Shayri (Part 1)

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zindgi! tujhko manaane nikle;
hum bhi kis darzaa deewaane nikle..
kuchh to dushman the mukhaalif -saf mein;
kuchh.. mere dost puraane nikle..
nazar-andaaz kiyaa hai usne;
..khud se milne ke bahaane nikle!
be-basaarat hai ye basti, yaaron!
aaina kisko dikhaane nikle..
in andheron mein jiyoge kab tak;
koi to shamma jalaane nikle.......
AMEER KAZALBASH
mukhaalif- saf=enemy camp;
be-basaarat=blind,drishtiheen
 
dhansati huyee kabron ki taraf dekh liyaa tha;
maan baap ke chehron ki taraf dekh liyaa tha.
daulat se mohabbat to nahi thi mujhe lekin;
..bachchon ne khilonon ki taraf dekh liyaa tha!
us din se bahut tez hawaa chalne lagi hai;
bas maine chiraagon ki taraf dekh liyaa tha.
ab tumko bulandi kabhi achchhi na lagegi;
kyon khaaknasheenon ki taraf dekh liyaa tha.
talwaar to kya.. meri nazar tak nahi utthi;
..us shakhs ke bachchon ki taraf dekh liyaa tha!
MUNAVVAR RANA
 
वक़्त का क्या है किसी पल भी बदल सकता है
हो सके तुम से तो तुम मुझ पे भरोसा ना करो
किर्छियाँ टूटे हुए अक्स की चुभ जाएँगी
और कुछ रोज़ अभी आइना देखा ना करो
अजनबी लगने लगे खुद तुम्हे अपना ही वजूद
अपने दिन रात को इतना भी अकेला ना करो
ख्वाब बच्चों के खिलौनो की तरह होते हैं
ख्वाब देखा ना करो ख्वाब दिखाया ना करो
बे-ख़याली में कभी उंगलियाँ जल जाएँगी
राख गुज़रे हुए लम्हों की कुरेद्दा ना करो
 
जिस दिन से चला हूँ कभी मुड़कर नही देखा
मैने कोई गुजरा हुआ मंज़र नही देखा

पत्थर मुझे कहता है मेरा चाहनेवाला
मैं मोम हूँ उसने मुझे छूकर नही देखा

बेवक़्त अगर जाओंगा सब चोक पड़ेंगे
एक उम्र हुई दिन में कभी घर नही देखा

यह फूल मुझे कोई विरासत में मिले हैं
तुमने मेरा काँटों भरा बिस्तर नही देखा
 
Saza Pe Chhod Diya Jaaza Pe Chhod Diya
Her Ek Kam Ko hum Ne Khuda Pe Chhod Diya


Wo Hum Ko Yaad Rakhe Ya Phir Bhula De
Usi Ka Kam Tha Us Ki Raza Pe Chhod Diya


Ab Us Ki Marzi Bhuja De Ya Jala De
Charagh Hum Ne Jala Ke Hawa Pe Chhod Diya


Ab Us Se Baat Kiye Bagair Kaise Rahenge Hum
Ye Masla Dua Ka Tha So Dua Pe Chhod Diya


Is Liye To Wo Kehte Hain Dewana Hum Ko
Ke Hum Ne Sara Zamana Wafa Pe Chhod Diya
 
Last edited:
कभी उनकी याद आती है कभी उनके ख्व़ाब आते हैं
मुझे सताने के सलीके तो उन्हें बेहिसाब आते हैं ।

कयामत देखनी हो गर चले जाना उस महफिल में
सुना है उस महफिल में वो बेनकाब आते हैं ।
 
सामने है जो उसे लोग बुरा कहते हैं
जिसको देखा ही नही उसको खुदा कहते हैं


ज़िंदगी को भी सिला कहते हैं कहने वाले
जीने वाले तो गुनाहों की सज़ा कहते हैं


फ़ासले उम्र के कुछ और बढ़ा देती है
जाने क्यूँ लोग उसे फिर भी दवा कहते हैं


चाँद मासूम से पत्तों का लहू है
जिसको महबूब के हाथों की हिना कहते हैं
 
फिर आज मुझे तुमको बस इतना बताना है
हसना ही जीवन है हस्ते ही जाना है

मधुबन हो या गुलशन हो पतझड़ हो या सावन हो
हर हाल में इंसान का इक फूल सा जीवन हो
कांटों में उलझ के भी खुश्बू ही लुटाना है
हसना ही जीवन है हस्ते ही जाना है

हर पल जो गुज़र जाए दामन को तो भर जाए
ये सोच के जी लें तो तकदीर संवर जाए
इस उम्र की राहों से खुशियो को चुराना है
हसना ही जीवन है हस्ते ही जाना है

सब दर्द मिटा दे हम, हर गम को सज़ा दे हम
कहते है जिसे जीना दुनिया को सीखा दे हम
ये आज तो अपना है कल भी अपनाना है
हसना ही जीवन है हस्ते ही जाना है
 
मैने जीना कब सीखा था

एक बोतल जो टूट गयी तो
तो महफ़िल सारी रूठ गयी

ये दुनिया एक महफ़िल है
और हम इसके मेहमाँ हैं
हैं कुछ साक़ी और कुछ आशिक़
उम्मीदें हैं ,कुछ अरमाँ हैं

आज अगर कुछ शब्द बहे
तो आखिर दिल से कौन कहे
प्यार वफ़ा कसमें और वादे
अब इनकी पीड़ा कौन सहे

पीड़ा को इतिहास बता कर
पीना मैने अब सीखा है
शायद लोग और कुछ कह दें
पर जीना मैने अब सीखा है
 
दर्द में भी ये लब मुस्कुरा जाते हैं ....!
बीते लम्हे हमें जब भी याद आते हैं ...!
तन्हाइयों में भी सुकून मिलता हे बहुत ,
जब जी भर कर उनकी याद में रो पाते हैं ...!
 
