Shayari (Part 2)

"बचपन में एक पत्थर तबियत से ऊपर उछाला था कभी,
आज हालात देखकर लगता है,
कहीं वो "ऊपर-वाले" को तो नहीं लग गया !"____________!!!!
 
मैने ही तो मांगी थी, उसके लिए खुशी की दुँआ....!!
मेरे बगैर अब वो खुश है, तो फिर जलन
कैसी.....!!
 
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दिल की खामोशी से..
साँसो के ठहर जाने तक...

मुझे याद आएगा वो शख़्स
मेरे मर जाने तक.!!
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मंज़िलोँ का ग़म करने से मंज़िलेँ नहीँ मिलती..

हौसले भी टूट जाते हैँ अक्सर उदास रहने से.!!
 
उन्होने धक्का दिया था हमें डुबोने के लिए,
अंजाम उसका ये हुआ कि हम तैराक बन गए....
 
ना जाने किसकी दुआओं का इतना असर है मुझ पर
जब कभी डूबता हूँ मै, तो यह दरिया उछाल देता है...
 
कौन कहता है, कि मुसाफिर जख्मी नही होते
रास्ते गवाह है, पर कमबख्त गवाही नही देते.........
 
कसमें, वादे, प्यार वफ़ा चंद सियासी लफ़्ज़ों के सिवा कुछ भी नहीं
चंद किरदार नए, जुमले नए कहानी में मगर नयापन कुछ भी नहीं
थी खिंची तलवारें जिनमें कल तक वो वो आज़ गठजोड़ किये बैठे हैं
देखो भूल कर गाली-गलौच हज़रत रिश्तों को नया मोड़ दिये बैठे हैं
तरक्की मुल्क की हो ना हो क्या फर्क पड़ता है इस अंधे अवाम को
लफ़्फ़ाज़ी से बहलते आए हजूम भला क्या समझेंगे अच्छे-बुरे हुक्काम को
'मासूम' ज़िन्दगी गुज़ार दी यों ही उसूलों का बोझा ढोते ढोते
काश ये उसूल ना होते तो शायद हम भी आज़ वज़ीरे आज़म होते
' मासूम '
 
धारा के साथ चलता तो कब का बह जाता,
इसलिए उलटा चल रहा हूँ एवँ दूसरों को बहते देख रहा हूँ।
 
वो गाँव नही जाता अब दीवाली पर
उसने शहर में घर बना लिया है !!
 
गरीबो के बच्चे भी खाना खा सके त्योहारों में,
तभी तो अब भगवान भी बिक रहें है बाजारों में.
 
कितनी अजीब है मेरे अन्दर की तन्हाई भी,
हजारो अपने है मगर याद तुम ही आते हो...


 
बहुत दूर तक जाना पड़ता है ,
सिर्फ यह जानने के लिए,
नज़दीक कौन है.........
 
अपने गमों की तू यूं नुमायश न कर
अपने नसीब की यूं आजमायश न कर
जो तेरा है, तेरे दर पर आयेगा एक दिन,
हर रोज़ उसके पाने की यूं ख़्वाहिश न कर....
 
ये राहें ले ही जाएँगी मंजिल तक हौंसला रख
कभी सुना है कि अँधेरे ने सुबह होने न दी हो !!
 
वो ""दोस्त"" मेरी नजर में ....
बहुत माएने रखते हैं,
जो वक़्त आने पर मेरे सामने
""आइने"" रखते हैं।
 
कौन कहता है, कि मुसाफिर जख्मी नही होते
रास्ते गवाह है, पर कमबख्त गवाही नही देते.........

Musafiron ne raston ko itna ronda ki wo gawahee bhi nahi de paate... LOL

RK^2
 
कितनी अजीब है मेरे अन्दर की तन्हाई भी,
हजारो अपने है मगर याद तुम ही आते हो...



Jo upne nahi ho paate, wo aksar jiada hi yaad aate hain...
wo aksar jhoote waide karke, kahi door bhaag jate hain

RK^2
 
वादा
मुददत बाद जबउनसे मिले और उन्होने कहा "तुम्हें भूल जाना चाहते है हम"
उस दिन अतीत को कुरेदा, यह सोचकर कि इन्हें अब तक क्यों याद है हम...!!..

Jo upne nahi ho paate, wo aksar jiada hi yaad aate hain...
wo aksar jhoote waide karke, kahi door bhaag jate hain

RK^2
 
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