We welcome Devender Sehrawat !!! He has raised very good point. I too feel same thing. Every Jat feels so. Reasons are historical. Thakur Deshraj is our best historian. He also felt and wrote
जाट इतिहास (उत्पत्ति और गौरव खंड), 1937. Same forces are still working. We have to identify them and neutralize their attempts. I am digitizing this book on Jatland. You may read here
https://www.jatland.com/home/Jat_Itihas_(Utpatti_Aur_Gaurav_Khand)
I quote some paras:
[p.ii] जाटों को पिछले एक हजार वर्ष ईसा की छठी शताब्दी से 16वीं शताब्दी तक दोहरे संघर्ष का सामना करना पड़ा है।
धार्मिक संघर्ष और
राजनैतिक संघर्ष ने उनके ढांचे को काफी जर्जर कर दिया है। पंजाब और राजपूताना में फिर से यदि वे राज्य शक्ति प्राप्त न करते तो इसमें संदेह है कि सामाजिक पद उनका आज के स्थान पर भी रहता।
[p.iii]: कहावत है कि गुलाम जाति का दिमाग भी गुलाम हो जाता है। इसी लोकोक्ति के अनुसार जाटों का एक समूह भी यह मानने लग गया कि हम तो पहले
राजपूत थे बाद में जाट हो गए हैं। हालांकि यह बात ऐसी थी जैसे स्कूल में पढ़ने वाले लाखों विद्यार्थियों का यह ख्याल हो गया है कि अंग्रेजों के आने से पहले हिंदुस्तान निरा जंगलियों का देश था। सदैव से ही विजेता जाति इस प्रयत्न में रहती है कि किसी भी तरह पराजित जाति के अंदर से आत्मगौरव अथवा जातीय-अभिमान की मात्रा मिटा दी जाए। क्योंकि
आत्म-गौरव और
जातीय अभिमान सदैव ही व्यक्ति के हृदय में उन्नत होने की प्रेरणा किया करते हैं।
इसी लक्ष्य को सामने रखकर राजपूताने में तो राजपूत शासकों ने जाटों के लिए
पालत्यां,
खोथला आदि जैसे घृणित नाम भी ईज़ाद कर लिए। पालत्यां का अर्थ पालित और आश्रित होता है। उनका कहना है कि हमने जाट लोगों को लाकर अपने राज्य में बसाया था। हालांकि यह बात मजाक से अधिक वजनदार नहीं है। जाट राजपूताने में जहां भी कहीं आबाद हैं दस पाँच शताब्दियों से नहीं किंतु बीसवीं शताब्दी से आबाद हैं। राजस्थान के वर्तमान राजपूत शासक खानदान में कोई भी 10 वीं शताब्दी से पहले का नहीं है। यह बात उन्हीं के इतिहास से साबित होती है।
इतना सब कुछ लिखने से हमारा इसके सिवा कुछ मतलब नहीं है कि जाट जाति आत्मगौरव और जाति अभिमान से वंचित
[p.iv] की जा चुकी है। उसके दिमाग में दूसरों द्वारा जो गलत बातें बिठा दी गई हैं उन्हें ही वह सही मान बैठी है।
कोई जाति
आत्मगौरव से तभी ओत-प्रोत हो सकती है जब उसका अपना इतिहास हो। भला जिस जाट जाति ने
एशिया और
यूरोप को अपनी योग्यता और वीरता से चकित किया हो, उसका कोई इतिहास नहीं था! अवश्य था किंतु पोथी के रूप में - सो भी किसी एक ऐसी पोथी के रूप में जिससे केवल जाट इतिहास की पोथी का नाम दे सकें न था। इसी कमी को दूर करने के लिए मैंने 3 वर्ष के कठिन परिश्रम के बाद सन्
1934 ई. की बसंत पंचमी पर "जाट इतिहास" तैयार किया था। जाट और गैर जाट सभी लोगों ने उसकी प्रशंसा की थी।
[पृ.29]:
उधर ब्राह्मण लोग
जाटों से उनकी सामाजिक उदारता के कारण असंतुष्ट थे ही।
जैन और