दर्द में भी ये लब मुस्कुरा जाते हैं ....!
बीते लम्हे हमें जब भी याद आते हैं ...!
तन्हाइयों में भी सुकून मिलता हे बहुत ,
जब जी भर कर उनकी याद में रो पाते हैं ...!
Ravinder ji tanhai par hi kuchh line thi collection mai..shayari achi hai aapki..

ढूंढ़ता तन्हाइयों को,
इक खुले आकाश में|
देखता परछाइओं को,
मौत की तलाश में|
आसमां भी रो पड़ा,
ये सोच तनहा है सफ़र|
एक टक वो देखता,
आए कहीं कोई नज़र|
देरों तलक निहारता,
शायद किसी की आस में|
ढूंढ़ता तन्हाइयों को,
इक खुले आकाश में|
चाँद-तारे सब के सब,
जानते हर बात को|
देखा है सबने साथ ही,
आसमां की बरसात को|
भींगतें हैं वो सभी,
रह आसमां के पास में|
ढूंढ़ता तन्हाइयों को,
इक खुले आकाश में|
चातक को है क्या पड़ा?
स्वाति की इक बूंद का|
चकोर भी है बावड़ा,
चाँद की इक धुन्द का|
जाने क्यूँ परेशां हैं सब?
गुमनाम-से इक प्यास में|
ढूंढ़ता तन्हाइयों को,
इक खुले आकाश में|
बुझती चिराग अब,
जोर है तूफान का|
टूटती दिवार अब,
हर पक्के मकान|
पत्थरों में देख करुणा,
जाने जीतें हैं क्यूँ विश्वास में?
ढूंढ़ता तन्हाइयों को,
इक खुले आकाश में|
ऐ दिल तूँ सुन यूँ ना मचल,
ये असर है उनके साथ का|
वादा किया करतें हैं वो,
क्या भरोसा बात का?
तूँ गुम है इतना क्यूँ भला?
दो पल के एहसास में|
ढूंढ़ता तन्हाइयों को,
इक खुले आकाश में|
 
ढूंढ़ता तन्हाइयों को,
इक खुले आकाश में|



भोत बढ़िया हरेंदर ,ये सब मुक्तभोगी ही लिख सकते हैं | [/font]
 
ढूंढ़ता तन्हाइयों को,
इक खुले आकाश में|


भोत बढ़िया हरेंदर ,ये सब मुक्तभोगी ही लिख सकते हैं | [/font]

hahahaha. :) bhukatbhogi... :) bhogna bhi chahiye... nu hi chlae gaye duniya mai te to aana ka kya matlab rah jaayega..
 
hahahaha. :) bhukatbhogi... :) bhogna bhi chahiye... nu hi chlae gaye duniya mai te to aana ka kya matlab rah jaayega..

दुखी ना होवे भाई ,सारी हाण न्यू-ए कोणी चाल्या करदा ,ये सब ते ढलदी -फिरदी छाहँ स |
 
दुखी ना होवे भाई ,सारी हाण न्यू-ए कोणी चाल्या करदा ,ये सब ते ढलदी -फिरदी छाहँ स |

Dukhi naa hu Ravinder ji....bindaas khus hu mai to... u r right sab dhalti firti chhav hoti hai...
lo kuchh aur padho..


नब्जों के आहट की दस्तक,
सांसों के ताने-बाने में|
लिखने को लिखता ही गया मैं,
शब्दों को अनजाने में|
साँसों की कब डोर टूटे,
बस यूँ ही जीता रहता हूँ|
कागज़ के इन टुकडों पर,
बस यूँ लिखता रहता हूँ|
जब मन भी बोझ से दब जाता,
बारिश होती इन आँखों से|
सब छोड़ मैं तन्हाँ खो जाऊ,
खामोशी की शालाखों में|
नींद दर्द को कब आये,
बस यूँ ही जीता रहता हूँ|
कागज़ के इन टुकडों पर,
बस यूँ ही लिखता रहता हूँ|
 
साथ नहीं रहने से रिश्ते नहीं टुटा करते
वक़्त की धुंध से लम्हे नहीं टुटा करते
लोग कहते हे मेरा सपना टूट गया
टूटी नींद है सपने नहीं टुटा करते
 
किदां अखां होर किसे नाळ मिला लिये ,
एहना अखां विच तां ओहदी तस्वीर रेह्न्दी ए .
किदां दिल विच होर किसे नु वसा लिये ,
एस दिल विच तां ओहदे मुड़ ओन दी उमीद रेह्न्दी ए .
किदां रब दा नाम तेया लिये ,
साड्डे लई तां ओही रब सी
ते अज्ज वि बुलियां उत्ते
ओहदे नाम दी जंजीर रेह्न्दी ए ….
 
दिल के दर्द को दिल तोड़ने वाला क्या जाने
प्यार के रिवाजों को ये जमाना क्या जाने ,
होती है कितनी तकलीफ कबर में ,
उप्पर से फूल चढाने वाला क्या जाने
 
किसी को रंगीन बहारें भी मिल जाती हैं
किसी को चमन तक नसीब नहीं होता
किसी की कबर पर खड़े हो जाते हैं ताजमहल
किसी को तो कफ़न तक नसीब नहीं होता
 
जरूरी नहीं की सारी दुनिया अच्छी निकले
जरूरी नहीं की सारी मोह्बतें सच्ची निकले
ऐ खुदा लिख मेरी किस्मत दूसरी कलम से
जरुरी नहीं की दूसरी कलम भी कच्ची निकले
 
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