Reservation is our constitutional right (continued)

जाटों सावधान !!!
अब जाटों को एक विशेष जाति बता कर जाटों को दिये गए आरक्षण के हक पर हमला किया जाएगा !

जिन लोगो ने कभी इस जातिवाद का बीज बोया था आज वहीं लोग इस पर रो रहे हैं | जब तक खुद को मलाई खाने को मिलती रही तो ठीक था , अब जब शोषित वर्ग जागरूक होने लगा तो जातिवाद जहर हैं की दुहाई देते हैं | वैसे आरक्षण देने का सबसे पहला पैमाना सामाजिक पिछड़ापन हैं जिस मे यह जातीया कहीं भी खरी नहीं उतरती और बात कर रहे हैं जाति आधार पर आरक्षण लेने की |
वैसे हरियाणा पहला ऐसा प्रदेश हैं जहा स्वर्ण जातीयों को भी 'आर्थिक पिछड़ा वर्ग' के तहत आरक्षण दिया गया हैं | एक तरफ तो यह लोग कहते हैं की आरक्षण आर्थिक आधार पर हो और जब इन लोगो को उसी आधार पर आरक्षण दे दिया गया हैं तो कहते की हमे जाति आधार पर दो | अब जातिवाद के जहर का क्या हुआ ?
जातिवाद मे विशास न रखने वाले क्या बता सकते हैं की यह विशेष जाति कौन सी हैं ? और विशेष कैसे हैं ? चौधरी भूपेन्द्र सिंह हुड्डा व चौधरी बिरेन्द्र सिंह पर एक विशेष जाति को तवज्जो देने से जात-पात की खाई को गहरा करने का इल्जाम लगा रहे हैं | ऐसे लोगो से सवाल हैं की आप लोगो ने सदियो से इस खाई को गहरा किया , एक विशेष जाति ने सदियो से धर्म के नाम से व्रण व्यवस्था के नाम से मलाई खाई , उसको पाटने का काम कैसे हो ? उसका हिसाब कैसे हो ? उसकी दुहाई कहा लगाई जाए जरा वो और बता दे ?
पिछली सरकार मे विधान सभा अध्यक्ष कुलदीप शर्मा क्या ब्राह्मण समाज से नहीं थे ? मंत्री शिवचरण शर्मा क्या ब्राह्मण समाज से नहीं थे ?
पूर्व मुख्यमंत्री चौधरी भूपेन्द्र सिंह हुड्डा मे तो वहीं बन गई की " सनम हम तो लुट गए तेरे प्यार मे " और जिनके प्यार मे लुटे उन्होने ने ही लूट लिया |
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मुख्यमंत्री जी को या तो शायद ज्ञान नहीं हैं की आरक्षण मे भी क्रीमी लेयर का प्रावधान हैं या फिर मुख्यमंत्री जी 'राष्ट्रवाद' 'सभी जाति एक समान' जैसी चिकनी चुपड़ी बातें कर के जाटों के आरक्षण को खत्म करने की मंशा रखते हैं !
जब जाट अपने हक के लिए आवाज़ उठाता हैं तो उस पर जातिवादी होने का आरोप लगाया जाता हैं | जाटों को जातिवाद से ऊपर उठ कर सोचने का पाठ पढ़ाया जाता हैं | परंतु जब ऐसी ही मांग स्वर्ण जाति के लोग करते हैं तब कोई नहीं कहता की जातिवाद से ऊपर उठ कर देश की सोचो ?
इन लोगो की चिकनी चुपड़ी बातों से बचो और अपनी आपने वाली नस्लों के भविष्य की सोचो , हमारे अपने हकों की मांग के लिए संगठित होने से राष्ट्र और राष्ट्रवाद को कोई खतरा नहीं हैं |
" बददुआ देंगे हमें बाद में आने वाले ,
घर न बनता न सही नींव तो रख दी होती "
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Two wrongs do not make one right. RESERVATION is WRONG. Instead of perpetuating unfair system of reservation that failed to serve the purpose of affirmative action, we must campaign for its abolition. We need a system based on meritocracy, not based on reservation. Demanding reservation is like saying, "since I can not compete as through bred, please relabel me as KHACCHAR and let me compete as a unfairly-privileged donkey (who has ample vote bank to demand such privilege)'.

