इन मामलों में मीडिया कर रहा है? तब, इस सब का मकसद क्या है और मीडिया क्या हासिल करना चाह रहा है?

गांव में अक्सर देखा जाता है कि किसी के किसी मामले में फंस जाने पर, यहां तक कि सही या गलत कत्ल के मामले में फंस जाने पर गांव में मिल कर चर्चा होने का सामान्य व्यवहार है। सही या गलत मामले में फंस जाने पर परिवार/रिश्तेदार अपनों की मदद करता है। गांव भी करता है। इसके ठोस कारण हैं जिन्हें परायों के हाथ न्याय पाने के अभ्यस्त लोग समझने की कुव्वत खो चुके हैं। ऐसे परिवार वालों या गांव वालों पर मीडिया क्या रुख अपनायेगा? खैर है कि अब तक ऐसे मामलों में इस कारस्तानी मीडिया द्वारा अथवा ‘प्रगतिशीलता’ का तमगा पाने हेतु अति उत्सुक सीपीएम के कार्यकर्त्ताओं द्वारा खाप को नहीं घसीटा है! आगे की कौन जाने? किन्तु इन्हें ये कथित ऑनर किलिंग के मामले बहुत लुभाते हैं और इनमें खाप हो न हो मीड़िया व प्रगतिशीलों को अवश्य दिखती रहती हैं। मामला मात्र दृष्टिदोष का नहीं बनता है। छिपे हुए इरादों का अधिक है।


रिश्तों की छतरी खाप पर विकास विरोधी तोहमत

मनुष्य की मौलिक प्रकृति मिल कर रहने-चलने की है। यह मिलनसारी स्थाई अथवा अस्थाई ढंग की रह सकती है। स्थाई मिलनसारी का सबसे बेहतर नमूना परिवार है जो खेती-किसानी के उद्भव के साथ वजूद में आया और तब से चलता संवरता आ रहा है। अस्थाई मिलनसारी उद्योगों के जमाने से जुडा हुआ चलन है। अनौपचारिक प्रकृति वाले घर-परिवार से भिन्न औपचारिक किस्म के संगठनों में अस्थाई किस्म की मिलनसारी चलती है। निकटतम प्रवृति का समाज परिवार एवं बिरादरी का नाम है। यह समाज गांवों में निवास करता है। घर-परिवार मनुष्य की मिलनसारी का सबसे निकट के रिश्ते का नाम है जहां चूल्हे पर सबका साझा है और संवेदनाओं का मिलन है। कुटुम्ब व बिरादरी का रिश्ता परिवार के साथ जुड़ता है। गांव व गौहॉंड में भाईचारे का रिश्ता बनता है जहां खेत की सीम मिलती है और गऊ/भैंस बिन दिक्कत फेरा लगा ले सकती हैं। गौहांॅंडी भाईचारे के बिना गऊ/भैंस यानी पशुपालन व खेती-किसानी नहीं फलती जबतक कि पूंजी पर आधारित मुनाफे के फार्म की खेती-उद्योग इसकी जड़ नहीं खोदता। हरयाणा सहित भारत का बहुत बड़ा भाग अभी तक परिवार के श्रम पर आधारित खेती-किसानी का क्षेत्र है जिसके पास अपने श्रम के अतिरिक्त जीविका का अन्य साधन नहीं बचा है। साझे के साधन भी हाथ नहीं रहे।

उद्योग-वाणिज्य ने एक मिथक की रचना करके अपनी यात्रा का आरम्भ किया था कि उत्पादन-वितरण का उसका ढंग ही समाज से अभाव को समाप्त करके वैभव का रास्ता है। यह मिथक लगभग चार सौ साल का है। इसकी गाड़ी निजी लोभ की भावना खड़ी करके आगे चली जिसने समाज की नींव को हिला कर तोड़ने का सामान जुटाया। आज की अफरातफरी का यही कारण बना। लेकिन देखते हैं कि चार सदी के सांस उखाड़ने वाले प्रयास के बावजूद अफरातफरी, रिश्तों की तोड़फोड़ व आपसी मारकाट के अलावा समाज में अभाव की समाप्ति व वैभव का लक्ष्य मात्र लक्ष्य ही बना हुआ है। चंद मुट्ठीभर लोगों को छोड़ कर बहुसंख्यक लोगों को दरिद्रता के भंवर से यह काफिला निकालने में सर्वथा अक्षम साबित हुआ है। दुनियां में एक भी देश ऐसा नहीं जहां उद्योग-वाणिज्य ने यह लक्ष्य हासिल करने में सफलता पाई हो। उल्ट, तनाव, भय, अशांति व युद्ध का दर्द गहरा होता जा रहा है। भारत में हालात बेहतर नहीं हुए है।

हरयाणा में जबसे इस पूंजी के काफिले ने गति पकड़ी कारों की गहमागहमी के साथ ही बेमतलब की दोड़, अपराध, तनाव एवं निजी मारकाट की स्थिति बनी है, नये नये रोगों का सिलसिला चला है, रिश्तों का कत्ल मुखर हुआ है। तब, उद्योग-वाणिज्य के वैभव वाले मिथक पर चल कर जीवन को बर्बाद करने का क्या औचित्य बच जाता है? इस मिथक को जन्म देने वाले पश्चिमी देशों में ही इससे पीछा छुड़ाने की ललक उठने लगी है; वे पारिवारिक खेती की तरफ मुड़ रहे हैं जिसकी प्रतिघ्वनि संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा वर्ष 2014 को फैमिली फार्मिंग वर्ष मनाने के निर्णय में मिलती है। उसी तरह, घर-परिवार की महत्ता को स्वीकारा जा रहा है जिसके बिना व्याप्त अफरातफरी ने उन्हें कहीं नहीं पहुंचाया। स्थाई व अस्थाई मिलनसारी के भेद को समझने की कसक उनमें देखी जा रही है। तब, इस मिथक पर सरपट दौड़ कर भारत क्यों अपनी नस्लों को बर्बाद करने पर लगा रहेगा?

खाप के विरुद्ध जब कोई दस-पन्द्रह साल पहले ऑनर किलिंग का सवाल उठा कर नये नये जिहादियों द्वारा हमला बोला गया जिसमें मीडिया व सरकारी धन पर पलने वाले एन जी ओ सैक्टर सबसे मुखर हेैं तो दलील उठी कि यह भाईचारा क्या होता है, यह तो अठारवीं सदी में रहने की जिद्द है, रिश्ते क्या होते हैं, यह तो आदमी को गुलाम बना कर रखने की लकीर है? रिश्तों की बंदिश कों आदमी के मानवीय अधिकारों का उलंघन बताया गया।

याद रहे जब खाप के विरुद्ध यह जिहाद छेड़ा गया वह समय परिवार के श्रम पर चलने वाली खेती को तबाह करके स्पेशल इकॉनिमिक जोन (एस. ई. जेड)़ यानी विशेष आर्थिक क्षेत्र के नाम से सेठियागिरी की शुरुआत का था। इसकी मार्फत अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व की भाजपा सरकार ने वर्ष 2000 में ‘नयी कृषि नीति-2000’ नाम से घोषित निर्णय के जरिये पूंजी आधारित खेती के लिए सरमायेदारों के हाथो में खेती को सौंपने का बिगुल बजाया था जिसमें गांव की छोटी पारिवारिक खेती बड़ी रुकावट मानी गयी थी।

