Vande Mataram V/S Jan Gan Man

rajpaldular

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आज मैं वन्दे मातरम और जन गण मन की कहानी आप लोगों के सामने लाया हूँ आशा है कि आप लोगों को पसंद आएगी |
वन्दे मातरम Vs जन गण मन

ये वन्दे मातरम नाम का जो गान है जिसे हम राष्ट्रगान के रूप में जानते हैं उसे बंकिम चन्द्र चटर्जी ने 7 नवम्बर 1875 को लिखा था | बंकिम चन्द्र चटर्जी बहुत ही क्रांतिकारी विचारधारा के व्यक्ति थे | देश के साथ-साथ पूरे बंगाल में उस समय अंग्रेजों के विरुद्ध एक विशाल आन्दोलन चल रहा था और एक बार ऐसे ही विरोध आन्दोलन में भाग लेते समय इन्हें बहुत चोट लगी और बहुत से उनके मित्रों की मृत्यु भी हो गयी | इस एक घटना ने उनके मन में ऐसा गहरा घाव किया कि उन्होंने आजीवन अंग्रेजों के विरूद्ध लड़ने का संकल्प ले लिया | तत्पश्चात उन्होंने एक उपन्यास लिखा जिसका नाम था "आनंदमठ", जिसमे उन्होंने अंग्रेजों के विरूद्ध बहुत कुछ लिखा, उन्होंने बताया कि अंग्रेज देश को कैसे लूट रहे है, ईस्ट इंडिया कंपनी भारत से कितना पैसा ले के जा रही है, भारत के लोगों को वो कैसे मूर्ख बना रहे हैं, ये सब बातें उन्होंने उस पुस्तक में लिखा | वो उपन्यास उन्होंने जब लिखा तब अंग्रेजी सरकार ने उसे प्रतिबंधित कर दिया | जिस प्रेस में छपने के लिए वो गया वहां अंग्रेजों ने ताला लगवा दिया | तो बंकिम दा ने उस उपन्यास को कई टुकड़ों में बांटा और भिन्न-भिन्न स्थानों से उसे छपवाया और फिर सब को जोड़ के प्रकाशित करवाया | अंग्रेजों ने उन सभी प्रतियों को जलवा दिया फिर छपा और फिर जला दिया गया, ऐसे करते करते सात वर्ष के पश्चात 1882 में वो ठीक से छ्प के बाजार में आया और उसमे उन्होंने जो कुछ भी लिखा उसने पूरे देश में एक लहर पैदा की | आरम्भ में तो ये बंगला में लिखा गया था, उसके बाद ये हिंदी में अनुवादित हुआ और उसके बाद, मराठी, गुजराती और अन्य भारतीय भाषाओँ में ये छपी और वो भारत की ऐसी पुस्तक बन गयी जिसे रखना हर क्रन्तिकारी के लिए गौरव की बात हो गयी थी | इसी पुस्तक में उन्होंने जगह जगह वन्दे मातरम का घोष किया है और ये उनकी भावना थी कि लोग भी ऐसा करेंगे | बंकिम बाबू की एक बेटी थी जो ये कहती थी कि आपने इसमें बहुत कठिन शब्द डाले है और ये लोगों को पसंद नहीं आयेगी तो बंकिम बाबू कहते थे कि अभी तुमको संभवतः समझ में नहीं आ रहा है पर ये गान कुछ दिन में देश की हर जीभ पर होगा, लोगों में भावना उत्पन्न करेगी और ये एक दिन इस देश का राष्ट्रगान बनेगा | ये गान देश का राष्ट्रगान बना परन्तु ये देखने के लिए बंकिम बाबू जीवित नहीं थे पर जो उनकी सोच थी वो अक्षरसः सही सिद्ध हुई | 1905 में ये वन्दे मातरम इस देश का राष्ट्रगान बन गया | 1905 में क्या हुआ था कि अंग्रेजों की सरकार ने बंगाल का बंटवारा कर दिया था | अंग्रेजों का एक अधिकारी था कर्जन जिसने बंगाल को दो भागों में बाँट दिया था, एक पूर्वी बंगाल और एक पश्चिमी बंगाल | इस बंटवारे का सबसे बड़ा दुर्भाग्य ये था कि ये धर्म के नाम पर हुआ था, पूर्वी बंगाल मुसलमानों के लिए था और पश्चिमी बंगाल हिन्दुओं के लिए, इसी को हमारे देश में बंग-भंग के नाम से जाना जाता है | ये देश में धर्म के नाम पर पहला बंटवारा था उसके पहले कभी भी इस देश में ऐसा नहीं हुआ था, मुसलमान शासकों के समय भी ऐसा नहीं हुआ था | जो भी हुआ ...............इस बंगाल बंटवारे का पूरे देश में जम कर विरोध हुआ था , उस समय देश के तीन बड़े क्रांतिकारियों (लाल, बाल और पाल) लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और बिपिन चन्द्रपाल ने इसका जम के विरोध किया और इस विरोध के लिए उन्होंने वन्दे मातरम को आधार बनाया | और 1905 से हर सभा में, हर कार्यक्रम में ये वन्देमातरम गाया जाने लगा | कार्यक्रम के आरम्भ में भी और अंत में भी | धीरे धीरे ये इतना प्रचलित हुआ कि अंग्रेज सरकार इस वन्दे मातरम से चिढने लगी | अंग्रेज जहाँ इस गीत को सुनते, बंद करा देते थे और और गाने वालों को जेल में डाल देते थे, इससे भारत के क्रांतिकारियों को और अधिक जोश आता था और वो इसे और जोश से गाते थे | एक क्रन्तिकारी थे इस देश में जिनका नाम था खुदीराम बोस, ये पहले क्रन्तिकारी थे जिन्हें सबसे कम उम्र में फाँसी की सजा दी गयी थी | मात्र 14 वर्ष की आयु में उसे फाँसी के फंदे पर लटकाया गया था और हुआ ये कि जब खुदीराम बोस को फाँसी के फंदे पर लटकाया जा रहा था तो उन्होंने फाँसी के फंदे को अपने गले में वन्दे मातरम कहते हुए पहना था | इस एक घटना ने इस गीत को और लोकप्रिय कर दिया था और इस घटना के पश्चात जितने भी क्रांतिकारी हुए उन सब ने जहाँ अवसर मिला वहीं ये घोष करना प्रारंभ किया चाहे वो भगत सिंह हों, राजगुरु हों, अशफाकुल्लाह हों, चंद्रशेखर हों सब की जीभ पर मंत्र हुआ करता था | ये वन्दे मातरम इतना आगे बढ़ा कि आज इसे देश का बच्चा बच्चा जानता है | कुछ वर्ष पहले इस देश के सूचना विभाग (Information bureau) ने एक सर्वे कराया जिसमे देश के लोगों से ये पूछा था कि देश का कौन सा गीत सबसे अधिक पसंद है आपको, तो सबसे अधिक लोगों ने वन्दे मातरम को पसंद किया था और फिर इसी विभाग ने पाकिस्तान और बंग्लादेश में यही सर्वे कराया तो वहां भी ये सबसे लोकप्रिय पाया गया था | इंग्लैंड की एक संस्था है बीबीसी उसने भी अपने सर्वे में पाया कि वन्दे मातरम विश्व का दूसरा सबसे लोकप्रिय गीत है |
 