SAY NO TO ALL FORMS OF RESERVATION.

Instead, to make the nation better, we must work for a system based on merit, where QUALITY & AFFORDABLE education are available to everyone and financially weaker sections are given scholarships and additional social security measures (counseling, career guidance, etc) to break the cycle of poverty.

Demanding entitlements based on reservation, so that we too can join this rotten system that breeds donkeys ain't the answer.

Its time, we learn to gain skills to compete in the globalized world on fair and square basis.
 
in the jest ... shall we rephrase "Reservation-is-our-constitutional-right" as thus

'so now "oh so proud" Jats are actually new Chamars' ... 'ar kuch un me te chamar bann ke rifal bi lagan re s' ha ha ha...

Constitutional reservation for Jats, who are socio-economically dominant in Haryana, is a shameful act, nothing to celebrate. Hurrrrrrrrr. NO RESERVATION FOR ANYONE, only quality affordable education and conducive business/employment environment for all ... is what govt and society must strive for.

~ Pro-Jat but Anti-castism, Anti-reservation but Pro-meritocracy and Pro-affirmative Action. JATs me babyeeee :)
 
in the jest ... shall we rephrase "Reservation-is-our-constitutional-right" as thus

'so now "oh so proud" Jats are actually new Chamars' ... 'ar kuch un me te chamar bann ke rifal bi lagan re s' ha ha ha...

Constitutional reservation for Jats, who are socio-economically dominant in Haryana, is a shameful act, nothing to celebrate. Hurrrrrrrrr. NO RESERVATION FOR ANYONE, only quality affordable education and conducive business/employment environment for all ... is what govt and society must strive for.

~ Pro-Jat but Anti-castism, Anti-reservation but Pro-meritocracy and Pro-affirmative Action. JATs me babyeeee :)

Dear, calm down.

Jat didn't start reservation in country. and its quite late now to blow your trumpet. Society and govt doesnt believe on your overly idealistic ( read baasi views at-least on it.

Yups not yet in SC/ST category, if that happens that will be good as well but OBC is great as well.

Now when you get in to a bit sane mood or state, in detail explain this pro-affirmative action. Will you? And how this would be implemented.?
 
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जाट आरक्षण के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दस याचिकाएं लंबित हैं, जिन पर कल से सुप्रीम कोर्ट मे बहस चालू हुई, याचिकाकर्ताओं की ओर से बहस करते हुए उनके अधिवक्ता ने कहा कि इन राज्यों के जाट पिछड़े नहीं हैं और इसीलिए राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (एनसीबीसी) ने इन्हें केंद्र की ओबीसी सूची में शामिल करने से मना कर दिया था। फिर भी पिछली सरकार ने राजनीतिक लाभ लेने के लिए नौ राज्यों के जाटों को पिछड़े वर्ग (ओबीसी) की केंद्रीय सूची में शामिल किया है, विरोधियों ने आईसीएसएसआर के सर्वे का भी हवाला दिया और कहा कि सरकारी हरियाणा, दिल्ली व अन्य जगह ज्यादातर जाट भूस्वामी हैं।

