Vigyan aur Dharm !!!!!!!

प्राचीन अरबी काव्य संग्रह गंथ ‘सेअरूल-ओकुल’ के 257वें पृष्ठ पर हजरतमोहम्मद से 2300 वर्ष पूर्व एवं ईसा मसीह से 1800 वर्ष पूर्व उत्पन्न हुए लबी-बिन-ए-अरव्तब-बिन-ए-तुरफा ने अपनी सुप्रसिद्ध कविता में भारत भूमि एवं वेदों को जो सम्मान दिया है, वह इस प्रकार है- “अया मुबारेकल अरज मुशैये नोंहा मिनार हिंदे. व अरादकल्लाह मज्जोनज्ज... जिकरतुन।1। वह लवज्जलीयतुन ऐनाने सहबी अरवे अतुन जिकरा. वहाजेही योनज्जेलुर्ररसूल मिनल हिंदतुन।२. यकूलूनल्लाहः या अहलल अरज आलमीन फुल्लहुम. फत्तेबेऊ जिकरतुल वेद हुक्कुन मालन योनज्वेलतुन।3। वहोबा आलमुस्साम वल यजुरमिनल्लाहे तनजीलन। फऐ नोमा या अरवीयो मुत्तवअन योवसीरीयोनजातुन।4। जइसनैन हुमारिक अतर नासेहीन का-अ-खुबातुन। व असनात अलाऊढ़न व होवा मश-ए-रतुन।5।” अर्थात-(1) हे भारत की पुण्य भूमि (मिनार हिंदे) तू धन्य है, क्योंकि ईश्वरने अपने ज्ञान के लिए तुझको चुना। (2) वह ईश्वर का ज्ञान प्रकाश, जो चार प्रकाश स्तम्भों के सदृश्य सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करता है, यह भारतवर्ष (हिंद तुन) में ऋषियों द्वारा चार रूप में प्रकट हुआ। (3) और परमात्मा समस्त संसार के मनुष्यों को आज्ञा देता है कि वेद, जो मेरे ज्ञान है, इनके अनुसार आचरण करो।(4) वह ज्ञान के भण्डार साम और यजुर है, जो ईश्वर ने प्रदान किये. इसलिए, हे मेरे भाइयों! इनको मानो, क्योंकि ये हमें मोक्ष का मार्ग बताते है।(5) और दो उनमें से रिक्, अतर (ऋग्वेद, अथर्ववेद) जो हमें भ्रातृत्व की शिक्षा देते हैं, और जो इनकी शरण में आ गया, वह कभी अन्धकार को प्राप्त नहीं होता।



इस्लाम धर्म का प्रवर्तक मोहम्मद स्वयं भी वैदिक परिवार में हिन्दू के रूप में जन्मा था, और जब उसने अपने हिन्दू परिवार की परम्परा और वंश से संबंध तोड़ने और स्वयं को पैगम्बर घोषित करना निश्चित किया, तब संयुक्त हिन्दू परिवार छिन्न-भिन्न हो गया और काबा में स्थित महाकाय शिवलिंग (संगेअस्वद) के रक्षार्थ हुए युद्ध में पैगम्बर मोहम्मद के चाचा उमर-बिन-ए-हश्शाम को भी अपने प्राण गंवाने पड़े। उमर-बिन-ए-हश्शाम का अरबमें एवं केन्द्र काबा (मक्का) में इतना अधिक सम्मान होता था कि सम्पूर्ण अरबी समाज, जो कि भगवान शिव के भक्त थे एवं वेदों के उत्सुक गायक तथा हिन्दू देवी-देवताओं के अनन्य उपासक थे, उन्हें अबुल हाकम अर्थात ‘ज्ञान का पिता’ कहते थे। बाद में मोहम्मद के नये सम्प्रदाय ने उन्हें ईर्ष्यावश अबुलजिहाल ‘अज्ञान का पिता’ कहकर उनकी निन्दा की। जब मोहम्मद ने मक्का पर आक्रमण किया, उस समय वहाँ बृहस्पति, मंगल, अश्विनीकुमार, गरूड़, नृसिंह की मूर्तियाँ प्रतिष्ठित थी। साथ ही एक मूर्ति वहाँ विश्वविजेता महाराजा बलि की भी थी, और दानी होने की प्रसिद्धि से उसका एकहाथ सोने का बना था। ‘Holul’ के नाम से अभिहित यह मूर्ति वहाँ इब्राहम और इस्माइल की मूर्त्तियो के बराबर रखी थी। मोहम्मद ने उन सब मूर्त्तियों को तोड़कर वहाँ बने कुएँ में फेंक दिया, किन्तु तोड़े गये शिवलिंग का एक टुकडा आज भी काबा में सम्मानपूर्वक न केवल प्रतिष्ठित है, अपितु हज करने जाने वाले मुसलमान उस काले (अश्वेत) प्रस्तर खण्ड अर्थात ‘संगे अस्वद’ को आदर मान देते हुए चूमते हैं.



प्राचीन अरबों ने सिन्ध को सिन्ध ही कहा तथा भारतवर्ष के अन्य प्रदेशों को हिन्द निश्चित किया। सिन्ध से हिन्द होने की बात बहुत ही अवैज्ञानिक है। इस्लाम मत के प्रवर्तक मोहम्मद के उत्पन्न होने से 2300 वर्ष पूर्व अर्थात लगभग 1800 ईश्वी पूर्व भी अरब में हिंद एवं हिंदू शब्द का व्यवहार ज्यों का त्यों आज ही के अर्थ में प्रयुक्त होता था। अरब की प्राचीन समृद्ध संस्कृति वैदिक थी तथा उस समय ज्ञान-विज्ञान, कला-कौशल, धर्म-संस्कृति आदि में भारत (हिंद) के साथ उसके प्रगाढ़ संबंध थे। हिंद नाम अरबों को इतना प्यारा लगा कि उन्होंने उस देश के नाम पर अपनी स्त्रियों एवं बच्चों के नाम भी हिंद पर रखे। अरबी काव्य संग्रह ग्रंथ ‘ से अरूल-ओकुल’ के 253वें पृष्ठ पर हजरत मोहम्मद के चाचा उमर-बिन-ए-हश्शाम की कविता है जिसमें उन्होंने हिन्दे यौमन एवं गबुल हिन्दू का प्रयोग बड़े आदर से किया है।