जन गण मन की कहानी

सन 1911 तक भारत की राजधानी बंगाल हुआ करती थी | सन 1905 में जब बंगाल विभाजन को लेकर अंग्रेजो के विरूद्ध बंग-भंग आन्दोलन के विरोध में बंगाल के लोग उठ खड़े हुए तो अंग्रेजो ने अपने आपको बचाने के लिए कलकत्ता से हटाकर राजधानी को दिल्ली ले गए और 1911 में दिल्ली को राजधानी घोषित कर दिया | पूरे भारत में उस समय लोग विद्रोह से भरे हुए थे तो अंग्रेजो ने अपने इंग्लॅण्ड के राजा को भारत आमंत्रित किया ताकि लोग शांत हो जाये | इंग्लैंड का राजा जोर्ज पंचम 1911 में भारत में आया | रविंद्रनाथ टैगोर पर दबाव बनाया गया कि आपको एक गीत जोर्ज पंचम के स्वागत में लिखना ही होगा | उस समय टैगोर का परिवार अंग्रेजों के निकट हुआ करता था, उनके परिवार के बहुत से लोग ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए काम किया करते थे, उनके बड़े भाई अवनींद्र नाथ टैगोर बहुत दिनों तक ईस्ट इंडिया कंपनी के कलकत्ता डिविजन के निदेशक (Director) रहे | उनके परिवार का बहुत पैसा ईस्ट इंडिया कंपनी में लगा हुआ था | और स्वयं रविन्द्र नाथ टैगोर की बहुत सहानुभूति थी अंग्रेजों के लिए | रविंद्रनाथ टैगोर ने मन से अथवा बेमन से जो गीत लिखा उसके बोल है "जन गण मन अधिनायक जय हे भारत भाग्य विधाता" | इस गीत के सारे के सारे शब्दों में अंग्रेजी राजा जोर्ज पंचम का गुणगान है, जिसका अर्थ समझने पर पता लगेगा कि ये तो वास्तव में ही अंग्रेजो की खुशामद में लिखा गया था | इस राष्ट्रगान का अर्थ कुछ इस तरह से होता है:-