वकील ने इस बारे में आरटीआई से प्राप्त सूचना के आंकड़े कोर्ट में पेश किए और कहा कि ओबीसी को मिलने वाले आरक्षण का ज्यादातर हिस्सा जाट ले जाते हैं।
याचिकाकर्ता के आंकड़े
1. दिल्ली पुलिस में जाट: हेड कांस्टेबिल- 32 %, कांस्टेबिल- 32%, एएसआई- 27 %, एसआई- 42 %, इंस्पेक्टर- 18 %, एसीपी- 18 %
2. राजस्थान प्रशासनिक सेवा, 2011 में कुल 30 ओबीसी उम्मीदवार चयनित से 25 जाट थे।
3. उत्तर प्रदेश के बीटीसी चयन, 2010 में मुजफ्फरनगर में कुल ओबीसी चयनित उम्मीदवार 85 में से 60,बागपत में 27 में 21और बिजनौर में 27 में से 18 जाट थे।
4. वर्ष 2012 की यूपीएससी परीक्षा में कुल चयन 998 (पूरे देश में) जिसमें से 30 जाट हैं|


....इन दलीलों पर सुनवाई कर रही पीठ ने कहा कि ऐसा लगता है कि हरियाणा में जाट सामाजिक रूप से पिछड़े नहीं हैं, शैक्षणिक रूप से पिछड़े हो सकते हैं।
देखो आज क्या होता है???
 
Supreme court may cancel the reservation for Jats on the basis that UPA govt did not follow the due process by ignoring the recommendation of NCBC (National Commission for Backward Class). As per the process, NCBC must recommend that a specific group is backward before being notified as such by the govt. NCBC had earlier told the govt that jats are not socioeconomically backward but owing to the poll gimmick, UPA still went ahead with the issuance of notification for Jats.

पिछड़े नहीं हैं जाट, राजनीतिक लाभ के लिए दिया गया आरक्षण

Publish Date:Thu, 27 Nov 2014 04:53 AM (IST)News in today's DAINIK JAGRAN reproduced below:
http://www.jagran.com/news/national-jats-are-not-backward-court-11813023.html

माला दीक्षित, नई दिल्ली। जाट पिछड़े नहीं हैं। सरकार ने राजनीतिक लाभ लेने के लिए नौ राज्यों के जाटों को पिछड़े वर्ग (ओबीसी) की केंद्रीय सूची में शामिल किया है। ये दलीलें बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में जाट आरक्षण पर शुरू हुई सुनवाई में आरक्षण का विरोध कर रहे वकीलों ने दीं।
इस साल आम चुनाव से ठीक पहले चार मार्च को सरकार ने नौ राज्यों दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान के दो जिलों (भरतपुर और धौलपुर), दिल्ली, मध्य प्रदेश और बिहार के जाटों को केंद्र की ओबीसी सूची में शामिल किया था। जाट आरक्षण के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दस याचिकाएं लंबित हैं, जिन पर बहस शुरू हुई।
बुधवार को याचिकाकर्ता रामसिंह व अन्य की ओर से बहस करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता गुरु कृष्णमूर्ति ने कहा कि इन राज्यों के जाट पिछड़े नहीं हैं और राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (एनसीबीसी) ने इन्हें केंद्र की ओबीसी सूची में शामिल करने से मना कर दिया था।
इसके बावजूद सरकार ने राजनीतिक लाभ पाने के उद्देश्य से इन नौ राज्यों के जाटों को ओबीसी सूची में शामिल करने की अधिसूचना जारी कर दी। उन्होंने कहा कि सरकार के लिए एनसीबीसी की सिफारिश बाध्यकारी है। एनसीबीसी ने कहा है कि इन राज्यों में जाट पिछड़े नहीं है और इसलिए इन्हें केंद्रीय सूची में शामिल नहीं किया जा सकता।
वकील ने आईसीएसएसआर के सर्वे का भी हवाला दिया। उन्होंने कहा कि सरकारी अधिसूचना में इस बात का कोई जिक्र नहीं है कि एनसीबीसी ने इन राज्यों के जाटों को ओबीसी सूची में शामिल करने से मना किया था। हरियाणा, दिल्ली व अन्य जगह ज्यादातर जाट भूस्वामी हैं। वे अपनी जमीन पर खेती करते हैं। वे दूसरे की जमीनों पर मजदूरी नहीं करते। सरकारी नौकरियों में भी उनका अच्छा खासा प्रतिनिधित्व है।
इन दलीलों पर सुनवाई कर रही पीठ ने कहा कि ऐसा लगता है कि हरियाणा में जाट सामाजिक रूप से पिछड़े नहीं हैं, शैक्षणिक रूप से पिछड़े हो सकते हैं। वकील ने इस बारे में आरटीआई से प्राप्त सूचना के आंकड़े कोर्ट में पेश किए जो दिल्ली पुलिस और अन्य सरकारी नौकरियों में जाटों के अच्छी उपस्थिति दर्शाते थे। उन्होंने कहा कि ओबीसी को मिलने वाले आरक्षण का ज्यादातर हिस्सा जाट ले जाते हैं।
याचिकाकर्ता के आंकड़े
दिल्ली पुलिस में जाट
हेड कांस्टेबिल- 32 फीसद
कांस्टेबिल- 32 फीसद
एएसआई- 27 फीसद
एसआई- 42 फीसद
इंस्पेक्टर- 18 फीसद
एसीपी- 18 फीसद

