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"ए-बी-सी-डी" का चक्रव्यूह
बात बहुत पुरानी नहीं, केवल कुछ सौ साल पहले की है । दुनियां एशिया, यूरोप और अफ्रीका तक ही सिमटी हुई थी । बाद में तीन विशाल महाद्वीप मिल गए जो समुद्र के कारण शेष भाग से कटे हुए थे - उत्तर अमरीका, दक्षिण अमरीका और आस्ट्रेलिया-न्यूजीलैंड । यूरोपीय साम्राज्य पूरी दुनियां में फैला - अफ्रीका, भारत आदि में भी । और उन तीन महाद्वीपों पर भी उनका कब्जा हो गया । अगर हम भारतीयों के पास उस समय नौसेना और समुद्री शक्ति होती तो आज हम भी आधी दुनियां पर राज कर रहे होते । पर बाद में हमारे लोग भी बाहर गए और आज भी जा रहे हैं, पहले खेतिहर मजदूर बनकर जाते थे और आजकल कुशल कारीगर (Professionals) बनकर जा रहे हैं ।
यहां बात उन भारतीयों की हो रही है जो अमेरिका में बसे हुए हैं । काफी संशय, असमंजस, ऊहापोह में जी रहे है - "क्या करूं, क्या न करूं" वाली हालत में । उन्होंने अपना नाम खुद ही रख लिया है - "ABCD" यानी "American Born Confused Desi". यहां रहें या भारत वापस चले जायें ? बच्चों को कहां पढ़ायें - यहां या भारत में ? अपने पैसे को कहां 'इन्वेस्ट' करें ? अमरीकन डालर अच्छा लगता है पर वहां की “कल्चर” रास नहीं आती - यानी मीठा-मीठा गप-गप और कड़वा-कड़वा थू ! वहां के स्कूलों में पढ़कर बच्चे “बिगड़ रहे हैं” । एक साहब को मैं जानता हूं जो अपने दो बच्चों को भारत के एक ‘इंग्लिश स्कूल’ में पढाते हैं । उनके मां-बाप ने पूछा - बेटा, अमरीका में क्या इंग्लिश स्कूल नहीं होते या वहां की अंग्रेजी अच्छी नहीं है ? फिर वहां की यूनिवर्सिटी क्यूं अच्छी मानी जाती है ?
दरअसल बात पढ़ाई या कल्चर की नहीं है । अधिकतर अमेरिकन स्कूलों में शिक्षा बिल्कुल मुफ्त दी जाती है - लंच, ट्रान्सपोर्ट आदि भी फ्री है - जबकि भारत के प्राइवेट स्कूल लूटने में लगे हैं । पर ABCD को इसी में फायदा लगता है कि बच्चे भारत में पढ़ें। मां-बाप दोनों नौकरी या व्यवसाय करते हैं - फिर घर पर बच्चों को कौन संभाले ? बहुत से तो भारत से अपने मां-बाप या किसी बड़े-बूढ़े नजदीकी रिश्तेदार को बुला लेते हैं, पर वे जल्दी ही बोर हो जाते हैं और भारत वापस आ जाते हैं । इसकी झलक आप फिल्म “परदेस” में देख सकते हैं । कोई ‘बेबी-सिटर’ या नौकर-चाकर रखना बहुत महंगा सौदा है । इसलिए एक शार्ट-कट ढूंढ़ लिया - बच्चों को भारत में रिश्तेदारों के पास छोड़ो या किसी बोर्डिंग स्कूल में दाखिल करवा दो, यहां डालर कमाते रहो और कुछ खर्चा भारत भेजते रहो।
लड़का बड़ा होने पर शादी की चिन्ता - दूल्हन 'इंडिया' से लायें या यहीं जुगाड़ कर लें ? और अगर लड़की हुई तो और भी चिन्ता – भारत में तो वह वापस आने से रही और भारत में पढ़ा-लिखा और पला हुआ लड़का उसको पसंद ही नहीं आयेगा और अमेरिका में कोई “सूटेबल मैच” मिलेगा नहीं । पिछले दिनों मैने जाटलैंड मैट्रिमोनियल में एक ‘एड’ देखी जो अभी गायब हो चुकी है - "Wanted a Jat boy raised in USA". जी चाहा लिख दूं –“क्यूं, देसी पढ़े-लिखे छोरे के थारै बुड़के मारैं सैं ?”
