Research on Burdak clan history

lrburdak

Active member
I did an extensive touring during Nov-Dec 2010. Consulted the Burdak Record Keeper in village Maheshwas in Jaipur district. Got information about history and genealogy of Burdaks. I am producing below history of Burdak clan.
 
बुरड़क गोत्र का इतिहास

नोट:- बुरडक गोत्र का विवरण बुरड़क गोत्र का रेकॉर्ड रखने वाले उनके बड़वा श्री भवानीसिंह राव, गाँव- महेशवास, पोस्ट- बिचून, तहसील- फूलेरा, जिला- जयपुर (फोन-09785459386) से उनके अभिलेखों (बहियों) से लेखक द्वारा दिनांक 2 दिसंबर 2010 को जयपुर में प्राप्त किया गया है.

* वंश - अग्निवंश,

* शाखा- माधनिक

* कुलदेवी - जीणमाता, समरायमाता, आशापुरीमाता

* गोत्र - बछवस्व

* गुरू - वशिष्ठ मुनि

* नदी - गंगा

* पूजा - तुलसी, पीपल

* प्रवरपांच - झंडा-सफ़ेद, नगारा-रणजीत, घोडा-शावकरण, वेद-यजुर्वेद, वृक्ष-अक्षयबड़

* निकास - आबू पर्वत अनिलकुण्ड से

बुरडकों की प्रथम राजधानी चौहानपुर थी. पाटण, अचलनगरी, अजमेर, मकराणा, अजयगढ, इन्द्रगढ, ठठोभी (?), हस्तिनापुर, पाटण, हिसार, हांसी, ददरेवा, भंवरगढ, चितौडगढ, आसोट, इन्द्रप्रस्थ, गागरोणगढ, आसोट, अभयनगरी, तोषीण, नाडोल, जालोर, सांचोर, गोदू, साम्भर, सरनाऊ, आदि राजधानियां रही.

बुरड़कों द्वारा बसाए गए गाँव: बालरासर, कारी, सरणाऊ, गोठडा, पलथाना, जूणसिया, घाटवा, कांकरा, अजीतपुरा, नौरंगपुरा, मांडेता, ..., ...., चारणवास, गुमानपुरा, धीजपुरा, उदयपुरा, पिपराली, मालासी, मोरडूंगा, कालाडेरा, पालडी, श्यामपुरा, सरणाऊ-कोट , जीणवास, साली, हर्ष, अंखलोड़, अतरायखेडा आदि.

चौधरी बालणसिंह साम्भर से उठकर आये और माघ सुदी बसंत पंचमी के दिन संवत 821 (765 ad) को बालरासर गाँव बसाया. 85 हाथ गहरा पूणी पांच हाथ चोडा पक्का कुवा चिनवाया. इसकी गूण अगुणी (पूर्व) दिशा में रखी. गाँव से उत्तर दिशा में बालाणु नाम से जोहड़ खुदवाया. इसके नीचे सवा पांच सौ बीघा जमीन छोड़ी. शिव बद्रीनारायण का मंदिर बनवाया.

संवत 825 (768 AD) में बालरासर से उठकर चौधरी मालसिंह ने चैत सुदी राम-नवमी के दिन कारी गाँव बसाया. गाँव में 90 हाथ गहरा पूणी पांच हाथ चोडा पक्का कुवा और पनघट कराया. चार मरवे बनाये और इसकी गूण उत्तर दिशा में रखी. गोपीनाथजी का मंदिर बनवाया. ब्राह्मण धनराज ने पूजा की. 51 बीघा जमीन मंदिर के लिए दी. कारंगा गाँव से आथुनी सवा दो सौ बीघा जमीन बीरभाण चोहान के समय छोड़ी. संवत 835 (778 ad) में कारी गाँव के राव राजा बीरभाण चुहान थे.

चौहान से निकास

राजा रतनसेण के बिरमराव पुत्र हुए. बिरमराव ने अजमेर से ददरेवा आकर राज किया. संवत 1078 (1021 AD) में किला बनाया. इनके अधीन 384 गाँव थे. बिरमराव की शादी वीरभाण की बेटी जसमादेवी गढ़वाल के साथ हुई. इनसे तीन पुत्र उत्पन्न हुए:

1. सांवत सिंह - सांवत सिंह के पुत्र मेल सिंह, उनके पुत्र राजा धंध, उनके पुत्र इंदरचंद तथा उनके पुत्र हरकरण हुए. इनके पुत्र हर्ष तथा पुत्री जीण उत्पन्न हुयी. जीणमाता कुल देवी संवत 990 (933 ad) में प्रकट हुयी.
2. सबल सिंह - सबलसिंह के बेटे आलणसिंह और बालणसिंह हुए. सबलसिंह ने जैतारण का किला संवत 938 (881 ad) में आसोज बदी 10 को फ़तेह किया. इनके अधीन 240 गाँव थे.
3. अचल सिंह -

बुरडक गोत्र की उत्पति

सबलसिंह के बेटे आलणसिंह के पुत्र राव बुरडकदेव, बाग़देव, तथा बिरमदेव पैदा हुए. आलानसिंह ने संवत 979 (922 ad) में मथुरा में मंदिर बनाया तथा सोने का छत्र चढ़ाया.
शिव मंदिर सरनाऊ

ददरेवा के राव बुरडकदेव के तीन बेटे समुद्रपाल, दरपाल तथा विजयपाल हुए.

राव बुरडकदेव लाहोर के राजा जयपाल की मदद के लिए गए. लड़ाई में संवत 1057 (1000 AD) को वे जुझार हुए. इनकी पत्नी तेजल शेकवाल ददरेवा में तालाब के पाल पर संवत 1058 (1001 ad) में सती हुई. राव बुरडकदेव से बुरडक गोत्र निकला.

राव बुरडकदेव के बड़े पुत्र समुद्रपाल के 2 पुत्र नरपाल एवं कुसुमपाल हुए. समुद्रपाल राजा जयपाल के पुत्र अनंतपाल की मदद के लिए गए और वहां पर जुझार हुए. संवत 1067 (1010 AD) में इनकी पत्नी पुन्यानी साम्भर में सती हुई.

नरपाल के उदयसिंह और करणसिंह पुत्र हुए तथा पुत्री आभलदे हुई. आभलदे का विवाह संवत 1103 में रुनिया के गोदारा कर्मसिंह के साथ हुआ.

उदयसिंह के पुत्र राजपाल, राव उदणसिंह तथा भरतोजी पैदा हुए.

राजपाल के पुत्र अभयपाल, धीरपाल, भोलराव, भीमदेव तथा जीतराव पैदा हुए. राजपाल संवत 1191 (1134 AD) में अजमेर के राजा सोमेसर के प्रधान सेनापति बने.
 
Last edited:
सरणाऊ गाँव और सरणाऊ कोट की बसावट

भीमदेव के पुत्र जीणदेव तथा माहीदेव हुए जिन्होंने सरणाऊ गाँव बसाया. 12 गांव का परकोटा कराया तथा किला बनाया.

चौधरी मालूराम, धरणी जाखड, कंवर आलणसिंह और वीरभाण ने कारी गांव से आकर सरणाऊ कोट की बसावट करी और सरणाऊ में गढ़-किला की स्थापना करी . गढ़ की नींव लगवाई. अगुणा दरवाजा रखा. गढ़ में जनाना और मरदाना महल बनाये. गढ़ में बारा-दरी बैठक बनायी. गढ और गांव का चौतरफा परकोटा बनाया. आगे अलग दरवाजा बनाया. चारों तरफ़ खाई और खाई के चारों तरफ़ धूल-कोट बनाया.

संवत 1032 में दिल्ली के राजा महीपाल तंवर से 84 गांव ईजारे पर लिये और हुकुम तासीर प्राप्त की. 6 महिने का दीवानी और फौजदारी अधिकार प्राप्त किया. काठ, कोरडा, घोडी, नगर, निशान एवं जागीरदारी के पूरे अधिकार प्राप्त हुए. गाँव में हालूराम जी के नाम पर हालानी बावड़ी बनाई. जीणमाता के नाम पर 104 पेडी की बावडी बनाई और बाग लगाया. गढ की गोलाई 1515 गज करायी. शिवबद्री केदारनाथ, आशापुरी माता तथा हनुमान के तीन मन्दिर बनाये. पूजा ब्राह्मण रूघराज ने की. मंदिर खर्च के लिए 152 बीघा जमीन डोली छोड़ी. अमावास, ग्यारस और पूनम का पक्का पेटिया बांधा. यह काम पौष बदी 7 संवत 1033 (977 ad) में किया.


सरणाऊ कोट गढ़ में एक पक्का कुवा चिनाया. दूसरा कुवा सरनाउ गांव के बीच गुवाड़ में चिनाया. ये दोनों कुये फ़ागण बदी फ़ुलरिया दूज संवत 1035 (979 ad) में कराये.