"भारत के नागरिक, भारत की जनता अपने मन से आपको भारत का भाग्य विधाता समझती है और मानती है | हे अधिनायक (Superhero) तुम्ही भारत के भाग्य विधाता हो | तुम्हारी जय हो ! जय हो ! जय हो ! तुम्हारे भारत आने से सभी प्रान्त पंजाब, सिंध, गुजरात, मराठा मतलब महारास्त्र, द्रविड़ मतलब दक्षिण भारत, उत्कल मतलब उड़ीसा, बंगाल आदि और जितनी भी नदिया जैसे यमुना और गंगा ये सभी हर्षित है, खुश है, प्रसन्न है , तुम्हारा नाम लेकर ही हम जागते है और तुम्हारे नाम का आशीर्वाद चाहते है | तुम्हारी ही हम गाथा गाते है | हे भारत के भाग्य विधाता (सुपर हीरो ) तुम्हारी जय हो जय हो जय हो | "

जोर्ज पंचम भारत आया 1911 में और उसके स्वागत में ये गीत गाया गया | जब वो इंग्लैंड चला गया तो उसने उस जन गण मन का अंग्रेजी में अनुवाद करवाया | क्योंकि जब भारत में उसका इस गीत से स्वागत हुआ था तब उसके समझ में नहीं आया था कि ये गीत क्यों गाया गया और इसका अर्थ क्या है ? जब अंग्रेजी अनुवाद उसने सुना तो वह बोला कि इतना सम्मान और इतनी खुशामद तो मेरी आज तक इंग्लॅण्ड में भी किसी ने नहीं की | वह बहुत प्रसन्न हुआ | उसने आदेश दिया कि जिसने भी ये गीत उसके (जोर्ज पंचम के) लिए लिखा है उसे इंग्लैंड बुलाया जाये | रविन्द्र नाथ टैगोर इंग्लैंड गए | जोर्ज पंचम उस समय नोबल पुरस्कार समिति का अध्यक्ष भी था | उसने रविन्द्र नाथ टैगोर को नोबल पुरस्कार से सम्मानित करने का निर्णय लिया | तो रविन्द्र नाथ टैगोर ने इस नोबल पुरस्कार को लेने से मना कर दिया | क्यों कि "लाल-बाल-पाल" ने बहुत बुरी तरह से रविन्द्रनाथ टेगोर को उनके इस गीत के लिए खूब डांटा था | टैगोर ने कहा कि आप मुझे नोबल पुरस्कार देना ही चाहते हैं तो मैंने एक गीतांजलि नामक रचना लिखी है उस पर मुझे दे दो पर इस गीत के नाम पर मत दो और यही प्रचारित किया जाये क़ि मुझे जो नोबेल पुरस्कार दिया गया है वो गीतांजलि नामक रचना के ऊपर दिया गया है | जोर्ज पंचम मान गया और रविन्द्र नाथ टैगोर को सन 1913 में गीतांजलि नामक रचना के ऊपर नोबल पुरस्कार दिया गया |