‘उमर-बिन-ए-हश्शाम’ की कविता नयी दिल्ली स्थित मन्दिर मार्ग पर श्री लक्ष्मीनारायण मन्दिर (बिड़लामन्दिर) की वाटिका में यज्ञशाला के लाल पत्थर के स्तम्भ (खम्बे) पर कालीस्याही से लिखी हुई है, जो इस प्रकार है - ” कफविनक जिकरा मिन उलुमिन तब असेक । कलुवन अमातातुल हवा व तजक्करू ।1। न तज खेरोहा उड़न एललवदए लिलवरा । वलुकएने जातल्लाहे औम असेरू ।2। व अहालोलहा अजहू अरानीमन महादेव ओ । मनोजेल इलमुद्दीन मीनहुम व सयत्तरू ।3। व सहबी वे याम फीम कामिल हिन्दे यौमन । व यकुलून न लातहजन फइन्नक तवज्जरू ।4। मअस्सयरे अरव्लाकन हसनन कुल्लहूम । नजुमुन अजा अत सुम्मा गबुल हिन्दू ।5। अर्थात् – (1) वह मनुष्य, जिसने सारा जीवन पाप व अधर्म में बिताया हो, काम, क्रोध में अपने यौवन को नष्ट किया हो। (2) आदि अन्त में उसको पश्चाताप हो और भलाई की ओर लौटना चाहे, तो क्या उसका कल्याण हो सकता है ? (3) एक बार भी सच्चे हृदय से वह महादेव जी की पूजा करे, तो धर्म-मार्ग में उच्च से उच्च पद को पा सकता है। (4) हे प्रभु ! मेरा समस्त जीवन लेकर केवल एक दिन भारत (हिंद) के निवास का दे दो, क्योंकि वहाँ पहुँचकर मनुष्य जीवन-मुक्त हो जाताहै। (5) वहाँ की यात्रा से सारे शुभ कर्मो की प्राप्ति होती है, और आदर्शगुरूजनों (गबुल हिन्दू) का सत्संग मिलता है ।



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क्या आप जानते हैं कि........

दुनिया में इस्लाम ही एक मात्र ऐसा धर्म है .... जहाँ वेश्यावृति ना सिर्फ वैध है बल्कि इसे इस्लाम में प्रोत्साहित भी किया जाता है और एक धार्मिक कार्य माना जाता है....! इसका कारण जानने से पहले हमें इस्लाम और उसके प्रतिपादक मुहम्मद के क्रिया कलापों और उसकी मानसिकता को समझना अतिआवश्यक है......!

और, सारी कहानी का सार ये है कि.... मुहम्मद साहब कोई साधू-महात्मा तो थे नहीं ..... वे तो एक अनपढ़, जाहिल और पेशे से दुर्दांत लुटेरे थे....! तो.... अपनी लूट -मार और तथाकथित रूप से जेहाद फ़ैलाने के सिलसिले में उन्हें और उनके गिरोह को हफ़्तों-महीनों तक घर से बाहर रहना पड़ता था ( शायद यही वजह थी कि.. मौका लगते ही उन्होंने अपनी सगी और मात्र 6 साल की मासूम बेटी तक को ............... ). खैर.... तो , उसी लूट-मार के दौरान कहीं उनके साथी बिदक ना जाएँ और उनके लूट-पाट का फलता-फूलता धंधा चौपट ना हो जाए .. इसी डर से मुहम्मद साहब ने ना सिर्फ वेश्यावृति के धंधे को बढ़ावा दिया ..बल्कि उसे एक धार्मिक और कानूनी जामा पहनाते हुए उसे ना सिर्फ कुरान में भी उल्लेखित कर दिया बल्कि उसे पुण्य का काम भी घोषित कर दिया.

आपलोगों को लग रहा होगा कि ऐसा भला कैसे हो सकता है.... लेकिन आप ये बात जान लो कि.... जहाँ मुहम्मद साहब मौजूद हों वहां कुछ भी हो सकता है (सिर्फ उलुल -जुलूल और बुरी बातें ) लीजिए .... आप भी कुरान की उन हदीसों का अध्धयन करें और अपना सामान्य ज्ञान बढाएँ .

इस्लाम में "मुथा" और "मिस्यर" शादी शब्द लाकर वेश्यावृति को कानूनी जामा पहनाया गया है.... जिसे यात्री विवाह भी कहा जाता है..! ये एक प्रकार से अनुबंध आधार पर अल्पावधि शादियां हैं और कुछ घंटों के लिए भी हो सकती है...! @ इब्न मसूद ने बताया, "हम रसूल के साथ लड़ रहे थे और अपनी पत्नियों हमारे साथ नहीं थीं, तब हमने रसूल से पूछा, 'क्या हम खुद को संतुष्ट करना चाहिए....? रसूल हमें उस से मना किया और फिर वह हमें (अस्थायी) Mutha शादी की अनुमति दी. तो, हम सभी कपड़े का एक टुकड़ा की दहेज के लिए एक निश्चित समय (आमतौर पर तीन दिन) के लिए शादी कर के पत्नी बना लिए...... Al Hadis, Vol. 2, page no. 686 @ सलामा बिन अल-अक्वा कहते हैं : अल्लाह से प्रेरित होकर मैं कहता हूँ .. अगर एक आदमी और एक औरत सहमत हैं ( अस्थायी रूप से शादी के लिए) तो उनकी शादी अधिकतम तीन रातों के लिए वैध होगी, और उसके बाद अगर वे इसे जारी रखना चाहते हैं तो रखें रख सकते हैं, अन्यथा अलग होना चाहते हैं तो वे ऐसा कर सकते हैं....Volumn 007, Book 062, Hadith Number 053.


### मुझे तो लगता है कि जहाँ हिन्दू धर्म में स्त्रियों को सम्मान की नजर से देखा जाता है और उन्हें देवी तक की संज्ञा दी गयी है वहीँ मुहम्मद साहब ने "इस्लाम में स्रियों को" भोग-विलास की "मात्र एक वस्तु" बना रखने में कोई कोर-कसर नहीं रख छोड़ी है.