चौधरी मालूरामजी, धरणीजी जाखड,चौधरी आलणसिंहजी तथा वीरभाणजी हरिद्वार, केदरनाथ, द्वारकाजी, गंगासागर, कुंभ आदि का स्नान कर तीन साल की यात्रा से सरनाउ आये. वापस आकर पंच-कुण्डीय यज्ञ करवाया. 51 मण घी की आहुति कराई. 51 गायें और 700 मण अनाज ब्राह्मणों को दान किया. गांव कारी के पंडित गिरधर गोपाल द्वारा यज्ञ सम्पन्न किया गया. पंडित गिरधर गोपाल की बेटी राधा को धर्मं परणाई और पीपल परणाई. चौधरी हालूराम के समय दिल्ली के रावराजा महिपाल के समय ये काम संवत 1042 में कराये.

चौधरी मालूरामजी, धरणीजी जाखड,चौधरी आलणसिंहजी तथा वीरभाणजी ने संवत 1042 में सरनाउ-कोट तथा गढ, बावडी आदि बडवा जगरूप को लिखवाया और दान किया.

दिल्ली पति महीपाल तंवर के अधीन राव राजा की राजधानी सरनाउ को संवत 1032 में बनाया. बुरड़कों की राजधानी सरनाऊ संवत 1032 से संवत 1315 (975 - 1258 ad) तक रही.

संवत 1315 (1258 ad) में यह दिल्ली के बादशाह नसिरुदीन महमूद (1246–1266) पुत्र शमसुद्दीन इलतुतमिश (1211–1236) के अधीन हुई. बादशाह ने गानोड़ा गाँव के ढाका मोमराज को 52000 फ़ौज का मनसबदार बनाया. उस समय सरनाऊ कोट राजधानी चौधरी कालूरामजी बुरडक के पुत्र पदमसिंहजी बुरडक तथा जगसिंहजी बुरडक के अधिकार में थी. इस जागीर में 84 गाँव थे.
 
Last edited:
बुरड़क और ढाका की लड़ाई

सरनाऊ-कोट के बुरड़क और गनोडा के ढाका के बीच लडाई के दो कारण सामने आते है. पहला कारण पदमसिंह बुरड़क को मोमराज ढाका की पत्नी सुखी देवी द्वारा भला-बुरा कहा जाना है. यह बडवे के अभिलेख में पाया जाता है. दूसरा कारण बुरडक बुजुर्गों और स्थानीय बुजुर्ग लोगों द्वारा बताया गया जो बुरडक के कुए से ढाका औरत द्वारा पानी भरने को लेकर हुआ मनमुटाव है.

बडवे के अभिलेख अनुसार एक दिन पदम सिंह 84 गाँवों में घूमकर गानोडा गाँव से सरनाऊ कोट घोड़ा पर आ रहे थे. उस समय मोमराज ढाका की पत्नी सुखी देवी घोड़ा आते देख कर खड़ी हो गयी और पदम सिंह को देखने लगी. उस समय औरतों ने उसे भला बुरा कहा. जब पदम सिंह की घोडी पास आ गयी तो औरतों ने पदम सिंह को भला-बुरा कहा. यह बात पदम सिंह को बुरी लगी . उसने सुखी देवी को घोड़ी पर बैठाया और सरनाऊ ले गया. मोमराज ढाका के लोगों ने यह सूचना दिल्ली भेजी. मोमराज ढाका ने गुस्से में कहा कि वह 7 बुरड़क औरतों को उठाकार लायेगा तभी दम लेगा. तनाव बढ़ गया. चौधरी कालूराम दिल्ली गए और बादशाह से चर्चा की. बादशाह ने दोनों पक्षों में समझोता कराया. लेकिन मोमराज नहीं माना तो चौधरी कालूराम ने ललकारा कि जिस वक्त वह आयेगा तो ईंट का जवाब पत्थर से दिया जायेगा. इस बात पर नाराज होकर मोमराज ढाका ने सरनाउ-कोट पर 6 बार हमला बोला.

प्रथम लडाई - सरनाउ-कोट पर प्रथम लडाई में 10000 सैनिकों के साथ मोमराज ढाका ने हमला बोला. चैत बदी 9 संवत 1308 (1251 ad) को मोमराज ढाका की हार हुई. कुल 2000 आदमी मारे गये जिसमें मोमराज के 1500 और पदमसिंह के 500 लोग थे.

दूसरी लडाई - सरनाउ-कोट पर दूसरी लडाई काती सुदी 13 संवत 1309 को हुई. मोमराज के साथ 15000 आदमी थे. लडाई में 800 आदमी काम आये. इनमें से पदम सिन्ह के 200 तथा मोमराज के 600 लोग काम आये. नसरूदीन महमूद बादशाह के समय संवत 1309 (1252 ad) को इसके सेनापति रिडी बिग्गा के रिड़मल जाखड थे.

तीसरी लडाई - सरनाउ-कोट पर तीसरी लडाई संवत 1310 (1254 ad) के समय सेनापति कँवर जगसिंह बुरडक थे. मोमराज ढाका ने 20000 सेना के साथ सरनाऊ-कोट पर हमला बोला. लड़ाई तीन दिन चली. कुल 2500 आदमी काम आये. 84 गाँव के सब ठिकानों ने साथ दिया. लड़ाई में मोमराज ढाका की हार हुई. यह लड़ाई मिति फागुन बदी 5 से 8 तक चली. लड़ाई में मोमराज ढाका के 2000 और 500 आदमी जगसिंह बुरड़क के काम आये. यह लड़ाई संवत 1310 में बादशाह नसरुदीन महमूद के समय हुई.

चौथी लड़ाई - यह लड़ाई सरनाउ-कोट पर मोमराज ढाका और जगसिंह बुरड़क के बीच हुई. मोमराज ढाका ने 20000 सेना लेकर हमला बोला. लड़ाई संवत 1311 (1254 ad) में मिति चैत बदी 9 से 13 तक चली. इसमें 13515 आदमी काम आये. जगसिंह बुरड़क की विजय हुई.

पांचवीं लड़ाई - मोमराज ढाका ने 25000 सेना के साथ सरनाउ-कोट पर संवत 1313 (1256 ad) में हमला बोला. सेनापति का पद स्वयं पदमसिंह बुरड़क सम्भाले हुये थे. संवत 1313 में जेठ बदी 2 से जेठ बदी 9 तक लड़ाई चली. पानी नहीं मिला. सेना प्यासी मरगयी. 5000 आदमी काम आये और 2000 घायल हुये. मोमराज ढाका फ़िर हार गया. उसे मैदान छोड कर भागना पडा.

छठी लड़ाई - सरनाउ-कोट पर छठी लड़ाई मोमराज ढाका तथा पदमसिंह बुरड़क के बीच हुई. संवत 1313 (1257 ad) में मिति पौष बदी 5 से पौष बदी 13 तक लड़ाई चली. सरनाउ-कोट पर विजय नहीं पाई जा सकी. मोमराज ढाका ने हाथ खड़े कर दिये.

मोमराज ढाका सभी तरह से निराश हो गया तो पौष बदी 13 संवत 1313 (1256 ad) के बाद उसने दो साल तक स्वयं कोई सीधी लडाई नहीं लडी परन्तु सोचने लगा कि किस तरह से बुरडकों को परास्त किया जाये. जासूसों से पता लगाया कि सभी बुरडक परिवार आसोज माह के अमावस को निशस्त्र हालाणी बावडी पर श्राध के लिये एकत्रित होते हैं, स्नान करते हैं और बडा श्राध निकालते हैं. संवत 1315 (1258 ad) की आसोज माह के अमावस को सभी बुरडक निशस्त्र हालाणी बावडी पर श्राध के लिये एकत्रित हुये और उस समय मोमराज ढाका ने 25000 की फ़ौज लेकर उनपर तोपों से हमला किया. सभी बुरड़क मारे गए और किला नष्ट कर दिया गया. सरनाउ-कोट में कोइ भी नहीं बचा. गाँव की सातों जातियां ख़त्म कर दी गयी. मोमराज खुश होकर दिल्ली चला गया.

पदम सिंह की खर्रा गोत्र की पत्नी , जिसका नाम रम्भा था, वह उस समय सरनाउ-कोट से बाहर अपने पीहर गोठडा गयी हुई थी. रम्भा बच गयी और वह उस समय तीन माह की गर्भवती थी. वह इस बात से परेसान थी कि उसके कारण अब उसके पीहर वालों का भी सर्वनाश होगा. उसके ईस्ट-देव गोसाईंजी थे. उसने गोसाईंजी की पूजा की. गोसाईं जी ने एक रात 10 बजे सफ़ेद घोड़े पर सवार, सफ़ेद कपड़ों में, सफ़ेद दाढ़ी और बड़ी मूंछ सहित रम्भा को दर्शन दिए और पूछा कि रम्भा परेशान क्यों हो. रम्भा को लगा धोके से पकड़ने मोमराज ढाका आ गया है. रम्भा ने जवाब दिया -

कहरी केश भुजंग मणी पतिव्रता का गाथ ।
सूरा शस्त्र सूमधन जीवित आये न हाथ ।।

अर्थात शेर की मूंछ के बाल, मणीधारी सर्प के फ़न के बाल जिन्दा नहीं निकाले जा सकते उसी तरह पतिव्रता स्त्री को जिन्दा नहीं पा सकता. शूरवीर का अस्त्र और कंजूस का धन कोई जिन्दा नहीं पा सकता.

