The famous Jat people

Balbir Singh Mor

Balbir Singh Mor - A renowned advocate of Supreme Court of India has been recently appointed as Additional Advocate General by the Haryana Government. He has experience of 35 years in this field. He passed LLB from Delhi University Campus Law Centre in 1972.

Reference - Jat Jyoti, January 2008, p. 39
 
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H.K. Singh (Hemant Krishan Singh) - A senior officer of the Indian Foreign Service. He has been India's Ambassador to Indonesia and Colombia. Also served as India's Deputy Permanent Representative at the Indian Mission to the UN in Geneva (Switzerland). Currently, he is India's Ambassador to Japan.

His gotra is 'Dalal' and he hails from Jakhodha village, near Bahadurgarh (Haryana).
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Ch Virender Singh Ex commissioner MCD Delhi.
Ch Sompal Shastri : his profile is present in Jatland wiki but nobody discussed him in this thread.We need more politicians like him.
 
Deswalji namaskar,

I created two pages on Jatland Wiki

http://www.jatland.com/home/Jakhodha

http://www.jatland.com/home/Hemant_Krishan_Singh

Can you expand them and put some images?

Regards,


Thanks, Burdak ji. Ambassador H.K. Singh's bio data, along with his photograph, is available on the web-page of the Embassy of India, Tokyo, at the following URL:

http://www.embassyofindiajapan.org/message02.html

This information may be exclusively used on the newly-created pages.
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famou jats

The Jat caste has produced a number of heroic persons who have put their life and families at risk and kept the pride and values like truth, freedom, equality, loyalty etc. intact. They struggled for the cause of the common people and their upliftment. Here is list of such famous Jat people:

Baldev Ram Mirdha
Bhim Singh Dahiya
Captain Bhagwan Singh
Captain Dilip Singh Ahalawat
Chaudhari Charan Singh
Chaudhari Chhotu Ram
Chaudhari Devi Lal
Col.G.S. Dhillon
Dhanna Bhagat
Dharmendra (Actor)
Dr. Bal Ram Jakhar
Dr. Sarup Singh
Gyan Prakash Pilania
Justice Mahavir Singh
Kunwar Natwar Singh
Maharaja Bhim Singh Rana
Maharaja Ranjit Singh
Maharaja Suraj Mal
Maharani Kishori
Mahendra Singh Tikait
Pahalwan Dara Singh
Raja Mahendra Pratap
Swami Keshwa Nand
Thakur Deshraj
Veer Teja
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I would request the members to add more famous jats to this list. We should also provide articles about these great jats so that other communities know about them. Many jat members also do not have ideas about them.

We should also have a FORUM on this heading so that we can get any information about any famous jat, Like Chaudhary Charan Singh, Chaudhari Devilal and sir Chhoturam as has been provided on Jatland.
Regards,
i would like to add some more...
1.Harphool jat Julani Sharan gotar
2.Hari Singh Nalwa [Khatri] Mharaja Ranjeet Singh ke senapati
3.col.Dilsukh[Maan] I.N.A me Netaji ke saath rahe
4.capt.Kanwal Singh Dalal- Neataji ke saath Berlin se Tokyo tak pandubi me rahe
5.jamadar Hardwari Lal - world me sab se phale 10 thousand ft ki height par apna tank chadaya
6.capt.Bhagwan Singh_first hindu jat I,A.S officer
7.A.S.Cheema_first indian jo mount Everest par chade
8.maj gen.Subeg Singh Bhangu_jo 1984 ke vidroh me Jernail Singh Bhinderwale ka saath diya
9.Heer [sayal gotar}Ranja [Dhindo Ranja , Ranja Gotar]
10.Gen.Mohan Singh _Netaji ki I.N.A me parmukh senapati
11.Veer Ajit Singh_uncle of Shaheed Bhagat Singh jinhone nara diya "pagri sambhal jatta"
12.Jatni Sadha Kaur_Kanhiya misal ki sardar and mother in law of Maharaja Ranjeet Singh
13.Akali Fhula Singh_sharan gotari jat Maharaja Ranjeet Singh ke senapati or akal takath ke jathedar
 
Burdak Ji,

Whatever I know about him is already there. But if I get more info about him then I will definitely update.
 
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Another bright son of Ailum Village
Dr. Jaipal Singh Panwar ( Ph. D, Univ. of Illinois, U.S.A, Head & Professor in Department of Agricultural Engineering, Pusa Institute, New Delhi )
He topped UP in 10th and 12th.
he is the son in law of Dr. Giri Raj Singh Sirohi.
Dr. Giri Raj Singh Sirohi is first Indian to set foot on Antarctica, South Pole

Please visit following link for more info about them.

http://www.geocities.com/CapeCanaveral/Launchpad/3657/
 
Chaudhary Gulla Ram -

Chaudhary Gulla Ram (Benda) (1883 - 1968) was a Social worker, a reformer, freedom fighter and educationist from Ratkudia village in Rajasthan [1] He was born on vikram samvat 1940 ashvin krishna 14 (30 september 1883) in the family of Chaudhary Gena Ram ji Benda and Smt. Lali Bai in village Ratkudia, tehsil Bhopalgarh in Jodhpur district in Rajasthan.

चौधरी गुल्लाराम जी का बचपन

चौधरी गुल्लाराम जी का जन्म जोधपुर जिले की तह्सील भोपालगढ़ के गाँव रतकुड़िया में विक्रम संवत आश्विन कृष्णा १४ (३० सितम्बर १८८३) को एक साधारण बेन्दा गोत्र के जाट किसान परिवार में हुआ. आपके पिताजी का नाम श्री गेनाराम जी बेन्दा और माताजी का नाम श्रीमती लालीबाई था. [2]सात भाई बहिनों में आपका पांचवां स्थान था. आपका बचपन ग्रामीण परम्परा के अनुसार गायें चराते हुए गाँव में ही बीता. आपकी पढ़ने की बहुत इच्छा थी परन्तु गायें चराने के लिए कोई दूसरी व्यवस्था न होने और गाँव में कोई स्कूल न होने के कारण औपचारिक शिक्षा न ग्रहण कर पाए. परन्तु कृषि कार्य से जब भी समय मिलता गाँव के गुरूजी के पास जाकर बैठ जाते और थोड़े समय में अक्षर ज्ञान और गिनती सीख ली. १८ वर्ष की आयु में खांगटा गाँव के चौधरी श्री अमरारामजी गोदारा की पुत्री इंदिराबाई से आपका विवाह संपन्न हुआ. [3] [4]

शासकीय सेवा

१९०० में चौधरी गुल्लाराम जी पढने की इच्छा तथा नौकरी की तलास में जोधपुर आए. जोधपुर रेलवे स्टेशन के मैनेजर टॉड ने आपको गैंगमेन के पद पर काम लगाया. आप दिन में काम करते और रात को पढ़ते थे. बीमार पड़ने के कारण रेलवे का काम छुट गया. फ़िर आप आबू चले गए जहाँ पर श्रमिकों को पानी पिलाने का काम किया. साथ ही हिन्दी और गुजराती तथा अंगरेजी का ज्ञान प्राप्त किया. एक दिन आपको अंगरेजी बोलता देखकर आबू हाई अकूल के प्रिंसिपल वी. अच. स्केल्टन ने १ अक्टूबर १९०१ चौधरी गुल्लाराम जी को डेरी के काम में लगा दिया. आपकी योग्यता तथा मेहनत से प्रभावित होकर चौधरी गुल्लाराम जी को डेरी सहायक तथा बादमें डेरी प्रबंधक नियुक्त किया. ७ अप्रेल १९०४ तक आपने डेरी का काम संभाला. परन्तु अंग्रेज अधिकारी की रंगभेद नीति के कारण काम छोड़कर जोधपुर आ गए. यहाँ पर रेलवे के इन्जीनियरिंग विभाग में मेट की नौकरी कर ली. मि. स्केल्टन को जब गलती का अहसास हुआ तो पुनः आबू बुलाया और १९०९ में पुनः डेरी का मनेजर बना दिया. १९१२ में स्केल्टन के विदेश जाने पर डेरी बंद कर दी और आपको जोधपुर भेज दिया जहाँ पर सार्वजनिक निर्माण विभाग में नक्शा बनाने और भूमी का सर्वे करने का काम दिया. काम में कुशल होने से आपको १ मार्च १९१४ को ओवरसियर बना दिया तथा आबू, जस्वन्तपुर, सांचौर, भीनमाल आदि के भवनों की देख रेख का जिम्मा आपको सौंपा. आपका मुख्यालय आबू था जहाँ १९२४ तक आप रहे इसके बाद स्थानांतरण पिचिकिया बाँध पर कर दिया. बेडा ठाकुर पृथ्वी सिंह की मांग पर आपको १ जनवरी १९२४ को बेडा ठिकाने का मुख्य कामदार बना दिया. १९२६ में जोधपुर सरकार ने नीलगिरी उटकमंड में एक विशाल भवन ख़रीदा जिस के देख रेख के लिए आपको ७ मार्च १९२७ को प्रबंधक नियुक्त किया. १९४८ तक आप वहीं सेवा करते रहे और वहीं से सम्मान पूर्वक राजकीय सेवा से अवकाश ग्रहण किया.[5]

