Return Of Anna Hazare.

Anna is not history, however he himself is no great gun either. The reason why Anna had such a huge success last time was because he had a timely issue of Corruption he fought for with a strong anti incumbency and history is being repeated again.

Land acquisition bill is hot metal and anti incumbency is growing day by day. Do not discount the movement so quick-anna is just a catalyst.

Vikas, in democracy no one is history. Yesterday I was watching the proceedings of parliament and saw how few MPs were holding the entire parliament to ransom and ruling BJP was almost helpless. I am sure after watching this many would support the Chinese system of governance. On one hand we have democracy in which there is talk, talk and talk and protests. On the other hand one has Chinese style governance in which talking is censored and there is work, work and work. Any Tom Dickens can get up in democracy and question the wisdom of the most intelligent person on Earth. Everyone is debating about farmers and the poor farmers are seen nowhere in TV debates. When democracy does not produce results, dictatorial tendencies take birth. Smart people simply move away to other countries where they think they can do better. Everyone wants free things and not many want to pay Taxes. Lately I notice that democracies world over are crumbling. During last two weeks there have been two massive rail accidents in USA also. I have not heard President / congress getting worried about the state of crumbling infrastructure. Europe too is becoming irrelevant and Jihadi Islam is making all peace loving Europeans worried. Everyone talks f human rights, but no one utters a word when Chinese forbid Muslims even to observe Ramadan fast. Everyone feels appalled when ISIS beheads , no one cares when Saudis do the same on daily basis. I find world morally imploding. At personal level I feel that one should learn to survive without governments.

RK^2
 
I heard government is preparing a list of honest officers/public servants and making it public.

Government better make a list of honest and efficient officers. Honest but inefficient officers are worst than dishonest but efficient officers.

RK^2
 
Government better make a list of honest and efficient officers. Honest but inefficient officers are worst than dishonest but efficient officers.

RK^2


Dishonesty in government systems starts from the smallest bribe to the biggest murder scandal and the person/persons involved might be very efficient people in doing any of these crimes and doing their work. Corrupt people may even switch over the type of dishonesty. Everyone has seen such cases throughout ages in Indian system.
So, should such dishonesty in government systems be allowed just because of efficiency?

Efficiency is not a shield for Dishonesty.

We have to accept majority of people are dishonest in nature.
 
Last edited:
Dishonesty in government systems starts from the smallest bribe to the biggest murder scandal and the person/persons involved might be very efficient people in doing any of these crimes and doing their work. Corrupt people may even switch over the type of dishonesty. Everyone has seen such cases throughout ages in Indian system. So, should such dishonesty in people
government systems be allowed just because of efficiency?

Efficiency is not a shield for Dishonesty.

We have to accept majority of people are dishonest in nature.




Main question is : Who should the person serving the government be honest for?
 
Last edited:
Main question is : Who should the person serving the government be honest for?

or all politicians can be honest to each other and no one else?
all people working in any given department are honest to one another and no one else?

To whom is government machinery accountable to?
 
