तेरी शोहरत
गुप्तगू महज़ तेरी वफ़ा पर ही मुख्तसर नहीं हुई
वो शोखियाँ भी तो अब नहीं रही तेरे जमाल में ||
सुना है शहर में हर तरफ़ चर्चे है तेरी शोहरत के
जब कोई परवाना झुलस गया था तेरे जलाल में ||
पल भर में कैसे बिखर जाती वो बरसों की चाहत
एक ज़माना लग जाता है हसरतों के इंतकाल में ||
सच्ची मोहब्बत के आगे झुक जाती है ये कायनात
न जाने कितने बरबाद हो गए इसी मायाजाल में ||
मेरी ज़िन्दगी में आते तो कुछ और ही बात होती
किसी की उमर अब नहीं गुजरेगी इस मलाल में ||
देर से ही सही पर सारा वहम तो निकल गया
अब कौन अपना सुकून ढूंढ़ता है तेरे विसाल में ||
तुझ पर कोई इल्जाम ना लगाए मेरी बर्बादी का
परवरिश का असर नजर आता है मेरे ख्याल में ||
ये हुस्न का गुरुर तुमसे और क्या नहीं करवाएगा
तेरे तमाम जवाब शामिल हैं 'विजय' के सवाल में ||
जमाल = सुन्दरता, व्यक्तित्व
जलाल = तेज, प्रताप
इंतकाल = मौत
विसाल = मिलन
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