न्यू-यार्क में रहने वाले एक ग्रीन कार्ड वाले सरदार जी को कई साल बाद भारत आने की सूझी, टिकट वगैरा बुक करा लिया और पहुंच गए JFK एयरपोर्ट । वहां जब पासपोर्ट दिखाया तो पता चला कि उसकी अवधि काफी पहले ही समाप्त हो चुकी है । झुंझलाते हुए वापस आए और अगले दिन पहुंच गए भारतीय कोंसुलेट । वहां पासपोर्ट जमा करवाया तो उनको चार दिन बाद आने को कहा गया । बस हो गए गर्म - आज ही इसको ‘रिन्यू’ करने में आपको क्या तकलीफ है ? फिर शाम को उन्होंने मुझे फोन किया कि मेरी मदद करो और कांसुलेट में किसी को कह कर मेरा पासपोर्ट जल्दी बनवा दो । जब मैने वहां अपने दोस्त से बात की तो उसने बताया कि यह तो रोज का तमाशा है, आप क्यूं फिक्र करते हैं - अगर किसी का पासपोर्ट समाप्त हुए सालों हो जायें तो गलती किसकी है ? अपने देसी आदमी अमरीकन वीजा के लिए महीनों तक और ग्रीन कार्ड के लिए सालों तक लाइन में लगने को तैयार हैं, वहां चूं भी नहीं करते, पर हम अगर उनके पासपोर्ट वगैरा पर दो-चार दिन का टाइम ले लें तो आसमान सिर पर उठा लेते हैं । अमरीकन एक वीजा के सैंकड़ों डालर वसूल कर लें तो खुशी-खुशी दे देते हैं पर भारत सरकार थोड़ी सी पासपोर्ट फीस बढ़ाती है तो हाय-तोबा मचाते हैं ।
.....Continued
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"ए-बी-सी-डी" का चक्रव्यूह
बात बहुत पुरानी नहीं, केवल कुछ सौ साल पहले की है । दुनियां एशिया, यूरोप और अफ्रीका तक ही सिमटी हुई थी । बाद में तीन विशाल महाद्वीप मिल गए जो समुद्र के कारण शेष भाग से कटे हुए थे - उत्तर अमरीका, दक्षिण अमरीका और आस्ट्रेलिया-न्यूजीलैंड । यूरोपीय साम्राज्य पूरी दुनियां में फैला - अफ्रीका, भारत आदि में भी । और उन तीन महाद्वीपों पर भी उनका कब्जा हो गया । अगर हम भारतीयों के पास उस समय नौसेना और समुद्री शक्ति होती तो आज हम भी आधी दुनियां पर राज कर रहे होते । पर बाद में हमारे लोग भी बाहर गए और आज भी जा रहे हैं, पहले खेतिहर मजदूर बनकर जाते थे और आजकल कुशल कारीगर (Professionals) बनकर जा रहे हैं ।
यहां बात उन भारतीयों की हो रही है जो अमेरिका में बसे हुए हैं । काफी संशय, असमंजस, ऊहापोह में जी रहे है - "क्या करूं, क्या न करूं" वाली हालत में । उन्होंने अपना नाम खुद ही रख लिया है - "ABCD" यानी "American Born Confused Desi". यहां रहें या भारत वापस चले जायें ? बच्चों को कहां पढ़ायें - यहां या भारत में ? अपने पैसे को कहां 'इन्वेस्ट' करें ? अमरीकन डालर अच्छा लगता है पर वहां की “कल्चर” रास नहीं आती - यानी मीठा-मीठा गप-गप और कड़वा-कड़वा थू ! वहां के स्कूलों में पढ़कर बच्चे “बिगड़ रहे हैं” । एक साहब को मैं जानता हूं जो अपने दो बच्चों को भारत के एक ‘इंग्लिश स्कूल’ में पढाते हैं । उनके मां-बाप ने पूछा - बेटा, अमरीका में क्या इंग्लिश स्कूल नहीं होते या वहां की अंग्रेजी अच्छी नहीं है ? फिर वहां की यूनिवर्सिटी क्यूं अच्छी मानी जाती है ?