अगर दो महीने के लिए किसान यह कर दे तो लैंड आर्डिनेंस रद्द समझो:
It is about recognizing the consumer power of a farmer by a farmer!
असल तो पूरे देश में, लेकिन फिर भी अगर पंजाब (22 जिले) - हरियाणा (21 जिले) - पश्चिमी उत्तरप्रदेश (करीब 30 जिले) - राजस्थान (33 जिले) व् दिल्ली (9 जिले) यानी कुल 115 जिलों में भी किसान
1) दो महीने के लिए नया ट्रेक्टर खरीदना बंद कर दे तो (करीब 200 से 500 ट्रेक्टर उत्तरी भारत के हर जिले में बिकते हैं), औसतन 300 भी ले लो तो 115 जिलों में 2 महीने में कुल 34500ट्रेक्टर बिकेंगे| औसतन एक नया ट्रेक्टर आता है 4 लाख का, यानी 400000 * 34500 = INR 13800000000 यानी 13 अरब 80 करोड़ का अकेला नुक्सान तो अकेले ट्रेक्टर ना खरीदने से हो जायेगा उद्योपतियों को| और इन दो महीनों में किसान का कुछ बिगड़ना नहीं|
ऐसे ही सोचिये अगर कृषि के ट्रेक्टर के अतिरिक्त बाकी के कृषि उपक्रम भी दो महीने नहीं खरीदे तो अकेले खेती उपक्रम खरीदने के बायकाट से इन उद्योगपतियों को इतना नुकसान होगा कि इनकी बैलेंस सीटें इम्बैलेंस कर जाएँगी और जो यह मुफ्त में किसान की जमीन पर उसकी मर्जी के बिना नजर गढ़ाए बैठे हैं, इनकी नजरें इनकी बैलेंस सीटों में ही उलझ के रह जाएँगी| और इनकी अक्ल ठिकाने आ जाएँगी कि जिसको तुम लूटने की सोचे बैठे हो, उसने सिर्फ दो महीने भी तुमसे सामान नहीं खरीदा तो कहाँ से कहाँ होवोगे तुम| इसलिए इस ग्लोबलाइजेशन (globalization) के जमाने में किसान रुपी कंस्यूमर (consumer) अपनी इस कंस्यूमर पावर (consumer power) को पहचाने और इसका इन व्यापारियों को भी अहसास करवा दे कि कहाँ तुम सरकारों पे दबाव दे के हमें कुचलने पे तुले हो, हम अपनी पे आये तो घर-बैठे-बिठाए ही तुम्हें कुचल देंगे|
2) और ऐसे ही दो महीने के लिए अगर सिर्फ किसान अकेला भी कोई कार-एसयूवी (SUV)-मोटरसाइकिल भी खरीदना बंद कर दे तो आप सब अंदाजा लगा लीजिये कि इन लोगों को दो महीने में कितना बड़ा नुक्सान उठाना पड़ जायेगा|
3) और ऐसे ही दो महीने के लिए अगर सिर्फ किसान अकेला भी कोई वाशिंग मशीन-फ्रिज-कूलर-पंखा यानी घर में काम आने वाली तमाम तरह की मशीनें ना खरीदें तो और किस-किस की मार्किट बैठेगी|
4) और ऐसे ही दो महीने के लिए अगर सिर्फ किसान अकेला भी कोई ज्वैलरी-कपडा-लत्ता-बर्तन ना खरीदे तो इन दो महीनों में और किस-किस के पेटों के पानी हिलेंगे और कितने अरबों-करोड़ों के घाटे व्यापारियों को होंगे|
यहां सिर्फ खाने-पीने के सामान की चीजों के बायकाट को बाहर रख रहा हूँ, क्योंकि हम किसान होते हैं, समाज के पालनहारी हैं हम और अगर खाने-पीने की चीजों का भी बायकाट कर देंगे तो कहीं ऐसा ना हो जाए कि किसी व्यापारी के घर में बच्चे बिना दूध-फल-सब्जी के तरसें| इसलिए एक किसान की इंसानियत को कायम रखते हुए अगर किसान खाने-पीने की चीजों को छोड़ के बाकी तमाम सामान का दो महीने भी खरीदने से बहिष्कार कर देवें तो यही व्यापारी जो आज सरकार पर "भूमि अधिग्रहण" के लिए ऐसा जालिम बिल बनवाने को तुले हैं, खुद ही अपने-आप इसको वापिस करवाने को कहेंगे और किसान का उसके घर बैठे-बैठे निशाना सध जायेगा| यानी लाठी भी नहीं टूटेगी और सांप मरे-का-मरा|
लेख का सार यही है कि किसान अपने आपको लाचार-बेबस ना समझे, इस ग्लोबलाइजेशन के जमाने में अपनी कंस्यूमर पावर को पहचाने| इस बिल को वापिस करवाने के लिए उसकी यह कंस्यूमर पावर ही काफी है; ना कोई रेल रोकने की जरूरत ना रोड जाम करने की, ना दिल्ली घेरने की जरूरत ना जेल भरने या जाने की|
प्रवर्तिगार से यही अरदास है कि हमारे तमाम तरह के किसान संगठनों, पार्टियों में उनकी इस कंस्यूमर पावर की ताकत को पहचानने की नजर डाल दे बस, बाकी सारा काम तो घर बैठे ही हो जायेगा; क्योंकि जब कोई किसान ग्राहक दो महीने के लिए सामान खरीदने ही नहीं जायेगा तो बड़े-बड़े कॉर्पोरेट (corporate) सीईओ (CEO) से ले के डायरेक्टर्स (directors), मैनेजर्स (managers) और सेल्समेन (salemen) तक की नौकरियां हिलने के साथ-साथ बैलेंस सीटें हिलेंगी तो कौन किसानों से पंगा लेने का जोखिम लेगा?
अपील: किसान का युवा बेटा-बेटी अपने तमाम किसान नेताओं, शुभचिंतकों और परिवारों के बड़ों को इस पावर बारे समझाएं और इसपे एक-जुट होने का आह्वान करें| साथ ही सोशल मीडिया पे इसको इतना बड़ा आंदोलन बनाये कि सोशल मीडिया पर बैठी व्यापारी और सरकारी लोगों को उनके इन अन्यायकारी क़दमों पर दोबारा सोचना भी पड़े और इस आर्डिनेंस को वापिस लेने के तमाम कारणों का भी इनको अहसास हो जाए|
पगड़ी संभाल ओये, दुश्मन पहचान ओये! - फूल मलिक
 
