खट्टर को पाकिस्तानी मूल का क्यों कहना पड़ा?
-हवासिंह सांगवान, पूर्व कमांडेंट, मो. 94160-56145
मैं हमारे समाज को याद दिलाना चाहूंगा कि पिछले चुनाव में करनाल की एक रैली में नरेंद्र मोदी ने साफ-साफ कहा कि दबंगों की दबंगई नहीं चलने दी जाएगी। ये शब्द वही थे, जो समाचार-पत्र जाटों के विरोध में काफी समय से इस्तेमाल करते आए तथा हमारे विरोधियों के बयान के आधार पर एनसीबीसी की रिपोर्ट पर जाटों को दबंग कहा गया। इसके बावजूद भी जाट समाज के काफी लोग मोदी की धमकी को नहीं समझे और उन्होंने भावुकता में बहकर भारतीय जनता पार्टी को वोट दिया। भाजपा ने किस प्रकार केंद्र और राज्य में हमारे आरक्षण की सुरक्षा की, यह सबके सामने है।
अभी सितंबर में हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर ने बयान दिया कि जाट तो सब कुछ लाठी के बल पर लेना चाहते हैं। यह सरासर जाट समाज के साथ छेडख़ानी थी और एक कटाक्ष भी था, जो मेरे जैसे व्यक्ति को हजम नहीं हुआ और मैनें तुरंत बयान दिया कि यदि जाट लाठी के बल से ही सब कुछ लेते, तो खट्टर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर न होकर कोई जाट ही होता। उस समय खट्टर ने एक और असहनीय बयान दिया कि हरियाणा के लोग कंधे तक मजबूत होते हैं, ऊपर कमजोर होते हैं। इस बयान से स्पष्ट था कि हम लोग दिमागी तौर पर दिवालिये हैं। यह किसी भी स्वाभिमानी हरियाणवी को हजम होने वाला बयान नहीं था। सबसे बढक़र उन्होंने तो विज्ञान के इस सिद्धांत को भी झुठला दिया कि स्वस्थ शरीर में स्वस्थ दिमाग रहता है। उनका इशारा चाहे स्पष्ट तौर पर जाटों के लिए न हो, लेकिन यह सभी हरियाणवी मूल के लोगों के लिए अपमान था, जिसमें हम सभी शामिल हैं। हरियाणा जाट बाहुल्य प्रदेश है, इसलिए सबसे ज्यादा अपमान भी स्वाभाविक तौर पर जाटों का ही हुआ। हरियाणा राज्य की पहचान जाटों से ही है। मैंने स्वयं अनुभव किया कि हरियाणा के बाहर जाने के बाद किसी भी जाति का व्यक्ति अपने आप को जाट कहलाने पर ही ज्यादा गौरव अनुभव करता है। केवल हिंदू पंजाबियों को छोडक़र। खट्टर के बयान का अप्रत्यक्ष रूप से यह अर्थ निकलता है कि उनकी जाति हरियाणा में केवल छह प्रतिशत है और वे आज 94 प्रतिशत हरियाणवी मूृल के लोगों पर राज कर रहे हैं। यह स्पष्ट तौर पर हरियाणवी लोगों का दिवालियापन ही तो दर्शा रहा है।
मैं निजी तौर पर स्वाभिमानी व्यक्ति हूं। मुझे याद है कि हमारी ट्रेनिंग के दौरान सन् 1970 में मेरे एक साथी बिहारी ने हरियाणा के नाम पर गाली दी, तो मैंने अपने उल्टे हाथ से उसके मुंह पर उल्टा थप्पड़ मारा तो उसकी आंखें सूज गईं, जिसे देखकर हमारे उस्ताद को पता चल गया और हम दोनों को एक दिन के पि_ू की सजा दी गई। इसी प्रकार सन् 1996 में ऑफिसर मैस में बैसाखी की रात की पार्टी में मेरे कमांडेंट ने, मैं द्वितीय कमान अधिकारी होते हुए हरियाणा के बारे में कुछ अपशब्द कहे, जिस पर मैंने उसे बुरी तरह लताड़ा, तो वह पार्टी छोडक़र भाग खड़े हुए और दूसरे दिन प्रात: मुझसे माफी मांगी। मेरे कहने का अर्थ है कि यह स्वाभिमान का प्रश्र होता है। कुछ लोगों की चमड़ी मोटी होती है, जो सहन कर जाते हैं, लेकिन मेरे जैसे लोग इसे अनादर समझकर कभी भी चुप नहीं बैठ सकते।
