Mere gaon ki galiyaan kahti hain....

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sandeeprathee

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मेरे गाँव की गलियां कहती हैं...

Its been a long time since i have been to my village. Many a times i think about the days when my very hamlet was my favourite Holiday destination. Memories are endless and sometimes i wish i could move back in time and enjoy those incredible moments once again.

I wonder if my village does also waits for me ...


मेरे गाँव की गलियां कहती हैं...

मेरे गाँव की गलियां कहती हैं
कभी हमसे भी मिलने आया करो

इस मिट्टी में तुमने जन्म लिया
कभी इस मिट्टी से भी मिल के जाया करो

ये खेत, चौपाल, पनघट के रस्ते
बैल, जोहड़, लकड़ी की तख्ती
और खेल तुम्हारे सब बचपन के
कब से रस्ता देख रहे हैं

कभी याद इन्हे कर मुस्काया करो
कभी इनसे भी मिलने आया करो

जोहड़ के किनारे का पीपल कब से इस आस में बैठा है
तुम फ़िर कब उसके पतों की फिरकी को बना के दौडोगे
बरगद भी बाट में बुढा हुआ उसकी दाढी भी गहरी हुई
उसके पतों की खड-खड में जैसे विरह वेदना ठहरी हुई

ये सब तो यादों को संजोयें हैं
तेरी याद में कितना रोये हैं

अपने बचपन के मित्रों के लिए तनिक
दो अश्रु तुम भी बहाया करो

इसी मिटटी से हो गढे गए, रहते थे इसी में सने हुए
खेला करते थे देर दुपहर, गिर गिर कर इसी में खड़े हुए
जाने अब क्यों हमसे रूठे हो
दूर जो इतना जा बैठे हो

क्या आने की भी चाह नही
क्या उठती कभी दिल से आह नही

आ जाओ की आँगन सुना है,
नही अब लगती कोई किलकारी है
तुम बिन इस घर में
सन्नाटे का दांव भारी है

तुम तो इन सब के प्यारे थे, क्या तुमको न याद सताती है
या समय की लम्बी अवधी ने यादों को नींद दिला दी है

जिस मिटटी के चूल्हे पर पूरे कुनबे की रोटी सिकती थी
अब राख के नीचे कोने में इक याद सिलगती रहती है
इक इक कर सब आँगन से उठ चले गए
अबके बरस इन जाडों में बूढी दादी की बारी लगती है

क्या अब मिलने के लिए दो घड़ी भी भारी लगती हैं

जब छत की मुंडेरों से तुम नीचे झाँका करते थे
दादी पर फ़िर चुपके से हौले से कंकर मारा करते थे
डंडा लेकर दादी फ़िर पीछे दौड़ा करती थी
तुम्हारी इस शैतानी में मासूमी झलका करती थी

मुंडेरों की इंटें अब गल कर गिरने को हैं
नीर लिए अंखियों में जम के शिकायत भरने को हैं

क्या इनकी मायूसी भरी शिकायक की भी तुम्हे कोई परवाह नही

फौजी चाचा की चिट्ठी को चाव से पढ़ के सुनाते थे
फ़िर फ़ौरन जवाब लिखने को दौड़ के लिफाफा लाते थे

ख़तम हुए वो दौर भी अब तो
डाकिये की भी आमद ख़तम हुई

तेरी चिट्ठी की आहट सुनने को
दरवाजे की कुण्डी के कान रह रह कर जागा करते हैं

मेरे गाँव की गलियां कहती हैं
कभी हमसे भी मिलने आया करो ....


Lets move back to our villages... aa ab laut chalen :)
 
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मेरे गाँव की गलियां कहती हैं...

its been a long time since i have been to my village. Many a times i think about the days when my very hamlet was my favourite holiday destination. Memories are endless and sometimes i wish i could move back in time and enjoy those incredible moments once again.

I wonder if my village does also waits for me ...


मेरे गाँव की गलियां कहती हैं...

मेरे गाँव की गलियां कहती हैं
कभी हमसे भी मिलने आया करो

इस मिट्टी में तुमने जन्म लिया
कभी इस मिट्टी से भी मिल के जाया करो

ये खेत, चौपाल, पनघट के रस्ते
बैल, जोहड़, लकड़ी की तख्ती
और खेल तुम्हारे सब बचपन के
कब से रस्ता देख रहे हैं



lets move back to our villages... Aa ab laut chalen :)
बहुत बडिया भाई गाँव की याद फेर दिला दी आपने एक बार .
अब तो दो - चार दिन में गाँव का चक्कर जरुर मारना पड़ेगा .
 
मेरे गाँव की गलियां कहती हैं...

Thanks for sharing nice composition.
To me vaillages are our basic roots...
I used visit my village but it's been 2 years i haven't been able to visit...
I hope to visit in the coming time...
 
Bahut aachi kavita se bhai ... aapka kavi hridya aur shabd rachna kafi aachey lage.