अगर दो महीने के लिए किसान यह कर दे तो लैंड आर्डिनेंस रद्द समझो:
It is about recognizing the consumer power of a farmer by a farmer!
असल तो पूरे देश में, लेकिन फिर भी अगर पंजाब (22 जिले) - हरियाणा (21 जिले) - पश्चिमी उत्तरप्रदेश (करीब 30 जिले) - राजस्थान (33 जिले) व् दिल्ली (9 जिले) यानी कुल 115 जिलों में भी किसान
1) दो महीने के लिए नया ट्रेक्टर खरीदना बंद कर दे तो (करीब 200 से 500 ट्रेक्टर उत्तरी भारत के हर जिले में बिकते हैं), औसतन 300 भी ले लो तो 115 जिलों में 2 महीने में कुल 34500ट्रेक्टर बिकेंगे| औसतन एक नया ट्रेक्टर आता है 4 लाख का, यानी 400000 * 34500 = INR 13800000000 यानी 13 अरब 80 करोड़ का अकेला नुक्सान तो अकेले ट्रेक्टर ना खरीदने से हो जायेगा उद्योपतियों को| और इन दो महीनों में किसान का कुछ बिगड़ना नहीं|
ऐसे ही सोचिये अगर कृषि के ट्रेक्टर के अतिरिक्त बाकी के कृषि उपक्रम भी दो महीने नहीं खरीदे तो अकेले खेती उपक्रम खरीदने के बायकाट से इन उद्योगपतियों को इतना नुकसान होगा कि इनकी बैलेंस सीटें इम्बैलेंस कर जाएँगी और जो यह मुफ्त में किसान की जमीन पर उसकी मर्जी के बिना नजर गढ़ाए बैठे हैं, इनकी नजरें इनकी बैलेंस सीटों में ही उलझ के रह जाएँगी| और इनकी अक्ल ठिकाने आ जाएँगी कि जिसको तुम लूटने की सोचे बैठे हो, उसने सिर्फ दो महीने भी तुमसे सामान नहीं खरीदा तो कहाँ से कहाँ होवोगे तुम| इसलिए इस ग्लोबलाइजेशन (globalization) के जमाने में किसान रुपी कंस्यूमर (consumer) अपनी इस कंस्यूमर पावर (consumer power) को पहचाने और इसका इन व्यापारियों को भी अहसास करवा दे कि कहाँ तुम सरकारों पे दबाव दे के हमें कुचलने पे तुले हो, हम अपनी पे आये तो घर-बैठे-बिठाए ही तुम्हें कुचल देंगे|
2) और ऐसे ही दो महीने के लिए अगर सिर्फ किसान अकेला भी कोई कार-एसयूवी (SUV)-मोटरसाइकिल भी खरीदना बंद कर दे तो आप सब अंदाजा लगा लीजिये कि इन लोगों को दो महीने में कितना बड़ा नुक्सान उठाना पड़ जायेगा|
3) और ऐसे ही दो महीने के लिए अगर सिर्फ किसान अकेला भी कोई वाशिंग मशीन-फ्रिज-कूलर-पंखा यानी घर में काम आने वाली तमाम तरह की मशीनें ना खरीदें तो और किस-किस की मार्किट बैठेगी|
4) और ऐसे ही दो महीने के लिए अगर सिर्फ किसान अकेला भी कोई ज्वैलरी-कपडा-लत्ता-बर्तन ना खरीदे तो इन दो महीनों में और किस-किस के पेटों के पानी हिलेंगे और कितने अरबों-करोड़ों के घाटे व्यापारियों को होंगे|
यहां सिर्फ खाने-पीने के सामान की चीजों के बायकाट को बाहर रख रहा हूँ, क्योंकि हम किसान होते हैं, समाज के पालनहारी हैं हम और अगर खाने-पीने की चीजों का भी बायकाट कर देंगे तो कहीं ऐसा ना हो जाए कि किसी व्यापारी के घर में बच्चे बिना दूध-फल-सब्जी के तरसें| इसलिए एक किसान की इंसानियत को कायम रखते हुए अगर किसान खाने-पीने की चीजों को छोड़ के बाकी तमाम सामान का दो महीने भी खरीदने से बहिष्कार कर देवें तो यही व्यापारी जो आज सरकार पर "भूमि अधिग्रहण" के लिए ऐसा जालिम बिल बनवाने को तुले हैं, खुद ही अपने-आप इसको वापिस करवाने को कहेंगे और किसान का उसके घर बैठे-बैठे निशाना सध जायेगा| यानी लाठी भी नहीं टूटेगी और सांप मरे-का-मरा|
लेख का सार यही है कि किसान अपने आपको लाचार-बेबस ना समझे, इस ग्लोबलाइजेशन के जमाने में अपनी कंस्यूमर पावर को पहचाने| इस बिल को वापिस करवाने के लिए उसकी यह कंस्यूमर पावर ही काफी है; ना कोई रेल रोकने की जरूरत ना रोड जाम करने की, ना दिल्ली घेरने की जरूरत ना जेल भरने या जाने की|
प्रवर्तिगार से यही अरदास है कि हमारे तमाम तरह के किसान संगठनों, पार्टियों में उनकी इस कंस्यूमर पावर की ताकत को पहचानने की नजर डाल दे बस, बाकी सारा काम तो घर बैठे ही हो जायेगा; क्योंकि जब कोई किसान ग्राहक दो महीने के लिए सामान खरीदने ही नहीं जायेगा तो बड़े-बड़े कॉर्पोरेट (corporate) सीईओ (CEO) से ले के डायरेक्टर्स (directors), मैनेजर्स (managers) और सेल्समेन (salemen) तक की नौकरियां हिलने के साथ-साथ बैलेंस सीटें हिलेंगी तो कौन किसानों से पंगा लेने का जोखिम लेगा?
अपील: किसान का युवा बेटा-बेटी अपने तमाम किसान नेताओं, शुभचिंतकों और परिवारों के बड़ों को इस पावर बारे समझाएं और इसपे एक-जुट होने का आह्वान करें| साथ ही सोशल मीडिया पे इसको इतना बड़ा आंदोलन बनाये कि सोशल मीडिया पर बैठी व्यापारी और सरकारी लोगों को उनके इन अन्यायकारी क़दमों पर दोबारा सोचना भी पड़े और इस आर्डिनेंस को वापिस लेने के तमाम कारणों का भी इनको अहसास हो जाए|
पगड़ी संभाल ओये, दुश्मन पहचान ओये! - फूल मलिक