आजादी के पूर्व मारवाड़ में किसानों की हालत

जिस समय चौधरी गुल्लाराम जी का जन्म हुआ, उस समय मारवाड़ में किसानों की हालत बडी दयनीय थी। मारवाड़ का ८३ प्रतिशत इलाका जागीरदारों के अधिकार में था इन जागीरदारों में छोटे-बडे सभी तरह के जागीदार थे। छोटे जागीरदार के पास एक गांव था तो बडे जागीरदार के पास बारह से पचास तक के गांवो के अधिकारी थें और उन्हें प्रशासन, राजस्व व न्यायिक सभी तरह के अधिकार प्राप्त थे। ये जागीरदार किसानों से न केवल मनमाना लगान (पैदावार का आधा भग) वसूल करते थे बल्कि विभिन्न नामों से अनेक लागबों व बेगार भी वसूल करते थें किसानों का भूमि पर कोई अधिकार नहीं था और जागीरदार जब चाहे किसान को जोतने के लिए दे देता थां किसान अपने बच्चों के लिए खेतों से पूंख (कच्चे अनाज की बालियां) हेतु दो-चार सीटियां (बालियां) तक नहीं तोड सकता था। जबकि इसके विपरीत जागीरदार के घोडे उन खेतों में खुले चरते और खेती को उजाडते रहते थे और किसान उन्हें खेतों में से नहीं हटा सकते थे। इसके अलावा जागीरदार अपने हासिल (भूराजस्व) की वसूली व देखरेख के लिए एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी जो ‘कण्वारिया‘ कहलाता था, रखता था। यह कणवारिया फसल पकने के दिनों में किसानों की स्त्रियों को खतों से घर लौटते समय तलाशी लेता था या फिर किसानों के घरों की तलाशी लिया करता था कि कोई किसान खेत से सीटियां तोडकर तो नहीं लाया है। यदि नया अनाज घर पर मिल जाता था तो उसे शारीरिक और आर्थिक दण्ड दोनों दिया जाता था।

लगान के अलावा जागीरदारों ने किसान का शोषण करने के लिए अनेक प्रकार की लागें (अन्य घर) लगा रखी थी जो विभिन्न नामों से वसूल की जाती थी, जैसे मलबा लाग, धुंआ लाग आदि-आदि इसके अलावा बैठ-बेगार का बोझ तो किसानों पर जागीरदार की आरे से इतना भारी था कि किसान उसके दबाव से सदैव ही छोडकर जागीरदार की बेगार करने के लिए जाना पडता था। स्वयं किसान को ही नहीं, उनकी स्त्रियों को भी बेगार देनी पडती थी। उनको जागीरदारों के घर के लिए आटा पीसना पडता था। उनके मकानों को लीपना-पोतना पडता था और भी घर के अन्य कार्य जब चाहे तब करने पडते थे। उनका इंकार करने का अधिकार नहीं था और न ही उनमे इतना साहस ही था। इनती सेवा करने पर भी उनको अपमानित किया जाता था। स्त्रियां सोने-चांदी के आभूषण नहीं पहन सकती थी। जागीरदार के गढ के समाने से वे जूते पहनकर नहीं निकल सकती थी। उन्हें अपने जूते उतारकर हाथों में लेने पडते थे। किसान घोडों पर नहीं बैठ सकते थे। उन्हे जागीरदार के सामने खाट पर बैठने का अधिकार नहीं था। वे हथियार लेकर नहीं चल सकते थें किसान के घर में पक्की चीज खुरल एव घट्टी दो ही होती थी। पक्का माकन बना ही नहीं सकते थे। पक्के मकान तो सिर्फ जागीरदार के कोट या महल ही थे। गांव की शोषित आबादी कच्चे मकानों या झोंपडयों में ही रहती थी। किसानों को शिक्षा का अधिकार नहीं था। जागीरदार लोग उन्हें परम्परागत धंधे करने पर ही बाध्य करते थे। कुल मिलाकर किसान की आर्थिक व सामाजिक स्थिति बहुत दयनीय थी । जी जान से परिश्रम करने के बाद भी किसान दरिद्र ही बना रहता था क्योंकि उसकी कमाई का अधिकांश भाग जागीरदार और उसके कर्मचारियों के घरों में चला जाता था। ऐसी स्थिती में चौधरी भींया राम सिहाग ने मारवाड के किसानों की दशा सुधारने का बीडा उठाया।

शिक्षा प्रचार

चौधरी गुल्लाराम जी ने मारवाड़ के किसानों की हालत सुधारने का बीडा उठाया. निमंत्रण मिलने पर आप चौधरी मूल चंद सियाग नागौर के साथ २७ मार्च १९२१ को संगरिया जाट स्कूल के वार्षिक जलसे में पहुंचे, जिसका सभापतित्व करने रोहतक से सर छोटूरामजी पधारे थे. समय लेकर आप दोनों अलग से सर छोटूरामजी से मिले और मारवाड़ के जाट किसानों की समस्या के समाधान और उनकी जागृति तथा उत्थान के लिए परामर्श किया. उन्होंने सलाह दी कि वे राजनैतिक और सामाजिक उत्थान से पहले किसानों में शिक्षा के प्रचार-प्रसार को अपनी प्रतामिकता बनायें और शासन सत्ता के विरोध में अपनी शक्ति का अपव्यय न करें. इसलिए यह तय किया गया की सबसे पहले मारवाड़ के किसानों को शिक्षित किया जाए.[6] [7]

चौधरी गुल्लारामजी एक निश्चित विचार लेकर संगरिया से लौटे. रास्ता बनाने के लिए आपने सर्वप्रथम चौधरी सर छोटूरामजी को १९२१ की गर्मियों में अपने गाँव रतकुड़िया आमंत्रित किया. एक बड़ा जुलूस गाँव में होकर निकाला गया. सभा हुई जिसमें सर छोटूरामजी ने शिक्षा तथा संगठन पर भाषण दिया. इस तरह वातावरण अनुकूल बनाकर चौधरी गुल्लारामजी ने १ जुलाई १९२१ को गाँव के पास उम्मेद स्टेशन पर एक पाठशाला स्थापित कर मास्टर नैनसिंह को बच्चों को पढाने का कार्य सौंपा. १९२४ तक यह पाठशाला रही जिसका समस्त व्यय आपने वहन किया, परन्तु किसी का सहयोग न मिलने तथा जातीय भाई अशिक्षित होने के कारण इस स्कूल का फायदा नहीं उठा सके और यह पाठशाला बंद हो गयी. [8] [9]