यह सुनकर गोसाईंजी खुश हुए और कहा कि डरने की कोई बात नहीं है. मैं मोमराज ढाका नहीं हूँ परन्तु तुम्हारा ईष्ट देव हूँ और तुम्हारी रक्षा हेतु आया हूँ. मैं जैसा तुम्हें समझता था तुम वैसी ही बहादुर निकली. ईस्टदेव गोसाईंजी ने रम्भा को आशीर्वाद दिया और कहा कि -

"चैत सुदी राम-नवमी के दिन उत्तरा नक्षत्र में पुत्र पैदा होगा. उसका नाम नानक रखना और नाल कुरड़ी में डालना. जैसे कुरड़ी बढ़ेगी वैसे ही वंश बढेगा. नानक के पैदा होते ही सांड का कान काटकर उसका छींटा देना तो हर पीढी में सांड ही पैदा होंगे. बड़ा नहान मत करना, श्राद्ध मत निकालना. जब नानक बड़ा हो जाये तब पीहर में मत रहना और दूसरा गाँव बसाना. मुझे मत भूलना, हर दूज के रोज पूजना. तेरे बेटे को कोई नुकसान नहीं पहुंचा सकेगा."

इतना कहकर गोसाईंजी जी अंतर्ध्यान हो गए और उनके आशीर्वाद से चैत सुदी नवमी संवत 1316 (1259 ad) को रम्भा को 10 बजे खर्रा के गोठडा डूंगर की घाटी पर एक लड़का हुआ. उसका नाम नानक रखा. नानक (1259-1318 AD) के बड़े होने पर उसकी शादी कुशलजी तेतरवाल की बेटी मानकौरी से की. सभी बुरड़क नानकजी (1259-1318 AD) से फले-फूले हैं.
 
Last edited:
गोठड़ा तगालान का बसाना

नानकजी (1259-1318 AD) के तीन पुत्र हुए. सहराज, धनराज और करमाराम. नानकजी ने मूल खर्रा का गोठडा गाँव छोड़ कर संवत 1351 (1294 Ad) में बैसाख सुदी आखा तीज रविवार के दिन दूसरा गोठडा गाँव बसाया. हरनारायण ब्रह्मण ने पूजा की. नानकजी ने संवत 1353 (1296 AD) में पनघट का कुआ करवाया. खंडेला राजा भोजराज का सहयोग लिया. कुए की गहराई 26 हाथ और चौड़ाई पौने पांच हाथ रखी. गूण उत्तराधी रखी. उस समय दिल्ली बादशाह अलाउदीन खिलजी (1296-1316) थे.

संवत 1353 में गुसाईंजी का कच्चा मंदिर बनाया. गाँव में फिर भगवान का मंदिर चिनाया. इसकी पूजा हरनारायण ब्रह्मण ने की. अमावस, ग्यारस, पूनम का पक्का पेटिया बांधा. 51 बीघा जमीन मंदिर की डोळी छोड़ी. संवत 1353 में नानकजी, कँवर सहराज, धनराज और करमराज ने गाँव गोठडा में माँ खर्री, दादा इन्द्राराम के नाम से इन्दोलाव तालाब बनाया और 1111 बीघा जमीन गौचर भूमि छोड़ी. साथ ही यह प्रण लिया जो राजस्थानी भाषा में निम्नानुसार है:

बुरडक जायो बावै नहीं, सींव नींव दाबै नहीं, तालाब नै काम लेवै नहीं, लेवे तो वंश चाले नहीं. ईष्ट देव गुसाईं जी को छोड़े नहीं.

अर्थात - बुरडक परिवार में पैदा कोई भी आदमी जोहड़ और गौचर-भूमि को नहीं बायेगा. इन भूमियों की सीमाओं को नहीं दबायेगा. तालाब की भूमि को बोने के काम नहीं लेगा. यदि ऐसा करेगा तो उसका वंश नहीं चलेगा. ईष्टदेव गुसाईंजी को नहीं भूलेगा.

नानक जी की मृत्यु संवत 1375 (1318 AD ) में हुई.

गाँव का नाम गोठडा तगालान कैसे पड़ा - गाँव का नाम गोठडा तगालान रखने के सम्बन्ध में भड़वा (राव) के अभिलेखों में निम्न विवरण उपलब्ध है. कहते हैं कि जब भारत में मुसलमान बादशाहों द्वारा मंदिरों को नष्ट किया जा रहा था तब औरंगजेब ने हर्ष और जीनमाता के मन्दिरों पर भी हमला किया. उसने हर्ष की मूर्तियों को खंडित कर फौजों को जीणमाता के मंदिर की तरफ बढ़ाया. उस समय हर्ष के मंदिर की पूजा गूजर लोग तथा जीनमाता के मंदिर की पूजा तिगाला जाट करते थे. कहते हैं कि हमले के तुरन्त बाद जीणमाता की मक्खियों (भंवरों) ने बादशाह की सेना पर हमला बोल दिया. मक्खियों ने बादशाह की सेना का पीछा दिल्ली तक किया और सेना को बहुत नुकसान पहुंचाया. बदशाह ने जब हर्ष और जीनमाता का स्मरण किया और माफ़ी मांगी तभी पीछा छोड़ा. इसके उपलक्ष में बादशाह द्वारा हर्ष मंदिर के लिये सवामण तेल और सवामण बाकला हर साल भेजने का वादा किया. जीनमाता के भाट हरफ़ूल तिगाला जाट को गाँव गोठडा तागालान की 18000 बीघा जमीन की जागीर बक्शी. इसलिए इस गाँव का नाम गोठडा तागालान कहलाता है. यह जागीर उनके पास 105 साल रही तत्पश्चात संवत 1837 में यह कासली के नवाब के साथ फतेहपुर के अधीन हुआ. बादमें यह जागीर शेखावतों के पास आई.

वर्त्तमान में गोठडा तगालान गाँव में पुराने मंदिर के स्थान पर गुसाईंजी का एक शानदार मंदिर बनाया गया है. बुरडकों के आदि पुरुष नानकजी द्वारा गाँव बसाने और मंदिर बनाने का इतिहास बताने वाला सूचना-पटल भी लगाया गया है. लेखक द्वारा दिनांक 12 दिसंबर 2010 को लिए गए चित्र यहाँ दिए गए हैं. इस मंदिर की पूजा वर्तमान में मोहनदास महाराज (मोबा- 9772344906) द्वारा की जा रही है.
 
Last edited:
सरनाऊ की वर्तमान स्थिति

लेखक को यह उत्सुकत थी कि भडवे के अभिलेखों का सत्यापन मौके पर किया जाये. इस कर्य में सरनाऊ की प्रारम्भिक जानकारियां सीकर के भंवर लाल बिजारनिया द्वारा ली गयी थी. लेखक ने दिनांक 12 दिसम्बर 2010 को उनको साथ लेकर क्षेत्र देखा. सबसे पहले हर्ष, तत्पश्चात जीनमाता, जीनवास, गोठडा तगालान, विरान सरनाउ-कोट और सरनाउ गाँव देखा.

संडाऊ की जोड़ी - रायपुरा और खंडेलसर गावों के के पूर्व में 1 किमि दूरी पर विरान गाँव सरनाउ स्थित है. स्थानीय लोग इसे 'संडाऊ की रोही' या 'संडाऊ की जोड़ी' अदि नामों से पहचानते हैं. रायपुर से 'संडाऊ की जोड़ी' का कच्चा रास्ता है. भड़वा के अभिलेख के अनुसार संडाऊ में तीन मंदिर बनाना बताये गये हैं जिनमे से शिव और हनुमान मंदिरों को लेखक ने देखा. हनुमान मंदिर में काफ़ी विस्तार हो रहा है. 'सरनाउ की जोडी' में ही ये मंदिर स्थित हैं. एक गहरा तालाब भी बना हुआ है.