Too many ifs in your wish list. You are assuming as if all the farmers in this country are 100% farmers and don't engage in anything else. You are assuming as if all the farmers in this country come from one caste, one region and one religion and vote only on one issue. For a moment let us assume that you are right. Can you please name me one single farmer leader in the country who can unite majority of Indian farmers behind him ? If yes, farmers can have their PM for ever in this country. How about Phool Malik as next PM candidate ?

RK^2
 
Too many ifs in your wish list. You are assuming as if all the farmers in this country are 100% farmers and don't engage in anything else. You are assuming as if all the farmers in this country come from one caste, one region and one religion and vote only on one issue. For a moment let us assume that you are right. Can you please name me one single farmer leader in the country who can unite majority of Indian farmers behind him ? If yes, farmers can have their PM for ever in this country. How about Phool Malik as next PM candidate ?

RK^2
are sir ji, kab tak bjp ko defend karte rahenge uske supporters. pehle Delhi elections mei kiya aur wahan haar gaye aur abb is land acquisition act ke upar.bill to hai hi anti farmer. iss baat ko aap kaise chipate rahoge.
 
Propose some realistic solutions. Do not talk in the air.
अगर दो महीने के लिए किसान यह कर दे तो लैंड आर्डिनेंस रद्द समझो:
It is about recognizing the consumer power of a farmer by a farmer!
असल तो पूरे देश में, लेकिन फिर भी अगर पंजाब (22 जिले) - हरियाणा (21 जिले) - पश्चिमी उत्तरप्रदेश (करीब 30 जिले) - राजस्थान (33 जिले) व् दिल्ली (9 जिले) यानी कुल 115 जिलों में भी किसान
1) दो महीने के लिए नया ट्रेक्टर खरीदना बंद कर दे तो (करीब 200 से 500 ट्रेक्टर उत्तरी भारत के हर जिले में बिकते हैं), औसतन 300 भी ले लो तो 115 जिलों में 2 महीने में कुल 34500ट्रेक्टर बिकेंगे| औसतन एक नया ट्रेक्टर आता है 4 लाख का, यानी 400000 * 34500 = INR 13800000000 यानी 13 अरब 80 करोड़ का अकेला नुक्सान तो अकेले ट्रेक्टर ना खरीदने से हो जायेगा उद्योपतियों को| और इन दो महीनों में किसान का कुछ बिगड़ना नहीं|
ऐसे ही सोचिये अगर कृषि के ट्रेक्टर के अतिरिक्त बाकी के कृषि उपक्रम भी दो महीने नहीं खरीदे तो अकेले खेती उपक्रम खरीदने के बायकाट से इन उद्योगपतियों को इतना नुकसान होगा कि इनकी बैलेंस सीटें इम्बैलेंस कर जाएँगी और जो यह मुफ्त में किसान की जमीन पर उसकी मर्जी के बिना नजर गढ़ाए बैठे हैं, इनकी नजरें इनकी बैलेंस सीटों में ही उलझ के रह जाएँगी| और इनकी अक्ल ठिकाने आ जाएँगी कि जिसको तुम लूटने की सोचे बैठे हो, उसने सिर्फ दो महीने भी तुमसे सामान नहीं खरीदा तो कहाँ से कहाँ होवोगे तुम| इसलिए इस ग्लोबलाइजेशन (globalization) के जमाने में किसान रुपी कंस्यूमर (consumer) अपनी इस कंस्यूमर पावर (consumer power) को पहचाने और इसका इन व्यापारियों को भी अहसास करवा दे कि कहाँ तुम सरकारों पे दबाव दे के हमें कुचलने पे तुले हो, हम अपनी पे आये तो घर-बैठे-बिठाए ही तुम्हें कुचल देंगे|
2) और ऐसे ही दो महीने के लिए अगर सिर्फ किसान अकेला भी कोई कार-एसयूवी (SUV)-मोटरसाइकिल भी खरीदना बंद कर दे तो आप सब अंदाजा लगा लीजिये कि इन लोगों को दो महीने में कितना बड़ा नुक्सान उठाना पड़ जायेगा|
3) और ऐसे ही दो महीने के लिए अगर सिर्फ किसान अकेला भी कोई वाशिंग मशीन-फ्रिज-कूलर-पंखा यानी घर में काम आने वाली तमाम तरह की मशीनें ना खरीदें तो और किस-किस की मार्किट बैठेगी|
4) और ऐसे ही दो महीने के लिए अगर सिर्फ किसान अकेला भी कोई ज्वैलरी-कपडा-लत्ता-बर्तन ना खरीदे तो इन दो महीनों में और किस-किस के पेटों के पानी हिलेंगे और कितने अरबों-करोड़ों के घाटे व्यापारियों को होंगे|
यहां सिर्फ खाने-पीने के सामान की चीजों के बायकाट को बाहर रख रहा हूँ, क्योंकि हम किसान होते हैं, समाज के पालनहारी हैं हम और अगर खाने-पीने की चीजों का भी बायकाट कर देंगे तो कहीं ऐसा ना हो जाए कि किसी व्यापारी के घर में बच्चे बिना दूध-फल-सब्जी के तरसें| इसलिए एक किसान की इंसानियत को कायम रखते हुए अगर किसान खाने-पीने की चीजों को छोड़ के बाकी तमाम सामान का दो महीने भी खरीदने से बहिष्कार कर देवें तो यही व्यापारी जो आज सरकार पर "भूमि अधिग्रहण" के लिए ऐसा जालिम बिल बनवाने को तुले हैं, खुद ही अपने-आप इसको वापिस करवाने को कहेंगे और किसान का उसके घर बैठे-बैठे निशाना सध जायेगा| यानी लाठी भी नहीं टूटेगी और सांप मरे-का-मरा|
लेख का सार यही है कि किसान अपने आपको लाचार-बेबस ना समझे, इस ग्लोबलाइजेशन के जमाने में अपनी कंस्यूमर पावर को पहचाने| इस बिल को वापिस करवाने के लिए उसकी यह कंस्यूमर पावर ही काफी है; ना कोई रेल रोकने की जरूरत ना रोड जाम करने की, ना दिल्ली घेरने की जरूरत ना जेल भरने या जाने की|
प्रवर्तिगार से यही अरदास है कि हमारे तमाम तरह के किसान संगठनों, पार्टियों में उनकी इस कंस्यूमर पावर की ताकत को पहचानने की नजर डाल दे बस, बाकी सारा काम तो घर बैठे ही हो जायेगा; क्योंकि जब कोई किसान ग्राहक दो महीने के लिए सामान खरीदने ही नहीं जायेगा तो बड़े-बड़े कॉर्पोरेट (corporate) सीईओ (CEO) से ले के डायरेक्टर्स (directors), मैनेजर्स (managers) और सेल्समेन (salemen) तक की नौकरियां हिलने के साथ-साथ बैलेंस सीटें हिलेंगी तो कौन किसानों से पंगा लेने का जोखिम लेगा?
अपील: किसान का युवा बेटा-बेटी अपने तमाम किसान नेताओं, शुभचिंतकों और परिवारों के बड़ों को इस पावर बारे समझाएं और इसपे एक-जुट होने का आह्वान करें| साथ ही सोशल मीडिया पे इसको इतना बड़ा आंदोलन बनाये कि सोशल मीडिया पर बैठी व्यापारी और सरकारी लोगों को उनके इन अन्यायकारी क़दमों पर दोबारा सोचना भी पड़े और इस आर्डिनेंस को वापिस लेने के तमाम कारणों का भी इनको अहसास हो जाए|
पगड़ी संभाल ओये, दुश्मन पहचान ओये! - फूल मलिक
 
