jyotikohar
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तुमसे पूछूँ
माँ......
मैं कैसा भी रहूँ,
तुम मेरी ही कह्लाओगी ना?
मेरी हर हार पर दुखी हो कर,
सर सहला कर समझाओगी ना?
जीत कर आता हूँ तो,
जी भर कर देखती हो जैसे.
वैसे ही मेरी हार पर भी,
ममता अपनी लुटाओगी ना??
हाथ नन्ही उँगलियों में थमा कर,
चलना सिखाया था एक दिन.
आज भी ठोकर लगेगी ,
तो हुलस हुलस जाओगी ना??
बड़ा हो गया हूँ ,
जमाने की खातिर.
मगर थाकुंगा तो,
अपने आँचल में सुलाओगी ना??
करूं लाख भूलें,
मारोगी मुझको.
फिर हल्दी लगा कर,
चोटों पर पछ्तोगी ना??
कभी पैर भटके,
तो पहले की माफिक.
उमेठ के कानों को,
सही राह मुझको दिखाओगी ना??
जली कच्ची रोटी,
कभी मैं पका के.
खिलाऊं जो तुमको,
अभी भी ख़ुशी से वो खाओगी न??
होली के पुए दिवाली के लड्डू,
हाथों से अपने खिलाओगी ना?
मुझे दुबला पतला अब भी कहोगी,
रस्ते पे पलकें बिछाए रहोगी.
मेरी छिकों पर भी,
मनौतियाँ हजारों चढाओगी ना??
बचपन में जब जब,
तुम जाती थी मंदिर.
तुम्हे ना पा के घर में,
मैं था जार रोता.
आज भी मेरी हर याद में आ,
तुम मुझको हर पल रुलाओगी ना??
मैं कैसा भी होऊं,
तुम्हारा रहूंगा.
हर जनम में मुझको बेटा,
अपना ही बेटा बनाओगी ना??
vivek bhai MA kardi yaad aagi teri kavita padh ke................