संडाऊ-कोट - 'संडाऊ की जोड़ी' के पूर्व में 'सरनाउ कोट' वीरान हालत में पहाड़ियों पर स्थित है. किले के पुराने खँडहर स्पष्ट परिलक्षित होते हैं. उस समय के राजाओं द्वारा सुरक्षा के कारणों से किले का निर्माण पहाड़ियों पर ही किया जाता था. किले के स्थान पर एक बावड़ी दिखती है उसमें पानी अभी भी भरा है. कोट के पश्चिम भाग में बाद के निर्माण भी हैं जिसमें एक गैशाला स्थित है. कुछ कमरे भी बाद के बने हैं. बताया गया क़ि कुछ समय पूर्व तक यहाँ एक बाबाजी रहते थे जो अब कहीं चले गए हैं. बरगद के प्राचीन वृक्ष खड़े हैं. चौहानों के पांच प्रवरों में एक अक्षयवट भी है जिससे यह संकेत मिलता है क़ि यह चौहानों का किला रहा है. संडाऊ-कोट से उत्तर-पूर्व में दो गाँव :बाएं - गढ़ वालों की ढाणी तथा दायें - बाजियों की ढाणी दिखाई देते है. इससे कुछ ही दूरी पर बिजारनियों का गढ़ लढाना पड़ता है.

संडाऊ गाँव - वीरान 'संडाऊ गाँव' के स्थान का सड़क से सीधा रास्ता नहीं है. 'संडाऊ गाँव' को ढूंढने में हमारी सहायता रायपुरा गाँव के बुजुर्ग श्री उगमसिंह शेखावत ने की. उनका खेत 'संडाऊ गाँव' के पूर्व में स्थित है. हम लोग खेतों की पगडंडियों के सहारे उस स्थान पर गए जहाँ वीरान गाँव सरनाऊ बसा था. वर्त्तमान में मौके पर केवल 'भैमिया जी का एक देवला' स्थित है जहाँ स्थानीय लोगों द्वारा पूजा की जाती है. यह जगह वर्तमान में एक मीना परिवार के अधीन है. भौमिया जी की देवली के लिए दो बीघा जमीन छोडी गयी थी उस पर भी खेती की जा रही है. आस-पास जाट और राजपूतों के खेत भी हैं. खेत बोने के समय पत्थर और टूटे हुए मिटटी के बर्तनों के अवशेष निकलते हैं. मौके के कुछ चित्र यहाँ दिए गए हैं.

अपेक्षा- स्थानीय नागरिकों से अपेक्षा की जाती है कि ऐतिहासिक स्थानों का संरक्षण करें और उनका विकास करें ताकि हमारा प्राचीन इतिहास तथा धरोहरें लुप्त न हो जायें.
 
Last edited:
बुरड़कों की वंशावली

नोट - नाम के साथ पत्नी का नाम तथा गोत्र ब्रेकेट में दिया गया है. लेखक द्वारा बडवा के अभिलेख से स्वयं तक की वंशावली नीचे दी गयी है. प्रत्येक नाम से अलग शाखाएं निकलती हैं जिनसे बुरडक जनसंख्या का फैलाव हुआ है. जिस पीढी में स्थान बदला है उस जगह का नाम भी दिया गया है.

• चौधरी कालूराम (सरनाऊ) → • पदमसिंह (m.रम्भा खर्री, गाँव खर्रा का गोठड़ा) → • नानकजी (1259-1318 AD) (m.राणाजी की बेटी करमा हरतवाल) (गोठडा) → • सहराज (वीरां जेवल्याणी) → • जोखा (m.सबीरा बुगालियाणी) → • सांवल (m.मोरी जाखडणी) → • शकता (m.भुरी शेषमी) → • जैता (m.जीवू कुलडियाणी) → • अडिमाल (m.ज्ञानी ढाकी) → • वीरुराम (m.हीरा मांगलोदी) → • सुरजा (m.तुलछी गेणी) → • रूडा (m.पारा बाज्याणी) → • किसना (देवू घासल) → • रूपाराम (उदी महली) → • खींवराज (m.नानी मेहरियाणी) (गोठडा) → • जगू (m.कुशली नेहरी) (मांडेता बसे) → • बालू (m.जीवू बाज्याणी) → • चिमना (m.तुलछी बरड़वालणी) → • मोहना (लछी पिलानिया) (सुटोट) → • खुमाणा (m.भूरी खीचडणी) (मांडेता-सुटोट-रतनगढ़-ठठावता) → • भीमा (m.रुकमा पचारणी गाँव सबलपुरा) → • बेगा (m.बरजी मंडीवालणी गाँव सेवा) → • लक्ष्मन (गोमती नेहरी गाँव हरसावा)

ठठावता राजस्थान के बुरड़क

लेखक वर्ष 6 मार्च 1996 में राजस्थान के ठठावता गाँव गए. वहां बुरड़क के कुछ परिवार रहते हैं. उनमें सबसे बुजुर्ग श्री लादूराम जी थे. उनसे जब बुरड़क का इतिहास पूछा तो उन्होंने बताया कि बुरड़क गोत्र का रेकॉर्ड उनके बड़वा श्री भवानीसिंह राव, गाँव-महेशवास, पोस्ट-बिचून,तहसील-फूलेरा,जिला-जयपुर (फोन-09785459386) के द्वारा रखा जाता है.

श्री लादूराम जी ने बुरड़क का इतिहास मौखिकरूप से कुछ इस तरह बताया जो लेखक ने लिपिबद्ध किया. बुरड़क का निकास चौहान से हुआ है. उन्होंने सीकर जिले के जीणमाता के पास सरनाऊ नामक गाँव बसाया और राजधानी बनाया. यहाँ बुरड़क और ढाका जाटों में लड़ाई हुई. कहते हैं कि वहां सरलो और पालो नामके दो भाई थे. एक ढाका गोत्र की औरत बुरड़कों के यहाँ घड़ा लेकर पानी लेने आ गयी. इस पर ढाका नाराज हो गए और उस औरत को कहा कि तुम तो बुरड़कों के यहीं जाओ. इस बात पर बुरड़क और ढाका जाटों में लड़ाई हुई. बुरड़कों ने अधिकांस ढाकों को ख़त्म कर दिया परन्तु बाद में ढाका जाटों ने बादशाह की मदद से सभी बुरड़कों को खत्म कर दिया. एक खर्रा गोत्र की लड़की बुरड़कों में ब्याही थी. वह उस समय पीहर गयी हुई थी और गर्भवती थी. उसका पीहर गोठड़ा तगालान में था. वह बच गयी. उसके ईस्टदेव गोसाईंजी थे. उसने गोसाईं जी की पूजा की और उनके आशीर्वाद से एक लड़का हुआ. सभी बुरड़क उस लडके से फले फूले हैं. लड़का ननिहाल गोठड़ा तगालान में पैदा हुआ. कहते हैं कि वह बहुत चंचल था और पनिहारिनों के पानी लाते समय मटके फोड़ देता था. तब ताम्बे के मटके बनाए गए. उस लड़के ने लोहे के बाण बनाए और फ़िर मटके फोड़ता था.

एक बार इस लडके के खर्रा मामा ने अपने भाईयों को कहा कि जोहड़ का बंधा टूट रहा है इसको ठीक करें. उसके भाईयों ने कहा कि धन तो बुरड़क भांजे को मिलेगा हम क्या करें. वह खर्रा मामा इस बात पर मर गया. उसका चबूतरा अभी भी गोठड़ा तगालान गाँव के जोहड़ के ढावे पर है. वहां एक गोसाईंजी का आदि मन्दिर भी है. गोठड़ा तगालान में 400 बुरड़क परिवार रहते हैं. कुछ बुरड़क परिवार वहां से उठकर मांडेता गाँव चले गए. मांडेता में आथुनी चोक की हवेली है जो बुद्धा की है जहाँ से बुरड़क निकले हैं. वहां एक पुराना खेजड़ा का पेड़ अभी भी मोजूद है. बुद्धा का परिवार काफी धनवान था और कहते हैं कि वह हाथी पर तोरण मरवाता था.

बुरड़क वंशावली में एक उदाजी थे. उनके वंश में चिमना राम तथा उनके पुत्र मोहनाराम थे. मोहनाराम का विवाह पिलानिया जाटों में हुआ. उनके दो पुत्र थे. नूनारामजी और खुमाणारामजी. नूनारामजी और खुमानारामजी का जन्म सीकर जिले के मांडेता गाँव में हुआ. रतनगढ़ में वर्तमान में रह रहे बुरड़क नूनारामजी के वंशज हैं तथा ठठावता गाँव मे रह रहे बुरड़क खुमानारामजी के वंसज हैं. खुमाणारामजी का मामा हरुरामजी पिलानिया था वह सुटोट गाँव में रहता था. नूनारामजी और खुमानारामजी मांडेता से आकर मामा हरुरामजी पिलानिया के यहाँ सुटोट गाँव में रहने लगे. दोनों भाईयों का विवाह मामा हरु पिलानिया ने किया. खुमाणारामजी का विवाह खीचड़ जाटों में 'खीचड़ों की ढाणी' में भूरी खीचड़ के साथ हुआ तथा नूनारामजी का विवाह महला जाटों में मैलासी गाँव में हुआ. मामा हरुरामजी पिलानिया के मरने के बाद उसके भाईयों में जमीन का विवाद हुआ तब नूनारामजी और खुमाणारामजी सुटोट से रतनगढ़ आकर बस गए. रतनगढ़ के पश्चिम में 400 बीघा जमीन ली और 'मावलियों का बास' नामक गाँव बसाया. नूनारामजी के चार बेटे हुए मालू, लीछमण, नाराण, और सूरजा. ये सभी रतनगढ़ में ही बस गए.

