विकास भाई,
आम आदमी के आर्थिक हालात, आमदनी और प्रति व्यक्ति आय के मुद्दे पर चर्चा के लिये एक नये धागे की जरुरत है और जल्दी ही सभी तथ्यों और आंकडो के साथ एक नए धागे में मिलते है चर्चा के लिये|
मैं किस का समर्थन करता हूँ किस का नहीं करता, मेरी सोच अच्छी है या बेकार आदि आदि बातो / प्रशनो से, इस धागे के मूल विषय का कोई सम्बन्ध नहीं है और ना ही ज्वलन्त सवालों के जवाब मिलते है जो इस धागे में उठाये गए है| इस धागे की आप अपनी पहली पोस्ट दोबारा पढना तो आप को खुद पता चला जायेगा कि आम आदमी की एक सांसद से तुलना कितना सही है? और धागे के topic व मिज़ाज से कितना मेल खाता है? ये ही मेरा पहली पोस्ट का सवाल था| इसे कुछ यूँ समझा जा सकता है मान लो एक कक्षा के कुछ बच्चे किसी धर्म की बुराई करते है और उसी स्कूल का एक teacher प्रार्थना सभा / morning assembly में धार्मिक भावनाओ को राष्ट्रीय गीत से ऊपर बताता है | निष्कर्ष आप खुद तय करें|
मैं आशा करूँगा कि सभी सदस्य अब से आपके इस कथन को ध्यान में रखे "मैं कभी सिर्फ काँग्रेस की तरफदारी नहीं करता मैं सही और गलत की तरफदारी करता हू, काँग्रेस मैं त्रुटि है और बहुत सारी त्रुटि है" और आपके प्रति बनी धारणा को पुनः परिभाषित करेंगे |
इस धागे की मेरी दूसरी पोस्ट का मुख्य सवाल (तथाकथित धर्मनिरपेक्ष खान्ग्रेस पार्टी की बोलती क्यूँ बंद है इस मुद्दे पर?) अभी भी निरुत्तरित है और आशा थी कि आप भले ही ऊँचे स्वर में जवाब ना दें, दबी आवाज में तो देंगे ही |
अब रही बात सरकार के काम काज की, हाँ सरकार ने बहुत से अच्छे काम भी किये है| तो क्या सब उसके गुणगान करने लग जाए? ये सरकार का दायित्व है कि वो देश का काम काज ठीक से चलाए और जिन दायित्वों का निर्वाह ठीक से नहीं किया या गलतियाँ की, उन पर जनता का सवाल उठाना लाजिमी है| सरकार की नीतियों की समीक्षा / आलोचना जनता और बुध्दिजीवी नहीं करंगे तो कौन करेगा? यही तो लोकतंत्र है वर्ना राजशाही और लोकतंत्र में क्या फरक रह जायेगा? अब आप ही बताएं सरकार की त्रुटियों पर लोगो का बात/चर्चा करना ठीक है या नहीं?
"जीयो और जीने दो" की मूल विचारधारा पर जीवन जीता हूँ | पत्थर फेकने में मैं विश्वास नहीं रखता, ये गुजरे वक्त की बात थी लेकिन बुलेट प्रूफ शीशे अपनी सुरक्षा के लिये लगवा रखे है ताकि कोई आके अपना सिर मारे तो मुझे कुछ नुक्सान ना हो|
आम आदमी के आर्थिक हालात, आमदनी और प्रति व्यक्ति आय के मुद्दे पर चर्चा के लिये एक नये धागे की जरुरत है और जल्दी ही सभी तथ्यों और आंकडो के साथ एक नए धागे में मिलते है चर्चा के लिये|
मैं किस का समर्थन करता हूँ किस का नहीं करता, मेरी सोच अच्छी है या बेकार आदि आदि बातो / प्रशनो से, इस धागे के मूल विषय का कोई सम्बन्ध नहीं है और ना ही ज्वलन्त सवालों के जवाब मिलते है जो इस धागे में उठाये गए है| इस धागे की आप अपनी पहली पोस्ट दोबारा पढना तो आप को खुद पता चला जायेगा कि आम आदमी की एक सांसद से तुलना कितना सही है? और धागे के topic व मिज़ाज से कितना मेल खाता है? ये ही मेरा पहली पोस्ट का सवाल था| इसे कुछ यूँ समझा जा सकता है मान लो एक कक्षा के कुछ बच्चे किसी धर्म की बुराई करते है और उसी स्कूल का एक teacher प्रार्थना सभा / morning assembly में धार्मिक भावनाओ को राष्ट्रीय गीत से ऊपर बताता है | निष्कर्ष आप खुद तय करें|
मैं आशा करूँगा कि सभी सदस्य अब से आपके इस कथन को ध्यान में रखे "मैं कभी सिर्फ काँग्रेस की तरफदारी नहीं करता मैं सही और गलत की तरफदारी करता हू, काँग्रेस मैं त्रुटि है और बहुत सारी त्रुटि है" और आपके प्रति बनी धारणा को पुनः परिभाषित करेंगे |
इस धागे की मेरी दूसरी पोस्ट का मुख्य सवाल (तथाकथित धर्मनिरपेक्ष खान्ग्रेस पार्टी की बोलती क्यूँ बंद है इस मुद्दे पर?) अभी भी निरुत्तरित है और आशा थी कि आप भले ही ऊँचे स्वर में जवाब ना दें, दबी आवाज में तो देंगे ही |
अब रही बात सरकार के काम काज की, हाँ सरकार ने बहुत से अच्छे काम भी किये है| तो क्या सब उसके गुणगान करने लग जाए? ये सरकार का दायित्व है कि वो देश का काम काज ठीक से चलाए और जिन दायित्वों का निर्वाह ठीक से नहीं किया या गलतियाँ की, उन पर जनता का सवाल उठाना लाजिमी है| सरकार की नीतियों की समीक्षा / आलोचना जनता और बुध्दिजीवी नहीं करंगे तो कौन करेगा? यही तो लोकतंत्र है वर्ना राजशाही और लोकतंत्र में क्या फरक रह जायेगा? अब आप ही बताएं सरकार की त्रुटियों पर लोगो का बात/चर्चा करना ठीक है या नहीं?