1. राजस्थान प्रशासनिक सेवा, 2011 में कुल 30 ओबीसी उम्मीदवार चयनित हुए। इनमें से 25 जाट थे।
2. उत्तर प्रदेश के बीटीसी चयन, 2010 में मुजफ्फरनगर में कुल ओबीसी चयनित उम्मीदवार 85, जिनमें से जाट उम्मीदवार 60 थे।
3. बागपत में 27 ओबीसी में 21 जाट उम्मीदवार थे।
4. बिजनौर में 27 ओबीसी में से 18 जाट थे।
5. वर्ष 2012 की यूपीएससी परीक्षा में कुल चयन 998 (पूरे देश में) जिसमें से 30 जाट हैं।
 
यदि जाट आरक्षण रद्द होता है तो यह हमारे समुदाय के लिए एक बहुत बड़ा झटका साबित होगा| ग्रामीण क्षेत्रो में बसी अधिसंख्य जाट आबादी के लिए आरक्षण संजीवनी से कम नही है| दुर्भाग्यवश दिन प्रतिदिन सिकुड़ते खेती के रकबे के कारण अब ज़्यादातर जाटो की हैसियत ना तो काश्तकार की रही है ना मजदूर की| ऐसी स्थिति में आरक्षण की बैशाखी के सहारे वैकल्पिक रोज़गार खोज रहे जाट समुदाय के लिए यह खबर घाव पर नमक लगाने के समान है|
मेरा व्यक्तिगत रूप से मानना है कि जैसे जैसे खेती योग्य ज़मीन कम हो रही है उसके हिसाब से जाटो को आर्थिक स्थिति भी नाज़ुक दौर में पहुँच रही है| यह तो भला हो जाटो के कर्मठ स्वभाव का कि वह नाममात्र की खेती में भी अपना परिवार चला रहा है| नही तो उसकी स्थिति तो एक मजदूर से भी बदतर हो चुकी है| कुछेक बड़े जाट काश्तकारो के आधार पर हम सबको एक नज़रिए से नही देख सकते|
ऐसी स्थिति में आरक्षण तो लाज़िमी हो जाता है| हालाँकि कुछ लोगो को आरक्षण स्वाभिमान से जुड़ा प्रश्न लगता है| मेरा मानना है कि जाटो की सामाजिक हैसियत उनके कार्यो और आर्थिक स्थिति से निर्धारित होती है| ऐसे में पिछड़े वर्ग के आरक्षण से उनके स्वाभिमान को कोई ठेस नही लगनी चाहिए| बल्कि अगर हम आर्थिक रूप से पिछड़ते है तो यह हमारे रूतबे को कम ही करेगा| हम केवल इस भरोसे नही रह सकते कि सरकार सस्ती सुलभ शिक्षा और अवसर प्रदान करे| जाटो का प्रतिनिधित्व सरकारी नौकरियो, उच्च शिक्षा के क्षेत्र में बढ़े, यह आरक्षण द्वारा ही संभव है| इस महंगाई के जमाने में, खेती से जुड़ा जाट अपने बच्चो के लिए महँगी शिक्षा और कोचिंग का व्यय नही वहन कर सकता| सीमित संसाधनो में आरक्षण रूपी सहारा किसी अमृत से कम नही है|

