Shayri (Continued)

अनपढ़ है मेरे गाँव का, गाय चराने जाये ।पढ़ा लिखा तेरे शहर का, कुत्ते को टहलाये ।।
 
सँवरती है...वो देखकर आईना.....सँवर जाए तो...आईना देखता है...!!
 
जब चलना नहीं आता था, तब गिरने नहीं देते थे लोग,
जब से संभाला स्वयँ को कदम कदम पर गिराने की सोचते हैं लोग !!
 
हमारी प्यास का अंदाज़ भी अलग है,कभी समंदर को ठुकरा देते है, तो कभी आंसू तक पी जाते है...."
 
आज की रात एक ख्वाब मे था |
जैसे उसके जुल्फो की छांव मे था ॥
वो ना हैं मेरी ना हो पाएगी मेरी,
फिर भी नादान - ऐ- दिल इसी ख्वाब मैं था!
जैसे उसके जुल्फो की छांव मे था ॥
शाम ओ सुबह तेरी यादो मैं खोया रहा
पागल दिल समझा नी ये हकीकत नी ख्वाब मैं था,
जैसे उसके जुल्फो की छांव मे था ॥
दिल में उठ ता रहा अरमानो का समुन्द्र ,
और लहरों में फंसता रहा दिल हमारा ,
कोई आएगा बचाने हमे इस तूफ़ान से
हम को क्या पता छेद उसी नाव मैं था।
जैसे उसके जुल्फो की छांव मे था ॥
 
इन मैखाने को भी अब तेरा बफ़ादार पाता हूँ.......
सिर्फ खुद को ही अब खुद का गुनगार पाता हूँ....

एक खता तो कर ही दी मुहबब्त करके ......
पर सजा मै ही क्योँ हर बार पाता हूँ.......
 
अर्थी इसीलिए भारी थी उस निर्धन की,


क्योंकि वो सारी इच्छाएँ अपने साथ लेकर गया।
 
कैद कर दिया साँपों को ये कहकर सपेरे ने,
बस
अब
मनुष्यों को डसने के लिये मनुष्य ही पर्याप्त है !
 
पवन के साथ उड़ गया घर इस नन्हे से पक्षी का,
कैसे बना था घौंसला वो तूफान क्या जाने?
 
बहाना मत तलाश कर शहर में शरीफ होने का.... लोग खामोश तो हैं पर नासमझ नहीं !
 
एक छुपी हुई पहचान रखता हूँ,
बाहर शांत हूँ, अंदर तूफान रखता हूँ.
 
"नींद तो बचपन में आती थी ,
अब तो बस थक कर सो जाते हैं।"
 
एक ही ख़्वाब ख़रीदने मे जिंदगी दाँव पर लग गयी....दुनिया समझती है कि प्यास बुझ गई...
 
चूम कर कफ़न में लिपटें मेरे चेहरे को,उसने तड़प के कहा...'नए कपड़े क्या पहन लिए, हमें देखतेभी नही ।
 
आवारगी छोड़ दी हमने तो लोग भूलने लगे हैं,
वर्ना शोहरत कदम चूमती थी जब हम बदनाम हुआ करते थे !!!
 
बहाना मत तलाश कर शहर में शरीफ होने का.... लोग खामोश तो हैं पर नासमझ नहीं !
Bahane talashne me wale sharafat kaha rakhte hai,
Ye khamosi hi hai jo logo ko nasamaj bana deti hai
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