Shayri (Part 1)

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मसर्रत पे रिवाजों का सख्त पहरा है,
ना जाने कौन सी उम्मीद पे दिल ठहरा है
तेरी आँखों में झलकते हुए इस गम की कसम,
ऐ दोस्त! दर्द का रिश्ता बहुत ही गहरा है...
 
इश्क ने हमसे सब कुछ लूटा कर डाले कंगाल यारों
ना मालूम था यूं गुज़ेगी हमपे अब की साल यारों

आँख में आंसू आहें लबों पर दिल में धुंआ सा उठता है
बेबस है बस जीने को और मरना हुआ है मुहाल यारो

ख्वाब दिखाए थे जो उसने सबके सब वो फर्जी थे
रोज पशेमा करते है अब मुझको मेरे ख्याल यारो

 
तब तक ये सब शायरी , हैं फ़क्त अल्फाज ,
ना हो जब तक दिल में ,दरद -ए अंदाज |
 
ठोकर खाकर भी ना संभले तो मुसाफिर का नसीब,
वरना पत्थर तो अपना फर्ज निभा दिया करते है
 
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मेरे बारे में कोई राय न बना

मेरा वक्त बदल जाएगा ,तो तेरी राय भी बदल जाएगी !!
 
किताबों में दफ़न की हे मेने ,दास्ताँ -ए रुसवाई ,
पर रात होने पर वो , टीस बन कर लौट आई ||
 
उसकी बेरुखी ने छीन ली है शरारत मेरी
लोग समझते हैं कि समझदार हो गया हूँ मैं !!
 
मियाँ ! मैं शेर हूँ, शेरों की गुर्राहट नहीं जाती,
मैं लहज़ा नर्म भी कर लूँ तो झुँझलाहट नहीं जाती ।

किसी दिन बेख़याली में कहीं सच बोल बैठा था,
मैं कोशिश कर चुका हूँ मुँह की कड़वाहट नहीं जाती ।।

मुन्*नवर राणा
 
Heart-touching lines by a married man:
मांग भरने की सजा कुछ इस कदर पा रहा हूँ
की मांग पूरी करते-करते, अब मांग-मांग के खा रहा हूँ...!!!
 
Heart-touching lines by a married man:
मांग भरने की सजा कुछ इस कदर पा रहा हूँ
की मांग पूरी करते-करते, अब मांग-मांग के खा रहा हूँ...!!!

तू इस्सी गलती ना कर दिए |
 
उठती नहीं किसी और की जानिब निगाह मेरी ,

पाबंद कर गयी है किसी की नज़र मुझे |
 
जरूरी तो नहीं, जीने के लिए सहारा हो।
जरूरी तो नहीं, हम जिनके हैं वो हमारा हो।
कुछ कश्तीयां डूब भी जाया करती हैं,
जरूरी तो नहीं हर कश्ती का किनारा हो।
 
[h=6]
कभी लगता है वो दूरियां बढ़ा रहे हैं....
कभी लगता है करीब आ रहे हैं........
कुछ लोग होते हैं आंसुओ की तरह ...
पता ही नहीं चलता , कि साथ दे रहे हैं या छोड़ के जा रहे हैं...
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कभी लगता है वो दूरियां बढ़ा रहे हैं....
कभी लगता है करीब आ रहे हैं........
कुछ लोग होते हैं आंसुओ की तरह ...
पता ही नहीं चलता , कि साथ दे रहे हैं या छोड़ के जा रहे हैं...

कसूती बात कह गया नरवीर, धूमां ठा दिया कति, लाग्या रह नूए
 
तारीख हजारो साल में बस इतनी सी बदली है

तब दौर था पत्थर का........अब लोग पत्थर के है !
 
Hasi ke nagme gaate raho,

waqt nikal kar muskurate raho,

jindgi kab deti hai mauka baar-baar,

mauka dhundo aur khil khilate raho.
 
वो जो शख्स तुझसे पहले यहाँ तख़्त नसीन था,

उसे भी अपने खुदा होने का यकीन था !!
 
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