आरक्षण द्वारा हम शिक्षा और रोज़गार के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति कर सकते है| यह जाटो के आर्थिक रूप से पिछड़ रहे वर्ग को नवजीवन प्रदान करेगा| अब बस यही आशा की जाए कि माननीय न्यायालय जाटो के पक्ष में निर्णय दे| जिससे की हमारी भावी पीढ़ियो का भविष्य सुरक्षित हो सके|

---आयुष
 
Notified in Uttranchal as well. So jats from Utranchal can start applying for OBC certificate.


राज्य ब्यूरो, देहरादून: उत्तराखंड में जाट जाति के अभ्यर्थियों को अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) का प्रमाण पत्र मिलने का रास्ता साफ हो गया है। शासन ने जाट जाति के ओबीसी की केंद्र व राज्य सूची में शामिल होने का हवाला देते हुए इस वर्ग को ओबीसी का प्रमाण पत्र जारी करने के संबंध में शासनादेश जारी किया है। शासन ने सभी जिलाधिकारियों को जाट जाति के लिए नियमानुसार ओबीसी प्रमाण पत्र निर्गत करने के निर्देश भी दिए। उधर, सरकार के इस कदम का आंदोलनकारी संगठनों ने विरोध किया है।
अपर मुख्य सचिव समाज कल्याण एस राजू की ओर से जारी शासनादेश में बताया गया कि 22 मार्च 2010 को उत्तराखंड में ओबीसी की सूची पुनरीक्षित की गई थी। जाट जाति सूची के क्रमांक-78 में अंकित है। मार्च 2014 में केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय ने ओबीसी की सूची को संशोधित कर उत्तराखंड में जाट जाति को क्रमांक-79 में अंकित करते हुए केंद्रीय सूची में सम्मिलित किया है, मगर राज्य में जाट जाति के अभ्यर्थियों को ओबीसी के प्रमाण पत्र निर्गत नहीं किए जा रहे।
सभी जिलों के जिलाधिकारियों को भेजे पत्र में उन्होंने कहा कि चूंकि उत्तराखंड में जाट जाति ओबीसी की केंद्र व राज्य सूची में सम्मिलित हैं, लिहाजा जाट जाति के लिए नियमानुसार अन्य पिछड़ा वर्ग प्रमाण पत्र निर्गत किए जाएं। उधर, राज्य आंदोलनकारी रविंद्र जुगरान ने इसे उत्तराखंड के बेहतरीन सामाजिक तानेबाने पर कुठाराघात बताया। उन्होंने कहा कि किसी जाति को उसकी आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक पृष्ठभूमि का आंकलन किए बगैर आरक्षण का लाभ देकर सरकार समाज में वैमनस्य पैदा करना चाहती है।
राजनीतिक लाभ के लिए उठाया गया यह कदम लोगों में भारी असंतोष पैदा करेगा और राज्य के हालात खराब होंगे। राज्य में जाट समुदाय काफी समृद्ध है। सरकार के इस कदम को कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। राज्य आंदोलनकारी मंच के जिला अध्यक्ष प्रदीप कुकरेती ने कहा कि इससे साफ हो गया है कि उत्तराखंड राज्य के लिए शहादत देने व संघर्ष करने वालों के प्रति सरकार कितनी संवेदनहीन है। राज्य आंदोलनकारियों के दस फीसद आरक्षण की सुविधा को सरकार ने छीन लिया। नौ पिछड़े जिलों की बजाय समृद्ध जाति को ओबीसी में शामिल करने का पुरजोर विरोध किया जाएगा।

