Shayri (Continued)

दर्पण, प्रतिबिंब और मै
हरेक व्यक्ति कोदर्पण मे दूसरा यहाँ उलटा ही लगता है,
मुझे बताओ वह कौन है जो अंधेरे में सीधा भी चलता है।

दूसरों को उलटा देखना बंद करो,पहले खुद की गलतियां दफन करो ।
ये जो सब तुम्हें उलटे लगते हैं, असल में ये सब तुम्हारे प्रतिबिंब हैं||
 
वो स्वयँ ही जान जाते हैं बुलंदी आसमानों की,
पक्षियों को नहीं शिक्षा दी जाती उड़ानों की !
 
जिँदगी भर सूखे पत्तोँ की तरह बिखरे पड़े रहे हम,
मुद्दतोँ बाद किसी ने समेटा भी तो जलाने के लिए ।
 
जिन्दगी जला दी हमने जब जलानी थी.
अब धुएँ पर तमाशा क्यों
और राख पर बहस कैसी?
 
तेर दामन में सितारे होंगे तो होंगे ऐ फ़लक मुझे मेरी माँ की मैली ओढ़नी अच्छी लगी.
 
इन कम्बखत ख्वाइशो का काफिला भी अजीब है |
वही से गुजरता है जहा रास्ता नहीं होता ||
 
जहाँ भूली हुई यादें दामन थाम ले ह्रदय का,
वहाँ से अजनबी बनकर गुज़र जाना ही बेहतर है !
 
बुलंदियो को पाने की ख्वाहिश तो बहुत हैमगर , दूसरों को रौंदने का हुनर कहां से लाऊं?
 
रोये वो इस कदर उनके शव से लिपटकर कि शव स्वयँ उठ कर बोला कि ले तू मर जा पहले, उपर ही चढे जा रहा है इतनी गर्मी में ।
 
''क्या सितम है कि अब तेरी सूरत गौर करने पर याद आती है''
 
मुद्द्तों बाद पूछा उसने कहाँ रहते हो,
हमने पलटकर कहा अपनी औकात मै |
 
किस किस का नाम लूँ मै अपनी बरबादियों में,
जिस जिस ने भी सितम ढाए, वो सब अपने ही थे|
 
" अपने शब्दों में ताकत डालें आवाज में नहीं.बारिश से फूल उगते हैं, तूफ़ान से नहीं....! "
 
आँखों में जब समा गईं आँखें,
बस क़यामत ही ढा गईं आँखें,
उम्र सारी नशे में गुजरेगी,
पल में इतनी पिला गईं आँखें.
 
ऊब ना जाएँ दुनियां भर की ख़ुशी पाकर हम अपनो से !
इसलिए पराये ग़मों को भी हम सीने से लगा कर रखते हैं !!
 
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