खुमाणारामजी संवत 1962 में ठठावता गाँव आ गए. खुमाणारामजी के 11 बेटे और एक बेटी लाडो नामकी थी. बेटों के नाम पेमा, भींवा, बोदू, ... आदि थे. नूनारामजी और पेमारामजी रतनगढ़ के ओसवाल बनियों के साथ दिसावर (आसाम) चले गए. संवत 1975 में भयंकर महामारी फ़ैल गयी. नूनारामजी दिसावर में ही ख़त्म हो गये और पेमारामजी वहां से रतनगढ़ आ गये. पेमारामजी रतनगढ़ में आकर मर गये. संवत1975 की महामारी में खुमाणारामजी के सभी 10 बेटे और बेटी लाडां मर गये. केवल खुमाणारामजी और भींवारामजी बचे. उसकी पत्नी रूकमा की चूड़ी उसके छोटे भाई भींवारामजी ने पहन ली अर्थार्त पेमारामजी की पत्नी रूकमा (गोत्र पचार) से शादी करली. पेमारामजी के मरने के कुछ माह बाद संवत 1975 में आसोज माह में पुत्र लादूरामजी (यह इतिहास बताने वाले) पैदा हुए. लादूरामजी के तीन साल बाद संवत 1978 में भींवारामजी के पुत्र बेगारामजी (लेखक के पिता ) पैदा हुए. भींवारामजी के दो और पुत्र जेसारामजी और मूलारामजी पैदा हुए. इस तरह भींवारामजी के चार पुत्र हुए. उन्होंने ठठावता में वहां के ठाकुर गणपत सिंह से 500 बीघा जमीन मंडवा ली. यह जमीन पहले मेघा ऐचरा की थी. खुमाणारामजी संवत 2001 में ख़त्म हुए और उसके 11 दिन बाद पुत्र भींवारामजी भी ख़त्म हो गये. ऐसी परिस्थिति में दोनों का मौसर एक ही दिन किया. संवत 2011 (वर्ष 1954) में बेगारामजी के पुत्र लक्ष्मण (लेखक) पैदा हुए.

नोट-1 - यह इतिहास बताने वाले श्री लादूरामजी बुरड़क का निधन यह इतिहास बताने के अगले माह अर्थार्त अप्रेल 1996 में ही हो गया.

नोट-2 - सरनाऊ गाँव की प्रारंभिक जानकारियाँ सीकर के भंवर लाल बिजारनिया ने एकत्रित की. लेखक ने उनके साथ जाकर पूरी जानकारी ली जो यहाँ दी गयी है. यह स्थान जीणमाता के पूर्व में 7 की.मी. दूरी पर बिजारनियों के प्राचीन गढ़ लढ़ाना के पास ही स्थित है. राष्ट्रीय राजमार्ग-11 पर स्थित राणोली गाँव से कोछोर के लिए सड़क जाती है. इस पर गाँव पड़ता है खण्डेलसर. इस गाँव की रोही में खण्डहर स्थित हैं जो सरनाऊ कहलाता है तथा यही बुरड़कों की राजधानी थी. स्थानीय लोग इसे सण्डाऊ भी बोलते हैं. यह स्थान रायपुरा गाँव के नजदीक पड़ता है.

नोट-3 - भड़वा के अभिलेखों की पुष्टी स्थानीय किंवदन्तियों से भी होती है.

नोट-4 - चित्र देखने और अधिक जानकारी के लिए जाटलैंड पर पढ़ें.

हिन्दी में जानकारी के लिए - http://www.jatland.com/home/Burdak_Gotra_Ka_Itihas

For information in English - http://www.jatland.com/home/Burdak#History_of_Burdaks_from_Ajmer_to_Sarnau
 
Last edited:
बुरडक गोत्र के बडवा श्री भवानीसिंह राव के उपरोक्त अभिलेखों की पुष्टि ऐतिहासिक तथ्यों से होती है. विकिपीडिया (http://en.wikipedia.org/wiki/Jai_pal) से हमें ज्ञात होता है कि असतपाल के पुत्र जयपाल थे तथा उनके पुत्र आनंदपाल थे. राजा जयपाल ने महमूद ग़ज़नवी के आक्रमण का सामना करने के लिए उत्तर-पश्चिमी पकिस्तान तथा अफगानिस्तान में हिन्दुशाही राज्य की स्थापना की थी. वह शाहीराजा भीमदेव (964 AD) के उतराधिकारी थे. भारत कोश वेबसाईट (http://www.bharatdiscovery.org/india/) के अनुसार सन 1000 ई. में महमूद गजनवी का भारत पर (काबुल में) प्रथम आक्रमण हुआ. उसने स्थानीय जनता पर लूट-पाट तथा धर्म परिवर्तन किया. महमूद ने पहला आक्रमण हिन्दू शाही राजा 'जयपाल' के विरुद्ध संवत 1058 (29 नबंवर सन 1001) में किया. उन दोनों में भीषण युद्ध हुआ, परन्तु महमूद की जोशीली और बड़ी सेना ने जयपाल को हरा दिया . इस अपमान से व्यथित होकर वह जीते जी चिता पर बैठ गया और उसने अपने जीवन का अंत कर दिया. जयपाल के पुत्र आनन्दपाल और उसके वंशज 'त्रिलोचनपाल' तथा 'भीमपाल' ने कई बार महमूद से युद्ध किया. आनन्दपाल हिन्दूशाही राजवंश के राजा जयपाल का पुत्र था. वह 1002 ई में सिंहासन पर आसीन हुआ था. आनन्दपाल ने उज्जैन, ग्वालियर, कन्नौज, दिल्ली और अजमेर के हिन्दू राजाओं का संघ बनाकर सुल्तान की सेना का पेशावर के मैदान में सामना किया। हिन्दूशाही राजधानी 'वैहिंद' (पेशावर के निकट) में महमूद और आनन्दपाल के बीच 1008-1009 ई. में भीषण युद्ध हुआ। दोनों ओर की सेनाएँ 40 दिन तक एक-दूसरे के सामने डटी रहीं. अन्त में भारतीय सेना ने सुल्तान की सेना पर हमला बोल दिया और जिस समय हिन्दुओं की विजय निकट मालूम होती थी, उसी समय एक दुर्घटना घट गई. जिस हाथी पर आनन्दपाल अथवा उसका पुत्र ब्राह्मणपाल बैठा था, वह पीछे मुड़कर भागने लगा। यह देखते ही भारतीय सेना छिन्न-भिन्न होकर भागने लगी. इस युद्ध में युवराज ब्राह्मणपाल मारा गया. इस युद्ध में उत्तर-पश्चिमी भारत के कन्नौज और अजमेर के राजाओं के अलावा कई राजपूत शासकों ने भाग लिया. 1010 ई. में आनन्दपाल अपमानजनक शर्तों पर महमूद गजनवी का सामंत बना.
 
Uncle gi, deeply researched history. Badwo ke davra bataye gye es history ko hum aage bhi sambhal kr rakhange....
Pls uncle gi, aap mujhe ''JAKHAR'' chaln ke bare me jankar koi viswasniye badwa bata sakthe h....
 
बुरडक गोत्र के बडवा श्री भवानीसिंह राव के पास जाखड गोत्र का भी इतिहास है. आप संपर्क कर सकते हैं. ऊपर उनका पूरा पता दिया है. फोन पर भी संपर्क कर सकते हैं. पूरा विवरण लेने के लिए व्यक्तिगत रूप से संपर्क करना पड़ेगा.
 
