Kutubminar pe paronthe

rakeshsehrawat

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एक बार की बात स अपना रलदु अपनी घर आली न ले के दिल्ली घुमन चला गया....

उड़े जा के रलदु अपनी घर आली किताबों न कुतबमिनार दिखान ले गया...

रलदु अपनी बहू त बोलया अक गुलाबो देख ले ध्यान त कदे फेर न्यू कवे अक लाल किला ना दिखाया.... ।

गुलाबो : जी यो त कुतबमिनार स....

(ड़ोस पड़ोसिया न देखया त हासी उड़ाई रलदु की )

रलदु : मेरी सासु की बोलबालि रह... तन्ने घुमान मै ल्याया सु या तू मन्ने ल्याइ ह... ?

दोनवा क छो उठ ज्या दोणु अपना कुतबमीनार प त ए उल्टे हो ले स घर के नाम के... । शांज न रलदु कह स सुने स के... ?
परामठे बनाइये ।?

किताबों क छो उठ रहया कुतबमिनार के नाम का...

उसने परामठे की जगह सूखे रोट धर दिये थाली मे...

रलदु न मारया रुक्का अक ये तन्ने परामठे दिखे स के... ?

किताबों : बेलन मारया बगा के अक बनावे तू है अक मै.....
 
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