चौधरी गुल्लारामजी ने हार नहीं मानी. अक्टूबर १९२५ में कार्तिक पूर्णिमा को अखिल भारतीय जाट महासभा का एक अधिवेसन पुष्कर में हुआ था उसमें मारवाड़ के जाटों में जाने वालों में चौधरी गुल्लाराम, चौधरी मूलचंद जी सियाग, मास्टर धारासिंह, चौधरी रामदान जी, भींया राम सिहाग आदि पधारे थे. इस जलसे की अध्यक्षता भरतपुर के तत्कालीन महाराजा श्री किशनसिंह जी ने की. इस समारोह में उत्तर प्रदेश, पंजाब, दिल्ली के अलावा राजस्थान के हर कोने से जाट सम्मिलित हुए थे. इन सभी ने पुष्कर में अन्य जाटों को देखा तो अपनी दशा सुधारने का हौसला लेकर वापिस लौटे. उनका विचार बना की मारवाड़ में जाटों के पिछड़ने का कारण केवल शिक्षा का आभाव है.[10][11]
 
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"जाट बोर्डिंग हाउस जोधपुर" की स्थापना

कुछ समय बाद चौधरी गुल्लारामजी के रातानाडा स्थित मकान पर चौधरी मूलचंद सिहाग नागौर, चौधरी भिंयारामजी सिहाग परबतसर, चौधरी गंगारामजी खिलेरी नागौर, बाबू दूधारामजी और मास्टर धारा सिंह की एक मीटिंग हुई. यह तय किया गया कि किसानों से विद्या प्रसार के लिए अनुरोध किया जाए. तदनुसार २ मार्च १९२७ को ७० जाट सज्जनों की एक बैठक श्री राधाकिसन जी मिर्धा की अध्यक्षता में हुई. इस बैठक में चौधरी गुल्लारामजी ने जाटों की उन्नति का मूलमंत्र दिया कि - "पढो और पढाओ" . साथ ही एक जाट संस्था खोलने के लिए धन की अपील की गयी. यह तय किया गया कि बच्चों को निजी स्कूल खोल कर उनमें भेजने के बजाय सरकारी स्कूलों में भेजा जाय पर उनके लिए ज्यादा से ज्यादा होस्टल खोले जावें. चौधरी गुल्लारामजी ने इस मीटिंग में अपना रातानाडा स्थित मकान एक वर्ष के लिए छात्रावास हेतु देने, बिजली, पानी, रसोइए का एक वर्ष का खर्च उठाने का वायदा किया. इस तरह ४ अप्रेल १९२७ को चौधरी गुल्लारामजी के मकान में "जाट बोर्डिंग हाउस जोधपुर" की स्थापना की । [12] [13]

१९३० तक जब जोधपुर के छात्रावास का काम ठीक ढंग से जम गया और जोधपुर सरकार से अनुदान मिलने लग गया तब चौधरी मूलचंद जी, बल्देवराम जी मिर्धा, भींया राम सियाग, गंगाराम जी खिलेरी, धारासिंह एवं अन्य स्थानिय लोगों के सहयोग से बकता सागर तालाब पर २१ अगस्त १९३० को नए छात्रावास की नींव नागौर में डाली । बाद में चौधरी रामदानजी के सहयोग से बाडमेर में व १९३५ में चौधरी पूसरामजी पूलोता, डांगावास के महाराजजी कमेडिया, प्रभुजी घतेला, तथा बिर्धरामजी मेहरिया के सहयोग से मेड़ता में छात्रावास स्थापित किया गया. [14] [15] [16] [17]

आपने जाट नेताओं के सहयोग से अनेक छात्रावास खुलवाए । बाडमेर में १९३४ में चौधरी रामदानजी डऊकिया की मदद से छात्रावास की आधरसिला राखी । १९३५ में मेड़ता छात्रवास खोला । आपने जाट नेताओं के सहयोग से जो छात्रावास खोले उनमें प्रमुख हैं:- सूबेदार पन्नारामजी ढ़ीन्गसरा व किसनाराम जी रोज छोटी खाटू के सहयोग से डीडवाना में, इश्वर रामजी महाराजपुरा के सहयोग से मारोठ में, भींयाराम जी सीहाग के सहयोग से परबतसर में, हेतरामजी के सहयोग से खींवसर में छात्रावास खुलवाए । इन छात्रावासों के अलावा पीपाड़, कुचेरा, लाडनुं, रोल, जायल, अलाय, बीलाडा, रतकुडि़या, आदि स्थानों पर भी छात्रावासों की एक श्रंखला खड़ी कर दी । इस प्रकार मारवाड़ के जाट नेताओं जिसमें चौधरी बल्देवराम मिर्धा, चौधरी गुल्लारामजी, चौधरी मूलचंदजी, चौधरी भींयारामजी, चौधरी रामदानजी बाडमेर आदि प्रमुख थे, ने मारवाड़ में छात्रावासों की एक श्रंखला स्थापित करदी तथा इनके सुचारू संचालन हेतु एक शीर्ष संस्था "किसान शिक्षण संस्थान जोधपुर" स्थापित कर जोधपुर सरकार से मान्यता ले ली, जिसे सरकार से छात्रावासों के संचालन हेतु आर्थिक सहायता प्राप्त होने लगी. [18] [19]इस शिक्षा प्रचार में मारवाड़ के जाटों ने अपने पैरों पर खड़ा होने में राजस्थान के तमाम जाटों को पीछे छोड़ दिया ।[20]

चौधरी गुल्लारामजी जहाँ अपनी सारी शक्ती छात्रावासों में लगाते थे, वहीं होनहार व मेधावी गरीब छात्रों को अपनी जेब से आर्थिक सहायता भी देते थे. कुछ बच्चों को तो उन्होंने उच्च शिक्षा के लिए भी आर्थिक मदद की. जिन छात्रों को आपने विशेष सहायता दी उनमें प्रमुख हैं गुरुदयालसिंह, रामदयालसिंह, मुन्शीसिंह, ओमप्रकाश जाट, जालूराम प्रजापत आदि. [21][22]
मारवाड़ जाट कृषक सुधारक सभा के संस्थापक

सन् १९३७ में चटालिया गांव के जागीरदार ने जाटों की ८ ढाणियों पर हमला कर लूटा और अमानुषिक व्यवहार किया । चौधरी साहब को इससे बड़ी पीड़ा हुई और उन्होंने तय किया की जाटों की रक्षा तथा उनकी आवाज बुलंद करने के लिए एक प्रभावसाली संगठन आवश्यक है । अतः जोधपुर राज्य के किसानों के हित के लिए २२ अगस्त १९३८ को तेजा दशमी के दिन परबतसर के पशु मेले के अवसर पर "मारवाड़ जाट कृषक सुधारक सभा" नामक संस्था की स्थापना की । चौधरी मूलचंद इस सभा के प्रधानमंत्री बने, चौधरी गुल्लाराम जी रतकुडिया इसके अध्यक्ष नियुक्त हुए और भींया राम सिहाग कोषाध्यक्ष चुने गए । इस सभा का उद्देश्य जहाँ किसानों में में फ़ैली कुरीतियों को मिटाना था, वहीं जागीरदारों के अत्याचारों से किसानों की रक्षा करना भी था. उन दिनों जगह-जगह सम्मेलन आयोजित किए गए, जिनमें कुरीतियों को छोड़ने के प्रस्ताव पास किए गए. छात्रावासों के चंदे हेतु प्रति हल एक रूपया व विवाह के अवसर पर तीन से ग्यारह रुपये तक लिए जाने तय किए.[23] इन उपदेशकों में ठाकुर हुकुमसिंह व भोलासिंह, उपदेशक, अखिल भारतीय जाट महासभा, हीरा सिंह पहाड़सर, पंडित दत्तुराम बहादरा, चौधरी गणपतराम , चौधरी जीवनराम , चौधरी मोहरसिंह आदि प्रमुख थे. [24]इस प्रकार मारवाड़ के किसानों में कुरीतियों के निवारण में चौधरी गुल्लाराम जी अग्रणी व्यक्ती थे. [25]

