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तू कहता है किसी को भी तेरा पता नही है,
तुझे ढूँढने की हद तक कोई ढूँढता नही है,
तुझे वीराने के वीरान किसी कोने में ढूंढे,
तू पाने से न मिले तोह खोने में ढूंढे,
तू बुलाने से ना सुने,तू बिन बुलाए ना आए ,
तू होके भी न किसी का ,तोह ना होने में ढूंढे ,
तू पाने से ना मिले तो खोने में ढूंढे,
दुनिया डूबी है हँसी कहकहों में,
तुझे खुशी में नही आँचल भिगूने में ढूंढे,
तू आसमा का नूर नही ज़र्रा नही ज़मीन का ,
दोनों के दरमियाँ हवा के पिरोने में ढूंढे,
तू पाने में न मिले तोह खोने में ढूंढे,
तेरी मोजूदगी का एहसास इनसे होता है ,
तेरे पते है ये सब तू लापता नही है,
तुझे ढूँढने की हद तल कोई ढूँढता नही है.........
तेरी चुप पे भी शक होता है,
तेरी नज़रों पे ऐतबार नही,
तेरी हर शय में प्यार दिखता है,
तेरे जेहन -ओ -दिल में प्यार नही,
तेरा सब इंतज़ार करते हैं,
तुझे किसी का इंतज़ार नही,
तू नशे में समझदार लगता है,
तू आए होश में तो होशियार नही,
तुझपे कोई अपना हक जताए क्यूँकर
तुझे तोह ख़ुद पे इख्तियार नही,
मैं क्या तुझे तोह ख़ुद से भी वास्ता नही है,
तुझे ढूँढने की हद तक कोई ढूँढता नही है.
तू फरेब है,फरेब खाता है ,और फरेब पीता है,
जाने जी के तू मरता है, के मर के जीता है
ना इमान न तुझमे कोई शरम बाकी,
तू किसी का नही सबको बस भरम बाकी,
जो भी पहुँचा है तुझ तक ना मिला तुझ से ,
हमेशा रह गया तुझसे वह दो कदम बाकी,
तू इन दोनों से अलग ही कहीं पे बैठा है,
तुझे छोड़ के या खुशी है,या गम बाकी,
सबने ढूँढा तुझे मंजिलों पे मगर ,
तेरा तोरास्तों पे भी कोई निशाँ नही है,
तुझे ढूँढने की हद तक कोई ढूँढता नही है..............
तू मासूम नही है मगर दिखता है नादान ,
तू हैवान नही ,खुदा नही ,न ही है इंसान ,
तेरी बातें बड़ी लगती हैं पर इतनी बड़ी नही,
की किसी बेजुबान को दे दे अपनी कोई जुबान ,
तुझे बेइन्तीहाँ जानना काफ़ी नही था,
तू निकला बेइन्तीहाँ के आगे भी इन्तीहाँ ,
तू ठंडी सी आग है,या तड़पता कोई इरादा ,
तू आधा पानी है,और पत्थर है आधा,
तू गर्द में ही साफ साफ दिखता है,
जो चमक के दिखे तू वो आइना नही है ,
तुझे ढूँढने की हद तक कोई ढूँढता नही है,
झूठे है तेरे सारे वादे,झूठे हैं सब इरादे,
झूटी हैं सब दुआएं,झूटी हैं फरियादें,
झूठा है तेरा आज ,झूठा है तेरा कल भी,
झूटी है तेरी हर बात ,झूटी है तेरी यादें,
तू शोख है जो हर लम्हा रंग बदलता है,
क्या हुआ जो तेरे रंग है सादे,
तू कौन है,कहाँ से आया है,
गर ये तुझको है मालूम तो तू ही बता दे,
तुझे पता है तुझे ख़ुद का भी नही पता ,
है कौन सा वह रंग जो तुझमे घुला नही है,
तुझे ढूँढने की हद तक कोई ढूँढता नही है..
तू नशा है ,आग है.तड़प है,पर प्यार नही,
तेरा हर लम्हा फुरसत है और तू बेकार नही,
तू नज़रों से खेलता है,नज़रों का बीमार नही,
तू ख़ुद में उलझा है औरों का गरिफ्तार नही,
तेरे होंठो पे नशा ,आंखों में गज़ब की महक,
फिर भी वह आग तेरे सीने में बेदार नही,
तू छु जाए तो रह जाए जुदा सा एहसास,
और एह्सांस से तुझे कोई सरोकार नही,
कोई हसरत न ऐसी जिसकी तुझे हसरत न हो,.