खेती और खेती की जमीन को सेठों के हाथ में सौंपने की राह को आसान करने के लिए तब परिवार के बंधन और भाईचारे पर हमला आरम्भ हुआ था ताकि पूंजी की खेती के रास्ते की रुकावटें दूर हो सकंे। सरकार जानती थी कि रिश्तों की बंदिश रहेगी तो परिवार रहेगा; भाईचारा रहेगा तो खाप रहेगी। दोनों रहेंगे तो गांव की खेती-किसानी जड़ पकडे रहेगी जो उनके विनाशी विकास की रफ्तार को रोकेे रहेंगे। यही कारण था कि इन जिहादियों ने अपने हमले में रिश्तों व भाईचारे की छतरी खाप पर विकास विरोधी होने का आरोप उस समय लगाया जब अटल बिहारी की सरकार इस नीति के जरिये विकास का मतलब खेती की जमीन को रिलांयस जैसे घरानों को सौंप देने में बता रही थी।

उस सरकार द्वारा सेठियागिरी में तय की गयी ‘नीति’ को आगे बढाने के लिए मामला प्रेम विवाह जैसी सवंेदनाओं को आड़ बना कर खाप विरोधी अभियान चला। देहाती परिवारों के युवा-युवतियों को चारा बनाया गया। परिणाम स्वरूप, पूंजी की सेवा में यह सांस्कृतिक युद्ध स्वयं किसानों मजदूरों के घर में चालू किया गया ताकि समाज की भावना को नष्ट करके बदले में इन जिहादियों का अपना ‘व्यक्ति’ मुखी समाज बन सके। अस्थाई मिलनसारी को स्थाई मिलनसारी की जगह प्रतिष्ठित करने की साजिश! मकसद है पूंजी के काफिले को आगे बढाने की कसरत। यह सेठियागिरी के हक में एक समरस समाज के विरुद्ध साजिश नही ंतो क्या है? पत्रकारों का ईमानदार भाग इसका हिस्सा क्यों बने?
 
किस का मीडिया

पत्रकार की आजादी नागरिक के मौलिक व नैसर्गिक अभिव्यक्ति के अधिकार से आती है। भारत के संविधान ने इसे लिखित में स्वीकारा है। अखबार उस आजादी यानी नागरिक के अपने अभिव्यक्ति के नैसर्गिक अधिकार का औजार है, एक जरिया है। उसकी ताकत का स्रोत यह नगरिकों का अधिकार है; इसीलिए उसकी शक्ति है। किन्तु है उधार की! इसे पत्रकार और पत्रकार जगत अक्सर याद रख कर नहीं चलता है। इस अधिकार की यह त्रासदी है कि जिनका अधिकार है उनके अधिसंख्यक हिस्से के पास औजार रखने के साधन नहीं हैं जिनके पास माध्यम यानी औजार को रखने की ताकत है जनता के इस अधिकार को धनवान कब्जे में रख कर इस आजादी की बदौलत समाज को अपने स्वार्थ में नाथने का काम करते हैं। अर्थ हुआ नागरिकों को अधिकार की स्वीकारोक्ति भी मिली और हाथ से छीन भी ली! भारत के संविधान और व्यवहार का यह विरोधाभास है।

आज के भारत की बुनगत का हिसाब लगा कर देखा जाए तो आबादी का बहुत बड़ा अंश यहां लगभग 80 प्रतिशत ऐसे लोगों का है जिन्हें दो वक्त की रोटी के लिए 12 से 14 घंटे खटना होता है। जब हम यह कहते हैं तो हमारे हिसाब में परिवार की इकाई है। इतनी बड़़ी संख्या कोे समय ही नहीं कि चल रही धटनाओं की तह में जा कर झांक सके कि सच क्या है। इनमें बहुत बडी संख्या अनाक्षर या अर्धाक्षर ज्ञानी हैं। आबादी का वह भाग पत्रकारों द्वारा परोसे गये ‘तथ्यों’ को पढ-सुन कर स्याना बनता है। जबकि पत्रकार स्वयं मामलों की खोजबीन करने की हालत में ही नहीं हैं। यानी अक्सर मामलों में झूठ का व्यापार चलता है जिसे ‘‘अंधता का उद्योग’’ भी कहा गया है। फिर, भारत के पत्रकार जगत का एक दूसरा पहलू भी है।

पत्रकारों का समूह रूप मीडिया है जिसे मालिक हाँकते हैं। इसमें वह पत्रकार वैभव पाता है जो पत्रकारिता के दर्जे, उसकी ताकत को अपने समग्र अथवा वर्गीय हितों को दरकिनार करके मालिकों-सेठों के हितों को आगे बढाने में अच्छे तरीके से इस्तेमाल करने की काबलियत हासिल करता है। इसकी अनेक मिसाल हैं -अरुण शौरी, बलबीर पुंज, एम.जे. अकबर, तवलीन सिंह, शेखर गुप्ताओं की यहां भरीपूरी जमात है। ऐसे प्राप्त वैभव के धनी पत्रकारों की पराई चमक से नींचे स्तर पर बहुत मित्र चौंधिाये घूमते हैं और न इधर के रहते हैं न उधर इतनी जगह है कि इन्हें भी दमक हासिल हो। अधिकतर विभिन्न हितों की खातिर जारी होने वाली विज्ञप्तियों के पत्रकार सुनी-सुनाई समझदारी के ज्ञान को परोसने वाले पुर्जे बनते हैं। खाप के प्रश्न पर ऐसी पत्रकारिता की त्रासदी ही सामने आई है।

प्रेम विवाह, सैक्स की स्वतन्त्रता, महिला उत्पीडन तो हरिजन उत्पीडन जैसे सवालों में पत्रकारिता उलझी खड़ी हैं जहां न घटनाओं की छानबीन है न परख। जब सी. पी. एम. पार्टी के जनसंगठनों की संख्या को जनता के रुप में पत्रकार पेश करता है तो इन्हें हित विशेष का साक्षी पेश न करके जनता का प्रतिनिधि रूप दे बैठता है। इससे समाज को होने वाले घाटे का हिसाब पत्रकार नही ंतो कौन लगायेगा? दी हिंदू अखबार की एक पत्रकार ने मनोज-बबली कांड पर निचली अदालत के फैसले को अपनी किताब का आधार बनाया जबकि मामला उच्च अदालत में अपील पर था। खाप को निशाना बनाया। उक्त किताब को पढने से लगता है कि खाप को निशाना बनाने के लिए ही किताब लिखी गयी है! इसे एक नामचीन प्रकाशक ने छापा। पत्रकार ने नाम भी कमाया और सम्भवतः पैसा भी। पुस्तक में अभियोजन पक्ष की कहानी व सी.पी.एम पार्टी के कार्ड होल्डर तथा हिमायतियों को छोड़ कर पूरा समाज दायरे से बाहर रख कर मामले को पेश किया गया है। सम्भव है स्वयं पत्रकार महोदया नारीवाद की स्वयं हिमयती रही हो। जब लेखिका पक्षधर अथवा घोषित एक पक्ष की हिमायती है तो वह पत्रकार कैसे हुई? हित विशेष की पत्रकार तो बनी किन्तु वह समाज की पत्रकार होने का रुतबा नहीं ले सकी। न यह पुस्तक मामले को समझने में मदद करती है, न अपराधियों को चिन्हत करने में सहायक है। तब पत्रकारिता का यह कौन उदाहरण है जिसपर तालियां बजाई जाएं? धोखापट्टी का नाम पत्रकारिता नहीं हो सकता है। सम्भवत ये लोग ग्रामीण आंचल में सामंती अवशेषों को समाप्त करके पूंजी के विकास की लड़ाई के योद्धा हैं और बतौर संस्था परिवार को दफा करके पितृसत्ता को परास्त कऱने में मस्त हैं!