रविन्द्र नाथ टैगोर की ये सहानुभूति समाप्त हुई सन 1919 में जब जलियाँ वाला कांड हुआ और "लाल-बाल-पाल" ने लगभग गाली की भाषा में उनको पत्र लिखा और कहा क़ि अभी भी तुम्हारी आँखों से अंग्रेजियत का पर्दा नहीं उतरेगा तो कब उतरेगा, तुम अंग्रेजों के इतने चाटुकार कैसे हो गए, तुम इनके इतने समर्थक कैसे हो गए ? तब जाकर रविंद्रनाथ टैगोर की नीद खुली | इस काण्ड का टैगोर ने विरोध किया और नोबल पुरस्कार अंग्रेजी सरकार को लौटा दिया | सन 1919 से पहले जितना कुछ भी रविन्द्र नाथ टैगोर ने लिखा वो अंग्रेजी सरकार के पक्ष में था और 1919 के बाद उनके लेख कुछ कुछ अंग्रेजो के विरूद्ध होने लगे थे | रविन्द्र नाथ टेगोर के बहनोई, सुरेन्द्र नाथ बनर्जी लन्दन में रहते थे और ICS ऑफिसर थे | अपने बहनोई को उन्होंने एक पत्र लिखा था (ये 1919 के बाद की घटना है) | इसमें उन्होंने लिखा है कि ये गीत 'जन गण मन' अंग्रेजो के द्वारा मुझ पर दबाव डलवाकर लिखवाया गया है | इसके शब्दों का अर्थ अच्छा नहीं है | इस गीत को नहीं गाया जाये तो अच्छा है | पर अंत में उन्होंने लिख दिया कि इस चिठ्ठी को किसी को नहीं दिखाए क्योंकि मैं इसे केवल आप तक सीमित रखना चाहता हूँ परन्तु जब कभी मेरी म्रत्यु हो जाये तो सबको बता दे | 7 अगस्त 1941 को रबिन्द्र नाथ टैगोर की मृत्यु के पश्चात इस पत्र को सुरेन्द्र नाथ बनर्जी ने ये पत्र सार्वजनिक किया, और सारे देश को ये कहा क़ि ये जन गन मन गीत न गाया जाये |

1941 तक कांग्रेस पार्टी थोड़ी उभर चुकी थी | पर वह दो खेमो में विभाजित हो गई | जिसमे एक खेमे के समर्थक बाल गंगाधर तिलक थे और दुसरे खेमे में मोती लाल नेहरु थे | मतभेद था सरकार बनाने को लेकर | मोती लाल नेहरु चाहते थे कि स्वतंत्र भारत की सरकार अंग्रेजो के साथ कोई संयोजक सरकार (Coalition Government) बने | जबकि गंगाधर तिलक कहते थे कि अंग्रेजों के साथ मिलकर सरकार बनाना तो भारत के लोगों को धोखा देना है | इस मतभेद के कारण लोकमान्य तिलक कांग्रेस से निकल गए और उन्होंने गरम दल बनाया | कोंग्रेस के दो भाग हो गए | एक नरम दल और एक गरम दल | गरम दल के नेता थे लोकमान्य तिलक जैसे क्रन्तिकारी | वे हर जगह वन्दे मातरम गाया करते थे | और नरम दल के नेता थे मोती लाल नेहरु | परन्तु नरम दल वाले अधिकतर अंग्रेजो के साथ रहते थे | उनके साथ रहना, उनको सुनना, उनकी बैठकों में शामिल होना | हर समय अंग्रेजो से समझौते में रहते थे | वन्देमातरम से अंग्रेजो को बहुत चिढ होती थी | नरम दल वाले गरम दल को चिढाने के लिए 1911 में लिखा गया गीत "जन गण मन" गाया करते थे और गरम दल वाले "वन्दे मातरम" | नरम दल वाले अंग्रेजों के समर्थक थे और अंग्रेजों को ये गीत पसंद नहीं था तो अंग्रेजों के कहने पर नरम दल वालों ने उस समय एक हवा उड़ा दी कि मुसलमानों को वन्दे मातरम नहीं गाना चाहिए क्यों कि इसमें बुतपरस्ती (मूर्ति पूजा) है | और आप जानते है कि मुसलमान मूर्ति पूजा के कट्टर विरोधी हैं | उस समय मुस्लिम लीग भी बन गई थी जिसका प्रमुख मोहम्मद अली जिन्ना था | उसने भी इसका विरोध करना आरम्भ कर दिया क्योंकि जिन्ना भी देखने भर को (उस समय तक) भारतीय था मन,कर्म और वचन से अंग्रेज ही था उसने अंग्रेजों के इशारे पर ये कहना शुरू किया और मुसलमानों को वन्दे मातरम गाने से मना कर दिया | जब भारत सन 1947 में स्वतंत्र हो गया तो जवाहर लाल नेहरु ने इसमें राजनीति कर डाली | संविधान सभा की बहस चली | संविधान सभा के 319 में से 318 सांसद ऐसे थे जिन्होंने बंकिम बाबु द्वारा लिखित वन्देमातरम को राष्ट्र गान स्वीकार करने पर सहमति जताई | बस एक सांसद ने इस प्रस्ताव को नहीं माना | और उस एक सांसद का नाम था पंडित जवाहर लाल नेहरु | उनका तर्क था कि वन्दे मातरम गीत से मुसलमानों के मन को चोट पहुचती है इसलिए इसे नहीं गाना चाहिए (वास्तव में इस गीत से मुसलमानों को नहीं अंग्रेजों के मन को चोट पहुंचती थी) | अब इस झगडे का निर्णय कौन करे, तो वे पहुचे गाँधी जी के पास | गाँधी जी ने कहा कि जन गन मन के पक्ष में तो मैं भी नहीं हूँ और तुम (नेहरु ) वन्देमातरम के पक्ष में नहीं हो तो कोई तीसरा गीत तैयार किया जाये | तो महात्मा गाँधी ने तीसरा विकल्प झंडा गान के रूप में दिया "विजयी विश्व तिरंगा प्यारा झंडा ऊँचा रहे हमारा" | परन्तु नेहरु जी उस पर भी तैयार नहीं हुए | नेहरु जी का तर्क था कि झंडा गान ओर्केस्ट्रा पर नहीं बज सकता और जन गन मन ओर्केस्ट्रा पर बज सकता है | उस समय बात नहीं बनी तो नेहरु जी ने इस मुद्दे को गाँधी जी की मृत्यु तक टाले रखा और उनकी मृत्यु के बाद नेहरु जी ने जन गण मन को राष्ट्र गान घोषित कर दिया और हठात भारतीयों पर इसे थोप दिया गया जबकि इसके जो बोल है उनका अर्थ कुछ और ही कहानी प्रस्तुत करते हैं, और दूसरा पक्ष रुष्ट न हो इसलिए वन्दे मातरम को राष्ट्रगीत बना दिया गया पर कभी गाया नहीं गया | नेहरु जी कोई ऐसा काम नहीं करना चाहते थे जिससे कि अंग्रेजों के ह्रदय को चोट पहुंचे, मुसलमानों के वो इतने समर्थक कैसे हो सकते थे जिस आदमी ने पाकिस्तान बनवा दिया जब कि इस देश के मुसलमान पाकिस्तान नहीं चाहते थे, जन गण मन को इस लिए महत्त्व दिया गया क्योंकि वो अंग्रेजों की भक्ति में गाया गया गीत था और वन्देमातरम इसलिए पीछे रह गया क्योंकि इस गीत से अंगेजों को पीड़ा होती थी |

