I have been thinking on this subject for quite a long time and think that where we are going as a nation, a civilized nation? Everyday we read in newspapers, watch on TV that mob killed thieves, mob killed a driver who accidently killed someone. Law and order situation is detariorating rapidly in all over India and Bihar is on top in this atleast. Even a peacful state like Rajasthan is having this kind of incidents. This shows that how we are loosing confidence in our law, How corrupt is the system?
I am reproducing an article which was published in "Dainik Bhaskar" on Sep. 15, 2007. Please read and express your views.
अभिमत. न कोई अपील, न दलील, न गवाही न जिरह, सीधे सजा। और वह भी घटनास्थल पर। जज एक दो नहीं, सैकड़ों या हजारों। जी हां, यह भीड़ का इंसाफ है। और आजकल देश में इस तरह का इंसाफ करने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है।
ताजा मामला बिहार के बैशाली जिले के ढेलपुरवा गांव का है, जहां भीड़ ने 10 कथित चोरों को पीट-पीटकर मार डाला। इन लोगों को सफाई तक का मौका नहीं दिया गया।
दरअसल इस घटना की बीती रात ही ढेलपुरवा के पड़ोसी गांव में चोरी हुई थी। गांव वालों ने अचानक 13 अनजान लोगों को देखा, जो किसी वाहन की तलाश कर रहे थे। गांव वालों के पूछताछ करने पर वे भागने लगे। गांव वालों ने घेरकर इनमें से 11 लोगों को पकड़ लिया और इतना पीटा कि 10 की तो मौके पर ही मौत हो गई और एक गंभीर रूप से घायल है।
भीड़ के इंसाफ का एक नमूना पिछले दिनों दिल्ली में भी दिखा था जब एक चैनल द्वारा एक शिक्षिका उमा खुराना को स्टिंग ऑपरेशन के जरिए छात्राओं के जिस्म का सौदा करते दिखाया गया। यह खबर देखकर भीड़ ने शिक्षिका को क्लास रूम से निकालकर पीटा और कपड़े तक फाड़ दिए।
बाद में पता चला कि शिक्षिका पर लगा आरोप गलत था और पूरा स्टिंग ऑपरेशन फर्जी था, लेकिन भीड़ तो इसके पहले ही शिक्षिका को सजा दे चुकी थी। इन घटनाओं की तह में जाएं तो हम इनके कारणों की भी पड़ताल कर सकते हैं।
दरअसल भीड़ द्वारा कानून हाथ में ले लेने की बढ़ती प्रवृत्ति इस बात की सूचक है कि लोगों का पुलिस और कानून से विश्वास उठता जा रहा है। इस प्रवृत्ति को और बढ़ने से रोकने के लिए पुलिस और कानून में लोगों का विश्वास बहाल करना बहुत जरूरी है, वरना एक ऐसा अराजक माहौल बन जाएगा जिसमें सिर्फ भीड़ का कानून ही चलेगा।
I am reproducing an article which was published in "Dainik Bhaskar" on Sep. 15, 2007. Please read and express your views.
अभिमत. न कोई अपील, न दलील, न गवाही न जिरह, सीधे सजा। और वह भी घटनास्थल पर। जज एक दो नहीं, सैकड़ों या हजारों। जी हां, यह भीड़ का इंसाफ है। और आजकल देश में इस तरह का इंसाफ करने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है।
ताजा मामला बिहार के बैशाली जिले के ढेलपुरवा गांव का है, जहां भीड़ ने 10 कथित चोरों को पीट-पीटकर मार डाला। इन लोगों को सफाई तक का मौका नहीं दिया गया।
दरअसल इस घटना की बीती रात ही ढेलपुरवा के पड़ोसी गांव में चोरी हुई थी। गांव वालों ने अचानक 13 अनजान लोगों को देखा, जो किसी वाहन की तलाश कर रहे थे। गांव वालों के पूछताछ करने पर वे भागने लगे। गांव वालों ने घेरकर इनमें से 11 लोगों को पकड़ लिया और इतना पीटा कि 10 की तो मौके पर ही मौत हो गई और एक गंभीर रूप से घायल है।
भीड़ के इंसाफ का एक नमूना पिछले दिनों दिल्ली में भी दिखा था जब एक चैनल द्वारा एक शिक्षिका उमा खुराना को स्टिंग ऑपरेशन के जरिए छात्राओं के जिस्म का सौदा करते दिखाया गया। यह खबर देखकर भीड़ ने शिक्षिका को क्लास रूम से निकालकर पीटा और कपड़े तक फाड़ दिए।
बाद में पता चला कि शिक्षिका पर लगा आरोप गलत था और पूरा स्टिंग ऑपरेशन फर्जी था, लेकिन भीड़ तो इसके पहले ही शिक्षिका को सजा दे चुकी थी। इन घटनाओं की तह में जाएं तो हम इनके कारणों की भी पड़ताल कर सकते हैं।
दरअसल भीड़ द्वारा कानून हाथ में ले लेने की बढ़ती प्रवृत्ति इस बात की सूचक है कि लोगों का पुलिस और कानून से विश्वास उठता जा रहा है। इस प्रवृत्ति को और बढ़ने से रोकने के लिए पुलिस और कानून में लोगों का विश्वास बहाल करना बहुत जरूरी है, वरना एक ऐसा अराजक माहौल बन जाएगा जिसमें सिर्फ भीड़ का कानून ही चलेगा।