नोट: इस्लाम को छोड़कर दुनिया के सभी धर्मों में चरित्रवान रहने पर जोर दिया गया है और वेश्यावृति को पाप मानते हुए उसे एक घिनौने अपराध की संज्ञा दी गई है...! ये लेख किसी दुर्भावना के कारण नहीं बल्कि लोगों के सामाजिक जागरूकता में वृद्धि करने के पवित्र उद्देश्य से लिखी गई है...!
 
क्या आप जानते हैं कि........

दुनिया में इस्लाम ही एक मात्र ऐसा धर्म है .... जहाँ वेश्यावृति ना सिर्फ वैध है बल्कि इसे इस्लाम में प्रोत्साहित भी किया जाता है और एक धार्मिक कार्य माना जाता है....! इसका कारण जानने से पहले हमें इस्लाम और उसके प्रतिपादक मुहम्मद के क्रिया कलापों और उसकी मानसिकता को समझना अतिआवश्यक है......!

राजपाल भाई साब हिंदू मंदिरों में देवदासियां होती थी, वो क्या होती थी फिर !!!

http://en.wikipedia.org/wiki/Devadasi

http://en.wikipedia.org/wiki/Nagarvadhu

http://www.telegraph.co.uk/expat/expatlife/8008562/Indias-prostitutes-of-God.html
 
राजपाल भाई साब हिंदू मंदिरों में देवदासियां होती थी, वो क्या होती थी फिर !!!

http://en.wikipedia.org/wiki/Devadasi

http://en.wikipedia.org/wiki/Nagarvadhu

http://www.telegraph.co.uk/expat/expatlife/8008562/Indias-prostitutes-of-God.html


"Devdasi" wali pratha vartman samay me sampt ho gayee hai..
pracheen samay me log anpadh the, jagruk nahi the, tab ye sambhav tha.
 
मनुस्मरती के अनुसार ,सात तरह के विवाह होते हैं , जिसमे "देव विवाह" प्रथम परकार (श्रेष्ठ ) से लेकर राक्षस विवाह ( निकर्स्ट ) अंतिम परकार तक होते हैं | इसमें छठे नंबर पे "गंधर्व विवाह" आता हे | गंधर्व विवाह स्त्री पुरुष के केवल एक दुसरे को पति- पत्नी मान लेने और फूलों की माला एक दुसरे को पहना देने मात्र से पूरा हो जाता हे और इसकी अवधि एक घंटे से लेकर एक जीवन तक दोनों की इच्छा अनुसार हो सकती हे | अगर एक स्त्री या पुरुष हर एक घंटे में अलग-अलग वय्क्तिओं से गन्धर्व विवाह करने पर यह कीर्या करें ,तो भी वेश्यव्रती नहीं कहलाती |
 
मनुस्मरती के अनुसार ,सात तरह के विवाह होते हैं , जिसमे "देव विवाह" प्रथम परकार (श्रेष्ठ ) से लेकर राक्षस विवाह ( निकर्स्ट ) अंतिम परकार तक होते हैं | इसमें छठे नंबर पे "गंधर्व विवाह" आता हे | गंधर्व विवाह स्त्री पुरुष के केवल एक दुसरे को पति- पत्नी मान लेने और फूलों की माला एक दुसरे को पहना देने मात्र से पूरा हो जाता हे और इसकी अवधि एक घंटे से लेकर एक जीवन तक दोनों की इच्छा अनुसार हो सकती हे | अगर एक स्त्री या पुरुष हर एक घंटे में अलग-अलग वय्क्तिओं से गन्धर्व विवाह करने पर यह कीर्या करें ,तो भी वेश्यव्रती नहीं कहलाती |

भाई साब मैं विवाह के प्रकारों की बात नहीं कर रहा था ! देवदासियो की बात कर रहा था !!
 
"Devdasi" wali pratha vartman samay me sampt ho gayee hai..
pracheen samay me log anpadh the, jagruk nahi the, tab ye sambhav tha.

भाई साहब प्राचीन समय में देवदासियाँ पंडो की सेवा में नियुक्त होती थी और पंडत अनपढ़ नहीं थे !!
 
भाई साहब प्राचीन समय में देवदासियाँ पंडो की सेवा में नियुक्त होती थी और पंडत अनपढ़ नहीं थे !!


devdasi aur unke parents to anpadh hote the............
 
कुरान की चौबीस आयतें और उन पर दिल्ली कोर्ट का फैसला

श्री इन्द्रसेन (तत्कालीन उपप्रधान हिन्दू महासभा दिल्ली) और राजकुमार ने कुरान मजीद (अनु. मौहम्मद फारुख खां, प्रकाशक मक्तबा अल हस्नात,रामपुर उ.प्र. १९६६) की कुछ निम्नलिखित आयतों का एक पोस्टर छापा जिसके कारण इन दोनों पर भारतीय दंड संहिता की धारा १५३ए और २६५ए के अन्तर्गत (एफ.आई.आर. २३७/८३यू/एस, २३५ए, १ पीसी होजकाजी, पुलिस स्टेशन दिल्ली) में मुकदमा चलाया गया।

1- ”फिर, जब हराम के महीने बीत जाऐं, तो ‘मुश्रिको’ को जहाँ-कहीं पाओ कत्ल करो, और पकड़ो और उन्हें घेरो और हर घातकी जगह उनकी ताक में बैठो। फिर यदि वे ‘तौबा’ कर लें ‘नमाज’ कायम करें और, जकात दें तो उनका मार्ग छोड़ दो। निःसंदेह अल्लाह बड़ा क्षमाशील और दया करने वाला है।” (पा० १०, सूरा. ९, आयत ५,२ख पृ. ३६८)

2- ”हे ‘ईमान’ लाने वालो! ‘मुश्रिक’ (मूर्तिपूजक) नापाक हैं।” (१०.९.२८ पृ. ३७१)

3- ”निःसंदेह ‘काफिर तुम्हारे खुले दुश्मन हैं।” (५.४.१०१. पृ. २३९)

4- ”हे ‘ईमान’ लाने वालों! (मुसलमानों) उन ‘काफिरों’ से लड़ो जो तुम्हारे आस पास हैं, और चाहिए कि वे तुममें सख्ती पायें।” (११.९.१२३ पृ. ३९१)