विकास भी चाहिए और जमीन भी नहीं देनी, यह कैसे होगा?

एक मित्र जो नाम से तो किसानपुत्र लगता है परन्तु विचार से अंधभक्त लगता है, उसने यह जुमला कहा है| मित्र आपकी शंका का जवाब इस प्रकार है:

1) क्या आपने या आपकी सरकार ने इस बात का अध्यन किया है कि जिन पुराने भूमि अधिग्रहण के नियमों के कारण काफी प्रोजेक्टों के लटके होने की दुहाई दी जा रही है, उनमें कितने प्रतिशत सरकारी प्रोजेक्ट लटके हुए हैं और कितने गैर-सरकारी यानि प्राइवेट? कितने लाइन के यानी सड़क की लाइन, रेल की लाइन, नहर की लाइन, बिजली की लाइन व् आर्मी के यानि सरकारी प्रोजेक्ट लटके पड़े हैं और कितने फिर से वही प्राइवेट हाउसिंग व् इंडस्ट्री के प्रोजेक्ट अटके पड़े हैं? और लाइन का तो मैंने कोई विरला ही प्रोजेक्ट अटका सुना है| और अगर कोई अटका भी है तो 95% लाइन को थोड़ा बदल के बना दिए जाते रहे हैं| क्योंकि लाइन के हर प्रोजेक्ट के कम से कम तीन सर्वे होते हैं, प्राथमिकी के आधार पे, कि या तो यहाँ से बनेगी, या यहां से या यहां से| इसलिए लाइन के प्रोजेक्ट में विरला ही कहीं अधिग्रहण की दिक्क्त आती है| पहली बात!