बीबीसी ने एक सर्वे किया था | उसने पूरे संसार में जितने भी भारत के लोग रहते थे, उनसे पूछा कि आपको दोनों में से कौन सा गीत अधिक पसंद है तो 99 % लोगों ने कहा वन्देमातरम | बीबीसी के इस सर्वे से एक बात और स्पष्ट हुई कि संसार के सबसे लोकप्रिय गीतों में दूसरे नंबर पर वन्देमातरम है | कई देश हैं जिनके लोगों को इसके बोल समझ में नहीं आते हैं वो कहते हैं कि इसमें जो लय है उससे एक जोश उत्पन्न होता है |

तो ये इतिहास है वन्दे मातरम का और जन गण मन का | अब ये आप को निश्चित करना है कि आपको क्या गाना है ?

इतने लम्बे लेख को आपने धैर्यपूर्वक पढ़ा इसके लिए आपको बहुत बहुत साधुवाद |
 
prashantacmet




Join Date Oct 2005 Location Dhanaura-tikri(Baraut) Posts 2,205 Full Name Prashant Vaidwan


Mr. Prashant Vaidwan ! I am waiting for your comments !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
 
राजपाल जी इसमें एक तथ्य और छूट गया ह | जार्ज पंचम की सवागत कमिटी के अध्यक्ष पद पर उस समय जवाहरलाल नेहरु के पिता मोतीलाल नेहरु थे .|
 
राजपाल जी इसमें एक तथ्य और छूट गया ह | जार्ज पंचम की सवागत कमिटी के अध्यक्ष पद पर उस समय जवाहरलाल नेहरु के पिता मोतीलाल नेहरु थे .|

जी हाँ जी हाँ रविन्द्र जीत सिंह जी ! बिलकुल सही मोतीलाल नेहरु जोर्ज पंचम की स्वागत कमेटी का अध्यक्ष था...धन्यवाद.
 