5- ”जिन लोगों ने हमारी ”आयतों” का इन्कार किया, उन्हें हम जल्द अग्नि में झोंक देंगे। जब उनकी खालें पक जाएंगी तो हम उन्हें दूसरी खालों से बदल देंगे ताकि वे यातना का रसास्वादन कर लें। निःसन्देह अल्लाह प्रभुत्वशाली तत्वदर्शी हैं” (५.४.५६ पृ. २३१)

5- ”हे ‘ईमान’ लाने वालों! (मुसलमानों) अपने बापों और भाईयों को अपना मित्र मत बनाओ यदि वे ईमान की अपेक्षा ‘कुफ्र’ को पसन्द करें। और तुम में से जो कोई उनसे मित्रता का नाता जोड़ेगा, तो ऐसे ही लोग जालिम होंगे” (१०.९.२३ पृ. ३७०)

7- ”अल्लाह ‘काफिर’ लोगों को मार्ग नहीं दिखाता” (१०.९.३७ पृ. ३७४)

8- ”हे ‘ईमान’ लाने वालो! उन्हें (किताब वालों) और काफिरों को अपना मित्र बनाओ। अल्ला से डरते रहो यदि तुम ‘ईमान’ वाले हो।” (६.५.५७ पृ. २६८)

9- ”फिटकारे हुए, (मुनाफिक) जहां कही पाए जाऐंगे पकड़े जाएंगे और बुरी तरह कत्ल किए जाएंगे।” (२२.३३.६१ पृ. ७५९)

10- ”(कहा जाऐगा): निश्चय ही तुम और वह जिसे तुम अल्लाह के सिवा पूजते थे ‘जहन्नम’ का ईधन हो। तुम अवश्य मौत के घाट उतरोगे।”

11- ‘और उस से बढ़कर जालिम कौन होगा जिसे उसके ‘रब’ की आयतों के द्वारा चेताया जाये और फिर वह उनसे मुँह फेर ले। निश्चय ही हमें ऐसे अपराधियों से बदला लेना है।” (२१.३२.२२ पृ. ७३६)

12- ‘अल्लाह ने तुमसे बहुत सी ‘गनीमतों’ का वादा किया है जो तुम्हारे हाथ आयेंगी,” (२६.४८.२० पृ. ९४३)

13- ”तो जो कुछ गनीमत (का माल) तुमने हासिल किया है उसे हलाल व पाक समझ कर खाओ” (१०.८.६९. पृ. ३५९)

14- ”हे नबी! ‘काफिरों’ और ‘मुनाफिकों’ के साथ जिहाद करो, और उन पर सखती करो और उनका ठिकाना ‘जहन्नम’ है, और बुरी जगह है जहाँ पहुँचे” (२८.६६.९. पृ. १०५५)

15- ‘तो अवश्य हम ‘कुफ्र’ करने वालों को यातना का मजा चखायेंगे, और अवश्य ही हम उन्हें सबसे बुरा बदला देंगे उस कर्म का जो वे करते थे।” (२४.४१.२७ पृ. ८६५)

16- ”यह बदला है अल्लाह के शत्रुओं का (’जहन्नम’ की) आग। इसी में उनका सदा का घर है, इसके बदले में कि हमारी ‘आयतों’ का इन्कार करते थे।” (२४.४१.२८ पृ. ८६५)

17- ”निःसंदेह अल्लाह ने ‘ईमानवालों’ (मुसलमानों) से उनके प्राणों और उनके मालों को इसके बदले में खरीद लिया है कि उनके लिए ‘जन्नत’ हैः वे अल्लाह के मार्ग में लड़ते हैं तो मारते भी हैं और मारे भी जाते हैं।” (११.९.१११ पृ. ३८८)

18- ”अल्लाह ने इन ‘मुनाफिक’ (कपटाचारी) पुरुषों और मुनाफिक स्त्रियों और काफिरों से ‘जहन्नम’ की आग का वादा किया है जिसमें वे सदा रहेंगे। यही उन्हें बस है। अल्लाह ने उन्हें लानत की और उनके लिए स्थायी यातना है।” (१०.९.६८ पृ. ३७९)

19- ”हे नबी! ‘ईमान वालों’ (मुसलमानों) को लड़ाई पर उभारो। यदि तुम में बीस जमे रहने वाले होंगे तो वे दो सौ पर प्रभुत्व प्राप्त करेंगे, और यदि तुम में सौ हो तो एक हजार काफिरों पर भारी रहेंगे, क्योंकि वे ऐसे लोग हैं जो समझबूझ नहीं रखते।” (१०.८.६५ पृ. ३५८)

20- ”हे ‘ईमान’ लाने वालों! तुम यहूदियों और ईसाईयों को मित्र न बनाओ। ये आपस में एक दूसरे के मित्र हैं। और जो कोई तुम में से उनको मित्र बनायेगा, वह उन्हीं में से होगा। निःसन्देह अल्लाह जुल्म करने वालों को मार्ग नहीं दिखाता।” (६.५.५१ पृ. २६७)

21- ”किताब वाले” जो न अल्लाह पर ईमान लाते हैं न अन्तिम दिन पर, न उसे ‘हराम’ करते हैं जिसे अल्लाह और उसके रसूल ने हराम ठहराया है,और न सच्चे दीन को अपना ‘दीन’ बनाते हैं उनसे लड़ो यहाँ तक कि वे अप्रतिष्ठित (अपमानित) होकर अपने हाथों से ‘जिजया’ देने लगे।” (१०.९.२९. पृ. ३७२)

22- २२ ”…….फिर हमने उनके बीच कियामत के दिन तक के लिये वैमनस्य और द्वेष की आग भड़का दी, और अल्लाह जल्द उन्हें बता देगा जो कुछ वे करते रहे हैं। (६.५.१४ पृ. २६०)

23- ”वे चाहते हैं कि जिस तरह से वे काफिर हुए हैं उसी तरह से तुम भी ‘काफिर’ हो जाओ, फिर तुम एक जैसे हो जाओः तो उनमें से किसी को अपना साथी न बनाना जब तक वे अल्लाह की राह में हिजरत न करें, और यदि वे इससे फिर जावें तो उन्हें जहाँ कहीं पाओं पकड़ों और उनका वध (कत्ल) करो। और उनमें से किसी को साथी और सहायक मत बनाना।” (५.४.८९ पृ. २३७)