2) दूसरी बात, सरकारी प्रोजेक्टों के लिए तो खुद सरकार सीधी ले या लीज पे ले परन्तु यह प्राइवेट वालों को किसान से जमीन लीज पर लेने में क्या दिक्कत है? लीज पर लेने में उनको किसान से जमीन खरीदनी नहीं होगी कि जिसके लिए उनको लाखों-करोड़ों रूपये एक ही बार में किसान को देने पड़ें, अपितु जमीन किराए पे भी ली जाएगी, जो कि अगर देखो तो कम से कम पहले पचास साल का लीज का किराया तो एक मुस्त दी जाने वाली कीमत से ही निकल जायेगा| परन्तु नहीं इन्होनें तो किसान का शोषण जो करना है, इनको जमीन से थोड़े ही मतलब है|

3) सर छोटूराम और फिर रही-सही कमी जो चौधरी चरण सिंह ने एक किसान को जो तमाम तरह के जमीन से संबंधित मालिकाना हक किसान को दिलाने के लिए जीवन खपाए थे, इस नए आर्डिनेंस से वो सारे हक किसान के हाथ से निकल जायेंगे और किसान पहले की तरह जमींदारी प्रथा के चंगुल में आके साहूकारों के दोहरे चंगुल में फंस जायेगा|

एक इतिहासकार भाई कह रहा था कि अमेरिका में 1930 में इसी तरह का कानून आया था जिसमें कॉर्पोरेट ने लगभग सारी जमीन एक सोची-समझी स्ट्रेटेजी के तहत अपने अधिकार में ले के किसान को उसी जमीन का मजदूर बना के छोड़ दिया था, अब वही अमरीकन नीति भारत में लागू होने वाली है| यह सही है कि यह नीति उसके जैसी ही होगी, लेकिन यहां यह भाई साहब सर छोटूराम का वो क्रेडिट भूल गए जिसके तहत सर छोटूराम ने उसी 1930 के आसपास 1930 से भी पहले यहां जो सदियों से खेती का कॉर्पोरेट रूप यानी जमींदारी प्रथा चली आ रही थी; वह एक बड़ी लड़ाई लड़ के किसानों को उससे मुक्त करवा दिया था| इसलिए आप ऐसा ना कहें कि अमेरिका की तरह करने जा रहे हैं, अपितु यह कहें कि सर छोटूराम के जमाने से पहले यानी तकरीबन एक सदी पहले जो भारत में किसान की हालत थी, इस बिल के जरिये वो वापिस आ रही है| हर बात में अमेरिका को पैमाना बनाना छोड़ के अपने ही इतिहास को पलटोगे तो यह अमेरिका की चीजें तो यहां, उनसे बहुत पुरानी भरी पड़ी हैं| खैर जो भी है, परन्तु वह एक सदी पुरानी किसान की गुलामी फिर से जबाड़ा खोल रही है इसलिए इस बिल का विरोध जरूरी है| और वो हालत कैसे आ रही है, अगले बिंदु में देखो|

4) किसान की मर्जी का क्लॉज़ प्राइवेट सेक्टर के लिए भी हटा देना; जिसमें कि व्यापारी को एकमुश्त फायदा होगा| उसके ऊपर फिर कोर्ट जाने का रास्ता भी बंद किया, यानी सरकारी अफसरों की तानाशाही चलेगी, वो भी क्लास A और B के अफसरों की, जिनमें कि 80% अफसर गैर-किसान जातियों के हैं या ऐसी जातियों के हैं, जिनके यहां सिर्फ आंशिक रूप से खेती करते हैं या ऐसी जातियों के हैं जिनके लिए खेती द्वितीय धंधा रहा है, प्राथमिक नहीं|

और अफसरों के लिए इतिहास में कहावत रही है कि "बनिया हाकिम, ब्राह्मण शाह, जाट मुहासिब जुल्म खुदा"। और अगर आप हरियाणा और वहाँ भी जींद जिले के हैं तो आपने ऐसे ही एक बनिया हाकिम की किसानों पे अत्याचार बारे 1856-58 में हुआ "लजवाना काण्ड" तो सुना होगा; जानकारी के लिए बता दूँ वो काण्ड इतना मशहूर हुआ था कि पटियाला की लोकधुनों में आज भी यह मुखड़ा सुनने को मिल जाता है कि, "लजवाने रे तेरा नाश जाइयो, तैने बड़े वीर खपाए!" तो मित्र, ऐसी-ऐसी जो दुसम्भावनाएं जो यह बिल ले के आ रहा है, उसके लिए इसका विरोध है| और मुझे यह बता दे भाई, जो समाज जात-पात के नाम पर इतना बंटा हुआ हो, और हरियाणा का तो हाल यह हो कि यहां जाट बनाम नॉन-जाट की राजनीती चलती है, तो ऐसे में इस कानून का इस तरीके का दुरूपयोग नहीं होगा, इसके लिए सरकार ने क्या प्रावधान किये हैं?

5) यह आत्मसम्मान की भी बात हो गई है, वो ऐसे| हमारे यहाँ 50% से ज्यादा ऐसे किसान हैं जो अपनी हाड-तोड़ मेहनत से किल्ले-जमीन जोड़ते हैं| किसी ने 10 किल्ले से शुरू करके अपनी हाड़तोड़ मेहनत से 20 बनाये होते हैं| यह मत समझो कि किसान सिर्फ पिता से ही वंशानुगत जमीन पाता है और उसके लिए वो कोई पसीना नहीं बहाता| आधे से ज्यादा किसान उसमें नई जमीन जोड़ते हैं| तो क्या उसकी मेहनत की इतनी ख़ाक के बराबर की कीमत कि उसकी इस हाड़तोड़ मेहनत को कोई भी एक पल में उसकी मर्जी के बिना ही उड़ा ले जायेगा और वो केस भी नहीं कर सकेगा| और ऐसे में ना सरकारी अफसरों द्वारा हो सकने वाले अत्याचार के खिलाफ आवाज उठा पायेगा| नहीं भाई नहीं| एक उद्योगपति से पूछ के देखो कि क्या वो उसकी जीवनभर की कमाई से खड़ी की इंडस्ट्री को ऐसे ही दे देगा किसी को? फर्क सिर्फ इतना ही तो है ना कि उद्योगपति का विकास वर्टीकल होता है और किसान का हॉरिजॉन्टल, परन्तु विकास तो विकास होता है ना?