http://www.jagran.com/uttarakhand/dehradun-city-jat-reservation-11674299.html
 
जाट आरक्षण पर सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई जारी है।
अभी कुछ दिनों से जाट आरक्षण पर सुनवाई जारी है क्योंकि हमारे विरोधियों ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका लगाई थी कि जाटों को आरक्षण गलत मिला हुआ है अर्थात वे आरक्षण के हकदार नहीं हैं। वहां की लड़ाई हमारे उत्तरप्रदेश से चौ० एचपी सिंह परिहार तथा महाराजा सूरजमल संस्था के अध्यक्ष चौ० एसपी सिंह आदियों की देखरेख में लड़ाई लड़ी जा रही है। हरियाणा में जाटों के आरक्षण के विरोध में चंडीगढ़ में कई याचिकाएं दाखिल की गईं, जिनकी सुनवाई 22 जनवरी की है। इसके लिए हमने अपने संगठन की तरफ से वकील तैयार कर लिए हैं और मैं अपने भाईयों, बहनों और दोस्तों को सूचित करना चाहूंगा कि अगर संभव हो तो 22 जनवरी, 2015 को पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट, चंडीगढ़ पहुंच जाएं।
 
[h=1]GOVT'S VIEWS ON JAT RESERVATION
सरकार ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में UPA II के उस फैसले का बचाव किया, जिसमें जाटों को OBC की केंद्रीय सूची में शामिल गया गया था। सरकार ने कहा है कि एक राज्य में पिछड़ा व्यक्ति केंद्र में भी पिछड़ा ही होगा। पिछड़ापन अलग-अलग नहीं हो सकता। कमीशन ऑफ बैकवर्ड क्लासेज के मामले में राज्य कमीशन के फैसले को पलट नहीं सकता......
http://navbharattimes.indiatimes.co...at-reservstion-issue/articleshow/45379231.cms
[/h]
 
जाट आरक्षण को लेकर अदालतों में चल रहे मुकदमों को लेकर बैठक 28 को : सांगवान
जाट आरक्षण को लेकर अदालतो मे चल रहे मुकदमो पर विचार विमर्श करने, समीक्षा करने व आगामी रणनीति तय करने के लिए अखिल भारतीय जाट आरक्षण संघर्ष समिति की एक बैठक 28 दिसंबर, रविवार को रोहतक की चौ० छोटूराम धर्मशाला में होगी।
यह जानकारी देते हुए समिति के प्रदेशाध्यक्ष पूर्व कमांडेंट हवासिंह सांगवान ने बताया कि जाट आरक्षण को बरकरार रखने के लिए हर प्रकार का कदम उठाया जाएगा। सांगवान ने आगे बतलाया कि आरक्षण लेने के लिए जिस निष्ठा के साथ जमीनी संघर्ष किया गया था, उसी प्रकार अभी कानूनी संघर्ष किया जाएगा। अगर सरकार ने जाट आरक्षण के साथ छेड़छाड़ की तो इसे किसी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा तथा कठोर से कठोर कदम उठाए जाएंगे।
 