बुरडक जी आपका प्रयास निस्संदेह प्रशंसनीय है, कमल की जानकारी निकल के लाये हैं आप .... आपके अथक प्रयास से जाटलैंड विकी को बहुत लाभ पहुंचा है, इसके लिए आपकी जितनी प्रशंसा की जाये कम है

कुछ हुडा गोत्र के बारे मै प्रकाश डालिए :)
 
सुनीताजी बुरडक गोत्र के बडवा श्री भवानीसिंह राव के पास जाखड गोत्र के अलावा कुछ अन्य गोत्रों का भी इतिहास उपलब्ध है. संयोग से हूडा गोत्र का इतिहास भी श्री भवानीसिंह राव के पास है. समयाभाव के कारण मैं केवल बुरडक गोत्र का ही इतिहास नोट कर पाया था. मैंने उन कागजों की फोटोकापी भी ली थी. श्री भवानीसिंह राव ने आश्वासन दिया था कि वे शेष इतिहास भी उपलब्ध करा देंगे. मैं यह प्राप्त करने का प्रयास करूंगा. संयोग से कुछ गोत्रों का इतिहास प्राप्त हुआ जो मैं नीचे दे रहा हूँ.धन्यवाद
 
थालोड़ गोत्र का इतिहास

थालोड़ गोत्र के रेकोर्ड उनके बडवा गोपालराव (मोबा - 09828173479) गाँव श्रीनगर, तहसील राजगढ़, जिला अलवर द्वारा रखे जाते हैं. इनके अनुसार थालोड़ गोत्र की उत्पति चौहान वंश में आबू पर्वत से मानी गयी है. इनके पहिचान चिन्ह हैं - सफ़ेद झंडा, नगारा बेरीसाल, वृक्ष चंपा, निशान घोडा सफ़ेद.

बडवा गोपालराव के बही अनुसार चौधरी बाबलजी धमाणा से आये और चैत बदी दूज संवत 1221 (1164 ad) में लोसल-खेड़ा गाँव बसाया. पक्का कुआ करवाया. कुआं चिनते समय तीन आदमी दब गये. थालोड़ लोग खुवान माता को मानते है. बाबल को खुवान माता का दर्शाव हुआ. बाबल ने तीनों लोगों को जिन्दा निकाल दिया. तब से थालोड़ खुवान माता की पूजा करते हैं. खुवान माता ने प्रण करवाया कि कोई भी थालोड़ जाया कुए पर जूती नहीं ले जायेगा, शिकार नहीं करेगा, मांस नहीं खायेगा, सफ़ेद बकरी नहीं बेचेगा, न सफ़ेद बकरी का दूध खायेगा, न इसके दूध का बिलोवणा करेगा, हरा मुरायला नहीं काटेगा. यदि ये काम कोई करेगा तो उसका वंश नहीं चलेगा.

इनके कुल देवता शकल जी हैं. शकल जी का जन्म थालोड़ गोत्र में गाँव खुडी में पिता तहराजजी के घर चैत बदी 5 संवत 1652 (1595 ad) को हुआ. इनकी माताजी का नाम राजादेवी था और वे गाँव भोजासर के कानजी ढाका की पुत्री थी.

शकलजी ने गायों को बचाने के लिए प्राण दिए. मुसलमान गायों को चुरा कर ले जा रहे थे. शकल जी ने चोरों का पीछा किया और छुड़ा कर सिधराणा जोड़ा में गायें ले आये. गायों को छुड़ाने में संघर्ष हुआ और उन्होंने 5 लोगों का क़त्ल किया. वे में लड़ाई में जुझार हुए. सिधराणा जोड़ा में शकल जी की देवली जेठ सुदी 11 संवत 1671 में चिनवाई. इनकी याद में बैसाख माह की चानणी 11 को मेला लगता है. पशुओं को रोग होने पर शकल जी की तांती बांधी जाती है. मस्से होने पर भुवारी चढ़ाई जाती है. यह मान्यता है कि 2-3 दिन में मस्से ठीक हो जाते हैं.

सिधराणा जोड़ा खुडी से पहले सांवलोदा बस-स्टैंड से पूर्व में तथा राष्ट्रीय राजमार्ग-11 से आधा किमी पूर्व में स्थित है. वर्त्तमान में थालोड़ गोत्र के लोगों द्वारा शकलदास जी का एक सुन्दर मंदिर बनाया जा रहा है. शकलजी का एक मंदिर फतेहपुर से 8 किमी दूरी पर रतनगढ़ जाने वाली सड़क पर गाँव गोविन्दपुरा में बना है. यह मंदिर गाँव के श्री रिछपाल थालोड़ द्वारा बनाया गया है.
 
Last edited:
I was on tour to North-east states in November-2010. I was welcomed by Shri K R Choudhary - President Purvanchal Jat Mahasabha at Guwahati. When I enquired about the history of his village Dhankoli, he promised me to give a book about it. Next day he came to see me off at Railway station at Guwahati and gave me a book by M.K Azad. M.K Azad, a Kayamkhani, has authored a Book in Hindi on Dhankoli titled - 'Dhankoli Aaj Tak' (धनकोली आज तक). It is Published by Dhankoli Vikas Mandal, Dhankoli, 2004. In the train journey I went through the book. The book contains very useful informations about Jat clans. I have taken history concerned with some Jat clans from it. You may read more at http://www.jatland.com/home/Dhankoli

The Gotra history it contains is of Bijarnia, Tetarwal, Bhinchar, Jhajra etc. I reproduce below:
 
History of Bijarnia clan

Dhankoli village has good population of Bijarnia Jat Gotra. The book gives us genealogy of about seven Bijarnia families. The Bahi of the bard (Raoji Bajrang Singh, Dalania, Phagi, Jaipur) of Bijarnia reveals that One Bijarnia ancestor had come to Dhankoli in samvat 1609 (1552 AD) during the period of Kayamkhani rulers at Dhankoli and the rule of Humayun at Delhi.

Jag Singh Chaudhary (Bijarnia) was an officer in the Army of Mughal emperor Humanyun. Badshah was very pleased with his services so he offered him a Jagir of 12 villages in samvat 1503 (1446 AD). Jagsi had 12 sons and one Paswan son named Rupsi.

Local tradition tells us that Jakhar Kunwar of Mandoli (Bairath) was married in the family of Bana Jat of Jayal Bhadana. Jakhar Kunwar was returning after his gona with his wife Bijli. He stayed at Ladhana. Meanwhile Jagsi’s Paswan son Rupsi was going to forest for hunting and he also stayed at Ladhana for a while. The newly married wife Bijli of Jakhar Kunwar was very impressed with the behavior of Rupsi. She praised the qualities of Rupsi in front of his husband. (M.K Azad p.196)

This annoyed Jakhar Kunwar and he scolded her for this behavior, left her behind and went away without her. Bijli was a simple and humorous girl. She had not anticipated this before. When Rupsi came back from hunting he found Bijli weeping with sorrow. Rupsi said since he is responsible for this incidence he offered that she could go with him if she had no objection. She was left with no option so decided to go with Rupsi.

Jakhars when learnt that their bahu had gone with Bijarnias they got annoyed over this incidence and complained to Delhi Badshah. Jakhars attacked Bijarnias with an army of 2200 soldiers on chaitra sudi 8 samvat 1510 (1453 AD). Bijarnias had blessings of Jeenmata that they could not be defeated. The 12 brothers who were initially keeping a distance with Paswan brother Rupsi also joined him in war against Jakhars.

Though all brothers fought war but it was made clear during the war by elder Bijarnia that Rupsi had created this problem so he would be dealt accordingly after the war. Rupsi when learnt about this dictate of elder Bijarnia he left Ladhana with Bijli and went to Shrimadhopur. His descendants flourished there.

Jagsi family moved from Ladhana to Palsana in Sikar district. Jagsi had two sons Bindra and Alha. Alha was an ambitious and far sighted person. He came to know that Badshah Humayun was returning from Ajmer after performing jiyarat at Ajmer Dargah and going to capital Delhi. He offered for a feast to the Badshah to please him. Badshah accepted it and Alha gave a grand feast of khir-churma to Humayun. (M.K Azad p.197) Humanyu liked the Rajasthani food. He was pleased with Alha and gifted him 5500 bigha land. Alha was a kind man. He left a gauchar land and constructed a talab there. This Johad is still present and called Alhana Talab. Bijarnia descendants constructed many talabs in Dhankoli also.

Jagsi’s sixth son was Nihalji. Nihalji begot son Panagji who begot son Balu Ramji. Balu Ramji’s grand son Tola Ram ji constructed Tolana Talab and left auran (catchment) land 200 bigha in samvat 1620 (1562 AD). In the fourth generation Hemaji constructed Hemnana Talab in samvat 1695 (1638 AD) in west of Dhankoli.

Chaudhary Narbadji constructed Narbadana Talab in 300 bigha in samvat 1751 (1694 AD) in east of village. Narbadji’s son was Koju Ramji and his son was Harji Ramji who constructed ‘Har Jo Lav’ Talab in 50 bigha in Jhajhara’s fields in samvat 1825. Harji Ramji’s son was Kana Ramji who built a well in samvat 1875 in east of village. Kana Ramji built a 6 pillar chhatri after his father near the village well in samvat 1879. (M.K Azad p.198)

History of Tetarwal Gotra

Tetarwal Jats came to Dhankoli in samvat 1675 (1618 AD) after paying respect to their family deity goddess ‘Saunth Mata’. Saunth Mata is their kuladevi. They do not offer Saunth to ladies during delivery period.