मारवाड़ किसान सभा की स्थापना

किसानों की प्रगती को देखकर मारवाड़ के जागीरदार बोखला गए । उन्होंने किसानों का शोषण बढ़ा दिया और उनके हमले भी तेज हो गए । जाट नेता अब यह सोचने को मजबूर हुए की उनका एक राजनैतिक संगठन होना चाहिए । सब किसान नेता २२ जून १९४१ को जाट बोर्डिंग हाउस जोधपुर में इकट्ठे हुए जिसमें तय किया गया कि २७ जून १९४१ को सुमेर स्कूल जोधपुर में मारवाड़ के किसानों की एक सभा बुलाई जाए और उसमें एक संगठन बनाया जाए । तदानुसार उस दिनांक को मारवाड़ किसान सभा की स्थापना की घोषणा की गयी और मंगल सिंह कच्छवाहा को अध्यक्ष तथा बालकिशन को मंत्री नियुक्त किया गया. [26]

मारवाड़ किशान सभा का प्रथम अधिवेशन २७-२८ जून १९४१ को जोधपुर में आयोजित किया गया । मारवाड़ किसान सभा ने अनेक बुलेटिन जारी कर अत्याधिक लगान तथा लागबाग समाप्त करने की मांग की । मारवाड़ किसान सभा का दूसरा अधिवेशन २५-२६ अप्रेल १९४३ को सर छोटू राम की अध्यक्षता में जोधपुर में आयोजित किया गया । इस सम्मेलन में जोधपर के महाराजा भी उपस्थित हुए । वास्तव में यह सम्मेलन मारवाड़ के किसान जागृति के इतिहास में एक एतिहासिक घटना थी । इस अधिवेशन में किसान सभा द्वारा निवेदन करने पर जोधपुर महाराज ने मारवाड़ के जागीरी क्षेत्रों में भूमि बंदोबस्त शु्रू करवाने की घोषणा की । मारवाड़ किसान सभा जाटों के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि थी । [27]

रतकुड़िया स्कूल की स्थापना

१९४८ में सरकारी सेवा से अवकाश लेने के बाद चौधरी गुल्लाराम जी पूर्ण रूप से शिक्षा को समर्पित हो गए. आपने गाँव रतकुड़िया में १९५६ में निर्विरोध सरपंच बनाने के बाद एक शिक्षण संस्था स्तापित की. १९५७ में इस संस्था को उच्च प्राथमिक, १९६० में माध्यमिक व १९६२ में इसे उच्च माध्यमिक विद्यालय में क्रमोन्नत करवाया. १९६३ में इसमें गणित व १९६४ में जीव विज्ञान की कक्षा खुलवा कर तो आपने ग्रामीण विद्यार्थियों के लिए सुनहरे अवसरों के द्वार खोल दिए. आपने रात-दिन परिश्रम कर न केवल इस स्कूल के लिए विशाल भवन बनवाया बल्कि एक विशाल छात्रावास व अध्यापकों के लिए उन्नीस निःशुल्क आवास स्थापित कराये. १९५६ से लेकर १९६८ तक चौधरी गुल्लाराम जी ने इस विद्यालय के लिए घोर परिश्रम किया और अन्तिम समय तक इसकी उन्नति में लगे रहे. आपके प्रयास से ही इस स्कूल का उस समय पूरे राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में एक विशिष्ठ स्थान बन गया और यह विज्ञान के उन्नत शिक्षा केन्द्रों में गिना जाने लगा था, जहाँ दूर-दूर से विद्यार्थी विज्ञान की शिक्षा प्राप्त करने यहाँ आने लगे थे. [28]इसके बारे में कहा गया है -

रतकुड़िया कुण जानतो, साधारण सो गाँव ।
गुल्लाराम परकट कियो, मारवाड़ में नांव ।।

धन्य धन्य तुम धन्य हो, चौधरी गुल्लाराम ।

रतकुड़िया निर्मित कियो, विद्यालय शुभ धाम ।। [29]

आपके पुत्रों में श्री रामनारायण जी चौधरी व श्री हरीसिंह्जी राजस्थान सरकार में चीफ इंजीनियर, सिंचाई विभाग से सेवानिवृत हुए जबकि चौधरी गोवर्धनसिंह् जी राजस्थान में जाट जाति के पहले आई ए एस आफिसर बनने का गौरव प्राप्त किया और राजस्थान सरकार में कई महत्वपूर्ण पदों पर रहते हुए भी किसानों व जाट जाति के उन्नति के लिए काम करते रहे. [30]
स्वर्गवास

इस महान शिक्षा प्रेमी, किसानों के हितेषी नेता और साहसी समाज सुधारक चौधरी गुल्लारामजी का १२ अक्टूबर १९६८ को स्वर्गवास हो गया. चौधरी साहब के स्वर्गवास के बाद आपके परिवार ने इस संस्था को राजस्थान सरकार को समर्पित कर दिया और सरकार द्वारा आपके नाम पर इस विद्यालय का नाम "चौधरी गुल्लाराम राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय रतकुड़िया" रखा गया है.[31]
सन्दर्भ

1. ↑ Dr Mahendra Singh Arya, Dharmpal Singh Dudee, Kishan Singh Faujdar & Vijendra Singh Narwar: Ādhunik Jat Itihasa (The modernhistory of Jats), Agra 1998, p. 340-342
2. ↑ पंडित लक्ष्मीनारायण बुद्धिसागर शास्त्री: चौधरी गुल्लारामजी स्मृति ग्रन्थ, १९६८, पेज 3
3. ↑ पंडित लक्ष्मीनारायण बुद्धिसागर शास्त्री: चौधरी गुल्लारामजी स्मृति ग्रन्थ, १९६८, पेज 4-5
4. ↑ डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 102
5. ↑ डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 103
6. ↑ आचार्य गोपालप्रसाद कौशिक, चौधरी मूलचंद जी अभिनन्दन ग्रन्थ, १९७६, पेज ११२-113
7. ↑ डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 105
8. ↑ रिपोर्ट श्री जाट बोर्डिंग हाउस जोधपुर शुरू से ३० जून १९३६ तक, पेज 1
9. ↑ डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 105
10. ↑ डॉ पेमाराम, मारवाड़ में किसान जागृति के कर्णधार जाट, राष्ट्रिय सेमिनार, "लाइफ एंड हिस्ट्री आफ जट्स" , दिल्ली 1998
11. ↑ डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 105
12. ↑ रिपोर्ट श्री जाट बोर्डिंग हाउस जोधपुर शुरू से ३० जून १९३६ तक, पेज 2
13. ↑ डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 106
14. ↑ श्री बल्देवराम मिर्धा, पृ 30
15. ↑ आचार्य गोपालप्रसाद कौशिक, चौधरी मूलचंद जी अभिनन्दन ग्रन्थ, १९७६, पेज 149
16. ↑ रिपोर्ट श्री जाट बोर्डिंग हाउस जोधपुर शुरू से ३० जून १९३६ तक, पेज 3
17. ↑ डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 107
18. ↑ रिपोर्ट श्री जाट बोर्डिंग हाउस जोधपुर शुरू से ३० जून १९३६ तक, पेज 38
19. ↑ जोधपुर एडमिनिस्ट्रेशन रिपोर्ट, 1939, पेज 45
20. ↑ डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 107
21. ↑ पंडित लक्ष्मीनारायण बुद्धिसागर शास्त्री: चौधरी गुल्लारामजी स्मृति ग्रन्थ, १९६८, पेज 130,140,152
22. ↑ डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 108
23. ↑ आचार्य गोपालप्रसाद कौशिक, चौधरी मूलचंद जी अभिनन्दन ग्रन्थ, 1976, पेज 120-121
24. ↑ मारवाड़ जाट कृषक सुधारक सभा की त्रिवार्षिक रिपोर्ट . पेज 6
25. ↑ डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 108-109
26. ↑ डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 109
27. ↑ डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 110
28. ↑ डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 111
29. ↑ डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 111
30. ↑ डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 112
31. ↑ डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 113
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Mr. Jitendra Kumar son of Justice Mahavir Singh was amassador of India to Tajakistan a few years back but at the moment i donot know his whereabouts....
 
