Teri Shohrat !

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vijay

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तेरी शोहरत

गुप्तगू महज़ तेरी वफ़ा पर ही मुख्तसर नहीं हुई
वो शोखियाँ भी तो अब नहीं रही तेरे जमाल में ||

सुना है शहर में हर तरफ़ चर्चे है तेरी शोहरत के
जब कोई परवाना झुलस गया था तेरे जलाल में ||

पल भर में कैसे बिखर जाती वो बरसों की चाहत
एक ज़माना लग जाता है हसरतों के इंतकाल में ||

सच्ची मोहब्बत के आगे झुक जाती है ये कायनात
न जाने कितने बरबाद हो गए इसी मायाजाल में ||

मेरी ज़िन्दगी में आते तो कुछ और ही बात होती
किसी की उमर अब नहीं गुजरेगी इस मलाल में ||

देर से ही सही पर सारा वहम तो निकल गया
अब कौन अपना सुकून ढूंढ़ता है तेरे विसाल में ||

तुझ पर कोई इल्जाम ना लगाए मेरी बर्बादी का
परवरिश का असर नजर आता है मेरे ख्याल में ||

ये हुस्न का गुरुर तुमसे और क्या नहीं करवाएगा
तेरे तमाम जवाब शामिल हैं 'विजय' के सवाल में ||



जमाल = सुन्दरता, व्यक्तित्व
जलाल = तेज, प्रताप
इंतकाल = मौत
विसाल = मिलन

:)
 
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ज़मीं पे चल न सका आसमाँ से भी गया
कटा के पर को परिंदा उड़ान से भी गया


तबाह कर गई पक्के मकान की ख्वाहिश
मैं अपने गाँव के कच्चे मकान से भी गया


पराई आग में ख़ुद क्या मिला तुझ को
उसे बचा न सका अपनी जान से भी गया


भुलाना चाह तो भुलाने की इन्तहा कर दी
वो शख्स अब मेरे वहम -ओ -गुमान से भी गया


किसी के हाथ का निकला हुआ वो तीर हूँ मैं
हदफ़ को छू न सका और कमान से भी गया

 
तुम्हारे शहर का मौसम बड़ा सुहाना लगे
मैं एक शाम चुरा लूँ अगर बुरा ना लगे


तुम्हारे बस में अगर हो तो भूल जाओ हमें
तुम्हें भूलाने में शायद मुझे ज़माना लगे


हमारे प्यार से जलने लगी है ये दुनिया
दुआ करो किसी दुश्मन की बद दुआ ना लगे


ना जाने क्या है उस की बेबाक आँखों में
वो मूंह छुपा के जाये भी तो बेवफा लगे


जो डूबना है तो इतने सुकून से डूबो
के आस पास की लहरों को भी पता ना लगे


हो जिस अदा से मेरे साथ बेवफाई कर
के तेरे बाद मुझे कोई बेवफा ना लगे


वो फूल जो मेरे दामन से हो गए मंसूब
ख़ुदा करे उन्हें बाज़ार की हवा ना लगे


तुम आँख मूंद के पी जाओ ज़िन्दगी 'कैसर'
के एक घूँट में शायद ये बद मज़ा ना लगे


'कैसर'
 
अज़ब अपना हाल होता जो विसाल -ऐ -यार होता
कभी जाँ सदके होती कभी दिल निसार होता


ना मज़ा है दुश्मनी में ना है लुत्फ़ दोस्ती में
कोई गैर गैर होता कोई यार यार होता


ये मज़ा था दिल्लगी का के बराबर आग लगती
ना तुम्हें क़रार होता ना हमें क़रार होता


तेरे वादे पर सितमगर अभी और सब्र करते
अगर अपनी ज़िन्दगी का हमें ऐतबार होता



दाग़ देहलवी
 
awesome............very nice anjali g........!!!
ज़मीं पे चल न सका आसमाँ से भी गया
कटा के पर को परिंदा उड़ान से भी गया


तबाह कर गई पक्के मकान की ख्वाहिश
मैं अपने गाँव के कच्चे मकान से भी गया


पराई आग में ख़ुद क्या मिला तुझ को
उसे बचा न सका अपनी जान से भी गया


भुलाना चाह तो भुलाने की इन्तहा कर दी
वो शख्स अब मेरे वहम -ओ -गुमान से भी गया


किसी के हाथ का निकला हुआ वो तीर हूँ मैं
हदफ़ को छू न सका और कमान से भी गया
 
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