Local tradition reveals that one Tetarwal woman came to the village well, which was constructed by Bijarnias, for taking drinking water. She was in hurry and requested to let her take water first. Other ladies commented that this not Tetarwal’s well and if she was in such hurry Tetarwals should dig their own well. Tetarwal lady came back without water and told to her family. Tetarwals decided not to take water from Bijarnia’s well. They decided to dig their own well till that time they brought water from nearby village Asalsar.

Khemji Tetarwal’s son Poosa constructed and completed a well on Jeth Badi 3 samvat 1692 (1635 AD). This well was known as ‘Mithi Kothi’.

Tetarwals also constructed, near this well, a temple of Balaji and temple of Tamadayatas (Maharshi). (M.K Azad p.203)
 
Last edited:
History of Bhinchar Gotra

Their original habitation of Bhinchar Gotra people was in Gujarat. Some ruler from Sambhar settled Bhinchawa village. They had war with Borawar Rajput ruler. This ruler took away Kalwa from Dukiya Jats. Bhichars opposed this.

One family of Bhinchars lived with Kukana Jats of Kukanwali. Then they settled in Nalot. Later they founded ‘Bhincharon Ka Bas’.


Kesar Singh Bhinchar of this gotra was a great warrior. One Rajput lady was his dharmbahin. Shekhawats took away cows of this lady. On the request of Rajput lady Kesar Singh followed the thieves. He encountered them at Mundwara fought with them bravely with sword and got back cows from them. Kesar Singh was returning back with cows when the enemies attacked him from behind when he was unprepared. His head was chopped off. Even after chopping of head he moved headless on horse up to ‘Lamba Kotda’. This news spread in the area like jungle fire. When the Rajput lady learnt it she rushed to the spot and tied a rakhi thread to him. Then only his head felled on ground. Rajputs and Bhinchars constructed a chhatri on the Samadhi of Kesar Singh Bhinchar here. This chhatri is very sacred today.

Bhinchars came to Dhakoli in samvat 1982 from Mediawat to ‘Bhincharon Ki Dhani’ and finally to Dhankoli.

Bhinchar are also called Bhainchar, Bhachar , Bhaskar etc due to linguistic variations.

Reference - (M.K Azad p.212-13)
 
Research on Burdak clan history (Contd.)

ऊपर कुछ अन्य गोत्रों के उदहारण दिए गए हैं. ये भी चौहान वंश से निकले हैं. हर गोत्र के भाट कुछ तिथियाँ अपनी बही में देते हैं जिनसे अवधी का पता लगता है. यदि यहाँ सभी चौहान वंश से उत्पन्न गोत्रों की वंशावली एकत्रित कर उनको कन्वर्ज करें तो हम ठीक-ठीक उस समय का पता लगा सकते हैं जबसे अग्नि-कुल क्षेत्रीय पैदा हुए.

बुरडक गोत्र के बडवा (भाट) श्री भवानीसिंह राव की बही में सरणाऊ कोट गढ़ के निर्माण की अवधि संवत 1032 (975 ई.) बतायी गयी है. चौहानों के इतिहास की निश्चित तिथि संवत 1030 (973 AD) के हर्ष शिलालेख से प्राप्त होती है. हर्ष शिलालेख गूवक प्रथम से इस वंश की वंशावली देता है. चौहानों के राज्य का जब विस्तार हुआ तो उन्होंने अपना केन्द्रीय स्थान हर्ष को बनाया. गूवक पहला शासक था जिसने हर्ष को संभवतः राजधानी या उपराजधानी बनाया. गूवक का बनाया शिव मंदिर यहाँ अब भी विद्यमान है. चौहान शैव थे और हर्षदेव उनके कुल देवता थे. श्री हर्ष: कुलदेवोस्या तस्मादिव्यकुलक्रम:। हर्ष शिलालेख से यह भी ज्ञात होता है कि तंत्रपाल नामक प्रतिहारों का दूत जब चौहान नरेश वाक्पति से मिलने आया तो वह अनंतगोचार आया. इतिहासकार अनंतगोचार को हर्ष के आस-पास का क्षेत्र मानते हैं.(रतन लाल मिश्र:शेखावाटी का नवीन इतिहास, मंडावा, 1998, पृ.37 -38 )

भवानीसिंह राव की बही में बुरडक वंशावली के अनुसार हर्ष गाँव बुरडक लोगों द्वारा बसाया गया था. हर्ष राजस्थान के सीकर तहसील और जिले में सीकर से 15 किमी दक्षिण पश्चिम में है. हर्ष मंदिर राजस्थान में कला की दृष्टि से बहुत उन्नत श्रेणी का है. यह मंदिर अरावली की पहाड़ियों पर 3000 फीट की ऊंचाई पर गर्वपूरक खड़ा है. मंदिर आज भग्न अवस्था में श्रीहीन हो चुका है पर जो कुछ बचा है वह इसकी महानता और उत्कृष्टता स्थापित करने में समर्थ है.

हर्ष शिलालेख में उन गाँवों के नाम आये हैं जिन्हें विभिन्न शासकों या उनके सरदारों ने अपने नियंत्रित क्षेत्र से हर्षदेव को चढ़ाये. ये क्षेत्र हर्षदेव के आस-पास ही स्थित हैं. ये गाँव हैं -

सिंहासन (तहसील सीकर) - सिंहराज द्वारा ,

कदमा का बास (तहसील सीकर) - वत्स-राजा द्वारा,

छत्रधार - विग्रहराजा द्वारा,

शाकम्भरी - विग्रहराजा द्वारा,

कोलीड़ा (तहसील सीकर) - जय-श्री-राजा द्वारा,

कोछोर (तहसील दांतारामगढ़ ) - शाकम्बरी द्वारा,

परसरामपुरी - शाकम्बरी द्वारा,

पलासरा या आकवा (तहसील सीकर) - शाकम्बरी द्वारा,

कुटक (?) - शाकम्बरी द्वारा,

एकलका (?) - सिंह-राजा द्वारा,

कृशानु कूप (कालाडेरा ?) - सिंह-राजा द्वारा,

उरु-सरस - सिंह-राजा द्वारा,

कान्ह (?) -

मयूर-पुरा (मोरडूंगा ?) (तहसील सीकर) - धान्धुक राजा द्वारा

खड्ग-कूप - खंडेला (?)

पिपराली (तहसील सीकर) - ताविक नामक महिला

जो गाँव अभी इतिहासकारों द्वारा पहिचाने नहीं गए हैं वहां (?) चिन्ह लगाया गया है.
 
Last edited:
Research on Burdak clan history (Contd.)

ऊपर कुछ अन्य गोत्रों के उदहारण दिए गए हैं. ये भी चौहान वंश से निकले हैं. हर गोत्र के भाट कुछ तिथियाँ अपनी बही में देते हैं जिनसे अवधी का पता लगता है. यदि यहाँ सभी चौहान वंश से उत्पन्न गोत्रों की वंशावली एकत्रित कर उनको कन्वर्ज करें तो हम ठीक-ठीक उस समय का पता लगा सकते हैं जबसे अग्नि-कुल क्षेत्रीय पैदा हुए.

बुरडक गोत्र के बडवा (भाट) श्री भवानीसिंह राव की बही में सरणाऊ कोट गढ़ के निर्माण की अवधि संवत 1032 (975 ई.) बतायी गयी है. चौहानों के इतिहास की निश्चित तिथि संवत 1030 (973 AD) के हर्ष शिलालेख से प्राप्त होती है. हर्ष शिलालेख गूवक प्रथम से इस वंश की वंशावली देता है. चौहानों के राज्य का जब विस्तार हुआ तो उन्होंने अपना केन्द्रीय स्थान हर्ष को बनाया. गूवक पहला शासक था जिसने हर्ष को संभवतः राजधानी या उपराजधानी बनाया. गूवक का बनाया शिव मंदिर यहाँ अब भी विद्यमान है. चौहान शैव थे और हर्षदेव उनके कुल देवता थे. श्री हर्ष: कुलदेवोस्या तस्मादिव्यकुलक्रम:। हर्ष शिलालेख से यह भी ज्ञात होता है कि तंत्रपाल नामक प्रतिहारों का दूत जब चौहान नरेश वाक्पति से मिलने आया तो वह अनंतगोचार आया. इतिहासकार अनंतगोचार को हर्ष के आस-पास का क्षेत्र मानते हैं.(रतन लाल मिश्र:शेखावाटी का नवीन इतिहास, मंडावा, 1998, पृ.37 -38 )

भवानीसिंह राव की बही में बुरडक वंशावली के अनुसार हर्ष गाँव बुरडक लोगों द्वारा बसाया गया था. हर्ष राजस्थान के सीकर तहसील और जिले में सीकर से 15 किमी दक्षिण पश्चिम में है. हर्ष मंदिर राजस्थान में कला की दृष्टि से बहुत उन्नत श्रेणी का है. यह मंदिर अरावली की पहाड़ियों पर 3000 फीट की ऊंचाई पर गर्वपूरक खड़ा है. मंदिर आज भग्न अवस्था में श्रीहीन हो चुका है पर जो कुछ बचा है वह इसकी महानता और उत्कृष्टता स्थापित करने में समर्थ है.