एक ताजा मिसाल देखियेः 11 दिसम्बर 2014 को लोक सभा में एक प्रश्न का विधिमन्त्री ने उत्तर दिया जिसमें प्रश्नकर्त्ता ने एक सन्दर्भ में कहीं खाप का शब्द भी प्रयोग कर दिया। मन्त्री ने जवाब दे दिया जिसमें लोक सभा के पिकार्ड के अनुसार खाप के बारे में कहीं कोई उल्लेख नहीं हुआ है। किन्तु अगले दिन के अखबारों में विधिमन्त्री की ओर से ‘‘खाप गैर-संवैधानिक व गैर-कानूनी घोषित’’ होने का समाचार इतनी प्रमुखता से छपा कि लोग हैरान रह गये!

यह सही है कि विभिन्न हितों में ख्ंडित देश में, जैसा हमारा देश है वहां किसी के लिए पक्षधर न होना कैसे सम्भव हो सकता है? तब, पत्रकार भी उसी अनुरूप पक्षधर हैं, कोई समझ कर कोई अनजाने। ऐसे में स्वीकार हो कि पत्रकार जगत सामान्यत धनी तबके का पक्षधर है, क्योंकि उनके रहम पर रोटी मिलती है। यदि पत्रकारिता कोरा व्यवसाय है तब नागरिकों के नैसर्गिक अधिकार का प्रयोग करके ताकत पाने का औचित्य नहीं बचता है। यह तब बनता जब पत्रकारिता निष्पक्ष हो, अन्यथा नहीं। स्थिति का यही विरोधाभास है जो मामले को जटिल बनाता है। आज का सच यह है कि जाने-अनजाने पत्रकार जगत सामान्यत धनवान तबके के हितों की खातिर खाप के विरुद्ध अभियान का अंग बना खड़ा हैं। इससे पत्रकारिता की साख को बट्टा लगा है, विश्वास टूटा है। जनहित का पखधर पत्रकार इस जाल से मात्र सचेतन प्रयास से निकलने की स्थिति बना कर सफल हो सकता है।

मिथकों की दुनिया

मिथकों की अजब दुनिया है। पूंजी के साम्राज्य में हर भले मनुष्य की त्रासदी है कि वह अब मिथकों में जीता है जिनको उसे घेरने के लिए घड़ा जाता है। त्रासदी यह भी है कि जब मिथकों में जीने का मनुष्य आदी बन जाए तो पता ही नहीं चलता कि वह घिर चुका है। जैसे भगवान! कभी विचार ही नहीं आता कि इतनी पूजा-अर्चना व मिन्नतों के बाद भी दिक्कतों के मारे इंसान पर भगवान का दिल नहीं पसीजता और उसकी एक भी समस्या हल नहीं करता! चोरी के माल पर बने धनवान का मामला अलग है!

बात दूसरी हैः आधुनिक शासन प्रणाली मिथकों से जीवन पाती है। राजा-रजवाडों के शासन को मिथकों की इतनी जरूरत नहीं थी जितनी अब चार सौ साल से हर तरह के शासकों को रहती है। कारण यह है कि जनतन्त्र के नाम पर यह प्रणाली अल्पसंख्यक मुट्ठीभर लोगों की हितसाधना का औजार बन चुकी है, हालांकि दावा बहुसंख्यक जनता के समर्थन का रहता है। इसलिए शासन का काम पर्दे के पीछे चलता है और जनता को बेवकूफ बनाने के लिए नित नये तरीके शासक खोजते रहते हैं। इसके लिए शासन का एक हिस्सा निपट ‘‘अंधेरे का उद्योग’’ है जो निरन्तर अपना काम करता है, कभी नहीं सोता! समय के अनुसार नये नये मिथक घड़ कर रखता है जिसके लिए शिक्षा विभाग से लेकर पूरी अखबारी दुनियां इसकी मददगार है। दोनों के तर्क इन्हीं मिथकों पर चलते हैं ताकि जनता भ्रमित रहे, अंधेरे की अभ्यस्त बने।

मिसाल सामने हैः चुनाव के समय जनता के प्रतिनिधि बन पेश आने वाले नेताओं व दलों के वायदों का जाल चकराने वाला हो उठता है, चुनाव जीतने के बाद उसी नेता व दल की सरकार अगले दिन ही अल्पसंख्यक सेठिया तबके के हित में काम करती मिलती है और पांच साल तक लोगों को बरगलाने का खेल बेरोकटोक चलता है। सरकार व नेतागण नारा जनता की एकता का लगाते हैं और काम उन्हें किसी न किसी बहाने लडाने का करते हैं! अखबार इन्हीं बहरुपियों और दोगलों को महान नेता बताने व इनका गुणगान करने में ताकत लगाते रहते हैं। इस अंधकार के व्यापारियें के कारनामों की तह में जा कर न समझा जाए तो भ्रमजाल के ताण्डव को पकड़ना कठिन है जिसकी क्षमता जनता में न सरकार ने मिथकों के जरिये छोड़ी है और न उनके पास इसके लिए समय बचता है। खाप के सवाल पर भी यही होता आ रहा है। जनता के साथ यह अंधकार-उद्योग का खेल इतना व्यापक व असरदार दायरे का है कि अनेक नेकदिल इंसान भी जाने-अनजाने इसमें फंसे रहते हैं।

ऐसा एक मिथक देश के संविधान को लेकर खड़ा किया गया है जो इसे धर्म ग्रंथ का दर्जा देता लगता है। ऐसा ही कानून-व्यवस्था को लेकर है। इन पर अंध आस्था स्थापित करने की शुरुआत स्वयं पंडित जवाहरलाल नेहरू के जमाने से होने लगी थी हालांकि संविधान सभा में बात अलग हट कर हुई। जिन्हें देखना है वे संविधान सभा की कार्यवाही पर नजर डाल लें, विशेष कर 24 नवम्बर 1949 को संविधान सभा के अध्यक्ष डा. राजेन्द्र प्रसाद वह प्रधानमन्त्री नेहरू के बोल। फिर भी संविधान पास हो जाने के बाद आश्वासन के उल्ट इसका दर्जा धर्म ग्रंथ जैसा बना दिया गया है ताकि जनता इसपर अंधभक्ति का भाव लेकर चले; इसमें बदलाव कीं बात न हो, मनुष्य को ही इसके अनुरूप बदलने की नसीहत होती है। खाप को असंवैधानिक व गैर कानूनी बताने वाले इसी मिथक का सहारा लेकर बात कर रहे हैं। उनके कहने का अर्थ है कि कानून के लिए मनुष्य बना है वह उसमें फिट हो, मनुष्य के लिए कानून नहीं है कि मनुष्य की जरूरत के लिए उसे बदला जाए, जबकि सरमायेदारों के हितो में मामूली अडचन होते ही स्वयं शासकों ने 67 सालों में इसी संविधान को न जाने कितनी बार बदला है। अनेक मामलों में संविधान का चेहरा ही बदल डाला और उसे जनता के गले की फांस बना दिया। खुलासा अगली किसी कड़ी में होगा।

संविधान पर मिथक अतना गहरा हो गया है कि कोई इन महानुभावों से यह सवाल नहीं करता और मान लेता है कि सरकार की हर घोषणा जायज है! जबकि सभी सरकारें बीते 67 साल से मात्र सेठियागिरी करती आ रही हैं जिसका नुक्सान जनता को होता है। संविधान की धारा 38, 39, 40 को सरकारों ने पलीता लगा कर देश में गैर-बराबरी का साम्राज्य कायम किया है और राष्ट्र के सामजिक संसाधनों को मात्र सेठों के हवाले करने के लिए ट्रिकल डाऊन थ्योरी (टपका सिद्धान्त/परिकल्पना) को घड़ लिया जिसका संविधान में कहीं उल्लेख नहीं है। धन की चाल नींचे से आरम्भ होने में शासको की कल्पना शक्ति को सांप क्यों सूंघ गया? संविधान के अनुच्छेद 38 व 39 के उल्ट इस नकली थ्योरी के तहत सेठों के हाथ में सारे संसाधनों को सौंपने का काम सरकारों नें किया है। इसका जवाब कौन देगा? संविधान तो समाजवादी समाज का उल्लेख करता है जबकि सरकारों ने यहां निपट अमरीकी तर्ज पर पूंजी के साम्राज्य को लोगों पर थौंपा हुआ है। राज्य पर संविधान पाबंदी लगाता है कि उसकी गतिविधि पंथ निर्पेक्षता को मान कर चलेंगीं। किन्तु सरकारों द्वारा यहां पंथों को बढावा देने का काम हुआ है। इस संविधान के रहते तब यह कैसे सम्भव हुआ, क्या खाप के सवाल पर भाषण देने वाले लोग जरा बात स्पष्ट करेंगे?
 
