Shayri (Part 1)

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हमने कब माँगा था उस से अपनी वफाओं का सिला |
वो दर्द देती चली गई ,और मोहब्बत बढती गई ||
 
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"तुम्हें मस्जिद, मुझे मयखाना
वाइजा अपनी-2 किस्मत है"
 
ये मेरा इशक था की दीवानगी की इन्तहा...
तेरे करीब से गुजर गए , तेरे ही ख्यालों में ...
 
सूखे पत्ते की तरह बिखरे हैं हम तो
किसी ने समे्टा तो भी सिर्फ जलाने के लिए
 
Dard se dosti ho gayi hai doston,

Zindagi bedard ho gayi hai doston,

Kya hua jo jal gaya aashiyana humara,

Magar door tak roshni ho gayi hai doston..
 
सूखे पत्ते की तरह बिखरे हैं हम तो
किसी ने समे्टा तो भी सिर्फ जलाने के लिए

भोत-भोत बढ़िया सुलील |

सूखे पत्ते की तरह .............
 
एक शायर ने क्या खूब लिखा हैं...

"ये कौन सा शहर हैं दोस्तों, ये कौन सा दयार हैं"
 
तुम्ही पे मरता है ये दिल,अदावत क्यों नहीं करता ?
कई जन्मों से बंदी है,बगावत क्यों नहीं करता ?
कभी तुमसे थी जो,वो ही शिकायत है ज़माने से,
मेरी तारीफ़ करता है, मोहब्बत क्यों नहीं करता ....​
 
उस वक्त इन्तजार का आलम न पूछिए
जब कह रहा हो कोई बस आ रहा हूँ मैं !!
 
Last edited:
" सुर्ख मैदान में खरी( khari) कश्ती को देखकर लगता है
यक़ीनन यहाँ पे सैलाब आया होगा"

 
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