हर्ष शिलालेख में उन गाँवों के नाम आये हैं जिन्हें विभिन्न शासकों या उनके सरदारों ने अपने नियंत्रित क्षेत्र से हर्षदेव को चढ़ाये. ये क्षेत्र हर्षदेव के आस-पास ही स्थित हैं. ये गाँव हैं -

सिंहासन (तहसील सीकर) - सिंहराज द्वारा ,

कदमा का बास (तहसील सीकर) - वत्स-राजा द्वारा,

छत्रधार - विग्रहराजा द्वारा,

शाकम्भरी - विग्रहराजा द्वारा,

कोलीड़ा (तहसील सीकर) - जय-श्री-राजा द्वारा,

कोछोर (तहसील दांतारामगढ़ ) - शाकम्बरी द्वारा,

परसरामपुरी - शाकम्बरी द्वारा,

पलासरा या आकवा (तहसील सीकर) - शाकम्बरी द्वारा,

कुटक (?) - शाकम्बरी द्वारा,

एकलका (?) - सिंह-राजा द्वारा,

कृशानु कूप (कालाडेरा ?) - सिंह-राजा द्वारा,

उरु-सरस - सिंह-राजा द्वारा,

कान्ह (?) -

मयूर-पुरा (मोरडूंगा ?) (तहसील सीकर) - धान्धुक राजा द्वारा

खड्ग-कूप - खंडेला (?)

पिपराली (तहसील सीकर) - ताविक नामक महिला

जो गाँव अभी इतिहासकारों द्वारा पहिचाने नहीं गए हैं वहां (?) चिन्ह लगाया गया है.
I have heard that on moubt abu all agnicula khastriya that sprung on fire were rajputs. so if these Jats gotras are originated from agnikucla chauhan , so they are offshoots of Rajputs. I don't understand how rajputs converted into Jats. Earlier each and every Jatland historian rebuffed the statement " jats are offshoots of Rajputs" and now one of them is proudly telling himself offshoot of Rajput .Plz clear your stand rather than confusing the masses here
 
Last edited:
Prasantji you have raised very interesting point. I have so far not used the word Rajput. It is only the Chauhan vansha being used so far. It is a matter of research - Who were Chauhans Jats or Rajputs? To reach at some conclusion we need historical evidences. I have posted the most authentic Harsha Inscription of Chauhans of 961-973 AD on Jatland at http://www.jatland.com/home/Harsh

It has used word Chahumana for the line of rulers but not Rajput.

I quote here verses from Harsha Inscription here:

Verse III.—He at whose dancing the earth bows, moved by the rapid tread of his feet, though fixed to the hood of her supporting serpent, and even the whole system of the world, though joined with its chief guardians, the lords of the several regions of space, together with the sun and moon, is displaced—he, under the name of Sri Harsha, conquers all, the bestower of compassion on the universe.

Verse IV.—" The three-forked spear in thy left hand, the extended axe in thy right; thy head-dress the celestial Ganga herself; a serpent the necklace about thy blue throat; never was so wondrous vesture as thine, O three-eyed one, seen any where by me." May Hara, who smiling was thus addressed sportively by his fair consort Gauri, protect you!

Verse V.—May the river of heaven, fair as the moon, which, agitated by rains, pervades with her masses of waters in thousands of lines of waves the region of the sun and planets, looking down even upon the rapidly-flowing seas,—may she grant your petition, bearing gentle sport, cricket-like, on the crest of the moon-crowned Siva, fast bound with its shining horrid ornament [of clotted hair (Jata].

Verse XIII.—The first prince was celebrated by the name of Guvaka, the blessed, of the Chahumana (or Chauhan) family, and obtained heroic eminency amidst the multitude of kings in the several worlds, from the infernal world of the blessed Nagas upward : the earthly effigy of whose glory shines forth doubly in this excellent house erected to Harsha-Deva, and is celebrated by the most excellent of beings.

आद्य: श्री गूवकाख्य: प्रथित नरपति चाहमानोन्वयोभूत्

श्री मन्नागाद्य लोक प्रवरनृप सभालब्धवीर: प्रतिष्ठ: ।

यस्य श्री हर्षदेव वर भवन मयी भौतली कीर्तिमूर्ति

लोकेद्यापि स्थेरेषा प्रतपति परमै:......। १३

These verses use word Naga and Jata. The Jat clans of Rajasthan were mostly Nagavanshi kings. It means the Nagavanshi Jats joined to form Chahumana Agnikula Kshatriyas.
 
Prasantji you have raised very interesting point. I have so far not used the word Rajput. It is only the Chauhan vansha being used so far. It is a matter of research - Who were Chauhans Jats or Rajputs? To reach at some conclusion we need historical evidences. I have posted the most authentic Harsha Inscription of Chauhans of 961-973 AD on Jatland at http://www.jatland.com/home/Harsh

It has used word Chahumana for the line of rulers but not Rajput.

I quote here verses from Harsha Inscription here:

Verse III.—He at whose dancing the earth bows, moved by the rapid tread of his feet, though fixed to the hood of her supporting serpent, and even the whole system of the world, though joined with its chief guardians, the lords of the several regions of space, together with the sun and moon, is displaced—he, under the name of Sri Harsha, conquers all, the bestower of compassion on the universe.

Verse IV.—" The three-forked spear in thy left hand, the extended axe in thy right; thy head-dress the celestial Ganga herself; a serpent the necklace about thy blue throat; never was so wondrous vesture as thine, O three-eyed one, seen any where by me." May Hara, who smiling was thus addressed sportively by his fair consort Gauri, protect you!

Verse V.—May the river of heaven, fair as the moon, which, agitated by rains, pervades with her masses of waters in thousands of lines of waves the region of the sun and planets, looking down even upon the rapidly-flowing seas,—may she grant your petition, bearing gentle sport, cricket-like, on the crest of the moon-crowned Siva, fast bound with its shining horrid ornament [of clotted hair (Jata].

Verse XIII.—The first prince was celebrated by the name of Guvaka, the blessed, of the Chahumana (or Chauhan) family, and obtained heroic eminency amidst the multitude of kings in the several worlds, from the infernal world of the blessed Nagas upward : the earthly effigy of whose glory shines forth doubly in this excellent house erected to Harsha-Deva, and is celebrated by the most excellent of beings.

आद्य: श्री गूवकाख्य: प्रथित नरपति चाहमानोन्वयोभूत्

श्री मन्नागाद्य लोक प्रवरनृप सभालब्धवीर: प्रतिष्ठ: ।

यस्य श्री हर्षदेव वर भवन मयी भौतली कीर्तिमूर्ति

लोकेद्यापि स्थेरेषा प्रतपति परमै:......। १३

These verses use word Naga and Jata. The Jat clans of Rajasthan were mostly Nagavanshi kings. It means the Nagavanshi Jats joined to form Chahumana Agnikula Kshatriyas.
Burdak ji, I guess you could not catch my point. I reiterate " all the clans/gotra that are supposed to originated on Moubt abu are considered rajputs after wards". By taking into consideration your assumption that nagavanshi jats of rajasthan got mustered up to constitute chauhan vansha , those nagavanshi jats transformed into rajputs. So how burdak and other gotras jats tell themselves to be originated from chauhan vansha. It can be consented as per your theory that "chauhan rajputs originated from nagavanshi Jats" but how is it possible that these burdak and other Jat gotras offshooted from the chauhan vansha and agnikunda ?
बुरड़क गोत्र का इतिहास

नोट:- बुरडक गोत्र का विवरण बुरड़क गोत्र का रेकॉर्ड रखने वाले उनके बड़वा श्री भवानीसिंह राव, गाँव- महेशवास, पोस्ट- बिचून, तहसील- फूलेरा, जिला- जयपुर (फोन-09785459386) से उनके अभिलेखों (बहियों) से लेखक द्वारा दिनांक 2 दिसंबर 2010 को जयपुर में प्राप्त किया गया है.

* वंश - अग्निवंश,

* शाखा- माधनिक

* कुलदेवी - जीणमाता, समरायमाता, आशापुरीमाता

* गोत्र - बछवस्व

* गुरू - वशिष्ठ मुनि

* नदी - गंगा

* पूजा - तुलसी, पीपल

* प्रवरपांच - झंडा-सफ़ेद, नगारा-रणजीत, घोडा-शावकरण, वेद-यजुर्वेद, वृक्ष-अक्षयबड़

* निकास - आबू पर्वत अनिलकुण्ड से
Do you want to say that on mount abu jats also sprung on fire as per that mythical and illusionary story. If you say yes Can you please give me the reference of any history book that says this?
 
Last edited:
Back
Top