"जीयो और जीने दो" की मूल विचारधारा पर जीवन जीता हूँ | पत्थर फेकने में मैं विश्वास नहीं रखता, ये गुजरे वक्त की बात थी लेकिन बुलेट प्रूफ शीशे अपनी सुरक्षा के लिये लगवा रखे है ताकि कोई आके अपना सिर मारे तो मुझे कुछ नुक्सान ना हो|
पहले मैं aap के तर्क का तर्क से जवाब देता हु बाद मैं आप के कुतर्क का जवाब दूंगा
1) आम आदमी की आय पिछले चंद सालो मैं 10% से ऊपर पढ़ रही है
2) 2009 मैं per capita इंकम सबसे तेज़ी से बढ़ी और 7 सालो मैं दुगुनी हो गई
खैर आप ये बात मानेंगे नहीं क्यूँ की आज आप ने ये ज़हीर कर दिया की आप यहा तर्क कुतर्क करने नहीं सिर्फ ek पार्टी के खिलाफ बोलने आते है क्यूंकी आप को भी तर्क से कोई फरक नहीं पड़ता
आप मुझे बताने का कष्ट करेंगे की कितने जवाबो मैं मेरे आप ने अपशब्द सुने या भद्दे नाम सुने नेताओ या पार्टियो के? कितने पोस्ट्स मैं मैंने अपने भाइयो के ऊपर निजी सवाल उठाए, जवाब देना अलग बात है..। मैं हैरान हूँ की आप की राईता फैलाने की परिभाषा पर जो सिर्फ इतनी है की सरकार की सही बात को सही ठहराना , मुझे आप से बेहतर सोच की उम्मेद थी सुभाष भाई
अपनी बात को तर्क के साथ रखना राईता फैलाना होता है तो फिर आप एक राइते के समुंदर में जी रहे है क्यूंकी अधिकतर हिन्दुस्तानियो ने इसी राईता नूमी सोच के आधार पर सरकार को समर्थन दिया है ..।
तीसरी और सब से महत्वरपूर्ण बात मैं कभी सिर्फ काँग्रेस की तरफदारी नहीं करता मैं सही और गलत की तरफदारी करता हू, काँग्रेस मैं त्रुटि है और बहुत सारी त्रुटि है पर आप कहते है की उसमे सिर्फ त्रुटि ही त्रुटि है अच्छा कुछ नहीं तो मैं ये नहीं मानता
अब आप की दंगो वाली बात का जवाब, अगर सब से ज्यादा राज़ काँग्रेस करेगी तो स्वाभाविक है सबसे ज्यादा दंगे भी उसी के राज मैं होंगे, पर कुछ तो बात होगी विपक्षी पार्टियो मैं जो देश की जनता इतने दंगो बाद भी काँग्रेस को ही चुन कर भेजती है? शायद वो इससे भी खतरनाक हो पर आप की दूर दृष्टि कभी काँग्रेस के ऊपर उंगली उठाने से दूर उठे तो शायद आप भी देखे।
और शाशन काल मैं दंगे होना एक बात है और सरकार सहयोजित दंगे करना दूसरी , बाकी इशारा तो आप समझ ही गए होंगे..
आप की जानकारी के लिए मैं बता दी अगर सब से ज्यादा मौते किसी सरकार के काल मैं हुई है आतंकवाद को ले कर तो वो वजपायी की सरकार थी, सबसे सुरक्षित कोई सरकार अगर रही है अब तक तो वो पिछली काँग्रेस की ही सरकार थी और इस पर एक तागा भी है जिस पर लोगो ने अपने आप को आंकड़ो से ऊपर उठ कर अपनी विध्वनिता का प्रमाण दिया, शायद आप भी वही करेंगे अभी पर आप कुछ भी कहे वो कहने से हकीकत नहीं बदल जाती
और सुभाष भाई आप ने बुलेट प्रूफ शीशे लगवा रखे हो या नहीं, ये आप को फिर भी हक नहीं देता की आप दूसरों के घरो मैं पत्थर फेंको .। और शीशो मैं इतना मत खो जाना की लोगो की सही बात भी न सुनाई दे सके
क्षमा करना अगर कहीं लगा की मैंने ऊंचे स्वर मैं बात की हो, बुलेट प्रूफ खिड़की के पीछे आवाज़ पहुचाने की कोशिश जो करनी थी
सद्भावनाओ सहित
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