ब्राह्मणों का जिस समय संघर्ष चल रहा था उस समय तो ब्राह्मणों ने स्पष्ट कह दिया था कि कलयुग में कोई क्षत्रिय नहीं है। क्योंकि जैन लोग आरंभ में केवल तीन ही वर्ण मानते थे: क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। बौद्ध लोग भी ब्राह्मण की अपेक्षा क्षत्रिय को ऊंचा समझते थे। यही कारण था कि ब्राह्मणों को क्रोध में वह फतवा देना पड़ा कि कलयुग में क्षत्रिय वर्ण ही नहीं है। किंतु राज शक्ति के बिना धर्म का प्रचार होने में बड़ी कठिनाई थी। अतः पहले तो उन्होंने कई राज्यों को षड्यंत्र द्वारा अपने हाथ में किया।
शुंग,
चच और
कण्व इसके उदाहरण हैं[SUP]*[/SUP] किंतु कुछ काल बाद अनेकों बौद्ध जैन राजाओं को अपने धर्म में दीक्षित कर लिया। दीक्षा संबंधी सबसे बड़ा उत्सव
आबू का यज्ञ है जिसमें उत्तरी भारत के अनेक वंश आकर दीक्षित हुए थे।
चाहू,
परिहार,
सोलंकी और
परमार इन में मुख्य हैं। यहीं से एक तीसरे
अग्निकुल की स्थापना हुई। पीछे से ब्राह्मण और अग्निकुल एक हो गए। हो ही जाने चाहिए थे उनकी स्थापना का उद्देश्य ही एक था। इस आंदोलन
* देखो विश्वेश्वरनाथ रेऊ कृत भारत के प्राचीन राजवंशी द्वितीय भाग में शुंग और कण्व वंश का वर्णन।
[पृ.30]:आंदोलन (movement) के मुख्य दो केंद्र थे।
आबु और
नैमिषारण्य। यह
अग्निकुली और
ब्रह्मकुली लोग ही आगे चलकर
राजपूत के नाम से प्रसिद्ध हो गए और अब क्षत्रिय शब्द का स्थान
राजपूत शब्द ने ले लिया। हालांकि राजपूत क्षत्रिय वंशवृक्ष की एक शाखा मात्र थे। बढ़ते बढ़ते एक समय
राजपूतों के संगठन में 36 कुल शामिल हो गये थे। इनकी कई बार गणना हुई है। पहले के बाद में जितनी बार भी गणना हुई संख्या बढ़ती ही गई। किंतु नाम 36 ही रहा है।
चंद्रबरदाई के बाद
कर्नल टोड ने ही शायद इस गिनती को दोहराया था।[SUP]*[/SUP] यदि आज गिनती की जाए तो यह संख्या अब 200 के करीब पहुंचाएगी क्योंकि तब से कई राज खानदान इस राजपूत संगठन में शामिल हो गए हैं।
कपूरथला के
अहलूवालिया और
पडरौना के
कुर्मी तो अभी पिछले 15-20 वर्षों में ही दीक्षित हुए हैं। बस
इस संगठन में जो भी क्षत्रिय खानदान शामिल नहीं हुए उन्हें ही क्षत्रीयेतर वृषल और शूद्र तक कहने की धृष्टता की गई। हालांकि
खत्री,
लुहाना,
धाकड़,
गुर्जर,
रवा और
जाट पुरातन क्षत्रियों में से हैं। जाटों ने अनेक प्रकार के कष्ट सहकर भी उन रिवाजों को आज तक नहीं छोड़ा है जो वैदिक काल के उनके पूर्वजों द्वारा निर्धारित की गई थी।
* कर्नल टॉड ने इस 36 कुलों की संख्या में
जाटों का भी नाम दर्ज किया है।
[पृ.31]:
धार्मिक विद्वेष से बौद्ध काल के बाद के ब्राह्मणों और उनके अनुयायियों ने जाटों को गिराने के लिए ही यह कहना आरंभ किया था कि वे क्षत्रिय नहीं हैं। वरना क्या कारण है कि एक राजपूत
प्रमार तो क्षत्रिय है और दूसरा जाट
प्रमार क्षत्रीय नहीं है। जबकि वे दोनों इस बात को स्वीकार करते हैं कि हमारे दोनों के बाप-दादा एक ही थे।
जाटों में वे सारे गोत्र मौजूद हैं जो राजपूतों की 36 कुलों में गिने जाते हैं।
जाट और राजपूतों में जिनके गोत्र मिलते हैं रक्त का तो कोई अंतर है नहीं। हां रिवाजों का थोड़ा अंतर अवश्य है।