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एक बार बन्सीलाल जी ने चौधरी चरण सिंह के बारे में कहा था - "यो चौधरी बुळहद (बैल) तै सै हरयाणे का, पर इसनैं चारा खा-राख्या सै यू.पी. का - कदे-ना-कदे बसकैगा !"
पर याह बात म्हारै जच्ची नहीं । जाट तै जाट हो-सै चाहे कित्तै का बी हो ।
उन्हैं दिनां की बात - मैं नजफगढ (दिल्ली) से एक बारात में चला गया जो यू.पी में गई थी - जिला बाघपत के एक गाम मैं । बारात बाघपत पहुंच गई और् जब बारात को खाने पै बुलाया गया तो बाजे-वाले भी बरातियां के साथ खाण बैठ गये (वे बाजे वाले बारात के साथ ही नजफगढ से गये थे) ।
फिर क्या था - उस गाम के एक टोपी वाले ताऊ नै ठाई लाठी और बोल्या - अबे साले बाजे वाले, थारी ऐसी हिम्मत बारात के साथ वाली पंगत (लाइन) में बैठ गये .. तेरी तो....!!! और फिर वो बाजे वाले उन यू.पी. वाले जाट्टां नैं बाहर गळी में गंदी नाळी के पास बैठा दिये और उनको वहीं बैठ कर खाना पड़ा !!
म्हारे एक आदमी नै उन यू.पी. वाले रिश्तेदारों से कहा - "चौधरियो, जाण दो, ये बाजे वाले भी म्हारी और थारी तरह आदमी सैं ।" इतना सुण कै तै वे चिंग्गर-गे और बोल्ले - "आप लोगों को किसी की लिहाज-सरम है के नहीं ? हमें पहले पता होता कि आप लोगों के ऐसे विचार हैं तो हम ये रिश्ता ही नहीं करते !"
हम सब को उनसे माफी मांगनी पड़ी। फिर एक हमारी बारात का दिल्ली वाला जाट बोल्या "चौधरियो, थारा भोत शुक्रिया, तमनैं काट्या रोग - ये सुसरे बाजे-आळे सूधे कर दिये । इन्हैं म्हारा भोत खून खा राख्या था - म्हारै आगै बड्डे नखरे कर-रहे थे !!"
और बाद में एक हरयाणा का चौधरी बोल्या : "भाई, यो बंसीलाल तै झूठ बोल्लै था, ये यू.पी. आळे जाट तै म्हारे बी फूफा सैं !!"
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एक बार बन्सीलाल जी ने चौधरी चरण सिंह के बारे में कहा था - "यो चौधरी बुळहद (बैल) तै सै हरयाणे का, पर इसनैं चारा खा-राख्या सै यू.पी. का - कदे-ना-कदे बसकैगा !"
पर याह बात म्हारै जच्ची नहीं । जाट तै जाट हो-सै चाहे कित्तै का बी हो ।
उन्हैं दिनां की बात - मैं नजफगढ (दिल्ली) से एक बारात में चला गया जो यू.पी में गई थी - जिला बाघपत के एक गाम मैं । बारात बाघपत पहुंच गई और् जब बारात को खाने पै बुलाया गया तो बाजे-वाले भी बरातियां के साथ खाण बैठ गये (वे बाजे वाले बारात के साथ ही नजफगढ से गये थे) ।
फिर क्या था - उस गाम के एक टोपी वाले ताऊ नै ठाई लाठी और बोल्या - अबे साले बाजे वाले, थारी ऐसी हिम्मत बारात के साथ वाली पंगत (लाइन) में बैठ गये .. तेरी तो....!!! और फिर वो बाजे वाले उन यू.पी. वाले जाट्टां नैं बाहर गळी में गंदी नाळी के पास बैठा दिये और उनको वहीं बैठ कर खाना पड़ा !!
म्हारे एक आदमी नै उन यू.पी. वाले रिश्तेदारों से कहा - "चौधरियो, जाण दो, ये बाजे वाले भी म्हारी और थारी तरह आदमी सैं ।" इतना सुण कै तै वे चिंग्गर-गे और बोल्ले - "आप लोगों को किसी की लिहाज-सरम है के नहीं ? हमें पहले पता होता कि आप लोगों के ऐसे विचार हैं तो हम ये रिश्ता ही नहीं करते !"
हम सब को उनसे माफी मांगनी पड़ी। फिर एक हमारी बारात का दिल्ली वाला जाट बोल्या "चौधरियो, थारा भोत शुक्रिया, तमनैं काट्या रोग - ये सुसरे बाजे-आळे सूधे कर दिये । इन्हैं म्हारा भोत खून खा राख्या था - म्हारै आगै बड्डे नखरे कर-रहे थे !!"
और बाद में एक हरयाणा का चौधरी बोल्या : "भाई, यो बंसीलाल तै झूठ बोल्लै था, ये यू.पी. आळे जाट तै म्हारे बी फूफा सैं !!"
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