कुछ तथाकथित जाट नेता अब आरक्षण के केस लडऩे के लिए चंदा एकत्रित करते घूम रहे हैं। ये वही नेता हैं, जो कल तक कहा करते थे कि वे जाट आरक्षण आंदोलन में अपनी जेब से पैसे खर्च करते हैं। अभी इनको केस लडऩे के लिए लाखों रुपए चाहिएं। जबकि हमने लगभग आधा दर्जन से अधिक वकीलों से केस लडऩे के लिए बातें की हैं और किसी ने भी पैसा नहीं मांगा और उन सभी ने कहा है कि वे अपनी कौम की भलाई के लिए बिना फीस के केस लड़ेंगे। इन सभी को पीआईएल की प्रंतिलिपी, जो 193 पेज की है, मुहैया करा दी गई है, जिनमें रोड समाज की तरफ से रामदीया महला एडवोकेट, त्यागी समाज की तरफ से एडवोकेट सतपाल त्यागी और अशोक त्यागी, जाट समाज की तरफ से रणधीर सिंह बिरधान, संजय ढि़ल्लों और हरी प्रकाश सनसनवाल के अतिरिक्त हवासिंह हुड्डा से भी संपर्क किया जा रहा है। इसके अलावा दो और जाट वकीलों का ऑफर आया है, जो कौम का केस बगैर किसी फीस के लडऩा चाहते हैं। इसी प्रकार बिश्रोई जाट और सिख जाटों की तरफ से भी वकील कर लिए गए हैं और इन सभी से एडवोकेट रामदीया महला संपर्क बनाए हुए हैं। ज्यों ही हमें खजान सिंह से कागजात मिलेंगे, हम चंडीगढ़ जाकर जल्दी से जल्दी वे भी सौंप दिए जाएंगे। साथ-साथ मेरा ये भी कहना है कि जो लोग केस के बहाने चंदा इक_ा कर रहे हैं, उन पर कड़ी नजर रखी जाए कि वे कितना पैसा इक_ा करते हैं और कौन-कौन वकील करने जा रहे हैं। इसके अतिरिक्त यह भी बहुत महत्वपूर्ण होगा कि किस प्रकार हरियाणा सरकार अपने आदेशों का बचाव उच्च न्यायालय में करती है। केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में अपना बहुत मजबूृत हलफनामा प्रस्तुत किया है और हम उम्मीद करते हैं कि हरियाणा सरकार भी उसी प्रकार करेगी क्योंकि दोनों जगह ही भाजपा की सरकार है। इसके अतिरिक्त अगर किसी भाई का कोई सुझाव हो तो मुझसे मेरे मोबाइल नंबर 94160-56145 पर अवश्य संपर्क करें।
 
Curious to know the latest position of court cases at High Court Level and the Supreme Court level on the issue of Jat Reservation, could anyone share latest information !
 
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कल सूप्रीम कोर्ट में केंद्र व जाट संगठनों की पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी गई | इस पर रात्री 8 बजे ईटीवी हरियाणा हिमाचल न्यूज़ चैनल द्वारा एक डिबेट आयोजित की गई थी , जिसमे मनोज दूहन ने जाटों की तरफ से अपना दमदार पक्ष रखा | डिबेट से पहले ही मनोज ने मुझे फोन कर कहा कि आप इस डिबेट की हो सके तो मोबाइल से रिकॉर्डिंग कर लेना | आमतौर पर सभी चैनल डिबेट का रिपीट टेलिकास्ट करते हैं परंतु जैसा हमें अंदेशा था वैसा ही हुआ इस बहस का रिपीट टेलिकास्ट नहीं किया गया | शायद इसमे मनोज दूहन ने यूनियनिस्ट आइडियोलॉजी और सर छोटूराम की बात कही इसलिए नहीं किया गया होगा , मनोज ने इसमे ब्राह्मण का गंगा के घाट, मंदिर, पीपल ,गाय की पूछ में आरक्षण की बात कही इसलिए नहीं किया होगा , मनोज ने इसमे आर्थिक आधार पर आरक्षण मिलने पर सुदामा को नौकरी मिलेगी गरीब जमींदार के बालक को नहीं की बात कही इसलिए नहीं किया गया होगा , मनोज ने इसमें मनुवाद की बात कही इसलिए नहीं किया गया होगा ! शायद इन सभी या सभी में से किसी एक कारण की वजह से मनुवादियों को बेचैनी हो गई होगी ! खैर ना करें कोई बात नहीं पर हमारे पास इस बहस की विडियो हैं , यू ट्यूब पर आप यह बहस सुन सकते हैं , इसका लिंक मैं यहाँ शेयर कर रहा हूँ , विडियो की पिक्चर क्वालिटी अच्छी नहीं हैं परंतु ऑडियो आप बिलकुल साफ सुन सकते हैं |
 