विधि-विज्ञान की मान्यता है कि हर कानून जायज नहीं होता और हर जायज बात कानूनी नहीं होती। (समहंस ंदक समहपजपउंजम) जायज व कानूनी का यही विरोधाभास है। देश पहले था कानून व संविधान बाद में आया। खाप का वजूद पहले था संविधान बाद की उत्पत्ति है। संविधान सभा में सवाल उठा था कि एक आजाद देश का यह संविधान नहीं है जिसमें न गांव है न परिवार! उसपर आश्वासन देकर नेताओं ने उस दिन देश को बरगला दिया कि इसमें संशोधन करके इसे देश की आजादी के अनुरूप बनाया जाऐगा। किन्तु ऐसा नहीं हुआ। यदि संविधान में खाप नहीं है तो वह लिख ले, खाप क्यों बदले जबतक यह साबित न हो कि सदियों से चली आ रही खाप आज समाज विरोधी हो गयी है? आरोप लगाने से तो वह अराधी साबित नहीं हो जाती है। इसका निर्णय राज नहीं कर सकता। उसका तो अपने मिथक को बना कर रखने का निहित स्वार्थ हैं। और सेठों की सेवा करना। अब तक का यही सच है। संसद जनता की प्रतिनिधि है वह उसे नाथने के लिए नहीं चुनी गयी है। उसकी सीमा निर्धारित है। संविधान बनाने का अर्थ ही राज की सीमा बांधना होता है। वह मनमर्जी नहीं कर सकता है। भारत का संविधान अंग्रेज भक्त लोगों ने थौंपा है। इसमें कहीं आजादी की मनोभावना नहीं है जिस अंग्रेजियत के विरुद्ध यहां आजादी आन्दोलन चला था। पंडित नेहरू व डा. राजेन्द्र प्रसाद ने इसे स्वीकारा था और वायदा किया था कि इसे उन जरूरतों के अनुसार बदला जायेगा। तब जनता क्यों ऐसे संविधान के मुताबिक अपने को बदले? जनता के लिए संविधान बदले। सेठों का मीडिया तय करना छोड़ दे कि जनता का हित किस बात में है। आज का मीडिया जनता का औजार नहीं है, सेठों ने खरीद लिया है। लोकसभा के ताजा चुनाव में इस मीडिया की भूमिका इस तथ्य को साबित करती है।

दूसरा पहलू भी है। संविधान में हर कुछ नहीं लिखा गया है न यह उसका काम है और न ऐसा माना गया है कि जिस बात का संविधान में उल्लेख नहीं किया वह गलत है, उसे रहने का अधिकार ही नहीं है। संविधान में परिवार भी नहीं है। देश की विविधता को भी स्वीकारा गया है तो खाप को निशाना बनाने वाले कौन होते हैं इसके उलट फतवा देने वाले? सरमायेदारी के हित में लोगों को नाथने का काम संविधान अथवा संसद का नहीं हो सकता है।

खाप एक उत्कृष्ठ लोकतान्त्रिक प्रणाली

लोकतन्त्र और जनतन्त्र के बीच अन्तर को पहचान कर खाप के मौलिक चरित्र अथवा प्रकृति पर यह चर्चा है। दोनो को समानार्थी नहीं लिया जा सकता है। खाप लोकतन्त्र की व्यवस्था है तो वर्तमान शासन प्रणाली अपने को जनतान्त्रिक कहलवाती है। लोकत़न्त्र जनता की अपनी प्रणाली है जबकि जनतन्त्र जनता के नाम पर उन्हें नाथ कर रखने का प्रशासनिक तानाबाना है। दोनों में बुनियादी अन्तर है। संविधान सभा में गांव की स्वशासन व्यवस्था का प्रश्न उठा था कि 6 नवम्बर 1948 को सदन में जिस प्रारूप को स्वीकार करने का प्रस्ताव वह इस देश का तन्त्र नहीं हो सकता है। कुछ सदस्यों ने अन्त तक यह बात रखी। विरोध को शांत करने के वास्ते समयाभाव के बहाने सन् 1949 में संविधान को पास करवाते समय नेताओं ने कहा था कि जो पास हो रहा है वह स्थाई नहीं है। बाद में इसे ठीक कर लिया जायेगा। अलबत्ता इस आश्वासन पर कभी अमल नहीं हुआ। यह आश्वासन ज्यों का त्यों अमल की इंतजार में है। इस बीच संविधान में बहुत बार संशोधन हुए और उसके ढांचे को पलीता लगा कर इसे सेठियागिरी का औजार बनाने पर अधिक ध्यान लगाया गया है।

ब्रिटिश शासन की समाप्ति के बाद भारत देश लोकतान्त्रिक प्रणाली का हकदार बना था। समय के नेताओं ने इस मामले में देश को वस्तुत ठगा है और यहां सरमायेदारी के जनतन्त्र का घिसा पिटा पट्टा पहना दिया और जनता की आकांक्षाओं को पलीता लगा दिया। जो लादा गया वह जनता की चीज नहीं है। इसे बदलने का नैसर्गिक अधिकार वैसा ही है जैसा गुलामी के विरुद्ध आजादी की हुंकार एक दिन लगी थी। कानून के नाम पर अंग्रेज उस दिन इसे दबा नहीं सके थे तो से्िरठयागिरी के विरुद्ध लोकतन्त्र की चाह उतनी ही महत्व की बात है जिसे मिथकों के सहारे या कानून बना कर दबाना सम्भव नहीं होगा। बराबरी का हक नैसर्गिक है। इसे अधिक समय तक नकारा नहीं जा सकता है।

सच है कि मनुष्य के कुछेक मौलिक हकों को समाप्त नहीं किया जा सकता है। इनमें एक लोगों के मिलने जुलने का हक है। अंग्रेजों ने अपने शासन के विरुद्ध बगावती तेवर को दबाने के लिए दण्ड संहिता में धारा 144 रख कर शासन को अकूत अधिकार रख लिए थे। खाप के विरुद्ध अब इसी संहिता की धारा को कानून का रूप देने का प्रचण्ड प्रयास हो रहा है। देश का वर्तमान संविधान स्वयं लोगों के मिलने-जुलने के नैसर्गिक अधिकार को स्वीकारता है। अंग्रेजों के इंडियन पैनल कोड की धारा को स्वतन्त्र भारत की संसद यदि कानून में बदलना चाहे तो लोगों को उसके विरुद्ध उठ खड़े होने का अधिकार है। सरकार ने लॉ कमीशन की मार्फत अपने इरादे को बता दिया है जिसके निशाने पर फिलहाल एक बिरादरी आई है।