24- ”उन (काफिरों) से लड़ों! अल्लाह तुम्हारे हाथों उन्हें यातना देगा, और उन्हें रुसवा करेगा और उनके मुकाबले में तुम्हारी सहायता करेगा, और‘ईमान’ वालों के दिल ठंडे करेगा” (१०.९.१४. पृ. ३६९)

उपरोक्त आयतों से स्पष्ट है कि इनमें ईर्ष्या, द्वेष, घृणा, कपट, लड़ाई-झगड़ा, लूटमार और हत्या करने के आदेश मिलते हैं। इन्हीं कारणों से देश व विश्व में मुस्लिमों व गैर मुस्लिमों के बीच दंगे हुआ करते हैं।

मैट्रोपोलिटिन मजिस्ट्रेट श्री जेड़ एस. लोहाट ने ३१ जुलाई १९८६ को फैसला सुनाते हुए लिखाः ”मैंने सभी आयतों को कुरान मजीद से मिलान किया और पाया कि सभी अधिकांशतः आयतें वैसे ही उधृत की गई हैं जैसी कि कुरान में हैं। लेखकों का सुझाव मात्र है कि यदि ऐसी आयतें न हटाईं गईं तो साम्प्रदायिक दंगे रोकना मुश्किल हो जाऐगा। मैं ए.पी.पी. की इस बात से सहमत नहीं हूँ कि आयतें २,५,९,११ और २२ कुरान में नहीं है या उन्हें विकृत करके प्रस्तुत किया गया है।”

तथा उक्त दोनों महानुभावों को बरी करते हुए निर्णय दिया कि- ”कुरान मजीद” की पवित्र पुस्तक के प्रति आदर रखते हुए उक्त आयतों के सूक्ष्म अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि ये आयतें बहुत हानिकारक हैं और घृणा की शिक्षा देती हैं, जिनसे एक तरफ मुसलमानों और दूसरी ओर देश के शेष समुदायों के बीच मतभेदों की पैदा होने की सम्भावना है।” (ह. जेड. एस. लोहाट, मेट्रोपोलिटिन मजिस्ट्रेट दिल्ली ३१.७.१९८६)
 
