Shayri (Part 1)

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जिंदगी तो सभी के लिए वही रंगीन किताब है
फरक है तो बस इतना कि
कोई हर पन्ने को दिल से पढ रहा है
ओर कोई दिल रखने के लिए पन्ने पलट रहा है
 
धूप मे निकलो घटाओं मे नहा कर देखो
जिंदगी क्या है किताबो को हटा कर देखो
वो सितारा है यूंहि चमकने दो आँखों मे
क्या जरूरी है उसे जिस्म बना कर देखो
पत्थरों मे भी जुबां होती है दिल होते हैं
अपने घर के दरो दिवार सजा कर देखो
फासला नजरों का धोखा भी हो सकता है
वो मिले या ना मिले, हाथ बढा कर देखो
 
क्या सूरज ऐ हसरत तेरी ओकात हे इस दुनिया में..........
इस रात के बाद भी एक रात ह इस दुनिया में.........
शाख से तोड़े गये फुल ने मुस्कुरा कर ये कहा......
अच्छा होना भी बुरी बात ह इस दुनिया........​
 
कुछ फासले सिर्फ आँखो से होते हैं
दिल के फासले दो बातों से होते हैं
कोई लाख भूलाने की कोशिश करे
पर कुछ रिश्ते खत्म सिर्फ सांसों से होते हैं
 
यहाँ दरख़्तों के साये में धूप लगती है,

चलो यहाँ से चले वहाँ उम्र भर के लिये !​
 
ये किस मोड़ पर ले आई हे, तेरी जुस्तजू ,
पानी में अक्स मेरा हो और नज़र तू आये....!!!​
 
एक तुम्हारी आँखें, एक तुम, एक मेरी मुहब्बत,
कोई तो है इनमे से जो मुझे मरने नहीं देता...​
 
यादें तुम्हारी...बातें हमारी...हमसे रूठ गयी है...
कुछ पीछे छुट गयी है...बहुत शोर के बाद..​
 
मग़रूर तो होना ही था उनको हमारी चाहत की शिद्दत देख कर ...............

मगर वो अपनी क़दर की सोच में हमारी कीमत भूल गया .........​
 
[h=6]हमसे मत पूछिए अब किधर जायेंगे...थक गए हैं बहुत अपने घर जायेंगे...
मौत के डर से नाहक ही परेशान हैं...आप ज़िंदा ही कहाँ हैं जो मर जायेंगे...
[/h]
 
ख्वाबों की अर्थी उठाने के लिए चार काँधे भी नहीं थे मेरे पास,
अपने अरमानों का जनाजा भी तनहा निकाला मैंने.​
 
नहीं ज़रूरत है ज़माने तेरी नश्तर सी चुभती बातों की ,
मेरे आंसुओं सैलाब ही काफ़ी है ,मुझे डुबोने के लिए .....​
 
ये तो जिंदगी की कशमकश में थोड़ा उलझ गये हैं दोस्तो,
वरना हम तो उनमे से हैं....जो दुश्मनों को भी अकेला महसूस नही होने देते ||
 
very nice...........
ये तो जिंदगी की कशमकश में थोड़ा उलझ गये हैं दोस्तो,
वरना हम तो उनमे से हैं....जो दुश्मनों को भी अकेला महसूस नही होने देते ||
 
"उम्र भर चलते रहे, मगर कांधों पे आये कब्र तक,

बस दस कदम के वास्ते गैरों का अहसान हो गया..!!"​
 
अजनबी साया बना और फिर जुदा भी हो गया ,
एक ज़रा सी बात पर इतना खफा भी हो गया |​
 
मौज-ए-तूफ़ाँ मुझे सीने से लगाए रखना
तेरे आग़ोश की लज़्ज़त तो किनारों में नहीं !!!​
 
वही आँगन, वही खिड़की, वही दर याद आता है,
मैं जब भी तन्हा होता हूँ, मुझे तेरा घर याद आता है।​
 
घर भी जालीम ने रवायत से सजा रखा है ;
कही खंज़र तो कही शमशीर लगा रखा है .​
 
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