लोकतन्त्र भारत की आदिकालीन लोकायत व्यवस्था का वारिस है। जब अत्यन्त सीमित राजन्य की प्रणाली को बदल कर उसकी जगह एक असीमित राजा अथवा राजसत्ता का चलन यहां स्थापित हो गया उस हालत में भी यहां के जीवन्त गांव समाज ने खाप प्रणाली को अपनी जीवनशैली का अंग बनाए रखा और विकसित किया जिसका आधार पूर्णत सहमति, बराबरी, भाईचारा एवं खुलापन है और जो परिवार, बिरादरी एवं गांव को प्राथमिक सार्वभौम सत्तासम्पन्न इकाई मान कर चलता है। जनतन्त्र पश्चिम में खड़े हुए वाणिज्य-उद्योग के समरूप पनपी राजव्यवस्था है जिसका एक समय प्रथम मन्त्र ‘समता, स्वतन्त्रता, बंधुत्व’ बना जिसे बाद में अल्पसंख्यक शासक जमात ने अपने अनुकूल परिभाषित कर लिया और जिसका आधार व्यक्ति है। इसमें अब न कहीं समता के दर्शन होते हैं, न स्वतन्त्रता बची है और न बंधुत्व का कुछ भाव इसमें कहीं रह गया है। यानी इसका सार समाप्त प्राय है! इसे जनता क्यों स्वीकार करे? वाणिज्य व उद्योग जगत ने यह कारनामा राजसत्ता को इस्तेमाल करके किया है जिसके हाथ में दबा कर रखने की अकूत हथियारबंद ताकत रहती है। खाप सामाजिक प्रतिष्ठा को अपनी ताकत मानता है और शासनतन्त्र हथियार और मिथकों के बल पर अनुसरण चाहता है। दोनों का यह अन्तर मौलिक प्रकृति का है।

खाप प्रणाली में कोई स्थाई चौधरी नहीं रहता। आज है तो गलत है और रोग की निशानी है। खाप बैठने पर उसे संचालित करने के लिए प्रधान या अध्यक्ष तय होता है जो बैठक की समाप्ति पर विलीन हो जाता है। सामान्यत अध्यक्षता के लिए उसे तय किया जाता है जिसकी न्यायप्रियता व निष्पक्षता पर सबको भरोसा हो। जो मान्यनीय नहीं उसे भाव नहीं दिया जाता। किसी की बात का वजन उसके धनी होने से नहीं उसकी छवि, उसकी निष्पक्षता, उसकी ईमानदारी पर होता है। बैठक में भाग लेना व बोलना सबका समान अधिकार है। पूरी चर्चा के बाद पंचों का उकासा करके मामले पर मंथन के बाद अपना प्रस्ताव पेश करना होता है जिसे पंचायत स्वीकार कर ले अथवा नकार कर फिर नये सिरे से बैठक बुला ले। कार्यविधि में हेराफेरी की कहीं जगह नहीं है।

अपनों की गलतियों व अपराध पर ग्रामीण समाज का न्यायबोध हॉ, मॉ, धिक तक ही जाता है। सुधारने का जीवनप्रयन्त प्रयास उसका अपना है। सजा देने की उसकी अलग व्यवस्था बनी थी। ग्रामीण जीवन मामलों को निपटाता है अपराध पर न्याय/फैसले नहीं सुनाता। तरफदारी करने वालों को गांव समाज खाप के लायक नहीं मानता। खाप में ईमानदार सोच के धनी की कद्र है। फिर गलती को सुधारने की उसकी अपनी प्रक्रिया मौजूद है। इसमें मनमर्जी चलाने वालों को छूट नहीं है। खाप ग्रामीण जीवन में स्वशासन की सबसे उन्नत व बढिया प्रक्रिया है। चुनावी राजनीति के दखल से खाप प्रणाली में आ घुसी कमजोरियो का हवाला देकर इसे नकारने का अर्थ बेइमानी है। संवैधानिक शासन व्यवस्था में कमजोरियांें के अलावा मौलिक चरित्र सेठिायागिरी का है जिसे नकारने का आग्रह अपनी जगह है। ं
 
स्ंविधान का पलटा चेहरा

यह निर्विवाद है कि भारत का संविधान कोई सार्वभौम दस्तावेज नहीं है। ऐसा दावा किसी का नहीं रहा। सब मानते है कि यह अंग्रेजों द्वारा भारत पर अपना लुटेरा शासन रखने की खातिर सन् 1935 के बने कानून का विस्तृत रूप है। इसके अलावा कुछ दूसरे देशों की नकल भी इसमें रख ली गयी है। इसे लिखने वाले लोग भी अधिकतर अंग्रेजियत के धनी लोग थे। आजाद देश की जनता को बेवकूफ बनाने के वास्ते इसमें थोथेबाजी का अधिक सहारा लिया गया जिसका कुछ अर्थ नहीं निकला। ब्रिटिश संसद द्वारा भारत को आजादी देने की शर्तों कों लेकर बनाए ‘इंडिया इंडिपेण्डैस एक्ट-1947 की सीमाबंदी इस संविधान की खासियत है। यह आम जानकारी में है कि भारत को अनेक शर्त के साथ आजादी देने पर सहमति बनी थी जिनका समावेश संविधान में जगह जगह हुआ था। सन् 1949 की 26 नवम्बर को पास हुए संविधान में इन शर्तों के बखूबी दर्शन हो जाते हैं। यह बगावती आजादी न होकर समझौते की आजादी थी। इसका अर्थ यही है कि अंग्रेजों द्वारा अपने हितों को बचाने वाली शर्त इसमें थीं। संविधान सभा में अनेक सदस्यों ने इस तथ्य को माना है। नवम्बर 1948 में संविधान पर आपत्तियों की बौछार हुई उससे इसके मौलिक चरित्र पर सवाल उठे। भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन की इच्छाओं का जिक्र हुआ जिसकी झलक के लिए सदस्य तरसते दिखे। नौबत यहां तक आई कि अन्तिम क्षणों में भी इनके दशर्न संविधान में नहीं दिखने पर विरोध को शांत करने के लिए नेताओं को कहना पड़ा कि समयाभाव के चलते जो नहीं हो सका वह बाद में होगा। विरोध इस स्तर का था।

एक बात अदालतों के दायरें को समझने वाली है। अदालतों की सीमा है। उन्हें तो लिखे को परिभाषित करने का काम दिया गया है, लोगों की आकांक्षाओं के अनुरूप लिखने या संविधान बदलने का काम अदालतों का नहीं है। यह काम संसद को करना था या फिर संविधान सभा गठित होती। इसलिए किसी अनुच्छेद अथवा प्रावधान पर अदालती निर्णय को बाइबल की लिखत नहीं माना जा सकता है। यह काम नेताओं के जिम्मे था कि उस समय किए गये वायदों पर अमल होता, नहीं हुआ। मौलिक बात यह है। पहली संविधान सभा का गठन ब्रिटिश संसद द्वारा पारित कानून के दायरें में हुआ था। एक आजाद देश अपने लिए नयी संविधान सभा क्यों नहीं गठित कर सकता था? कारण था शर्त पर मिलने वाली आजादी। अब मामला अधिक पेचीदा बन गया है जब भारत की चुनाव प्रणाली व संसद का चरित्र ही पक्षपाती है जिस पर सेठियागिरी का रूप छा चुका है।

जे हो, 1949 में पारित भारत के संविधान में उस जमाने के दार्शनिक दबावों की झलक भी समाहित है। उसमें समता की बात है। पंथ निर्पेक्षता का उल्लेख है जो यहां की विविधता को स्वीकरता है। साफ लिखा है कि सरकार इस तरह काम करेगी कि उससे संसाधनों का जमावड़ा चंद हाथों में न हो सके। सरकार देश की स्वत़न्त्रता को बचा कर रखेगी। किसी दूसरी ताकत के दबाव में काम नहीं करेगी, न दबाव में अपने कानून बदलेगी या बनायेगी। आजादी का यही मतलब हो सकता है। लेकिन, हुआ क्या है?

