History of Chahar clan
चाहर गोत्र का इतिहास
सन्दर्भ- अनूप सिंह चाहर, जाट समाज आगरा, नवम्बर 2013, पृ. 26-27
प्राचीन इतिहास के अनुसार चौथी शताब्दी में चहल (यूरोपियन इतिहासकारों के चोल) केस्पियन सागर के पूर्व में मध्य एशिया के दहिस्तान में गुरर्गन के शासक थे। सन 438-439 ई. में ईरान सम्राट यज्दगिर्द द्वितीय (Yazdegird II) ने चहलों के विरुद्ध अभियान छेड़ा। दहिस्तान के घास के मैदान में उत्तरी प्रजदिगिर्द गुरर्गन में सम्राट के सैनिक शिविर में ही चाहलों ने उसे मार दिया। सन 440 ई. यज्दगिर्द तृतीय (Yazdegird III) ने चाहलों को युद्ध में हरा दिया। चाहल भारत में सम्भवतः पांचवीं शदी में आये थे। इनको चहल-चाहल तथा चहर-चाहर दोनों रूप से उच्चारित किया जाता है।
इन्हें गीक, मध्य एशिया, दक्षिण भारत में [wiki]चोल[/wiki] और चीन, मंगोलिया, ब्रज (भारत) में चाहर, पंजाब, हरयाणा, पाकिस्तान में चाहल-चहल के रूप में उच्चारित किया जाता है। भारत एवं विदेशों में मुसलमान, ईसाई , हिन्दू तथा अन्य धर्मों में चहल-चाहल जाट पाये जाते हैं।
रामायण, महाभारत, मैगस्थनीज के वृतांत, अशोक के शिलालेखों तथा अन्य ग्रंथों में चोलों का उल्लेख मिलता है।
चाहर उस चोल जाटवंश की शाखा हैं, जिसका शासन रामायण काल में दक्षिण भारत में था। महाभारत काल में इनका राज्य उत्तर दिशा में भी था।
महाभारत वन पर्व अध्याय-48 में उल्लेखित चोल देश के नरेश ने महाराजा युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में काफी धनराशि भेंट की थी।
यत्र सर्वान महीपालाञ शस्त्रतेजॊ भयार्थितान
सवङ्गाङ्गान सपौण्ड्र उड्रान सचॊल थरविडान्धकान (III.48.18)
महाभारत सभा पर्व अधयाय-24 में अर्जुन द्वारा उत्तर में जीते गए राज्यों में चोल भी था।
ततः सुह्मांश च चॊलांश च किरीटी पाण्डवर्षभः
सहितः सर्वसैन्येन परामदत कुरुनन्थनः (II.24.20)
महाभारत भीष्म पर्व अध्याय-10 में भारतवर्ष के भूगोल का वर्णन किया गया है जिसमें चोल राज्य का उल्लेख दक्षिण के राज्यों के साथ किया गया है।
कर्णिकाः कुन्तिकाश चैव सौब्धिदा नलकालकाः
कौकुट्टकास तदा चॊलाः कॊङ्कणा मालवाणकाः (VI.10.58)
महाभारत भीष्म पर्व अध्याय-46 में चोल राजा का उल्लेख दक्षिण के राज्यों के साथ किया गया है।
बाह्लिकास तित्तिराश चैव चॊलाः पाण्ड्याश च भारत
एते जनपथा राजन थक्षिणं पक्षम आश्रिताः (VI.46.50)
आठवीं शताब्दी में दक्षिण भारत में चोल वंश जाटों का राज्य था, जिसमें तमिलनाडु और मैसूर के अधिकांश प्रदेश शामिल थे।
नौवीं शताब्दी में पालवों के ध्वंशावशेषों पर चोल वंश स्थापित हुआ। चोल वंश के संस्थापक विजयपाल नरकेशरी (850-891 ई.) थे इनकी राजधानी तांजाप (तंजौर या तंझुवर) थी। इस वंश में अनेकों पराक्रमी राजा हुए। राजेन्द्र चोल द्वितीय (1051–1063 ई.) और राजा राजराज (1063–1070 ई.) कुलोत्तुंग (1070–1120 ई.) के पश्चात् इस वंश के शासक कमजोर होते चले गए। चालुक्यों और मालिक काफूर ने 14 वीं शताब्दी में चोल वंश को जीत लिया।
राजस्थान में चाहर गोत्र
ऋषि - भृगु
वंश - अग्नि
मूल निवास - आबू पर्वत राजस्थान। शिव के गले में अर्बुद नाग रहता है उसी के नाम पर इस पर्वत का नाम आबू पर्वत पड़ा।
कुलदेव - भगवान सोमनाथ
कुलदेवी - ज्वालामुखी
पित्तर - इस वंश में संवत 1145 विक्रम (सन 1088 ई.) में नत्थू सिंह पुत्र कँवरजी पित्तर हुए हैं, जिनकी अमावस्या को धोक लगती है। इस वंश की बादशाह इल्तुतमिश (r. 1211–1236) (गुलाम वंश) से जांगल प्रदेश के सर नामक स्थान पर लड़ाई हुई।