मुहम्मद पैगम्बर खुद जन्मजात हिंदु था और काबा हिंदु मंदिर--

*************************************** मुहम्मद पैगम्बर खुद जन्मजात हिंदु था और काबा हिंदु मंदिर मुसलमान कहते हैं कि कुराण ईश्वरीय वाणी है तथा यह धर्म अनादि काल से चली आ रही है,परंतु इनकी एक-एक बात आधारहीन तथा तर्कहीन हैं-सबसे पहले तो ये पृथ्वी पर मानव की उत्प...त्ति का जो सिद्धान्त देते हैं वो हिंदु धर्म-सिद्धान्त का ही छाया प्रति है.हमारे ग्रंथ के अनुसार ईश्वर ने मनु तथा सतरूपा को पृथ्वी पर सर्व-प्रथम भेजा था..इसी सिद्धान्त के अनुसार ये भी कहते हैं कि अल्लाह ने सबसे पहले आदम और हौआ को भेजा.ठीक है...पर आदम शब्द संस्कृत शब्द "आदि" से बना है जिसका अर्थ होता है-सबसे पहले.यनि पृथ्वी पर सर्वप्रथम संस्कृत भाषा अस्तित्व में थी..सब भाषाओं की जननी संस्कृत है ये बात तो कट्टर मुस्लिम भी स्वीकार करते हैं..इस प्रकार आदि धर्म-ग्रंथ संस्कृत में होनी चाहिए अरबी या फारसी में नहीं. इनका अल्लाह शब्द भी संस्कृत शब्द अल्ला से बना है जिसका अर्थ देवी होता है.एक उपनिषद भी है "अल्लोपनिषद". चण्डी,भवानी,दुर्गा,अम्बा,पार्वती आदि देवी को आल्ला से सम्बोधित किया जाता है.जिस प्रकार हमलोग मंत्रों में "या" शब्द का प्रयोग करते हैं देवियों को पुकारने में जैसे "या देवी सर्वभूतेषु....", "या वीणा वर ...." वैसे ही मुसलमान भी पुकारते हैं "या अल्लाह"..इससे सिद्ध होता है कि ये अल्लाह शब्द भी ज्यों का त्यों वही रह गया बस अर्थ बदल दिया गया. चूँकि सर्वप्रथम विश्व में सिर्फ संस्कृत ही बोली जाती थी इसलिए धर्म भी एक ही था-वैदिक धर्म.बाद में लोगों ने अपना अलग मत और पंथ बनाना शुरु कर दिया और अपने धर्म(जो वास्तव में सिर्फ मत हैं) को आदि धर्म सिद्ध करने के लिए अपने सिद्धान्त को वैदिक सिद्धान्तों से बिल्कुल भिन्न कर लिया ताकि लोगों को ये शक ना हो कि ये वैदिक धर्म से ही निकला नया धर्म है और लोग वैदिक धर्म के बजाय उस नए धर्म को ही अदि धर्म मान ले..चूँकि मुस्लिम धर्म के प्रवर्त्तक बहुत ज्यादा गम्भीर थे अपने धर्म को फैलाने के लिए और ज्यादा डरे हुए थे इसलिए उसने हरेक सिद्धान्त को ही हिंदु धर्म से अलग कर लिया ताकि सब यही समझें कि मुसलमान धर्म ही आदि धर्म है,हिंदु धर्म नहीं..पर एक पुत्र कितना भी अपनेआप को अपने पिता से अलग करना चाहे वो अलग नहीं कर सकता..अगर उसका डी.एन.ए. टेस्ट किया जाएगा तो पकड़ा ही जाएगा..इतने ज्यादा दिनों तक अरबियों का वैदिक संस्कृति के प्रभाव में रहने के कारण लाख कोशिशों के बाद भी वे सारे प्रमाण नहीं मिटा पाए और मिटा भी नही सकते.... भाषा की दृष्टि से तो अनगिणत प्रमाण हैं यह सिद्ध करने के लिए कि अरब इस्लाम से पहले वैदिक संस्कृति के प्रभाव में थे.जैसे कुछ उदाहरण-मक्का-मदीना,मक्का संस्कृत शब्द मखः से बना है जिसका अर्थ अग्नि है तथा मदीना मेदिनी से बना है जिसका अर्थ भूमि है..मक्का मदीना का तात्पर्य यज्य की भूमि है.,ईद संस्कृत शब्द ईड से बना है जिसका अर्थ पूजा होता है.नबी जो नभ से बना है..नभी अर्थात आकाशी व्यक्ति.पैगम्बर "प्र-गत-अम्बर" का अपभ्रंश है जिसका अर्थ है आकाश से चल पड़ा व्यक्ति.. चलिए अब शब्दों को छोड़कर इनके कुछ रीति-रिवाजों पर ध्यान देते हैं जो वैदिक संस्कृति के हैं-- ये बकरीद(बकर+ईद) मनाते हैं..बकर को अरबी में गाय कहते हैं यनि बकरीद गाय-पूजा का दिन है.भले ही मुसलमान इसे गाय को काटकर और खाकर मनाने लगे.. जिस तरह हिंदु अपने पितरों को श्रद्धा-पूर्वक उन्हें अन्न-जल चढ़ाते हैं वो परम्परा अब तक मुसलमानों में है जिसे वो ईद-उल-फितर कहते हैं..फितर शब्द पितर से बना है.वैदिक समाज एकादशी को शुभ दिन मानते हैं तथा बहुत से लोग उस दिन उपवास भी रखते हैं,ये प्रथा अब भी है इनलोगों में.ये इस दिन को ग्यारहवीं शरीफ(पवित्र ग्यारहवाँ दिन) कहते हैं,शिव-व्रत जो आगे चलकर शेबे-बरात बन गया,रामध्यान जो रमझान बन गया...इस तरह से अनेक प्रमाण मिल जाएँगे..आइए अब कुछ महत्त्वपूर्ण बिंदुओं पर नजर डालते हैं... अरब हमेशा से रेगिस्तानी भूमि नहीं रहा है..कभी वहाँ भी हरे-भरे पेड़-पौधे लहलाते थे,लेकिन इस्लाम की ऐसी आँधी चली कि इसने हरे-भरे रेगिस्तान को मरुस्थल में बदल दिया.इस बात का सबूत ये है कि अरबी घोड़े प्राचीन काल में बहुत प्रसिद्ध थे..भारतीय इसी देश से घोड़े खरीद कर भारत लाया करते थे और भारतीयों का इतना प्रभाव था इस देश पर कि उन्होंने इसका नामकरण भी कर दिया था-अर्ब-स्थान अर्थात घोड़े का देश.अर्ब संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ घोड़ा होता है. {वैसे ज्यादातर देशों का नामकरण भारतीयों ने ही किया है जैसे सिंगापुर,क्वालालामपुर,मलेशिया,ईरान,ईराक,कजाकिस्थान,तजाकिस्थान,आदि..} घोड़े हरे-भरे स्थानों पर ही पल-बढ़कर हृष्ट-पुष्ट हो सकते हैं बालू वाले जगहों पर नहीं.. इस्लाम की आँधी चलनी शुरु हुई और मुहम्मद के अनुयायियों ने धर्म परिवर्त्तन ना करने वाले हिंदुओं का निर्दयता-पूर्वक काटना शुरु कर दिया..पर उन हिंदुओं की परोपकारिता और अपनों के प्रति प्यार तो देखिए कि मरने के बाद भी पेट्रोलियम पदार्थों में रुपांतरित होकर इनका अबतक भरण-पोषण कर रहे हैं वर्ना ना जाने क्या होता इनका..!अल्लाह जाने..!

