-- मैडम जी परनाम !
-- और कहो आंटी, कैसे आना हुआ ?
-- अरे कुछ ख़ास नहीं बहुरानी, बस ऐसे ही चले आये हैं, भेंट मुलाक़ात करे का वास्ते.
-- अच्छा अच्छा, मैंने सोचा कोई ख़ास काम होगा.
-- अरे नहीं बहुरानी, तुमलोगों ने हमका जहाँ पहुंचा दिया है, उस से ख़ास काम और का हो सकत है, हमारे जीवन में ?
-- हा हा हा, हाँ आंटी ये बात तो है. चलो आप इसका एहसान मानती हो, ये क्या कम है ?
-- नाहीं बहुरानी, ये एहसान भुलाया नहीं जा सकता. तुमलोगों ने तो मुझे फर्श से अर्श पर पहुंचा दिया है बहुरानी.
-- चाय पियेंगी आंटी ?
-- हाँ जरुर पियेंगे बहुरानी. बोलो कितने कप चाह बनाना है ?
-- अरे आंटी आप ऐसा मत कीजिये न, आप आज जो हैं वहां पहुँच कर ये काम सोभा नहीं देता कि आप चाय बनाएं और हम पियें.
-- अरे नाहीं बहुरानी, इम्दी चाहे जहां पहुँच जाए, उसको आपन औकात नाहीं भुलाना चाहिए. आज हम जे कुछ भी हैं तोहार सासू माँ का सेवा कर के ही बने हैं.
-- हा हा हा, ये बात तो ठीक कह रही हैं आंटी. सासू माँ के बर्तन-भांडा का सेवा कर-कर के आज आप ऐसे जगह पहुँच गयीं कि लोग आपकी सेवा कर रहे हैं.
-- हा हा हा, वही तो कह रहे थे हम. अच्छा बताओ बहुरानी कितने कप चाह बनाना है ?
-- तीन कप बना दो आंटी, एक मेरे लिए, एक अपने लिए, एक राहुल के लिए.
-- ठीक है बहुरानी हम अभी तुरंत ले के आवत हैं.
-- अरे आंटी !
-- का बहुरानी ?
-- मैं तो बताना भूल ही गयी आंटी. दो कप चाय और बढ़ा लो आप. क्यूंकि सुबह फोन आया था कि आज सन्डे है तो प्रियंका और वडेरा भी आते ही होंगे.
-- जी ठीक है बहुरानी
-- और सुनो आंटी.
-- बोलो बहुरानी.
-- जब किचेन में घुस ही गयी हो तो आज कुछ ख़ास नाश्ता भी बना देना प्रियंका और वडेरा के बच्चों के पसंद का.
-- जी ठीक है, आप निश्चिंत रहे बहुरानी. हम अभी फटाफट चाह-नाश्ता लेकर के करके हाज़िर होवत हैं.