Chaudhary Ramdan Dookiya - a great social reformer from Marwar

Chaudhary Ramdan Dookiya (चौधरी रामदान डऊकिया) (1884 - 1963) was a great social reformer, friend and well wisher of farmers, an educationist, from village Kharin (खड़ीन), 30 km west of Barmer in Barmer district. He was born on 15 March 1884 in farmer family of Malani. [1]


रामदानजी का जीवन परिचय

चौधरी रामदानजी का जन्म चैत बदी ३ संवत १९४० तदनुसार १५ मार्च १८८४ को सरली नामक गाँव में चौधरी तेजारामजी के यहाँ हुआ था. [2] [3]आपका गोत्र दऊकिया तथा नख तंवर था. आपकी माताजी का नाम श्रीमती दौली देवी था. आप भाई बहीनों में सबसे छोटे थे. जब आप सात वर्ष के थे तब आपका परिवार १८९१ में सरली से खड़ीन आ गया. आप जब १३ वर्ष के थे तब आपके पिताजी का देहांत हो गया था. इसके दो वर्ष बाद १८९९ में (विक्रम संवत १९५६) में मारवाड़ में भयंकर छपनिया अकाल पड़ा तो आपको परिवार के सिंध की और पलायन करना पड़ा.[4] [5]रामदान जी को रेल लीन बिछाने में काम मिल गया. उसी समय आपके बड़े भाई रूपाजी का देहांत हो गया इसलिए नौकरी छोड़ खड़ीन वापस आना पड़ा. १९०० से १९०५ तक आप गाँव में रहकर खेती करते रहे. इस दौरान १९०४ में आपकी शादी श्रीमती कस्तूरी देवी भाकर के साथ हो गयी. १५ मार्च १९०५ में पुनः आपको रेलवे में ट्रोली-मैन के पद पर रख लिया. १९०७ में आपको जमादार के पद पर पदोन्नत किया. १९०७ से १९२० तक रेलवे में जमादार के पड़ पर रहे. इस दौरान आपने स्वतः के प्रयास से पढ़ना लिखना सीख लिया. १९२० में आपको रेल-पथ निरिक्षक के पद पर पदोन्नत कर समदडी में लगा दिया. १९२३ में आपको जोधपुर में भेजा गया. जोधपुर प्रवास के दौरान आपका परिचय कई प्रबुद्ध जाटों से हुआ. [6]

अक्टूबर १९२५ में कार्तिक पूर्णिमा को अखिल भारतीय जाट महासभा का एक अधिवेसन पुष्कर में हुआ था उसमें मारवाड़ के जाटों में जाने वालों में चौधरी गुल्लाराम, चौधरी मूलचंद जी सियाग, मास्टर धारासिंह, चौधरी रामदान जी, भींया राम सिहाग आदि पधारे थे. इस जलसे की अध्यक्षता भरतपुर के तत्कालीन महाराजा श्री किशनसिंह जी ने की. इस समारोह में उत्तर प्रदेश, पंजाब, दिल्ली के अलावा राजस्थान के हर कोने से जाट सम्मिलित हुए थे. इन सभी ने पुष्कर में अन्य जाटों को देखा तो अपनी दशा सुधारने का हौसला लेकर वापिस लौटे. [7]उनका विचार बना की मारवाड़ में जाटों के पिछड़ने का कारण केवल शिक्षा का आभाव है.[8][9]

कुछ समय बाद चौधरी गुल्लारामजी के रातानाडा स्थित मकान पर चौधरी मूलचंद सिहाग नागौर, चौधरी भिंयारामजी सिहाग परबतसर, चौधरी गंगारामजी खिलेरी नागौर, बाबू दूधारामजी और मास्टर धारा सिंह की एक मीटिंग हुई. यह तय किया गया कि किसानों से विद्या प्रसार के लिए अनुरोध किया जाए. तदनुसार २ मार्च १९२७ को ७० जाट सज्जनों की एक बैठक श्री राधाकिसन जी मिर्धा की अध्यक्षता में हुई. इस बैठक में चौधरी गुल्लारामजी ने जाटों की उन्नति का मूलमंत्र दिया कि - "पढो और पढाओ" . साथ ही एक जाट संस्था खोलने के लिए धन की अपील की गयी. यह तय किया गया कि बच्चों को निजी स्कूल खोल कर उनमें भेजने के बजाय सरकारी स्कूलों में भेजा जाय पर उनके लिए ज्यादा से ज्यादा होस्टल खोले जावें. चौधरी गुल्लारामजी ने इस मीटिंग में अपना रातानाडा स्थित मकान एक वर्ष के लिए छात्रावास हेतु देने, बिजली, पानी, रसोइए का एक वर्ष का खर्च उठाने का वायदा किया. इस तरह ४ अप्रेल १९२७ को चौधरी गुल्लारामजी के मकान में "जाट बोर्डिंग हाउस जोधपुर" की स्थापना की । [10] [11] इसमें चौधरी रामदानजी का भी पूरा योगदान रहा. आपने न केवल मासिक चन्दा देकर बल्कि रेलवे के अन्य लोगों से बी काफी सहायता दिलवाई. आप लंबे समय तक तन-मन-धन से इस संस्था की सहायता करते रहे. [12]

१९३० तक जब जोधपुर के छात्रावास का काम ठीक ढंग से जम गया और जोधपुर सरकार से अनुदान मिलने लग गया तब चौधरी मूलचंद जी, बल्देवराम जी मिर्धा, भींया राम सियाग, गंगाराम जी खिलेरी, धारासिंह एवं अन्य स्थानिय लोगों के सहयोग से बकता सागर तालाब पर २१ अगस्त १९३० को नए छात्रावास की नींव नागौर में डाली । बाद में चौधरी रामदानजी के सहयोग से बाडमेर में व १९३५ में चौधरी पूसरामजी पूलोता, डांगावास के महाराजजी कमेडिया, प्रभुजी घतेला, तथा बिर्धरामजी मेहरिया के सहयोग से मेड़ता में छात्रावास स्थापित किया गया. [13] [14] [15] [16]

आपने जाट नेताओं के सहयोग से अनेक छात्रावास खुलवाए । बाडमेर में १९३४ में चौधरी रामदानजी डऊकिया की मदद से छात्रावास की आधरसिला राखी । १९३५ में मेड़ता छात्रवास खोला । आपने जाट नेताओं के सहयोग से जो छात्रावास खोले उनमें प्रमुख हैं:- सूबेदार पन्नारामजी ढ़ीन्गसरा व किसनाराम जी रोज छोटी खाटू के सहयोग से डीडवाना में, इश्वर रामजी महाराजपुरा के सहयोग से मारोठ में, भींयाराम जी सीहाग के सहयोग से परबतसर में, हेतरामजी के सहयोग से खींवसर में छात्रावास खुलवाए । इन छात्रावासों के अलावा पीपाड़, कुचेरा, लाडनुं, रोल, जायल, अलाय, बीलाडा, रतकुडि़या, आदि स्थानों पर भी छात्रावासों की एक श्रंखला खड़ी कर दी । इस प्रकार मारवाड़ के जाट नेताओं जिसमें चौधरी बल्देवराम मिर्धा, चौधरी गुल्लारामजी, चौधरी मूलचंदजी, चौधरी भींयारामजी, चौधरी रामदानजी बाडमेर आदि प्रमुख थे, ने मारवाड़ में छात्रावासों की एक श्रंखला स्थापित करदी तथा इनके सुचारू संचालन हेतु एक शीर्ष संस्था "किसान शिक्षण संस्थान जोधपुर" स्थापित कर जोधपुर सरकार से मान्यता ले ली, जिसे सरकार से छात्रावासों के संचालन हेतु आर्थिक सहायता प्राप्त होने लगी. [17] [18]इस शिक्षा प्रचार में मारवाड़ के जाटों ने अपने पैरों पर खड़ा होने में राजस्थान के तमाम जाटों को पीछे छोड़ दिया ।[19]