दरअसल बात पढ़ाई या कल्चर की नहीं है । अधिकतर अमेरिकन स्कूलों में शिक्षा बिल्कुल मुफ्त दी जाती है - लंच, ट्रान्सपोर्ट आदि भी फ्री है - जबकि भारत के प्राइवेट स्कूल लूटने में लगे हैं । पर ABCD को इसी में फायदा लगता है कि बच्चे भारत में पढ़ें। मां-बाप दोनों नौकरी या व्यवसाय करते हैं - फिर घर पर बच्चों को कौन संभाले ? बहुत से तो भारत से अपने मां-बाप या किसी बड़े-बूढ़े नजदीकी रिश्तेदार को बुला लेते हैं, पर वे जल्दी ही बोर हो जाते हैं और भारत वापस आ जाते हैं । इसकी झलक आप फिल्म “परदेस” में देख सकते हैं । कोई ‘बेबी-सिटर’ या नौकर-चाकर रखना बहुत महंगा सौदा है । इसलिए एक शार्ट-कट ढूंढ़ लिया - बच्चों को भारत में रिश्तेदारों के पास छोड़ो या किसी बोर्डिंग स्कूल में दाखिल करवा दो, यहां डालर कमाते रहो और कुछ खर्चा भारत भेजते रहो।
लड़का बड़ा होने पर शादी की चिन्ता - दूल्हन 'इंडिया' से लायें या यहीं जुगाड़ कर लें ? और अगर लड़की हुई तो और भी चिन्ता – भारत में तो वह वापस आने से रही और भारत में पढ़ा-लिखा और पला हुआ लड़का उसको पसंद ही नहीं आयेगा और अमेरिका में कोई “सूटेबल मैच” मिलेगा नहीं । पिछले दिनों मैने जाटलैंड मैट्रिमोनियल में एक ‘एड’ देखी जो अभी गायब हो चुकी है - "Wanted a Jat boy raised in USA". जी चाहा लिख दूं –“क्यूं, देसी पढ़े-लिखे छोरे के थारै बुड़के मारैं सैं ?”
न्यू-यार्क में रहने वाले एक ग्रीन कार्ड वाले सरदार जी को कई साल बाद भारत आने की सूझी, टिकट वगैरा बुक करा लिया और पहुंच गए JFK एयरपोर्ट । वहां जब पासपोर्ट दिखाया तो पता चला कि उसकी अवधि काफी पहले ही समाप्त हो चुकी है । झुंझलाते हुए वापस आए और अगले दिन पहुंच गए भारतीय कोंसुलेट । वहां पासपोर्ट जमा करवाया तो उनको चार दिन बाद आने को कहा गया । बस हो गए गर्म - आज ही इसको ‘रिन्यू’ करने में आपको क्या तकलीफ है ? फिर शाम को उन्होंने मुझे फोन किया कि मेरी मदद करो और कांसुलेट में किसी को कह कर मेरा पासपोर्ट जल्दी बनवा दो । जब मैने वहां अपने दोस्त से बात की तो उसने बताया कि यह तो रोज का तमाशा है, आप क्यूं फिक्र करते हैं - अगर किसी का पासपोर्ट समाप्त हुए सालों हो जायें तो गलती किसकी है ? अपने देसी आदमी अमरीकन वीजा के लिए महीनों तक और ग्रीन कार्ड के लिए सालों तक लाइन में लगने को तैयार हैं, वहां चूं भी नहीं करते, पर हम अगर उनके पासपोर्ट वगैरा पर दो-चार दिन का टाइम ले लें तो आसमान सिर पर उठा लेते हैं । अमरीकन एक वीजा के सैंकड़ों डालर वसूल कर लें तो खुशी-खुशी दे देते हैं पर भारत सरकार थोड़ी सी पासपोर्ट फीस बढ़ाती है तो हाय-तोबा मचाते हैं ।
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