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चूँकि पूरे अरब में सिर्फ हिंदु संस्कृति ही थी इसलिए पूरा अरब मंदिरों से भरा पड़ा था जिसे बाद में लूट-लूट कर मस्जिद बना लिया गया जिसमें मुख्य मंदिर काबा है.इस बात का ये एक प्रमाण है कि दुनिया में जितने भी मस्जिद हैं उन सबका द्वार काबा की तरफ खुलना चाहिए पर ऐसा नहीं है.ये इस बात का सबूत है कि सारे मंदिर लूटे हुए हैं..इन मंदिरों में सबसे प्रमुख मंदिर काबा का है क्योंकि ये बहुत बड़ा मंदिर था.ये वही जगह है जहाँ भगवान विष्णु का एक पग पड़ा था तीन पग जमीन नापते समय..चूँकि ये मंदिर बहुत बड़ा आस्था का केंद्र था जहाँ भारत से भी काफी मात्रा में लोग जाया करते थे..इसलिए इसमें मुहम्मद जी का धनार्जन का स्वार्थ था या भगवान शिव का प्रभाव कि अभी भी उस मंदिर में सारे हिंदु-रीति रिवाजों का पालन होता है तथा शिवलिंग अभी तक विराजमान है वहाँ..यहाँ आने वाले मुसलमान हिंदु ब्राह्मण की तरह सिर के बाल मुड़वाकर बिना सिलाई किया हुआ एक कपड़ा को शरीर पर लपेट कर काबा के प्रांगण में प्रवेश करते हैं और इसकी सात परिक्रमा करते हैं.यहाँ थोड़ा सा भिन्नता दिखाने के लिए ये लोग वैदिक संस्कृति के विपरीत दिशा में परिक्रमा करते हैं अर्थात हिंदु अगर घड़ी की दिशा में करते हैं तो ये उसके उल्टी दिशा में..पर वैदिक संस्कृति के अनुसार सात ही क्यों.? और ये सब नियम-कानून सिर्फ इसी मस्जिद में क्यों?ना तो सर का मुण्डन करवाना इनके संस्कार में है और ना ही बिना सिलाई के कपड़े पहनना पर ये दोनो नियम हिंदु के अनिवार्य नियम जरुर हैं. चूँकि ये मस्जिद हिंदुओं से लूटकर बनाई गई है इसलिए इनके मन में हमेशा ये डर बना रहता है कि कहीं ये सच्चाई प्रकट ना हो जाय और ये मंदिर उनके हाथ से निकल ना जाय इस कारण आवश्यकता से अधिक गुप्तता रखी जाती है इस मस्जिद को लेकर..अगर देखा जाय तो मुसलमान हर जगह हमेशा डर-डर कर ही जीते हैं और ये स्वभाविक भी है क्योंकि इतने ज्यादा गलत काम करने के बाद डर तो मन में आएगा ही...अगर देखा जाय तो मुसलमान धर्म का अधार ही डर पर टिका होता है.हमेशा इन्हें छोटी-छोटी बातों के लिए भयानक नर्क की यातनाओं से डराया जाता है..अगर कुरान की बातों को ईश्वरीय बातें ना माने तो नरक,अगर तर्क-वितर्क किए तो नर्क अगर श्रद्धा और आदरपूर्वक किसी के सामने सर झुका दिए तो नर्क.पल-पल इन्हें डरा कर रखा जाता है क्योंकि इस धर्म को बनाने वाला खुद डरा हुआ था कि लोग इसे अपनायेंगे या नहीं और अपना भी लेंगे तो टिकेंगे या नहीं इसलिए लोगों को डरा-डरा कर इस धर्म में लाया जाता है और डरा-डरा कर टिकाकर रखा जाता है..जैसे अगर आप मुसलमान नहीं हो तो नर्क जाओगे,अगर मूर्त्ति-पूजा कर लिया तो नर्क चल जाओगे,मुहम्मद को पैगम्बर ना माने तो नर्क;इन सब बातों से डराकर ये लोगों को अपने धर्म में खींचने का प्रयत्न करते हैं.पहली बार मैंने जब कुरान के सिद्धान्तों को और स्वर्ग-नरक की बातों को सुना था तो मेरी आत्मा काँप गई थी..उस समय मैं दसवीं कक्षा में था और अपनी स्वेच्छा से ही अपने एक विज्यान के शिक्षक से कुरान के बारे में जानने की इच्छा व्यक्त की थी..उस दिन तक मैं इस धर्म को हिंदु धर्म के समान या थोड़ा उपर ही समझता था पर वो सब सुनने के बाद मेरी सारी भ्रांति दूर हुई और भगवान को लाख-लाख धन्यवाद दिया कि मुझे उन्होंने हिंदु परिवार में जन्म दिया है नहीं पता नहीं मेरे जैसे हरेक बात पर तर्क-वितर्क करने वालों की क्या गति होती...! एक तो इस मंदिर को बाहर से एक गिलाफ से पूरी तरह ढककर रखा जाता है ही(बालू की आँधी से बचाने के लिए) दूसरा अंदर में भी पर्दा लगा दिया गया है.मुसलमान में पर्दा प्रथा किस हद तक हावी है ये देख लिजिए.औरतों को तो पर्दे में रखते ही हैं एकमात्र प्रमुख और विशाल मस्जिद को भी पर्दे में रखते हैं.क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि अगर ये मस्जिद मंदिर के रुप में इस जगह पर होता जहाँ हिंदु पूजा करते तो उसे इस तरह से काले-बुर्के में ढक कर रखा जाता रेत की आँधी से बचाने के लिए..!! अंदर के दीवार तो ढके हैं ही उपर छत भी कीमती वस्त्रों से ढके हुए हैं.स्पष्ट है सारे गलत कार्य पर्दे के आढ़ में ही होते हैं क्योंकि खुले में नहीं हो सकते..अब इनके डरने की सीमा देखिए कि काबा के ३५ मील के घेरे में गैर-मुसलमान को प्रवेश नहीं करने दिया जाता है,हरेक हज यात्री को ये सौगन्ध दिलवाई जाती है कि वो हज यात्रा में देखी गई बातों का किसी से उल्लेख नहीं करेगा.वैसे तो सारे यात्रियों को चारदीवारी के बाहर से ही शिवलिंग को छूना तथा चूमना पड़ता है पर अगर किसी कारणवश कुछ गिने-चुने मुसलमानों को अंदर जाने की अनुमति मिल भी जाती है तो उसे सौगन्ध दिलवाई जाती है कि अंदर वो जो कुछ भी देखेंगे उसकी जानकारी अन्य को नहीं देंगे..