स्वयं सरकार के आंकड़े मानते हैं कि उसकी नीतियों के तहत यहां संसाधनों का जमाव चंद हाथों में हुआ है, गैर-बराबरी बझी है। ऐसा क्यों हुआ, कोई जवाब है? प्रशासन द्वारा नीतियां बनाने के लिए टपका परिकल्पना किस लिए हुई, उसका संविधान के अनुच्छेद 38 व 39 से क्या मेल है? फिर, 1994 में विश्व व्यापार की संधि पर चुनी हुई जनप्रतिनिधि संसद को अंधेरे में रखने का क्या अर्थ होता है? और अब उसी संधि का हवाला देकर अमेरिका जैसे दूसरे देशों के दबाव में कानून बनाने या उनके कहने पर कानून बदलने का क्या अर्थ लिया जाए? इसे आजाद देश की तरह का व्यवहार तो कहा ही नहीं जा सकता है जब चंद सेठों के हितों की खातिर यहां की आम जनता को अभाव में जीने को मजबूर किया गया है।

परमाणु शक्ति पर अमेरिका के साथ सन् 2005 के समझौते में देनदारी के सवाल पर सरकार अब संसद द्वारा अपने कानून को ढीला करने की कसरत को किस तर्क पर जायज बता रही है? भोपाल गैस त्रासदी पर किस दबाव में सरकार ने अमेरिका के हितों को प्राथमिकता दी और क्यों? क्या यह सब संविधान के अनुकूल किया है?

आजादी के बाद सरकारों ने जमीन की हदबंदी की। लेकिन, कारखानों व व्यापार के धन पर सीमाबंदी करते हुए उसे लकवा क्यों मार गया और संविधान में बराबरी के उल्लेखित लेख का क्या हुआ? खेती-किसानी में काम के बदले हकदारी में उद्योगें में काम की हकदारी के मुकाबले गैर-बराबरी को कोई कैसे बयान करेगा? जरा समझा दें, कृपा होगी। यह भी संविधान में बराबरी की बात के बावजूद जिसके जरिये खेती किसानी को खोखला करने का कर्म समपन्न किया गया है जबकि धन्ना सेठों की देशभक्ति मात्र सार्वजनिक धन की वर्षा करने पर ही जागती है। प्रोत्साहन के बिना लूटा गया या चोरी किया गया पैसा वे देश में लगाने के लिए कभी तैयार ही नहीं होते हैं। ऐसा नहीं है तो भारत की जनता से खसोटा गया धन ये सेठ बाहर के देशों में किस लिए लगा रहे हैं जबकि देश की सरकार विदेशों से धन को बुलाने पर पसीना बहाते नहीं थक रही है? कृषि पैदावार की कीमत पर तब सरकार द्वारा पाबंदी जायज कैसे हो जाती है! एक को प्रोत्साहन दूसरें को दण्डित करने की चाल बराबरी के संवैधानिक सिद्धान्त पर कैसे जायज है? या यह कहा जाए कि संविधान में सब लिखा शासको की अपनी सहूलियत के अनुसार अमल हेतु दर्ज है!! यदि ऐसा है, जो असल में हो भी रहा है तो सरकार के चरित्र को जनता हितैषी कैसे स्वीकार किया जा सकता है जबतक कोई स्याना अम्बानी जैसों को जनता न बताता हो।

विश्व स्तर के हवाई अड्डे किसी फत्तू के लिए तो बन नहीं रहे हैं जबकि टैक्स की भरपाई तो भिक्षा में प्राप्त रोटी के टुकडे पर फत्तू को भी करनी पड़ती है। फत्तू से लूटो और अम्बानी जैसों को मालामाल करने की कौनसी बराबरी का पाठ देश को पढाया जा रहा है, जरा बतायें? यह सब संविधान के कैसे अनुकूल बैठता है? यह सब बराबरी का सबक संविधान में लिखा धरा है। खाप को गैर-संवैधानिक बताने वाले अपने गिरेबां में झांक लें तो बेहतर होगा जबकि खाप तो संविधान से बहुत पहले की परिपाटी है जिसे संविधान ने भी कभी गैर संवैधानिक कहने का प्रयत्न नहीं किया। उल्ट, संविधान विविधतों को मान्यता देता है कि किसी समुदाय पर किसी दूसरे समुदाय की परिपाटी नहीं थौंपी जायेगी।

खाप विरोधी जिहाद वृहद योजना का अंग
खाप विरोधी जिहाद एक वृहद योजना का अंग है और उसका लक्ष्य देश के अपने सांस्कृतिक परिदृष्य को पलटने का है। जिहाद का स्वरूप सर्वग्रासी है। इसका अहसास बहुत लोगों को नहीं है, उनको भी नहीं जो इस जिहाद के निशाने पर पहले आ गये हैं। पूरे शासनतन्त्र द्वारा पोषित यह जिहाद समाज में फंस गये किसी छुटपुट कांटे को निकाल कर सरे-राह लाने की मामूली कसरत मानने की गलती नहीं करनी चाहिए। देश का शासनतन्त्र बीते दो दशक से यहां के चेहरे को पलटने की जिस ताबडतोड कशमकश में लगा हुआ है उस पर निगाह रखने से साफ है कि यह समय देश के लिए निर्णयकारी पलटा खाने की जमीन पुख्ता करने का आ गया है जब सरकार लिए गये अपने एजेण्डे पर उठने वाले किसी विरोध की सम्भावना को पूरी तरह मिटाने का प्रबंध करने में लगी हुई हैं। अन्यथा, समुचित उत्तर खोजना कठिन है कि अचानक एक भरीपूरी कौम को उसकी चिर परिचित मान्यताओं पर ललकारने का काम शासकों द्वारा ठीक इस समय हाथ में क्यों लिया गया जब आर्थिक क्षेत्र में जगतीकरण के अमरीकी एजेण्डे का जहर रंग लाने लगा है और चारों ओर संताप का सा माहौल है। उपलब्ध सेकंतों से साफ है कि जिहाद का समय और प्रथम निशाने को भी सोच समझ कर चुना गया है।
जाट राजा-रजवाड़ों के सही/गलत चित्र से उत्पन्न आग्रहों/पूर्वाग्रहों को अलग छोड़ कर देखा जाए ंतो परम्परागत व पारिवारिक श्रम पर आधारित खेती-किसानी में रची-बसी जाट कौम अपनी कुछ विशेषताओं की धनी रही हैं जिन्हें समाज में पुनः प्रतिष्ठित किया जाए तो भविष्य संवर सकता है। यही खासियतें वर्तमान शासतन्त्र के लिए खतरे की घंटी है जो देश को पूंजीप्रदत्त हैवानियत व दकियानूसी चारण संस्कृति में फंसाने का मंसूबा पाले हुए है जो संस्कृति आम आदमी के काम की नहीं है, जो पहले ही अपनी सडांध को इतर में लपेटे फिरती है। यहां आत्म-सम्मानी जाट कौम ऐसी खासियतों की मालिक रही है जिसे पेशे व जीवनशैली के बतौर अब शासक अपनी राह का रोड़ा मानने लगे हैं। इतिहास में घरेलू व बिरादरी के अन्दरूनी मामलों में किसी शक्तिशाली से शक्तिशाली का भी दखल बर्दाश्त न करने, अपनी नसों में उसी तरह रची-बसी लोकतान्त्रिक जीवनपद्धति के प्रति घनिष्ट लगाव तथा दूसरों के प्रति सहिष्णु जाट कौम को जब इस जिहाद का पहला निशाना चुना गया तो अचरज नहीं हुआ। यह सब शासतन्त्र के मौजूदा ओढे गये एजेण्डे में फिट नहीं बैठता है।
विविधता में एकता पर गर्व करने वाले देश में ऐसी पराई सांस्कृतिक एकरूपता थौंपने के जिहाद का ठोस कारण है। वर्ष 1991 में अचानक सरकार ने देश की (मालिक) जनता से पूछे बिना ‘जगतीकरण, निजीकरण, उदारीकरण के विनाशकारी किन्तु लच्छेदार नारे के अधीन सेठियागिरी के प्रतीक अमरीकी एजेण्डे को यहां लादना आरम्भ किया था। और सेठसाहूकारों के लिए धन के अलावा दूसरा कुछ मायने नहीं रखता जिस धन के लिए वे किसी सीमा तक गिर सकते हैं तो दूसरों को गिरा सकते हैं। यह सब करने की ताकत उनकी खड़ी हो गयी है। यही आज की त्रासदी है। पता चलने पर भी थौंपे गये एजेण्डे को पलटने के वास्ते उस समय विरोध नही उठा। राजनेताओं व राजनीतिक दलों ने लोगों का साथ नहीं दिया। हर बार की तरह वे कहते कुछ रहे, जमीन इस ऐजेण्डे की तैयार करने में कंधा लगाते रहे! बीते बीस साल से जमीनी तैयारी कर लेने के बाद उसी एजेण्डे के अनुरूप अब देश की पूरी फितरत, पूरे मूल्यबोध व धरोहर को बदलने के लिए यह सांस्कृतिक उलटफेर का प्रयास सरकार ने चालू किया है। इस अभियान में प्रयोग शब्दावली, मुहावरे और तर्कों का यही निचोड़ निकलता है। बाहर से पूंजी के साथ आने वाली ‘संस्कृति’ के लिए रास्ता हमवार बनाने हेतु खाप को विकास विरोधी, देश विरोधी, दकियानूसी और भाईचारे एवं घर-परिवार की घेराबंदी जैसे पुरातनपंथी विचार की धनी बताना आरम्भ किया था जिससे जिहाद के इरादों को पकड़ना सहज हुआ।