कोई हसरत न ऐसी तेरी जो बेजार नही,
छाया अक्सर उजाले में गहरी दिखती है,
तू दिख जाए किसी को ऐसा साया नही है,
तुझे धुन्धने की हद तक कोई धुन्दता नही है...............
सिसकियों को दबा लेता है तू,
हर लम्हा गुनगुना लेता है तू,
परायों को अपना बना के ,
खूब अपनों की पनाह लेता है तू,
तू एक नकाब ओढ़कर जीता है,
हंस के लबों को सजा लेता है,
तेरी आवाज़ तेरे अंदर ही मर जाती है,
जाने किस तरह उसे बुला लेता है तू,
तू वो तन्हाई जो महफिलों में रहती है,
तेरे सरूर में अब कोई झूमता नही है,
तुझे ढूँढने की हद तक कोई ढूँढता नही है..............
देने को तुने सब को क्या का दिया
मुश्किलें मजबूरियां मर मर के जीना दिया,
किसी को ज़िंदगी दी,मौत दी किसी को
कहीं ज़मीं दी तो कहीं आसमान दिया,
सिन्दूरी सुबह दी कहीं रात का आँचल ओधा दिया,
यानी के कदम कदम पे तुने बस जानेजां दिया,
तेरी पनाह में कितने बेआसरा पड़े हैं
फिर भी कहीं पे तेरा कोई आसरा नही है,
तुझे ढूँढने की हद तक कोई ढूँढता नही है..............
तू जब भी मिलता है हंस के मिलता है,
हाथ मिलाता है,और साथ ही ले जाता है,
महसूस करता है महसूस कराता है,
फिर अपनी और से हर एक रिश्ता निभाता है,
दुनिया के चेहरे पे नही आंखों में सच होता है,
तू तो आंखों से भी झूठा ही नज़र आता है,
ज़िंदगी मौत का फर्क नही दिखता है तुझे,
तभी तो मार्के यूं ज़िंदगी बिताता है ,
तू एक मजबूर सा कुदरत का उलझा ख़याल है,
तू बेहया ढोंगी है और शायर कहलाता है,
तुझे ढूँढ ले किसी में इतना नशा नही है,
तुझे ढूँढने की हद तक कोई ढूँढता नही है...........
तुझे इश्क फिर से कभी हुआ ही नही,
हाँ एक बार तुने इश्क किया है ज़रूर,
किसी नशे का असर न हो तुझ पे,
कोई इअसा ज़हर तुने पिया है ज़रूर,
एक ज़िंदगी में इतना तजुर्बा नही मिलता,
तुने ज़िंदगी को पहले भी जिया है ज़रूर,
जिस्म चीर के शायद रूह को टोला है,
ये इम्तिहान भी तुने दिया है ज़रूर,
तू लाइलाज है तेरी कोई दवा नही है,
तुझे ढूँढने की हद तक कोई ढूँढता नही है.................
रिश्तों की उलझनों में तू अब नही है,
तुझे सिखा सकूं ऐसा कोई सबब नही है,
तू जहाँ आंखों में आयतें पढता था,
उस जहाँ का सुना है कोई मजहब नही है,
तू दिन में भी चाँदनी को ढूँढा करता है,
तेरे जेहन में आख़िर चाँद कब नही है,
तुन बेमतलब,बेमक्साद नही जीना अच्छा ,
थोडी उम्मीद रख ज़िंदगी बस शब नही है,
तू न वक्त न बेवक्त ,ना सदियाँ ,ना लम्हा,
तुझे बाँध ले ऐसा कोई दायरा नही है
तुझे ढूँढने को हद तक कोई ढूँढता नही है.........
मेरे कहने से क्या हो जायेगा,
क्या बयान आसमा हो पायेगा,
सोचती हूँ की क्यों लिखूं तुमको,
ये मर्ज़ बाद में सताएगा,
तुम च;ऐ जाओगे ये लफ्ज़ लेकर,
सुनी किस्मत पे रोना आएगा,
ज़िंदगी यूं जिया नही करते,
मेरे बाद कौन ये समझायेगा,
हाथ पत्थर हैं ,आंखों में लहू आया है,
तुझे और लिख सकूं अब होंसला नही है,
तुझे ढूँढने की हद तक कोई ढूँढता नही है........
तू कहता है किसी को तेरा पता नही है,
तुझे ढूँढने की हद तक कोई ढूँढता नही है...