Bhai ke yo kaam ho sake se?

Jitu bhai ram ram...aapki sarahana ke liye dhanyavaad.

Aaj ke samay main gaon ka samajik vatavaran kaafi kuch sahari manobhav se mail khata hai. Jo mailjol aur prembhav aaj se ik dashak pehle gaon main savarjnik tha vo aaj vilupt ho chuka hai..ya yoon kah lijiye ki sahari mansikta gaon ke logon par haavi ho chuki hai...

bhai bhai se avsaad rakhta hai....bairkashi ke karan logon ka saath uthna baithna kam ho gaya hai...iske kaaran kuch bhi hoon par mahaul pehle jaisa madhur nahi hai.

aise main gaon ki taraf rookh karna shayad mumkin na ho ..par jis jagah janam hua hai usse ta-umar lagav rehta hi hai.

kya pata mahaul kal fir badle...aur gaon lautne par for vahi aseem sneh ki anubhti ho....Amen!!
 
aapne bhut hi accha likka hai bhai
ye baat asi hoti hai ki rhe rhe yaad ati rhati hai
मेरे गाँव की गलियां कहती हैं...

Its been a long time since i have been to my village. Many a times i think about the days when my very hamlet was my favourite Holiday destination. Memories are endless and sometimes i wish i could move back in time and enjoy those incredible moments once again.

I wonder if my village does also waits for me ...


मेरे गाँव की गलियां कहती हैं...

मेरे गाँव की गलियां कहती हैं
कभी हमसे भी मिलने आया करो

इस मिट्टी में तुमने जन्म लिया
कभी इस मिट्टी से भी मिल के जाया करो

ये खेत, चौपाल, पनघट के रस्ते
बैल, जोहड़, लकड़ी की तख्ती
और खेल तुम्हारे सब बचपन के
कब से रस्ता देख रहे हैं

कभी याद इन्हे कर मुस्काया करो
कभी इनसे भी मिलने आया करो

जोहड़ के किनारे का पीपल कब से इस आस में बैठा है
तुम फ़िर कब उसके पतों की फिरकी को बना के दौडोगे
बरगद भी बाट में बुढा हुआ उसकी दाढी भी गहरी हुई
उसके पतों की खड-खड में जैसे विरह वेदना ठहरी हुई

ये सब तो यादों को संजोयें हैं
तेरी याद में कितना रोये हैं

अपने बचपन के मित्रों के लिए तनिक
दो अश्रु तुम भी बहाया करो

इसी मिटटी से हो गढे गए, रहते थे इसी में सने हुए
खेला करते थे देर दुपहर, गिर गिर कर इसी में खड़े हुए
जाने अब क्यों हमसे रूठे हो
दूर जो इतना जा बैठे हो

क्या आने की भी चाह नही
क्या उठती कभी दिल से आह नही

आ जाओ की आँगन सुना है,
नही अब लगती कोई किलकारी है
तुम बिन इस घर में
सन्नाटे का दांव भारी है

तुम तो इन सब के प्यारे थे, क्या तुमको न याद सताती है
या समय की लम्बी अवधी ने यादों को नींद दिला दी है

जिस मिटटी के चूल्हे पर पूरे कुनबे की रोटी सिकती थी
अब राख के नीचे कोने में इक याद सिलगती रहती है
इक इक कर सब आँगन से उठ चले गए
अबके बरस इन जाडों में बूढी दादी की बारी लगती है

क्या अब मिलने के लिए दो घड़ी भी भारी लगती हैं

जब छत की मुंडेरों से तुम नीचे झाँका करते थे
दादी पर फ़िर चुपके से हौले से कंकर मारा करते थे
डंडा लेकर दादी फ़िर पीछे दौड़ा करती थी
तुम्हारी इस शैतानी में मासूमी झलका करती थी

मुंडेरों की इंटें अब गल कर गिरने को हैं
नीर लिए अंखियों में जम के शिकायत भरने को हैं

क्या इनकी मायूसी भरी शिकायक की भी तुम्हे कोई परवाह नही

फौजी चाचा की चिट्ठी को चाव से पढ़ के सुनाते थे
फ़िर फ़ौरन जवाब लिखने को दौड़ के लिफाफा लाते थे

ख़तम हुए वो दौर भी अब तो
डाकिये की भी आमद ख़तम हुई

तेरी चिट्ठी की आहट सुनने को
दरवाजे की कुण्डी के कान रह रह कर जागा करते हैं

मेरे गाँव की गलियां कहती हैं
कभी हमसे भी मिलने आया करो ....