मामला जाट कौम तक सीमित नहीं है। यह तो पहला निशाना बनी। शासनकला में रचे-बसे द्विजों को छोड़ कर अपनी ईमानदार मेहनत के भरोसे जीवन चलाने वाली सभी कौम अपनी संस्कृति को प्यार करती हैं। कोई नहीं चाहता कि उसे जड़ से उखाड़ने का कोई जाबर प्रयास करे। यह सब की बुनियादी चाह है। देश की बात इसी में फिट होना चाहिए अन्यथा उसेे तो मुनाफेदार बाजार बना लिया है। इस संवाद में बात शासकों की लीक से हट कर अवाम के सन्दर्भ में हुई है, इसलिए किन्हीं को खटक सकती हैं। किन्तु साफ कहने का वक्त आया हुया है। खतरा बड़ा है। वक्त आम लोगों का हैं। उन्हें आगे आ कर कमान लेनी चाहिए।

http://tehrikrtk.wordpress.com/2015/01/10/खाप-पर-प्राथमिक-संवाद-12/
 
How is this unbiased? Isn't this pro Khap?
Khap is a democratic institution (संस्था). What's wrong in the word "संस्था"?
I think it would be much better to talk about the present Khap rather than taking refuge in unverifiable history.
Khap is a part of sawraj (
स्वराज), self-rule system which is most democratic setup of governance. That's the basic point.
स्वराज is the mission statement of new generation parties like AAP; which is well accepted by the electorate. So, calling Khap as "unconstitutional" raises questions on the lame Indian constitution that has misunderstood democracy.
 
How is this unbiased? Isn't this pro Khap?
Khap is a democratic institution (संस्था). What's wrong in the word "संस्था"?
I think it would be much better to talk about the present Khap rather than taking refuge in unverifiable history.
Khap is a part of sawraj (
स्वराज), self-rule system which is most democratic setup of governance. That's the basic point.
स्वराज is the mission statement of new generation parties like AAP; which is well accepted by the electorate. So, calling Khap as "unconstitutional" raises questions on the lame Indian constitution that has misunderstood democracy.

Isn't the khap as it is ? or you have some different understanding of it?

May be you havn't read in entirely and posted a half cooked opinion.
 
Isn't the khap as it is ? or you have some different understanding of it?

May be you havn't read in entirely and posted a half cooked opinion.
I may be "नासमझ" or "धूर्त" however, calling Khap as "रिवाज" is akin to making ones own dictionary.
 
Khap institutions are currently not in right hands. The people who have been given the responsibility to run these institutions are mostly holding those positions by virtue of their inheritance and not by skills. How can you expect these people can interact with media and people in general when they do not have themselves knowledge of the Khap. Time is ripe to put intellectuals in those positions so that image of Khap could be improved.
 
खाप पर चर्चा का आरम्भ पहले प्रचलित गलतफहमियों के जाल को हटाने के साथ होना चाहिये। सवाल पर भ्रम रचना के अनेक कारण बने हैं। एक-एक को परखना होगा। इस चर्चा की आवश्यकता पड़ने का कारण यह बना है कि एक दशक से अधिक हो गया जब खाप के विरुद्ध देश के प्रचार माध्यमों, विशेष कर अखबारों में चले एकतरफा अभियान के कारण अब तक ग्रामीण भारत की जीवनशैली ही शक के घेरे में पड़ गयी है। उसे दकियानूसी बताने वाले उछाल पर हैं और स्वयं आधुनिक बने हुए हैं। आधुनिकता का पैमाना भी अपना।

इस दुष्प्रचार की कसरत में जिस तरह की शब्दावली व वाक्यविन्यास का प्रयोग हुआ है उससे इस अभियान के असली मकसद पर ही शक खड़ा होता है। तब पूरे सवाल को सामने रखना जरूरी बन गया है। भाषा-विज्ञान के जानकार जानते हैं कि वाक्यविन्यास व शब्दावली का प्रयोग खास प्रभाव छोड़ता है, यही भाषा का प्रयोजन है। फिर, प्रचार चलाने वाले कोई बच्चा बुद्धि नहीं हैं कि भाषा का प्रयोग प्रयोजन रहित हो। कुछ ‘ऑनर किलिंग’ की घटनाओं को लेकर विगत एक दशक से अधिक चलते आ रहे इस अभियान पर ध्यान देेने से स्पष्ट होता है कि निशाना मात्र इन घटनाओं पर रोष जताना नहीं है, बल्कि इसके पीछे मकसद कहीं अधिक गहरा है। प्रचार का रूप प्रयोजन हेतु संगठित प्रयास का है, इसीलिए इसे अभियान कहना सर्वथा उचित है। खाप के सवाल पर यह चर्चा आरम्भ करने में संवाद की हमारी जरूरत का यह बुनियादी कारण है।

इस प्रचार द्वारा लांछन अभियान का परिणाम है कि ग्रामीण भारत की ऐसी प्रथा पर गलतफहमियों का अंधकार छा चुका है जो उसके सामाजिक जीवन कों सांस देती है। उत्तर भारत के एक विशेष क्षेत्र में खाप शब्द प्रचलित है। दूसरे भागों में इस प्रथा के लिए अलग अलग शब्द प्रयोग में आतें हैं। अनेक जगह इसें केवल पंचायत भी कहा जाता है तो कहीं पॉल शब्द का प्रयोग होता है।

जब इस अभियान का निशाना वह क्षेत्र आया जहां इस प्रथा के लिए खाप शब्द का प्रयोग होता है तब मकसद का एक दूसरा कोणा भी खुला। यह अधिक गम्भीर है। इन सब पहलुओं को ध्यान में रख कर चर्चा का आरम्भ हुआ है, क्योंकि स्वयं ग्रामीण क्षेत्रों में भी नासमझी का आलम देखने में आता है, खास कर नयी पीढी के लोगों में यह कमजोरी व्याप्त है।