जाट बोर्डिंग हाऊस बाडमेर के संस्थापक

चौधरी रामदानजी का १९२९ में जोधपुर से बायतू तथा १९३० में बाड़मेर स्थानान्तरण हो गया. अब आपने बाड़मेर के किसानों पर ध्यान देना शुरू किया. आपने बाडमेर में एक जाटावास बस्ती बसाई और वहीं अपना मकान बनाया. बाड़मेर को अपनी कर्म स्थली बनाते हुए इस एरिया के किसानों से सम्पर्क किया. कुछ बच्चों को लाकर अपने निवास स्थान पर लाकर रखा और पढाना शुरू किया. उस समय बाडमेर में एक मिडिल स्कूल और एक प्राथमिक स्कूल था. बच्चे वहां पढ़ने जाते और रामदानजी के मकान में रहते. यहाँ आपकी पत्नी सबके भोजन की व्यवस्था करती थी. जब बच्चों की संख्या बढ़ने लगी तब अपने पड़ौस के मकान में श्री भीकमचंदजी का मकान किराये पर लिया और वहां ३० जून १९३४ को जाट बोर्डिंग हाऊस बाड़मेर की स्थापना की. चौधरी मूलचंदजी नागौर के कर कमलों से इसका उदघाटन हुआ. उस समय १९ छात्रों ने इसमें प्रवेश लिया था.[20][21] [22]

इस संस्था की स्थापना करने के बाद रामदान जी तन-मन-धन से इसकी उन्नति में लग गए. बाड़मेर के आसपास के गाँवों का भ्रमण कर आपने कई और बच्चों को बोर्डिंग में भर्ती करवाया. धीरे-धीरे बच्चों की संख्या बढ़ने लगी तो इस छात्रावास का आर्थिक भार भी बढ़ने लगा, तब आपने ग्रामीण एरिया और रेलवे कर्मचारियों से चन्दा एकत्रित कर छात्रावास का खर्चा चलाया. इस कार्य में चौधरी आईदानजी भादू बाड़मेर ने आपका पूरा सहयोग किया. जून १९३६ तक इस संस्था में ३५ विद्यार्थी हो गए और बाड़मेर में यह संस्था अपने आप में एक अनूठी संस्था बन गयी. १९३७ में इस छात्रावास को जोधपुर सरकार से ३० रूपया मासिक अनुदान मिलने लग गया. अब चौधरी रामदानजी इस बोर्डिंग के लिए स्थाई निर्माण करवाने में लग गए. गाँवों में घूम कर तथा रेलवे कर्मचारियों से चंद एकत्रित कर १९४१ तक वर्तमान छात्रावास के आधे भाग का निर्माण पूरा कर लिया. अब किराए के भवन से बोर्डिंग नए भवन में स्थानांतरण करावा दिया. इस हेतु १९४२ तथा १९४४ में बाड़मेर में किसान सम्मेलन आयोजित किए. इनमें चौधरी बलादेवरामजी मिर्धा, हाकिम गोवर्धनसिंह्जी, चौधरी मूलचंदजी नागौर, चौधरी रामदानजी ने छात्रावास को पूरा करने हेतु चंदे की अपील की. तिलवाड़ा पशु मेले से भी चन्दा एकत्रित किया. इन प्रयासों से छात्रावास का निर्माण १९४६ तक पूरा हो गया. [23]

बाडमेर जिला किसान सभा की स्थापना

चौधरी रामदानजी १४ मार्च १९४६ को बाड़मेर से रेलवे के प्रथम-रेलपथ-निरीकसक पद से सेवानिवृत हो गए. इसके बाद आपने पूरा ध्यान समाज सेवा में लगा दिया. अब आपने जाट बोर्डिंग हाऊस बाड़मेर के साथ मारवाड़ किसान सभा का भी काम देखना शुरू कर दिया. किसानों की प्रगती को देखकर मारवाड़ के जागीरदार बोखला गए । उन्होंने किसानों का शोषण बढ़ा दिया और उनके हमले भी तेज हो गए । जाट नेता अब यह सोचने को मजबूर हुए कि उनका एक राजनैतिक संगठन होना चाहिए । सब किसान नेता २२ जून १९४१ को जाट बोर्डिंग हाउस जोधपुर में इकट्ठे हुए जिसमें तय किया गया कि २७ जून १९४१ को सुमेर स्कूल जोधपुर में मारवाड़ के किसानों की एक सभा बुलाई जाए और उसमें एक संगठन बनाया जाए । तदानुसार उस दिनांक को मारवाड़ किसान सभा की स्थापना की घोषणा की गयी और मंगल सिंह कच्छवाहा को अध्यक्ष तथा बालकिशन को मंत्री नियुक्त किया गया. [24] १९४६ में बलदेव रामजी मिर्धा ने मारवाड़ किसान सभा की कार्यकारिणी का पुनर्गठन किया जिसमें श्री नरसिंह्जी कच्छवाहा को अध्यक्ष व श्री नाथूरामजी मिर्धा को मंत्री बनाया तथा चौधरी रामदानजी को कार्यकारिणी का सदस्य नियुक्त किया. [25]साथ ही बाड़मेर परगने में भी किसान सभा की एक इकाई का गठन कर श्री रामदानजी को वहां का अध्यक्ष नियुक्त किया. ३ मार्च १९४८ को श्री जयनारायणजी व्यास के नेतृत्व में जोधपुर में नयी सरकार बनी जिसमें मारवाड़ किसान सभा की और से श्री नाथूरामजी मिर्धा कृषि मंत्री बने. [26]इस सरकार ने किसानों के हित में १९४९ के शुरू में मारवाड़ लैंड रेवेन्यू एक्ट व मारवाड़ टेनेन्सी एक्ट १९४९ पारित कर दिए जिसमें लागबाग आदि समाप्त करते हुए किसान को अपनी जमीन का मालिक बना दिया. इन कानूनों के बनते ही श्री रामदान जी मालानी के गाँव-गाँव ढाणी-ढाणी जाकर किसानों को इन कानूनों की जानकारी दी और लागबाग बंद करवाई.[27]

लगबाग बंद होने से जागीरदार तिलमिला गए और अत्याछार बढ़ा दिए. किसान नेताओं पर कातिलाना हमला कर हत्याएं करना शुरू कर दिया. इन घटनाओं में मालानी में २७ लोगों ने प्राण गँवाए. [28]इसे समय में रामदांजी पहाड़ बन कर किसानों के रक्षार्थ सामने आए और किसानों की हर प्रकार से मदद की. आप द्वारा बाड़मेर किसान सभा के अध्यक्ष तथा बाद में विधायक की हैसियत से जो सेवाएं आपने किसानों की करी आज तक भी बाड़मेर के किसान उनको याद कर आपके प्रति श्रद्धानत होते हैं. [29][30] मारवाड़ किसान सभा तथा १४ अगस्त १९४९ को जयपुर में गठित राजस्थान किसान सभा के अध्यक्ष श्री बलदेव राम जी मिर्धा व अन्य नेताओं के प्रयासों का परिणाम यह हुआ की १९५२ के प्रारम्भ में राजस्थान की सरकार ने जागीरदारी प्रथा समाप्त करने का अधिनियम पारित कर दिया. इससे राजस्थान का किसान सदा के लिए जागीरदारी प्रथा से मुक्त हो गया. १९५५ में राजस्थान टेनेन्सी एक्ट बन जाने के बाद तो किसान स्वयम अपने जमीन का मालिक बन गया. इस कार्य में श्री बलदेव राम मिर्धा और अन्य जाट नेताओं के साथ श्री रामदान जी का भी महत्वपूर्ण योगदान था. [31] [32]
 