राजा चाहर देव - इस लड़ाई के बाद चाहरों की एक शाखा नरवर नामक स्थान पर चली गयी। सन् 1298 ई. में नरवर पर राजा चाहरदेव का शासन था। यह प्रतापी राजा मुस्लिम आक्रांताओं के साथ लड़ाई में मारा गया और चाहर वंश ब्रज प्रदेश और जांगल प्रदेश में बस गया। इतिहासकारों को ग्वालियर के आस-पास खुदाई में सिक्के मिले हैं जिन पर एक तरफ अश्वारूढ़ राजा की तस्वीर है और दूसरी और अश्वारूढ़ श्रीसामंत देव लिखा है। इतिहासकार इसे राजा चाहरदेव के सिक्के मानते हैं।
संवत 1324 विक्रम (1268 ई.) में कंवरराम व कानजी चाहर ने बादशाह बलवान को पांच हजार चांदी के सिक्के एवं घोड़ी नजराने में दी। बादशाह बलवान ने खुश होकर कांजण (बीकानेर के पास) का राज्य दिया। 1266 -1287 ई तक गयासुदीन बलवान ने राज्य किया। सिद्धमुख एवं कांजण दोनों जांगल प्रदेश में चाहर राज्य थे।
राजा मालदेव चाहर - जांगल प्रदेश के सात पट्टीदार लम्बरदारों (80 गाँवों की एक पट्टी होती थी) से पूरा लगान न उगा पाने के कारण दिल्ली का बादशाह खिज्रखां मुबारिक (सैयद वंश) नाराज हो गए। उसने उन सातों चौधरियों को पकड़ने के लिए सेनापति बाजखां पठान के नेतृतव में सेना भेजी। खिज्रखां सैयद का शासन 1414 ई से 1421 ई तक था। बाजखां पठान इन सात चौधरियों को गिरफ्तार कर दिल्ली लेजा रहा था। यह लश्कर कांजण से गुजरा। अपनी रानी के कहने पर राजा मालदेव ने सेनापति बाजखां पठान को इन चौधरियों को छोड़ने के लिए कहा. किन्तु वह नहीं माना। आखिर में युद्ध हुआ जिसमें मुग़ल सेना मारी गयी. इस घटना से यह कहावत प्रचलित है कि -
माला तुर्क पछाड़याँ दे दोख्याँ सर दोट ।
सात जात (गोत) के चौधरी, बसे चाहर की ओट ।
ये सात चौधरी सऊ, सहारण, गोदारा, बेनीवाल, पूनिया, सिहाग और कस्वां गोत्र के थे।
विक्रम संवत 1473 (1416 ई.) में स्वयं बादशाह खिज्रखां मुबारिक सैयद एक विशाल सेना लेकर राजा माल देव चाहर को सबक सिखाने आया। एक तरफ सिधमुख एवं कांजण की छोटी सेना थी तो दूसरी तरफ दिल्ली बादशाह की विशाल सेना।
मालदेव चाहर की अत्यंत रूपवती कन्या सोमादेवी थी। कहते हैं कि आपस में लड़ते सांडों को वह सींगों से पकड़कर अलग कर देती थी। बादशाह ने संधि प्रस्ताव के रूप में युद्ध का हर्जाना और विजय के प्रतीक रूप में सोमादेवी का डोला माँगा। स्वाभिमानी मालदेव ने धर्म-पथ पर बलिदान होना श्रेयष्कर समझा। चाहरों एवं खिजरखां सैयद में युद्ध हुआ। इस युद्ध में सोमादेवी भी पुरुष वेश में लड़ी। युद्ध में दोनों पिता-पुत्री एवं अधिकांश चाहर मारे गए।
बचे हुए चाहर मत्स्य प्रदेश एवं उदयपुरवाटी (झुंझुनू) आ गए। उदयपुरवाटी के पास परशुरामपुर गाँव बसाया। यहाँ से एक पूर्वज गोपाल चाहर विक्रम संवत 1509 (1453 ई.) बसंत पंचमी (माघ पाँचम) को (18 पीढ़ी) खेजड़ी की डाली रोपकर ग्राम चारावास बसाया। उस समय दिल्ली पर बहलोल लोदी (1451 -1489 ई.) का राज्य था। ग्राम चारावास वर्त्तमान खेतड़ी तहसील जिला झुंझुनू में स्थित है। इस ग्राम के बजरंग सिंह चाहर खेतड़ी के प्रधान हैं और श्री पूरण सिंह चाहर सरपंच हैं।
भरतपुर रियासत की स्थापना में राजाराम के साथ रामकी चाहर ने जाट सैन्य संगठन और सञ्चालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। जाटों के यह सेनापति एक ही साथ युद्ध में लड़ते-लड़ते शहीद हो गए यहे।
झुंझुनू में चाहरों के ग्राम हैं - पिचानवा, समस्तपुर, भोड़की, लुटू, बाकरा, बग्गड़, खुडानियां, आबूसर, पबाना आदि. ये सभी गाँव चारावास से गए चाहर जाटों ने बसाये।
स्रोत - जागा सुरेन्द्र सिंह, ग्राम दादिया, तहसील - किशनगढ़, अजमेर, 2. राम चन्द्र चाहर, लाडनू, नागौर
Read more on Jatland Wiki at [wiki]Chahar[/wiki]