samarkadian
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''अरे यार!! कुछ नहीं होना इंडिया का ! सिस्टम ही खराब है, सब करप्ट हैं ! ! सारे नेता लोग चोर हैं !! कितना ही कोशिश कर लो यहाँ कुछ नहीं बदलने वाला !! खैर अपने को क्या , छोड़ इन बातो को !! ''
गाहे बगाहे उपरोक्त बाते किसी न किसी के मुखोर्विंद से सुनने को मिल ही जाती है ! नहीं ? आपने अपने अब तक के जीवन में ये सब एक बार तो कहा होगा या सुना होगा और सोचा तो पक्का होगा ! अपनी कमी का सीणक पूछने के लिए सिस्टम एक अच्छी दैवीय दीवार है जो पलट कर कुछ नहीं कहती ! इस गुण के लिए इसे सहनशीलता का नोबल पुरूस्कार तो हर साल मिल ही सकता है !
सरकारों के चेहरे/नाम बदलते हैं किन्तु सिस्टम क्यूँ नहीं बदलता ? क्यूँ की हम ही सरकार बनाते हैं और सोचते हैं अब सिस्टम बदलेगा ! परन्तु वही आगे पाछे नीम तले वाली बात , सिस्टम बदला ही नहीं ढीठ कहीं का ! आपने रोष में, क्रोध में , हताशा में निराशा में कभी न कभी पारी कथाओं सी परिकल्पना तो की ही होगी कि कोई महा-शक्तिशाली योधा अवतरित हो कर भैया इस सिस्टम से निजात दिलवा दे बस ! हाय !! हम दीन - हीन साधारण अकिंचन जनता क्या करे पर ! ऐसा महाशक्तिशाली कोई होता है क्या ?
लेकिन जरा सोचे और जरा सा और सोचे तो समझ में थोडा थोडा आता है की ये तथाकथित चिरकालीन खराब सिस्टम हम ही हैं ! स्वीकार करने में जोर पड़ता है ! नहीं क्या ? मै तो करता हूँ ! आपका पता नहीं ! हमारी अपंग, भीरु मानसिकता इस सिस्टम को सींच कर बल देती है और हम इसके अस्तित्व को अपने से बाहर समझ कर यकीं करने लगते हैं !
बाकी अगर किसी पढ़ने वाले के कुछ विचार हो तो आमंत्रित हैं !
गाहे बगाहे उपरोक्त बाते किसी न किसी के मुखोर्विंद से सुनने को मिल ही जाती है ! नहीं ? आपने अपने अब तक के जीवन में ये सब एक बार तो कहा होगा या सुना होगा और सोचा तो पक्का होगा ! अपनी कमी का सीणक पूछने के लिए सिस्टम एक अच्छी दैवीय दीवार है जो पलट कर कुछ नहीं कहती ! इस गुण के लिए इसे सहनशीलता का नोबल पुरूस्कार तो हर साल मिल ही सकता है !
सरकारों के चेहरे/नाम बदलते हैं किन्तु सिस्टम क्यूँ नहीं बदलता ? क्यूँ की हम ही सरकार बनाते हैं और सोचते हैं अब सिस्टम बदलेगा ! परन्तु वही आगे पाछे नीम तले वाली बात , सिस्टम बदला ही नहीं ढीठ कहीं का ! आपने रोष में, क्रोध में , हताशा में निराशा में कभी न कभी पारी कथाओं सी परिकल्पना तो की ही होगी कि कोई महा-शक्तिशाली योधा अवतरित हो कर भैया इस सिस्टम से निजात दिलवा दे बस ! हाय !! हम दीन - हीन साधारण अकिंचन जनता क्या करे पर ! ऐसा महाशक्तिशाली कोई होता है क्या ?
लेकिन जरा सोचे और जरा सा और सोचे तो समझ में थोडा थोडा आता है की ये तथाकथित चिरकालीन खराब सिस्टम हम ही हैं ! स्वीकार करने में जोर पड़ता है ! नहीं क्या ? मै तो करता हूँ ! आपका पता नहीं ! हमारी अपंग, भीरु मानसिकता इस सिस्टम को सींच कर बल देती है और हम इसके अस्तित्व को अपने से बाहर समझ कर यकीं करने लगते हैं !
बाकी अगर किसी पढ़ने वाले के कुछ विचार हो तो आमंत्रित हैं !
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