इसलिए मैंने मीडिया के सामने स्पष्ट बयान दिया कि हरियाणा के मुख्यमंत्री खट्टर पाकिस्तानी मूल के हैं, लेकिन मीडिया ने पाकिस्तानी---पाकिस्तानी कहकर इस मुद्दे को पूरा गर्मा दिया, लेकिन मूल कारण, जिस पर मुझे ये बयान देना पड़ा, दरकिनार कर दिया। मनोहर लाल खट्टर व उसके समाज वाले बिल्कुल भी हरियाणवी नहीं हैं। इस बात की सच्चाई खट्टर के स्वयं के 14 अगस्त के कुरुक्षेत्र में दिए गए बयान से भी साबित होती है, जिसमें उन्होंने अपने समाज की सभा में सभी पंजाबियों को हरियाणवी बनने का आह्वान किया, जिससे स्पष्ट है कि आज तक 68 साल के बाद भी हरियाणवी पंजाबी हरियाणवी नहीं बन पाए। इसी कारण हरियाणवी लोगों को दिमागी तौर पर तुच्छ समझते हैं। कुछ लोगों का यह कहना सरासर गलत है कि ये लोग पाकिस्तान बनने से पहले ही यहां आ गए थे। सच्चाई तो यह है कि ये लोग वहां से आए नहीं थे, बल्कि विशेष कारणों से वहां से मारपीट कर भगाए गए थे, जिसका वर्णन मैं कभी बाद में करूंगा, लेकिन याद रहे, 15 अगस्त, 1947 से पहले इनके लिए कोई भी शरणार्थी कैँप नहीं लगाया गया था। पहला बड़ा शरणार्थी कैंप करनाल में ही लगा था, जहां से इनके छोटे-छोटे शरणार्थी कैंप पंजाब और दिल्ली में लगाकर वहां भेजा गया था। दूसरा याद रहे, अपने ही देश में कभी कोई शरणार्थी नहीं होता, उसे विस्थापित कहा जाता है। जैसे कि आजकल कश्मीरी पंडित और त्रिपुरा में रियांग जाति आदि को। एक हरियाणवी नेता ने मेरे बयान पर अपना बयान दिया कि उसकी मां भी पाकिस्तान से आई थी। इस नेता ने हिंदू पंजाबियों की सहानुभूति बटोरने के लिए बयान दिया था। लेकिन उनको पता होना चाहिए कि यदि उनकी मां पकिस्तान से आई और शरणार्थी कैंपों में रही तो वह भी पाकिस्तानी मूल की ही कहलाएगी। लेकिन ये भी याद रहे कि हमारे काफी लोगों के पाकिस्तान के मिंटगुमरी क्षेत्र में जमीन के मुरब्बे मिले हुए थे, जो पाकिस्तान बनने पर वापिस अपने घर आ गए और उनको मुरब्बे भी यहां मिल गए। यदि ये हिंदू पंजाबी लोग शुरू से ही भारतीय थे, तो फिर भारत के संविधान में इनके लिए अलग से अनुच्छेद 6 की आवश्यकता क्यों पड़ी? अंतर्राष्ट्रीय कानून भी बड़ा स्पष्ट है कि यदि ये लोग पाकिस्तान जाना चाहें, तो वहां जा सकते हैं और इनको दोनों देशों की नागरिकता रखने का भी अधिकार है।
कुछ लोगों ने तर्क दिया कि मनोहर लाल खट्टर हरियाणा में पैदा हुए, इसलिए वे हरियाणवी हैं। ये भी अनुचित है। क्योंकि हरियाणा में लगभग ढ़ाई लाख बिहारी आदि बाहरी मजदूरी रहते हैं, जिनके सैंकड़ों बच्चे हरियाणा में पैदा होते हैं, उन्हें हरियाणवी मूल का नहीं कहा जा सकता। इसलिए कानूनी तौर पर और सिद्धांतिक तौर पर मनोहरलाल खट्टर पाकिस्तानी मूल के हैं और रहेंगे। लेकिन आश्चर्य की बात है कि इन लोगों ने अपने पूर्वजों की जन्मभूमि सरजमीन पाकिस्तान को सम्मान करने की बजाय उससे अपनी नफरत दिखलाई।
जब मैंने बयान दिया तो कई लोगों ने बयान दिए कि मुझे मेरे बयान पर माफी मांगनी चाहिए। इस पर मैंने बयान दिया था कि माफी तो वे लोग मांगें, जिन्होंने और जिनके पूर्वजों ने संयुक्त पंजाब के सदन में मंडी एक्ट की बहस पर कहा था कि ये कानून पास होने पर रोहतक का दो धेले का जाट लखपति पंजाबी बनिये के बराबर जा बैठेगा। इससे भी बढक़र जिन लोगों ने नारे लगाए थे : सर सिकंदर छोटू कंजर। इसलिए मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के अलावा उनके समाज के सभी लोगों को मुझसे माफी मांगनी चाहिए क्योंकि मेरे पुतले जलाने से मनोहर लाल खट्टर का मूल बदली नहीं हो सकता है और न ही पुतला जलाने वालों का।