Lets move back to our villages... aa ab laut chalen :)
 
Good composition, Sandeep

This poem is expressing the most beautiful sense :)

I really enjoyed it reading and memorised all my childhood visits to village.... :)
 
bhai saab chize change ho gyi hai ab
gaao ke wo maje na jaane kha chle gye jab kheto main se karbooje toda karte they
nadi main nhane jaya karte they raat main hide and seek khela karte they
school se bank marke cricket khela karte they khas wo din aa jaye jab raam lila ke time pe mastiya karte they sab ki bugi mudhi kar dete they wow
kitne maje ate they us time
sab change ho gya eb
sandeep bhai, yaade Hari kri...
 
amazing rathi bhai...........orginal or solid bat kahin hai bhai.......abki bar gaon jaroor jaunga........


मेरे गाँव की गलियां कहती हैं...

Its been a long time since i have been to my village. Many a times i think about the days when my very hamlet was my favourite Holiday destination. Memories are endless and sometimes i wish i could move back in time and enjoy those incredible moments once again.

I wonder if my village does also waits for me ...


मेरे गाँव की गलियां कहती हैं...

मेरे गाँव की गलियां कहती हैं
कभी हमसे भी मिलने आया करो

इस मिट्टी में तुमने जन्म लिया
कभी इस मिट्टी से भी मिल के जाया करो

ये खेत, चौपाल, पनघट के रस्ते
बैल, जोहड़, लकड़ी की तख्ती
और खेल तुम्हारे सब बचपन के
कब से रस्ता देख रहे हैं

कभी याद इन्हे कर मुस्काया करो
कभी इनसे भी मिलने आया करो

जोहड़ के किनारे का पीपल कब से इस आस में बैठा है
तुम फ़िर कब उसके पतों की फिरकी को बना के दौडोगे
बरगद भी बाट में बुढा हुआ उसकी दाढी भी गहरी हुई
उसके पतों की खड-खड में जैसे विरह वेदना ठहरी हुई

ये सब तो यादों को संजोयें हैं
तेरी याद में कितना रोये हैं

अपने बचपन के मित्रों के लिए तनिक
दो अश्रु तुम भी बहाया करो

इसी मिटटी से हो गढे गए, रहते थे इसी में सने हुए
खेला करते थे देर दुपहर, गिर गिर कर इसी में खड़े हुए
जाने अब क्यों हमसे रूठे हो
दूर जो इतना जा बैठे हो

क्या आने की भी चाह नही
क्या उठती कभी दिल से आह नही

आ जाओ की आँगन सुना है,
नही अब लगती कोई किलकारी है
तुम बिन इस घर में
सन्नाटे का दांव भारी है

तुम तो इन सब के प्यारे थे, क्या तुमको न याद सताती है
या समय की लम्बी अवधी ने यादों को नींद दिला दी है

जिस मिटटी के चूल्हे पर पूरे कुनबे की रोटी सिकती थी
अब राख के नीचे कोने में इक याद सिलगती रहती है
इक इक कर सब आँगन से उठ चले गए
अबके बरस इन जाडों में बूढी दादी की बारी लगती है

क्या अब मिलने के लिए दो घड़ी भी भारी लगती हैं

जब छत की मुंडेरों से तुम नीचे झाँका करते थे
दादी पर फ़िर चुपके से हौले से कंकर मारा करते थे
डंडा लेकर दादी फ़िर पीछे दौड़ा करती थी
तुम्हारी इस शैतानी में मासूमी झलका करती थी

मुंडेरों की इंटें अब गल कर गिरने को हैं
नीर लिए अंखियों में जम के शिकायत भरने को हैं

क्या इनकी मायूसी भरी शिकायक की भी तुम्हे कोई परवाह नही

फौजी चाचा की चिट्ठी को चाव से पढ़ के सुनाते थे
फ़िर फ़ौरन जवाब लिखने को दौड़ के लिफाफा लाते थे

ख़तम हुए वो दौर भी अब तो
डाकिये की भी आमद ख़तम हुई

तेरी चिट्ठी की आहट सुनने को
दरवाजे की कुण्डी के कान रह रह कर जागा करते हैं

मेरे गाँव की गलियां कहती हैं
कभी हमसे भी मिलने आया करो ....


Lets move back to our villages... aa ab laut chalen :)
 
Bahut sunder likha hai Sandeep Bhai.

Gaon jaaney mein itnee deir bhee nahi kernee chahiyea kee koi tumehy pehchanney wala he na rahey. Mein puri koshish kerta hun kee saal mein kam-say kam 2-3 baar gaon jarur jaya jai or wo mouka jayadter to parivaar kee shadiya hee dey deti hai.
 
Nice composition Rathee sahab....... but some JL members like me will moisten their eyes after finishing the poem...... we are so away from our village....... so away from motherland....... away from mother.....

However, thanks dear for this nice composition
 
u r real diamond man !

this is great stuff man ! u r real diamond in us ! great , just great !

mussya hi dittya hoon , ek bai to ron ka bhundda jee kar ryaa thaa :mad: !



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Its been a long time since i have been to my village. Many a times i think about the days when my very hamlet was my favourite Holiday destination. Memories are endless and sometimes i wish i could move back in time and enjoy those incredible moments once again.

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