सामाजिक सेवा

चौधरी रामदानजी मारवाड़ के अन्य जाट नेताओं की तरह किसानों में प्रचलित सामाजिक कुरीतियाँ हटाने के हामी थे. [33][34] आप बाल विवाह, म्रत्यु-भोज, मुकदमेबाजी, अफीम, तम्बाकू, दीन-प्रथा आदि कुरीतियों के विरोधी थे और जीवनभर इनके खिलाफ संघर्ष करते रहे. श्री रामदानजी म्रत्यु-भोज को किसानों का दुश्मन मानते थे. अतः उन्होंने ब्याह-शादियों, किसान-सम्मेलनों. तिलवाडा चैत्री पशु मेला, राजनैतिक-सम्मेलनों आदि सभी अवसरों पर म्रत्यु-भोज को बंद करने का आव्हान करते थे. जब इसमें आपको आशातीत सफलता नहीं मिली तब इसे कानूनन बंद कराने का प्रयास किया. १९५७ में जब आप विधायक बने तब आपने मुख्यमंत्री श्री मोहन लाल सुखाडिया जी से आग्रह कर "राजस्थान म्रत्यु-भोज निवारण अधिनियम १९६०" विधान सभा में पारित करवाया. इसके परिणाम स्वरूप बाड़मेर में म्रत्यु-भोज में बहुत कमी आई. दीन-प्रथा समाप्त करने के लिए आपने सर्वप्रथम अपने परिवार की लड़कियों का धर्म-विवाह करके किसानों के सामने इस प्रथा के खिलाफ एक उदाहरण प्रस्तुत किया और इस प्रथा को समाप्त करने में सफल रहे. [35] [36] आप लड़कों की शिक्षा के साथ लड़कियों की शिक्षा के भी हिमायती थे. बाड़मेर इलाके में स्त्री-शिक्षा का प्रचार आपके प्रयत्नों से ही हुआ. आपके प्रयासों का ही परिणाम था की १९५३ तक ३१८ लड़कियाँ मिडिल तक पढ़ने में सफल हुई. आपने किसानों के बच्चों की पढाई के साथ साथ द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान बड़ी संख्या में जाट युवकों को सेना में भर्ती करवाया. १९५१ से १९५५ के बीच राजस्थान में पुलिस प्रशासन का विस्तार हुआ तो बड़ी संख्या में किसानों के बच्चो को पुलिस में नौकरी दिलवाकर किसानों का बड़ा भला किया. [37]

परिवार का उत्थान

जहाँ आपने किसानों के बच्चों की शिक्षा व उनको नौकरियों में लगाने पर ध्यान दिया, उसी तरह अपने परिवार के बच्चों की शिक्षा पर भी विशेष ध्यान रखा. आपके पाँच पुत्र और चार पुत्रियाँ थी और उनको सबको उच्च शिक्षा दिलवाई. आपके सबसे बड़े पुत्र श्री केसरीमलजी को ऊंची शिक्षा दिलाने के बाद व्यापर के साथ ही जाट बोर्डिंग हाऊस जोधपुर को संभालने का जिम्मा सौंपा. दूसरे पुत्र लालसिंह को ऍम ऐ , एल एल बी करवाने के बाद जोधपुर में हाकिम के पद पर नियुक्त कराया. जिन्होंने राजस्थान में विभिन्न पदों पर रहकर महत्त्व पूर्ण दायित्व निभाया. तीसरे पुत्र गंगासिंह को एल एल बी की शिक्षा दिलाकर वकालत में लगाया और समाज सेवा का अवसर दिया. बाद में गंगाराम चौधरी ने राजनीती में आकर राजस्थान के विभिन्न विभागों में मंत्री रहकर जनता की सेवा की. चोथे पुत्र खंगारमलजी तथा पांचवें पुत्र फतहसिंह्जी को भी उच्च शिक्षा दिलवाई. उस समय आपका परिवार मारवाड़ में काफी बड़ा और प्रगतिशील था.[38]

राजनीती के माध्यम से समाज सेवा

१९५२ के प्रथम आम चुनाव से पहले १९५१ के आख़िर में मारवाड़ किसान सभा व राजस्थान किसान सभा का कांग्रेस में विलय हो जाने पर चौधरी रामदानजी भी कांग्रेस में सम्मिलित हो गए. [39]१९५३ में नया पंचायती राज अधिनियम लागू हुआ. आपके प्रयासों से अनेक किसान सरपंच चुने गए. इसके बाद तहसील पंचायत के चुनाव हुए जिसमें १९५४ में आप बाड़मेर तहसील पंचायत के सरपंच चुने गए. बाड़मेर में १९५३ से १९५५ तक हुए भूमि-बंदोबस्त में भी किसानों का आपने व आपके पुत्र श्री गंगारामजी ने बराबर मार्गदर्शन किया. भूमि के वाजिब लगान निर्धारित करवाए. १९५७ में द्वितीय आम चुनाव में गुडामालानी विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस प्रत्यासी के रूप में चुनाव लड़ा और विजयी रहे. १९५७ से १९६२ तक विधायक रहते बहुत समाज सेवा की. इस दौरान बाड़मेर में डाकू उन्मुलक करवाया तथा जागीर जब्ती क़ानून में जागीरों का अधिग्रहण करवाया. १९५९ में गुडामलानी पंचायत समिती के प्रधान पद पर पुत्र गंगारामजी को निर्वाचित करवाया. १९६० में म्रत्यु-भोज निवारण अधिनियम पास करवाकर बाड़मेर के किसानों को बर्बादी से बचाया. १९६२ में श्री रामदानजी ने राजनीती से सन्यास ले लिया और अपने उत्तराधिकारी के रूप में श्री गंगारामजी चौधरी को १९६२ के तृतीय आम चुनाव में कांग्रेस से गुडामलानी से विधायक जितवाया. बाड़मेर एरिया में आपके द्वारा की गयी सेवा के कारण श्री गंगारामजी बराबर बाड़मेर से चुनाव जीतते रहे तथा राजस्थान सरकार में कई विभागों के मंत्री रहे. [40][41]

रामदानजी के मिशन में सहयोगी

चौधरी रामदानजी के मिशन में सहयोगियों के रूपमें काम कराने वालों में प्रमुख थे[42] -

श्री केसरीमलजी - पुत्र
श्री गंगाराम चौधरी - पुत्र
श्री आईदान भादू - बाड़मेर
चौधरी भीकमचंदजी - बाड़मेर
चौधरी लिखामारामजी - बाड़मेर
चौधरी भेरारामजी - बायतू
अमरारामजी सारण - निवासी सेवाऊ
चौधरी बन्नारम जी जाखड़
अब्दुल हादीजी
मगारामजी

देहांत

इसे महान शिक्षा प्रेमी, किसानों के हितेषी व समाज सुधारक श्री रामदान्जी का २४ अक्टूबर १९६३ को देहावसान हो गया. आपका सच्चा स्मारक बाड़मेर का 'किसान छात्रावास' आपकी सारी यादें समेटे हुए आज भी समाज सेवा के लिए खड़ा है. यहाँ आपकी मूर्ती स्थापित है और छात्रावास के मुख्य द्वार से प्रवेश करने वाला हर आदमी मालानी के इस महापुरुष के दर्शन कर अपने को धन्य समझता है.[43]

चौधरी राम्दांजी के सही मूल्यांकन के लिए २५ जनवरी १९४९ के लोकसुधार जोधपुर के किसान अंक में छपी निम्न पंक्तियाँ उद्धृत करने योग्य हैं -

बाड़मेर के धोरों में, दुनिया की नजर से दूर अती ।
कृषकों को उन्नत करने में, तुम रहते हो वहां चूर जती ।।
जब उनके मन मोर तरसे ।
तुम बादल बन बरसे ।। [44] [45]