कुछ लोगों ने कहा कि मेरा ऐसा कहने से हरियसाणा की एकता पर असर पड़ता है तो मैं ऐसे लोगों से पूछना चाहता हूं कि जब से हरियाणा बना है, उसके बाद भी हरियाणा में जगह-जगह पंजाबी सभाएं और पंजाबियत की बात की जाती ही है, तो एकता पर असर क्यों नहीं पड़ा? आश्चर्यजनक बात ये रही कि हमारे ही कुछ आदमी मेरे बयान पर दुकानदारी करने लग गए और मुझसे पूछने लगे कि मेरे बयान से क्या फायदा और नुकसान हुआ? तो मेरा कहना है कि स्वाभिमान के साथ कभी सौदेबाजी नहीं की जा सकती है। यदि ऐसा ही होता तो शहीदे आजम भगतसिंह भी संसद भवन में कभी बम नहीं फोड़ते। वह सरासर भारतीय स्वाभिमान का मसला था। यहां हरियाणवी स्वाभिमान का मसला है। अंतर केवल गुलामी और आजादी का है। मेरे बयान से यह भी स्पष्ट हो गया है कि हमारे समाज में भी बहुत से लोग पत्तल उठाने वाले हैं, लेकिन याद रहे ये पत्तल उठाने वाले लोग पत्तल उठाकर अपने निजी स्वार्थ की पूर्ति तो कर सकते हैं, लेकिन कभी भी समाज की नहीं। वैसे भी मुख्यमंत्री खट्टर से किसी प्रकार की उम्मीद करना नासमझी होगी क्योंकि वे स्वयं भी पाकिस्तानी मूल के लोगों के साथ इंसाफ नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि आज तक उन्होंने केवल अपनी ही जाति खत्री के लोगों को बड़े-बड़े पदों पर नियुक्त किया है, लेकिन अपनी सह जाति अरोड़ा पंजाबी से एक भी नहीं। तो फिर जाट या कोई दूसरा हरियाणवी उनसे क्या उम्मीद कर सकता है?
पूरा जाट समाज देख रहा है कि किस प्रकार जाट अधिकारियों को अच्छे अच्छे पदों से हटाकर कम महत्व के पद दिए जा रहे हैं तथा हरियाणा की सबसे बड़ी जाति जिसकी जनसंख्या हरियाणा में 30 प्रतिशत है, केवल दो मंत्री हैं, जबकि अग्रवाल चार प्रतिशत हैं तो उनके भी दो मंत्री हैं, अहीर पांच प्रतिशत हैं तो उनके भी दो मंत्री हैं और खत्री पंजाबियों की जनसंख्या मात्र तीन प्रतिशत है(अरोड़ा पंजाबी छोडक़र), स्वयं मुख्यमंत्री, एक मंत्री और एक और कैबिनेट रैंक के मंंत्री का दर्जा प्राप्त मुख्य एडवोकेट जनरल शामिल हैं। हरियाणा के आज तक के प्रजातांत्रिक इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ। भजनलाल को जाट विरोधी कहा जाता रहा, लेकिन उनके मंत्रीमंडल में कभी पांच से कम जाट मंत्री नहीं हुए। इससे भी बढक़र हरियाणा में किसानों की जो दुर्गति हो रही है, जिसमें अधिकतर जाट किसान ही हैं, इसके बावजूद भी जाट सोता रहा तो आने वाले समय में उसके अस्तित्व का भी प्रश्र पैदा हो जाएगा, जिसे हमें नहीं भूलना चाहिए।
इससे भी बढक़र भारत वर्ष के 28 राज्यों में उसी के मूल निवासी और भाषाई मुख्यमंत्री हैं, केवल हरियाणा इसका अपवाद है। देश में दो राज्य ऐसे हैं, जो जाति/नस्ल के आधार पर बने हैं, 14 राज्य भाषा के आधार पर बने हैं, शेष 12 राज्य क्षेत्र के आधार पर बने हैं। पंजाब और हरियाणा उन राज्यों में से हैं, जो भाषा के आधार पर बने हैं। पंजाबियों के लिए पंजाब बना और हरियाणवी मूल के लोगों के लिए हरियाणा। फिर हरियाणा में पंजाबी मुख्यमंत्री होने का क्या तर्क है?- यह सरासर सिद्धांतिक और नैतिक तौर पर अनुचित है और हरियाणवी मूल के लोगों का सरासर अपमान है। जाटो का सबसे ज्यादा अपमान है क्योंकि यह जाट बाहुल्य राज्य है। यदि बात को समझते हैं, तो !
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