Shayri (Part 1)

Status
Not open for further replies.
चित्त करे तेरे कोल आके रुक जावां
तेरी बुक्कल विच आके मुक जावां
हंजु बण के बहां तेरे अंख विचों
तेर गोरे गाल ते आके सूख जावां
 
मर मै भी जाणा ते जीणा तेथों वी नी होणा
दिल मेरा टूटणा ते अंखा तेरिया ने वी रोणा
नींद मेरी भी उडणी ते रात नु तू वी नी सोणा
ईश्क मै कित्ता ते वेखी कंवला तू वी होणा
 
वक्त के पन्ने पलटकर
फ़िर वो हसीं लम्हे जीने को दिल चाहता है
कभी मुश्कराते थे सभी दोस्त मिलकर
अब उन्हें साथ देखने को दिल तरस जाता है​
​
 
रेत पर नाम लिखते नहीं
रेत पर लिखे नाम कभी टिकते नहीं
पुराने मित्र कहते हैं पत्थर दिल हैं हम
लेकिन पत्थरों पर लिखे नाम कभी मिटते नहीं.....


 
हमने उस ज़मीन को चूमा जहाँ उनके कदम पड़े...

और वो बेवफा मेरी माँ से आकार बोली .."काकी थारो छोरो माटी खावे है "
 
दोस्त बहुत हैं
मगर दोस्ती का मतलब समझ में न आया,
भीड़ में अजनबी भी अपना कहने लगे
पर जब सहारे के लिए ताका इधर उधर
अपने को अकेला पाया।​
 
बस इक इसी बात पर अहले जमाना खफा हे हमसे.....

लकीरें हम ज़माने से जरा हटके बनाते हैं.!!!
 
खतरा है इस दौर में , बुजदिलो से दिलेर को ..
धोखे से काट लेते है , कुत्ते भी शेर को ।
 
246564_4350134985374_1387046872_n.jpg
 
[h=5]Gehri thi raat, lakin hum khoye nahi,
Dard bahoot tha dil mein, lakin hum roye nahi,
Koi nahi hamara jo puche humse,
Jag rahe ho kisi ke liye, ya kisi ke liye soye hi nahi..!![/h]
 
सलीका हो अगर भीगी पलकों को पढ़ने का ,

तो बहते हुए आंसू अकसर बात करते हैं .
 
ख्वाब भी शायद कांच की तरह कमज़ोर होते है ,

हर रोज बिखर जाते है फक़त एक आँख खुलने से .
 
कभी कहता था मुझको कोई दुआ हू में
आज वो कह गया मुझको की बेवफा हू मे |
वो जी ना पता था एक लम्हा मेरे बगैर
आज कह गया मुझसे की एक सजा हू मे |
 
कभी ना आया वो मेरे साथ चलके
हमेशा गया मुझे बरबाद करके |
अगर कभी आ जाये मेरी मय्यत पे
कह देना अभी सोया हू उसे याद करके |
 
क्या लिखूं क्या न लिखूं आरजू मदहोश है,
आंसू गिरते पन्नों पर और कलम खामोश है.
कभी गर्मी कभी सर्दी ये कुदरत के नज़ारे हैं,
प्यास उनको भी लगती है जो दरिया किनारे हैं.
 
सपने में भी सपने ही नजर आते हैं ,
सपने के प्र्तिबिम्भ में भी "वो" ही नजर आते हैं ---रवि "अतृप्त"
 
खूबियाँ इतनी तो नहीं हम में
की किसी के दिल में घर कर जायेंगे
पर भूलना भी आसन नहीं होगा
ऐसा जरुर कुछ कर जायेंगे
 
चाहा था तुझपे ज़माने भर की खुशिया लुटा दूंगा
तेरे चेहरे की हँसी के लिए खुद को भी मिटा दूंगा |
पर तूने क्यों समझना छोड़ दिया मेरे जज्बातों को
अब आलम ये है की नींद भी नहीं आती रातो को |
कहा चले गए हमारे वो सारे गुजरे हसीन पल
वक़्त है संभल जाओ वरना इनको तरसोगे कल |
मे तो अब भी तन्हा खड़ा हू उसी मोड़ पर
जहा मुझ पर हसकर तुम गये थे छोड़ कर |

-संदीप
 
यारी तो वड्डी कोई ज़गीर नही
ईस तो सोहणी कोई तस्वीर नही
एह तां प्यार दा पिरोया होया कच्चा धागा है
फिर वी ईस तों पक्की कोई जंजीर नही
 
मेरा गाँव

बारिश के बाद
मिटटी की सोंधी खुशबू
लहलहाते खेत
ओर ठंडी हवाए |
मत जाना तू
लौट कर परदेश
लगता है ये कहके
सब मुझे बुलाये ||

जिन्दगी की भागदोड़ मे

सब पीछे छुट गया
खो गया बचपन
ओर गाँव भी छुट गया |
अब एक मेहमान बनकर
यहाँ आता हू लगता है
भीड़ मे अकेला
खुद को पाता हू लगता है ||

चूल्हे पे बनी रोटी

वही बैठ कर खाना
पेट भरने के बाद भी
एक ओर रोटी खाना |
वो सर्दियों मे गन्ने
खेत से चुन के लाना
मेरे कोई ना ले ले
इस डर से थोड़े छुपाना ||

हांड़ी मे बनी सब्जी का

स्वाद अभी बाकी है
कोल्हू के ताजे गुड की
मिठास अभी बाकी है |
मन करता है कि
फिर से छोटा हो जाऊ
ओर अपने गाँव मे
अपना बचपन जी पाऊ ||

--संदीप
 
Status
Not open for further replies.
Back
Top