अत्यंत ही चिंताजनक !!
जिस राष्ट्र गान को गाना मै आज तक भारत माता का गुणगान करना समझता रहा क्या वास्तव में उसकी हकीकत यही है?
अविश्विस्नीय !! अपने अंतर्मन को कमजोर सा महसूस कर रहा हु!
 
अधिनायक का मतलब नरेश(राजा) होता हे राजपाल जी superhero नहीं
 
विपिन ज्यानी जी अधिनायक का अर्थ 'super hero' ही होता है, वैसे आप अपने हिसाब से कुछ भी 'अर्थ' निकल सकते हैं, आप भी स्वतंत्र भारत के एक सम्माननीय नागरिक हैं.
 
अधिनायक एक बहोत पुराना शब्द हे कोई हिंदी की किताब उठा के देख लो इसका मतलब. हालाँकि मेरा उदेश्ये आप को गलत साबित करना नहीं था जैसा आपने लिया हे



मुझे पता हे ये लेख आपका नहीं हे कहीं से कॉपी-पेस्ट किया हुआ हे इसलिए आप मेरी पोस्ट को अपने मन पर मत लें



अधिनायक का मतलब किसी हिंदी जानकर से पूछना वो बताएगा नरेश. इसे नेता के लिए भी पर्योग कर सकते हे. Superhero उस ज़माने में कहाँ से आ गए ये तो एक बहोत नया शब्द हे
 
विपिन ज्यानी जी अधिनायक का अर्थ 'SUPER HERO' ही होता है, अब मैं विवाद में नहीं पड़ना चाहता, और रही बात 'copy paste की तो लगे हाथ 'source भी बता दीजिये. आपको बताना होगा कि मैंने कहाँ से कॉपी पेस्ट किया है?
 
जो बात आपने बताई हे वो काफी लोगों को पहले से ही पता थी ये ही कारण हे के ये गान तमिल लोग नहीं गाते कौनकी ये अँगरेज़ अधिनायक(king) के लिए लिखा गया था न की superhero के लिए.
 
विपिन ज्यानी जी अधिनायक का अर्थ 'SUPER HERO' ही होता है, अब मैं विवाद में नहीं पड़ना चाहता, और रही बात 'copy paste की तो लगे हाथ 'source भी बता दीजिये. आपको बताना होगा कि मैंने कहाँ से कॉपी पेस्ट किया है?

भाई आपने पहले कॉपी-पेस्ट यहाँ पोस्ट किये हे के मेने समजा ये भी कॉपी-पेस्ट हे अगर नहीं हे तो आप तारीफ के काबिल हे ऐसा लेख लिखने के लिए
 
विपिन ज्यानी जी अधिनायक का अर्थ 'SUPER HERO' ही होता है, अब मैं विवाद में नहीं पड़ना चाहता, और रही बात 'copy paste की तो लगे हाथ 'source भी बता दीजिये. आपको बताना होगा कि मैंने कहाँ से कॉपी पेस्ट किया है?

Author Ravi Verma. http://www.bhadas4media.com/article-comment/10881-vandematram-vs-janganman.html

Further Ravi verma too changed it. Some Rajiv dixit supposed to write it.

http://www.rajivdixit.com/?p=30
 
Last edited:
ले भाई समर या तो कती घिसी होगई. भाई का कांफिडेंस देख के में सोचा इबके तो भाई ने खुदे लिखा हे
 
रवि वर्मा मेरे मित्र हैं, मुझे वो नियमित रूप से मेल करते रहते हैं, जो लेख मुझे अच्छा लगता है उसको मैं और अधिक आकर्षक बनाकर (उर्दू के शब्दों को मिटाकर, हिंदी के शब्द सम्मिलित करके) आपके सामने प्रस्तुत करता हूँ. मुझे पहले ही जाटलैंड.कॉम पर मेरे एक परम मित्र ने चेता दिया था कि कुछ सदस्यों का काम ही यही है कि टांग खींचना.
 