तो "विकास भी चाहिए और जमीन भी नहीं देनी, यह कैसे होगा?" का यह जुमला बोलने वालों जरा इन पहलुओं पे जवाब दो तो जानूँ| इन सवालों पे एक किसान की शंका मेटो तो जानूँ|

मतलब यह भारत में अपनी ही तरह के व्यापारी पैदा हो रहे हैं, जिनको ग्राहक तो चाहिए परन्तु उसकी सुननी नहीं| इसीलिए आज जरूरी हो गया है कि किसान अपनी कंस्यूमर पावर (consumer power) को पहचाने और जरा लगा दे इनको दो महीने खाने-पीने के सामान को छोड़ के बाकी सारे सामान को खरीदने के बायकाट का झटका|

पगड़ी सँभाल ओये, तेरा लूट गया माल ओये, दुश्मन नू जाण ओये, ओ किसाना सर छोटूराम नूं पुकार ओये! - फूल मलिक
 
Yesterday I was watching the proceedings of parliament and saw how few MPs were holding the entire parliament to ransom and ruling BJP was almost helpless.

I would call it payback time for opposition.

Same BJP did not let a coalition government run for last 3 years, held parliament at ransom for bills they proposed, bills they are supporting now when in government.

Only characters change, core and belief remain the same in parliament and nation loses.
 
Propose some realistic solutions. Do not talk in the air.

What is so unrealistic in this? Gandhi became national baapu initiating the "non-cooperative movement" But if Phool proposes it, he is a "fuddu"......waah ji wah!

Phool bhai ..lage raho, hum (matlab main) aapke saath hain
 
If you think Phool is correct then join him in his efforts. Good Luck!!!!!!!!!!!

What is so unrealistic in this? Gandhi became national baapu initiating the "non-cooperative movement" But if Phool proposes it, he is a "fuddu"......waah ji wah!

Phool bhai ..lage raho, hum (matlab main) aapke saath hain
 
हमारे यहाँ 50% से ज्यादा ऐसे किसान हैं जो अपनी हाड-तोड़ मेहनत से किल्ले-जमीन जोड़ते हैं| किसी ने 10 किल्ले से शुरू करके अपनी हाड़तोड़ मेहनत से 20 बनाये होते हैं| यह मत समझो कि किसान सिर्फ पिता से ही वंशानुगत जमीन पाता है और उसके लिए वो कोई पसीना नहीं बहाता| आधे से ज्यादा किसान उसमें नई जमीन जोड़ते हैं|

Kya bakwaas logic hai diya hai apni baat prove karne ke liye ! aaadhe se jyaada kisaan jis din 10 se 20 kille bana lega us din kisi ka mohtaaz nahi hai..... Peedhiya beet jaati hain 1 naya killa khareedne mein kheti ki kamayi se..... Uper ya bahar ki kamayi hai to alag baat hai !


Aur sab kisaan 10 ke 20 bana leta to ye dharti ab tak to phail kar chaad ke ad jaati ! Rubber hai ? Jatland per cheppe jao faaaltu ke logic....
 
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It is defined under the mechanism of "Land Transfer", aadhe jat 10 ke 20 banaate hain to aadhe aise bhi hai jo kisi buri lat jaise ki nasha-wine ke kaaran 20 ke 10 bhi bana dete hain..... so yah within land transfer ka concept hai, ki us farmer ne bechi aur isne khareedi, yaani bechne waale ki ghati aur khareedne waale ki badhi..... isko samjhne ke liye thoda broad picture mein socho.

Rest I don't mind, there should be few people like you, else who will help us in explaining the things with more weight; thanks for this jockingly sarcastic kind of analysis.

And 10 se 20 banaane ka logic examplary hai, jiske aage yah bhi likha hai ki around 50% farmers apni lands ko double kar lete hain, to us double karne ke point mein sirf 10 se 20 ka hi set nahin aata, 5 se 10 ka, 2 se 4 ka bhi aa jata hai...... aur 20 se 40 ka bhi..... aur iska reverse bhi 20 se 10 ka bhi aur 4 se 2 aur 10 se 5 etc ka bhi....

Iske alawa tumne jo bhi unneccesary stuff bola hai, usko apne paas hi rakho.... aur kahin aur try kiya karo, mere ko fark nahin padta..... koi tujhe baandh ke rakhte hai kya, ki khulte hi JL pe aate ho aur Phool kya post karke gaya hai uspe kya bakwas kaati jaaye usmen lag jaate ho.... kindly have some fair and firm approach in critsizing me.... aise logics se critisize na kiya karo jo agle hi jwaab mein dhadaam se giraye ja saken.... kam se kam aisa criticize to ho jiske response dene mein saamne waale ko bhi maja aaye.