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ये श्रीमान जी हमारे भिवानी-महिन्द्र्गढ़ लोकसभा क्षेत्र से सांसद है | भिवानी-महिन्द्र्गढ़ लोकसभा में मुख्य दो बड़े तबके है जाट व अहीर (यादव) , अहीर पहले से ही ओबीसी में और जाट अभी ओबीसी कोटे के लिए खो-खो खेल रहे है मतलब कभी ओबीसी कोटे में आ जाते तो कभी निकाल दिये जाते है | कहने का मतलब यह श्रीमान जी जिनकी वोट लेकर सांसद बने है उसमे ओबीसी तबका बड़ा वोट बैंक रहा है परंतु ये बात कर रहे है आर्थिक आधार की ! ऐसा बोल कर सांसद महोदय किस से धोखा कर रहे है ? और किस के लिए काम कर रहे है ? सांसद महोदय ने विधायक या सांसद के लिए स्नातक की डिग्री होने की वकालत की है जाहीर है सांसद महोदय स्नातक ही होंगे ! पर आरक्षण पर सांसद महोदय ने जो तर्क दिया है उससे लगता नहीं के ये स्नातक होंगे ! आर्थिक आधार पर आरक्षण की वकालत करते हुए सांसद महोदय का तर्क है कि जिस परिवार के लोग आगे बढ़ गए है , उसे आरक्षण नहीं मिलना चाहिए | शायद सांसद महोदय को इल्म नहीं है कि ओबीसी आरक्षण में क्रीमी लेयर का भी प्रावधान है मतलब यह अमीर को नहीं मिल सकता |

दूसरी बात , नेता जी का कौम के प्रति भी कसूता प्रेम है , एक तरफ तो जाट आरक्षण को लेकर चल रहे आंदोलन को गलत करार नहीं दिया तो दूसरी तरफ कहते है जातिगत आधार पर आरक्षण की मांग के लिए चल रहे आंदोलन सही नहीं है ! बात कुछ पल्ले नहीं पड़ी के ऐसा बोल कर नेता जी किसे बहका रहे है और किसका साथ दे रहे है ? वैसे सांसद महोदय जाति से जाट है पर इस बयान से लगता है के सांसद महोदय जात-पात में यकीन नहीं रखते इसीलिए सबके लिए आरक्षण की वकालत की है ! पर सांसद महोदय जी जब बात बच्चों के रिश्तों की आती है तब जात-पात क्यों देखते हो ? शुरुआत घर से करो क्यों ऐसे बेतुके बयान दे कर कौम के भविष्य से खिलवाड़ करते हो ? जब हमारी कौम में ही ऐसे लोग बैठे है तो जाट क्यों सांसद राजकुमार सैनी को दोष देते है ? राजकुमार सैनी भी तो यही बोल रहा है कि जाटों को ही क्यों ? देना है तो फिर सबको आर्थिक आधार पर दो ! फर्क इतना है राजकुमार सैनी हमारे खिलाफ खुलकर बोल रहा है और हमारे अपने नीचे नीचे हमारे नस्तर लगा रहे है !

तीसरी बात , नेता जी ने संघ प्रमुख मोहन भागवत के आरक्षण की समीक्षा वाले बयान का समर्थन किया है | नेता जी क्यों न आरक्षण की समीक्षा के साथ साथ सभी नेताओं की चल-अचल संपति की भी समीक्षा की जाए ? क्योंकि हमें सबके इतिहास का पता है कि किसके बाप-दादा के पास क्या था और अब क्या है | अचानक ऐसी क्या तेजी आई के नेताओं की चल-अचल संपतियों के दाम रातों-रात बढ़ गए ? नेता जी यदि आप वाक्य में गरीब के लिए फिक्रमंद है तो इस समीक्षा के मुद्दे को भी उठाओ |
 
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