खाप कोई संस्था नहीं

यह पहले दर्जे का भ्रम है कि खाप कोई बनी बनाई संस्था है। इस भ्रम के कारण खाप के खाते में अनेक बेमतलब लांछन जुड़ गये हैं। खाप कोई संस्था या संगठन नहीं, प्रथा (व्यवहार) है। ध्यान से परखें तो खाप पद्धति का स्वरूप स्वयं बताता है कि मानव जाति ने जब से खेती-बाड़ी के लिए एक जगह टिक कर रहना आरम्भ किया तभी से यह पद्धति उसकी फितरत का हिस्सा बन गयी है। बस, आगे चलकर क्षेत्र विशेष में इसे खाप का नाम दे दिया गया और जरूरत के अनुसार इसे तराश लिया गया है जिससे खाप लोकतन्त्र का अनुपम रूप बन चुकी है। भारत के पुराने इतिहास में जिसे अनेक पर्यटकों ने ‘लिटिल रिपब्लिक’ यानी लघु लोकतन्त्र का नाम दिया था खाप उसी का नाम है।

पूंजी कमाने की अंधी दौड का आरम्भ होते ही, सन् 1991 के बाद से अपने को अति आधुनिक होने का गुमान लेकर चलने वाले लोगों को भ्रम हो गया लगता है कि वे ग्रामीण भारत को जैसा चाहेंगे हांकेंगे और उसे भी अपने जैसा आधुनिक बना कर छोडेंगे। अभियान का सुर यही है। देहात को भी बता देना चाहिए कि वह ऐसा आधुनिक बनने से इंकार करता है। स्पष्टता अच्छी बात है। देश इन मुट्ठीभर लोगों का ही नहीं देहातियों का भी है। ये लोग खाप को अपनी जहर भरी शब्दावली में पेश करने पर जुटे हुए हैं। खाप वह नहीं है, जैसा वे कहते हैं। यह मानने को दिल नहीं करता कि ये लोग अनजान या बेवकूफ हैं। लेकिन चालाक हैं और अनेक धूर्त हैं, यह अब तक साफ हो चुका है। एक खास मकसद लेकर चलने वाले लोगों का देहात विरोधी अभियान चल रहा है जिसका सीधा सम्बंध धन की अंधी दौड़ के साथ जुड़ा हुआ है। यह हम आगे देखेंगे।

देश के प्रचार माध्यमों, खासकर अखबारों में खाप के विरुद्ध लांछन अभियान वह मान कर चल रहा है कि यह एक संस्था है। इधर, इस दुष्प्रचार अभियान के दौरान खाप के कुछ चौधरियों द्वारा बिना सोचे बयानबाजी में अपनाये लहजे के चलते अखबारों को अवसर मिल गया है कि खाप को एक संस्था बताया जाए तभी विरोधियों का मकसद पूरा होगा। संस्था को ही उनका तन्त्र कानूनन प्रतिबंधित कर पायेगा, पद्धति को रोक पाना सांप की बूम्बी में हाथ देने जैसा कर्म होगा, यह बात ये लोग जानते हैं। किन्तु, खाप के इतिहास व कार्यपद्धति पर ध्यान दिया जाए तो स्वयं स्पष्ट है कि यह धारणा गलत है। असल में खाप एक प्रथा का नाम है। इसे संस्था या संगठन मानना या रूप देना विरोधियों के जाल में फंसने जैसा होगा!

सर्वप्रथम एक बात स्पष्ट होनी चाहिए। यह प्रथा जिसका रूप खाप शब्द के साथ जुड़ा हुआ है दुनियां का ऐसा कोई कोणा नहीं जहां के ग्रामीण क्षेत्र में इसका प्रयोग न होता हो। मनुष्य के साथ यह सार्वभौमिक प्रथा है। जैसे जैसे मनुष्य ने समूह में रहना, जीना सीखा यह प्रथा उसका अंग बनती चली गयी। यह प्रथा है अपनी समस्याओं को मिल बैठ कर आपस में सुलझाना। शहरों में जो लोग बसते चले गये इसका उनके जीवन से सम्बंध टूटता चला गया, क्योंकि शहरी जीवन समूह की जगह व्यक्ति केन्द्रित होता है। शहरी जीवन का समूह मात्र व्यक्ति का जोड़ रहता है जबकि ग्रामीण क्षेत्र में जीवन रिश्तो पर टिके समूह का होता है, दोनों में यह बुनियादी फर्क है जिसे आम तौर पर चर्चा में अनदेखा किया जाता है और भ्रम का लाभ कुछ लोग उठा ले जाते हैं। यह बात खाप शब्द प्रयोग होने वाले क्षेत्रों में तो पूरी तरह सच है।

खाप शब्द प्रयोग होने वाले क्षेत्र में मनुष्यजाति की इस प्रथा का सबसे ंअच्छा रूप बन पाया। इसका इतिहासिक कारण है। इस क्षेत्र में पारिवारिक खेती करने वाले कबीलों, जातियों में अपने कर्म पर अधिक भरोसा रहा है। यहां कबीलों व जातियों-गोत्रों के रिश्तों पर टिके गांव बसे। यह क्षेत्र किसी बाहरी परम शक्ति पर विश्वास न करके अपनों में मिलकर रहने, सोचने-समझने व कर्म पर अधिक विश्वास करता आया है जिनकी जिंदगी खेती व खेती से जुडे काम पर चलती है। यह भी एक कारण है कि खाप के विरोधी इससे इतने परेशान नज़र आते हैं।

चूंकि भारत में व्यक्ति अधिकार वाली चुनाव पद्धति का चलन आजादी के बाद आरम्भ हुआ जिसका सम्बंध राज की ताकत में साझेदारी का सवाल प्रमुख है, उससे यहां राजनीतिक पार्टियों अथवा संगठन बना कर इस दौड़ में शामिल होने का रिवाज हो गया है। उससे महत्वाकांक्षी लोगों में संगठन की अजब तरह की समझ बन गयी है और इसे वे ‘संगठन में शक्ति’ की कहावत के अनुसार प्रयोग करने में लगे रहते हैं। इसका प्रभाव देहात के लोगों पर भी पड़ा है। किन्तु यह मानना पड़ेगा कि यह परायी पद्धति है जिसका कृषि पर आधारित मौलिक ग्रामीण जीवन शैली से कोई मेल नहीं बैठता है। खाप शब्द को लेकर ग्रामीण क्षेत्र में बहुत महानुभाव इसका एक राजनीतिक पार्टी की तरह प्रयोग करने लगे हैं जिससे इस प्रथा को हानि पहुंच रही है। वर्तमान में टकराव का यह मूल कारण है जब दोनो में अन्तर को न समझ कर व्यवहार किया जाता है। खाप को संगठन या संस्था की तरह मान कर चलने वाले स्वयं उसके हिमायती महानुभाव इस खतरे को अनदेखा करते हैं और इस प्रथा को चोट पहुंचाने का कारण बनते हैं, भले अनजाने सही। खाप के विरुद्ध अभियान चलाने वाले चालबाज लोग तो इसे संस्था बताने पर जुटे हुए ही हैं, इससे उनको शिकार करने की सुविधा होती है। यह पहली बात है जिसपर समझ को स्पष्ट करना होगा। (क्रमशः)


समर भाई धन्यवाद

देखने में आया कि खाप के विरुद्ध छेड़े गये प्रचार अभियान के असर में आ कर अनेक बिरादरियों ने खाप शब्द को नकारना आरम्भ कर दिया था, क्योंकि अनजाने ही यह मान लिया गया कि खाप केवल जाट बिरादरी की पहचान है। इस तरह की बात खाप विरोधी प्रचार अभियान में खूब चलाई थी। जातिगत विरोध के बावजूद जाट बिरादरी से पढे-लिखे लोगों का बड़ा हिस्सा भी नफरत करता है.
 
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