लेखक: Laxman Burdak लक्ष्मण बुरड़क

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References
1.↑ Dr Mahendra Singh Arya, Dharmpal Singh Dudee, Kishan Singh Faujdar & Vijendra Singh Narwar: Ādhunik Jat Itihasa (The modern history of Jats), Agra 1998, p. 308
2.↑ ठाकुर देशराज: मारवाड़ का जाट इतिहास, १९५४. पेज १८५-१८६
3.↑ चौधरी गुल्लारामजी स्मृति ग्रन्थ, १९६८, पेज ८३
4.↑ महेश कुमार चौधरी:किसान कर्मवीर चौधरी रामदानजी , पेज ३८-३९
5.↑ डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 118
6.↑ डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 119
7.↑ डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 119
8.↑ डॉ पेमाराम, मारवाड़ में किसान जागृति के कर्णधार जाट, राष्ट्रिय सेमिनार, "लाइफ एंड हिस्ट्री आफ जट्स" , दिल्ली 1998
9.↑ डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 105
10.↑ रिपोर्ट श्री जाट बोर्डिंग हाउस जोधपुर शुरू से ३० जून १९३६ तक, पेज 2
11.↑ डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 106
12.↑ डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 119
13.↑ श्री बल्देवराम मिर्धा, पृ 30
14.↑ आचार्य गोपालप्रसाद कौशिक, चौधरी मूलचंद जी अभिनन्दन ग्रन्थ, १९७६, पेज 149
15.↑ रिपोर्ट श्री जाट बोर्डिंग हाउस जोधपुर शुरू से ३० जून १९३६ तक, पेज 3
16.↑ डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 107
17.↑ रिपोर्ट श्री जाट बोर्डिंग हाउस जोधपुर शुरू से ३० जून १९३६ तक, पेज 38
18.↑ जोधपुर एडमिनिस्ट्रेशन रिपोर्ट, 1939, पेज 45
19.↑ डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 107
20.↑ चौधरी गुल्लारामजी स्मृति ग्रन्थ, १९६८, पेज ८३
21.↑ महेश कुमार चौधरी:किसान कर्मवीर चौधरी रामदानजी , पेज 70-72
22.↑ डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 120
23.↑ डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 121
24.↑ डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 109
25.↑ डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 121
26.↑ डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 122
27.↑ डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 122
28.↑ डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 122
29.↑ डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 120
30.↑ चौधरी गुल्लारामजी स्मृति ग्रन्थ, १९६८, पेज ८३
31.↑ Dr Pema Ram: Agrarian Movement in Rajasthan, p. 238
32.↑ डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 122
33.↑ डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 122
34.↑ ठाकुर देशराज:रियासती भारत के जाट जन सेवक, १९४९, पेज 191
35.↑ महेश कुमार चौधरी:किसान कर्मवीर चौधरी रामदानजी , पेज 205-210
36.↑ डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 123
37.↑ डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 124
38.↑ डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 124
39.↑ डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 125
40.↑ डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 126
41.↑ महेश कुमार चौधरी:किसान कर्मवीर चौधरी रामदानजी , पेज 212-237
42.↑ डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 127
43.↑ डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 126
44.↑ लोकसुधार जोधपुर, २५ जनवरी १९४९
45.↑ डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 127
 
Captain Dilip Singh Ahlawat

Captain Dilip Singh Ahlawat is author of Jat history book in Hindi - "Jat viron ka Itihasa". It is good researched book on history of Jats.

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Saheed Bhagat Singh Sandhu

Bhagat Singh Sandhu (September 28,[1] 1907 - March 23, 1931) was A freedom fighter, considered to be one of the most famous revolutionaries Of the Indian independence movement. For this reason, he is often referred to as Shaheed Bhagat Singh (the word shaheed means "martyr"). He is also believed by many to be one of the earliest Marxism in India.[2] He was one of the leaders and founders of the Hindustan Socialist Republican Association (HSRA).

Born to a family which had earlier been involved in revolutionary activities against the British Raj in India, Bhagat Singh, as a teenager, had studied European revolutionary movements and was attracted to anarchisM and communism.[3] He became involved in numerous revolutionary organizations. He quickly rose in the ranks of the Hindustan Republican Association (HRA) and became one of its leaders, converting it to the HSRA. Singh gained support when he underwent a 63 day fast in jail, demanding equal rights for Indian and British political prisoners. He was hanged for shooting a police officer in response to the killing of veteran social activist Lala Lajpat Rai. His legacy prompted youth in India to begin fighting for Indian independence and also increased the rise of socialism in India.[4]

Early life

On September 28, 1907, Bhagat Singh was born into a Sandhu family to Sardar Kishan Singh Sandhu and Vidyavati in the Khatkar Kalan village near Banga in the present Nawanshahr district in Punjab. http://nawanshahr.nic.in/html/freedom.htm#khatkar[5][6][7] of Punjab. Singh's given name of Bhagat meant "devotee". His family background was that of a patriotic Sikh family which had participated in numerous movements supporting independence of India.[8] His father was influenced by the Hindu reformist Arya Samaj. His uncles, Sardar Ajit Singh and Swaran Singh, as well as his father were both part of the Ghadr Party led by Kartar Singh Sarabha. Ajit Singh was forced to flee to Iran because of pending cases against him while Swaran Singh was hanged.[9][8]

As a child, he was deeply affected by the Jalianwala Bagh Massacre that took place in Punjab in 1919.[9] When Mahatma Gandhi started the Non-Cooperation Movement in 1920, he became an active participant at the age of 13. He had great hopes that Gandhi would bring freedom in India. But he was disappointed when Gandhi called off this movement following the Chauri Chaura riot in 1922. At this point he had openly defied the British and had followed Gandhi's wishes by burning his government-school books and any British-imported clothing. In 1923, Bhagat famously won an essay competition set by the Punjab Hindi Sahitya Sammelan. This grabbed the attention of members of the Punjab Hindi Sahitya Sammelan including its General Secretary Professor Bhim Sen Vidyalankar. At this age, he quoted famous Punjabi literature and discussed the Problems of the Punjab. He read a lot of poetry and literature which was written by Punjabi writers and his favourite poet was an Indian freedom fighter Allama Iqbal from Sialkot.[10]

In his teenage years, Bhagat Singh started studying at the National College in Lahore,[9] but ran away from home to escape early marriage, and became a member of the organization Naujawan Bharat Sabha (Translated to 'Youth Society of India').[9] In the Naujawan Bharat Sabha, Singh and his fellow revolutionaries grew popular amongst the youth. He also joined the Hindustan Republican Association at the request of Professor Vidyalankar, which was then headed by Ram Prasad Bismil and Shahid Ashfaqallah Khan.[9] It is believed that he had knowledge of the Kakori train robbery. He wrote for and edited Urdu and Punjabi newspapers published from Amritsar.[9] In September 1928, a meeting of various revolutionaries from across India was called at Delhi under the banner of the Kirti Kissan Party. Bhagat Singh was the secretary of the meet. His later revolutionary activities were carried out as a leader of this association. The capture and hanging of the main HRA Leaders also allowed him and Sukhdev to be quickly promoted to higher ranks in the party.[8]

Bhagat Singh was hanged with two other revolutionaries - Sukhdev and Rajguru - March 23, 1931 for their involvement in what came to be known as the Lahore conspiracy case.

References

1.↑ Tribune Chandigarh In memory of Bhagat Singh
2.↑ Communist Party of India (Marxist)
3.↑ Revolutionary Democracy IBhagat Singh and the Revolutionary Movement
4.↑ Tribune India What if Bhagat Singh had lived
5.↑ Jang: Pakistan's Number One News Source
6.↑ Bhagat Singh Biography
7.↑ Martyrdom of Shaheed Bhagat Singh
8.↑ 8.0 8.1 8.2 Bharat Desam Biographies Bhagat Signh
9.↑ 9.0 9.1 9.2 9.3 9.4 9.5 Martyrdom of Sardar Bhagat Singh by Jyotsna Kamat. Cited by University of California Berkely Library on South Asian History
10.↑ Bhagat Singh Documents Problems of the Punjab
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