Shayari (Part 2)

लड़खड़ाई बुढ़िया को उठाने सारे बाजार में कोई ना झुका
गौरी का झुमका क्या गिरा, सारा बाजार घुटनों पर आ गया...
 
गिटार सिखा था जिस को पटाने के लिए ...
आज ऑफर आया है उसकी शादी में
बजाने के लिए !
 
जनाजा मेरा उठ रहा था,
फिर भी तकलीफ थी उसे आने में,
बेवफा घर में बैठी पूछ रही थी,
ओर कितनी देर है दफनाने में?
 
रुई का गद्दा बेच कर
मैंने इक दरी खरीद ली,
ख्वाहिशों को कुछ कम किया मैंने
और ख़ुशी खरीद ली ।

सबने ख़रीदा सोना
मैने इक सुई खरीद ली,
सपनो को बुनने जितनी
डोरी ख़रीद ली ।

मेरी एक खवाहिश मुझसे
मेरे दोस्त ने खरीद ली,
फिर उसकी हंसी से मैंने
अपनी कुछ और ख़ुशी खरीद ली ।

इस ज़माने से सौदा कर
एक ज़िन्दगी खरीद ली,
दिनों को बेचा और
शामें खरीद ली ।

शौक-ए-ज़िन्दगी कमतर से
और कुछ कम किये,
फ़िर सस्ते में ही
"सुकून-ए-ज़िंदगी" खरीद ली ।
 
वो अजब शख्स था ए जिंदगी जिसे समझ कर भी ना समझ सका ,
मुझे चाहता भी गजब का था मुझे छोड़कर भी चला गया !
 
पैबन्ध जब से लग गये अपने लिबास में,
अहसानमन्द लोग भी पहचाते नहीं।।
 
वक़्त नूर को बेनूर बना देता है,
छोटे से जख्म को नासूर बना देता है,
कौन चाहता है अपनों से दूर रहना
पर वक़्त सबको मजबूर बना देता है.
 
परिंदों को मंजिल मिलेंगी यकीनन,
यह फैले हुए उनके पर बोलते हैं,
वोही लोग रहते हैं खामोश अक्सर
ज़माने में जिनके हुनर बोलते हैं।
 
सभी झूठ बिक गए दोपहर तक बाज़ार में …………
और मैं एक सच लिए बैठा रहा शाम तक !!
 
इश्क का समंदर भी क्या
समंदर है...
जो डूब गया वो आशिक...
जो बच गया वो दीवाना !!!
जो तैरता ही रह गया वह पति!!!!
 
वकीलों की शख्सियत
का अन्दाजा क्या लगाओगे,

शमशान से गुज़रते है तो मुर्दे भी उठ कर पूछते है-
"वकील साहब नमस्ते, हमारा केस निपट गया क्या..?"
 
जुनून -ए - शौक आज भी कम नहीं है
मगर वो आज भी बरहम नहीं है

मेरे बर्बादियों के हमनशीं
तुम्हे क्या खुद मुझे भी गम नहीं है

अभी बज्मे -ए - तरब से क्या उठु मै
अभी तो आँख भी पूर्णम नहीं है

बहुत कुछ और भी है जहाँ में
ये दुनिया महज गम ही गम नहीं है

''मजाज़ ''
 
जब जिंदगी ढाेने का मजा ही चला जाए
बेहतर है तब जिंदगी से ताैबा किया जाए
अरसे की मुलाकाताें से जब दूरियां न घटें
तब ताे फासले काे ही बेइंतहा बनाया जाए
 
एक डॉक्टर ने स्वयँ के बारे में कहा - हमारी शख्सियत का अंदाजा तुम क्या लगाओगे गालिब, जब गुजरते हैं कब्रिस्तान से तो मुर्दे भी उठ के पूछ लेते हैं,
डॉक्टर साहब!


अब तो बता दो कि मुझे तकलीफ क्या थी?
 
कितना आसान था, मुझे देखकर मुस्कराना
इतने से काम में तुमने गुजार दिया जमाना
न जाने क्यूं पाल लेता हूं तुमसे ऐसी उम्मीदें
जिन पर हर बार चल जाता है तुम्हारा बहाना
 
सुबह से शाम तलक वे सभी को सह लेते हैं
फिर रोज सुबह अपने माँ बाप बदल लेते हैं
(सांभार:अ म)
 
आँखों का खारा पानी
घावों को सहलाता है
घावों से ही रिसता है
घावों को नहलाता है
-अ म
 
ख़ुद पर भरोसा करना कोई परिंदों से सीखे,
क्योंकि जब वो शाम को
वापस अपने घोंसलों में जाते है,
तो उनकी चौंच में कल के लिए कोई दाना नही होता ........
 
"चुप रहे जुबान ए खंज्जर , छुपता नहीं है इल्जाम।
लेता है लहू का कतरा कतरा कातिल का नाम...।।
 
एक वक़्त था जब हम सोचते थे कि हमारा भी वक़्त आएगा , और
एक ये वक़्त है कि हम सोचते हैं कि वो भी क्या वक़्त था....
 
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