Kaum ki support aur bhale ka jo likha ismen, uspe to assessing words bolne muhaal, critisize karne ke liye portions bhi aise uthate hain jnaab, jinka koi sir na pair! tum us category ke jat ho jinke baare kaha gaya hai ki "Jatda aur Katda apne ko hi maare" aur wo bhi bina kisi vajah.

Arey bhale insaan, ek pal ko tu figures mein tere hi according maan le 50 na sahi 10, 20, 30, 40% kuchh to honge aise kisaan jo haad-tod mehnat se jameen jodte hain ghar mein, aur maine to live example dekhe hain aise logon ke, Jats ne Haryana to Haryana, M.P. Chhattisgarch se le ke Rajsthan tak mein kitni jameen khareed ke apne naam daal li hai pichhle 2 decades mein idea to hoga tujhe?.... to jo maine kaha wo itna hi to kaha ki, "kya aise kisaanon ki life-long haad tod mehnat itni begairat ki unki kamai ko koi bhi bina notice bina consent ke chheen le jayega?".... but jisne post pe bakna hi kachra ho us insaan ko kaun kya samjha le....

Kya bakwaas logic hai diya hai apni baat prove karne ke liye ! aaadhe se jyaada kisaan jis din 10 se 20 kille bana lega us din kisi ka mohtaaz nahi hai..... Peedhiya beet jaati hain 1 naya killa khareedne mein kheti ki kamayi se..... Uper ya bahar ki kamayi hai to alag baat hai !


Aur sab kisaan 10 ke 20 bana leta to ye dharti ab tak to phail kar chaad ke ad jaati ! Rubber hai ? Jatland per cheppe jao faaaltu ke logic....
 
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Chepe ja ! Can not read your lenthy n faaltu ke logic wale posts ! Faaltu ka time hoga tere kenne ! JL ki dekhi jaagi ..... Tu to writer ban jaaga At the expense of others here.


zameeni hakikat ka tujhe kya pata hoga baawli khod ? Poore picchhle 1 saal mein tere apne gaam mein kitne logo ne kille beche er kitno ne khareede! 2-4 se jyaada naam gina dega to tu jo kahega maan lunga !



It is defined under the mechanism of "Land Transfer", aadhe jat 10 ke 20 banaate hain to aadhe aise bhi hai jo kisi buri lat jaise ki nasha-wine ke kaaran 20 ke 10 bhi bana dete hain..... so yah within land transfer ka concept hai, ki us farmer ne bechi aur isne khareedi, yaani bechne waale ki ghati aur khareedne waale ki badhi..... isko samjhne ke liye thoda broad picture mein socho.

Rest I don't mind, there should be few people like you, else who will help us in explaining the things with more weight; thanks for this jockingly sarcastic kind of analysis.

And 10 se 20 banaane ka logic examplary hai, jiske aage yah bhi likha hai ki around 50% farmers apni lands ko double kar lete hain, to us double karne ke point mein sirf 10 se 20 ka hi set nahin aata, 5 se 10 ka, 2 se 4 ka bhi aa jata hai...... aur 20 se 40 ka bhi..... aur iska reverse bhi 20 se 10 ka bhi aur 4 se 2 aur 10 se 5 etc ka bhi....

Iske alawa tumne jo bhi unneccesary stuff bola hai, usko apne paas hi rakho.... aur kahin aur try kiya karo, mere ko fark nahin padta..... koi tujhe baandh ke rakhte hai kya, ki khulte hi JL pe aate ho aur Phool kya post karke gaya hai uspe kya bakwas kaati jaaye usmen lag jaate ho.... kindly have some fair and firm approach in critsizing me.... aise logics se critisize na kiya karo jo agle hi jwaab mein dhadaam se giraye ja saken.... kam se kam aisa criticize to ho jiske response dene mein saamne waale ko bhi maja aaye.

Kaum ki support aur bhale ka jo likha ismen, uspe to assessing words bolne muhaal, critisize karne ke liye portions bhi aise uthate hain jnaab, jinka koi sir na pair! tum us category ke jat ho jinke baare kaha gaya hai ki "Jatda aur Katda apne ko hi maare" aur wo bhi bina kisi vajah.

Arey bhale insaan, ek pal ko tu figures mein tere hi according maan le 50 na sahi 10, 20, 30, 40% kuchh to honge aise kisaan jo haad-tod mehnat se jameen jodte hain ghar mein, aur maine to live example dekhe hain aise logon ke, Jats ne Haryana to Haryana, M.P. Chhattisgarch se le ke Rajsthan tak mein kitni jameen khareed ke apne naam daal li hai pichhle 2 decades mein idea to hoga tujhe?.... to jo maine kaha wo itna hi to kaha ki, "kya aise kisaanon ki life-long haad tod mehnat itni begairat ki unki kamai ko koi bhi bina notice bina consent ke chheen le jayega?".... but jisne post pe bakna hi kachra ho us insaan ko kaun kya samjha le....
 
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