रवि वर्मा मेरे मित्र हैं, मुझे वो नियमित रूप से मेल करते रहते हैं, जो लेख मुझे अच्छा लगता है उसको मैं और अधिक आकर्षक बनाकर (उर्दू के शब्दों को मिटाकर, हिंदी के शब्द सम्मिलित करके) आपके सामने प्रस्तुत करता हूँ. मुझे पहले ही जाटलैंड.कॉम पर मेरे एक परम मित्र ने चेता दिया था कि कुछ सदस्यों का काम ही यही है कि टांग खींचना.
Very nice article Rajpal ji. Though I was aware of the origin and meaning of both, but still found some new information in your article. Bankim Chandra was a wonderful author and I have read most of his work. The books I liked are "AnandMath","Devi Chaudharani", "Kapal Kundla". Anand Math was a must read book for all freedom fighters. Have read somewhere that Chandra Shekhar Azad used to ensure that everyone who joins HSRA read Aaryabhivinaya by Swami Dayanand and Anand Math.
 
राजपाल जी टांग खींचनी तो आपने शुरु करी थी में तो सिर्फ नु कहूँ था के अधिनायक का मतलब नरेश होवे स हर इस बात त तो आपके लेख का तर्क मजबूत ही होवे स पर क्योंकि आपने ये लेख नहीं लिखा आप इस बात न ना समज पाए ह़र आपने नु लागा में आप्के लेख का विरोध कर रहा हूँ . आपको तो राजी और होना चाहिए था के एक पॉइंट और मिल गया.



रही कॉपी पेस्ट की बात तो मेने इस्ते कोई दिकत ना हे जब तक असली लेखक न उसका श्रेय मिलता रवे. या बात मेने आप ति एक ब पहली भी कई थी
 
कोए ना भाइयो ,या सारी दुनिया कोपी-पेस्ट स | आपां भी आपने माँ-बाप के कोपी-पेस्ट सां | किम्मे ना किम्मे ज्ञान -ए तो मिले स | चालणं द्यो |
 
मुझे समाज नहीं आता कि ये किस तरह के लोग होते हैं जिन्हें असत्य फैलाने मैं मज़ा आता है. अगर उससे कुछ फायदा निकालता हो, तो समझ में आता. पर इस बकवास से क्या फायदा निकल सकता है?

जन गन मन पे विवाद बहुत पुराना है. ऐसी मास मेल मुझे आज से दस साल पहले आती थी. पर यह लेख खासम ख़ास है. क्यूंकि इसने पुराने विवाद में अपनी तरफ से खूब मसाला लगाया है. एक तरह से तो में इसका शुक्र गुज़ार हूँ. क्यूंकि इतनी बकवास पढ़ के ही मेरी जिगयासा जागी.

१. नोबल समिति का chairman Harald Hjärne था. ये आज भी उनकी वेबसाइट पे देखा जा सकता है. आपने इंग्लैंड के राजा को ही chairman घोषित कर दिया!
http://nobelprize.org/nobel_prizes/literature/laureates/1913/press.html

२. लाल बाल पाल ने tagore को डांटा इसका कोई सबूत है?

३. ये कौनसी चिट्ठी और कौनसे सुरेन्द्र नाथ बनर्जी हैं? आश्चर्य कि बात है कि उन्होनें इतनी बड़ी पोल खोली, पर न वोह और न ये चिट्ठी कहीं ढूँढने से भी नहीं मिल रही है.

४. १९४१ में तिलक और मोतीलाल कहाँ से आ गए? लगता है ये तो मसाला फैक्ट्री में जल्दी लिखने के कारण से चूक हो गयी. इस्पे विशेष टिप्पणी नहीं करूंगा :)

५. ३१९ में से ३१८ वन्दे मातरम के पक्ष में थे? पक्का? अकेले नेहरु ने सबको रोक लिया! लगता है आपकी कहानी का अधिनायक (superhero ) तो नेहरु होना चाहिए. वैसे इस बात का कोई तथ्य? ३१९ में कई मुसलमान भी रहे होंगे- सारे वन्दे मातरम के पक्ष में थे?

६. आखिर में तो इस लेख ने गज़ब ही ढा दिया. "बीबीसी ने पूरे संसार में जितने भी भारत के लोग रहते थे, उनसे पूछा"- वाह! इलेक्शन भी बीबीसी से ही करा लेने चाहिए, अगर उसकी पहुच इतनी तगड़ी है. और परिणाम भी ऐसा आया जैसे सद्दाम के इराक में आया करते थे- ९९%.

मेरे ख्याल से लेखक को फिल्मों कि कहानी लिखनी चाहिए. कहाँ उल-जुलूल उछलने में समय बर्बाद कर रहा है.
 
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