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कुछ लोग जो जानकारी प्राप्त करने के उद्देश्य से किसी प्रकार अंदर चले गए हैं,उनके अनुसार काबा के प्रवेश-द्वार पर काँच का एक भव्य द्वीपसमूह लगा है जिसके उपर भगवत गीता के श्लोक अंकित हैं.अंदर दीवार पर एक बहुत बड़ा यशोदा तथा बाल-कृष्ण का चित्र बना हुआ है जिसे वे ईसा और उसकी माता समझते हैं.अंदर गाय के घी का एक पवित्र दीप सदा जलता रहता है.ये दोनों मुसलमान धर्म के विपरीत कार्य(चित्र और गाय के घी का दिया) यहाँ होते हैं..एक अष्टधातु से बना दिया का चित्र में यहाँ लगा रहा हूँ जो ब्रिटिश संग्रहालय में अब तक रखी हुई है..ये दीप अरब से प्राप्त हुआ है जो इस्लाम-पूर्व है.इसी तरह का दीप काबा के अंदर भी अखण्ड दीप्तमान रहता है . ये सारे प्रमाण ये बताने के लिए हैं कि क्यों मुस्लिम इतना डरे रहते हैं इस मंदिर को लेकर..इस मस्जिद के रहस्य को जानने के लिए कुछ हिंदुओं ने प्रयास किया तो वे क्रूर मुसलमानों के हाथों मार डाले गए और जो कुछ बच कर लौट आए वे भी पर्दे के कारण ज्यादा जानकारी प्राप्त नहीं कर पाए.अंदर के अगर शिलालेख पढ़ने में सफलता मिल जाती तो ज्यादा स्पष्ट हो जाता.इसकी दीवारें हमेशा ढकी रहने के कारण पता नहीं चल पाता है कि ये किस पत्थर का बना हुआ है पर प्रांगण में जो कुछ इस्लाम-पूर्व अवशेष रहे हैं वो बादामी या केसरिया रंग के हैं..संभव है काबा भी केसरिया रंग के पत्थर से बना हो..एक बात और ध्यान देने वाली है कि पत्थर से मंदिर बनते हैं मस्जिद नहीं..भारत में पत्थर के बने हुए प्राचीन-कालीन हजारों मंदिर मिल जाएँगे... ये तो सिर्फ मस्जिद की बात है पर मुहम्मद साहब खुद एक जन्मजात हिंदु थे ये किसी भी तरह मेरे पल्ले नहीं पड़ रहा है कि अगर वो पैगम्बर अर्थात अल्लाह के भेजे हुए दूत थे तो किसी मुसलमान परिवार में जन्म लेते एक काफिर हिंदु परिवार में क्यों जन्मे वो..?जो अल्लाह मूर्त्ति-पूजक हिंदुओं को अपना दुश्मन समझकर खुले आम कत्ल करने की धमकी देता है वो अपने सबसे प्यारे पुत्र को किसी मुसलमान घर में जन्म देने के बजाय एक बड़े शिवभक्त के परिवार में कैसे भेज दिए..? इस काबा मंदिर के पुजारी के घर में ही मुहम्मद का जन्म हुआ था..इसी थोड़े से जन्मजात अधिकार और शक्ति का प्रयोग कर इन्होंने इतना बड़ा काम कर दिया.मुहम्मद के माता-पिता तो इसे जन्म देते ही चल बसे थे(इतना बड़ा पाप कर लेने के बाद वो जीवित भी कैसे रहते)..मुहम्मद के चाचा ने उसे पाल-पोषकर बड़ा किया परंतु उस चाचा को मार दिया इन्होंने अपना धर्म-परिवर्त्तन ना करने के कारण..अगर इनके माता-पिता जिंदा होते तो उनका भी यही हश्र हुआ होता..मुहम्मद के चाचा का नाम उमर-बिन-ए-ह्ज्जाम था.ये एक विद्वान कवि तो थे ही साथ ही साथ बहुत बड़े शिवभक्त भी थे.इनकी कविता सैर-उल-ओकुल ग्रंथ में है.इस ग्रंथ में इस्लाम पूर्व कवियों की महत्त्वपूर्ण तथा पुरस्कृत रचनाएँ संकलित हैं.ये कविता दिल्ली में दिल्ली मार्ग पर बने विशाल लक्ष्मी-नारायण मंदिर की पिछली उद्यानवाटिका में यज्यशाला की दीवारों पर उत्त्कीर्ण हैं.ये कविता मूलतः अरबी में है.इस कविता से कवि का भारत के प्रति श्रद्धा तथा शिव के प्रति भक्ति का पता चलता है.इस कविता में वे कहते हैं कोई व्यक्ति कितना भी पापी हो अगर वो अपना प्रायश्चित कर ले और शिवभक्ति में तल्लीन हो जाय तो उसका उद्धार हो जाएगा और भगवान शिव से वो अपने सारे जीवन के बदले सिर्फ एक दिन भारत में निवास करने का अवसर माँग रहे हैं जिससे उन्हें मुक्ति प्राप्त हो सके क्योंकि भारत ही एकमात्र जगह है जहाँ की यात्रा करने से पुण्य की प्राप्ति होती है तथा संतों से मिलने का अवसर प्राप्त होता है.. देखिए प्राचीन काल में कितनी श्रद्धा थी विदेशियों के मन में भारत के प्रति और आज भारत के मुसलमान भारत से नफरत करते हैं.उन्हें तो ये बात सुनकर भी चिढ़ हो जाएगी कि आदम स्वर्ग से भारत में ही उतरा था और यहीं पर उसे परमात्मा का दिव्य संदेश मिला था तथा आदम का ज्येष्ठ पुत्र "शिथ" भी भारत में अयोध्या में दफनाया हुआ है.ये सब बातें मुसलमानों के द्वारा ही कही गई है,मैं नहीं कह रहा हूँ.. और ये "लबी बिन-ए-अख्तब-बिन-ए-तुर्फा" इस तरह का लम्बा-लम्बा नाम भी वैदिक संस्कृति ही है जो दक्षिणी भारत में अभी भी प्रचलित है जिसमें अपने पिता और पितामह का नाम जोड़ा जाता है.. कुछ और प्राचीन-कालीन वैदिक अवशेष देखिए...


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ये हंसवाहिनी सरस्वती माँ की मूर्त्ति है जो अभी लंदन संग्रहालय में है.यह सऊदी अर्बस्थान से ही प्राप्त हुआ था.. प्रमाण तो और भी हैं बस लेख को बड़ा होने से बचाने के लिए और सब का उल्लेख नहीं कर रहा हूँ..पर क्या इतने सारे प्रमाण पर्याप्त नहीं हैं यह सिद्ध करने के लिए कि अभी जो भी मुसलमान हैं वो सब हिंदु ही थे जो जबरन या स्वार्थवश मुसलमान बन गए..कुरान में इस बात का वर्णन होना कि "मूर्त्तिपूजक काफिर हैं उनका कत्ल करो" ये ही सिद्ध करता है कि हिंदु धर्म मुसलमान से पहले अस्तित्व में थे..हिंदु धर्म में आध्यात्मिक उन्नति के लिए पूजा का कोई महत्त्व नहीं है,ईश्वर के सामने झुकना तो बहुत छोटी सी बात है..प्रभु-भक्ति की शुरुआत भर है ये..पर मुसलमान धर्म में अल्लाह के सामने झुक जाना ही ईश्वर की अराधना का अंत है..यही सबसे बड़ी बात है.इसलिए ये लोग अल्लाह के अलावे किसी और के आगे झुकते ही नहीं,अगर झुक गए तो नरक जाना पड़ेगा..क्या इतनी निम्न स्तर की बातें ईश्वरीय वाणी हो सकती है..!.? इनके मुहम्मद साहब मूर्ख थे जिन्हें लिखना-पढ़ना भी नहीं आता था..अगर अल्लाह ने इन्हें धर्म की स्थापना के लिए भेजा था तो इसे इतनी कम शक्ति के साथ क्यों भेजा जिसे लिखना-पढ़ना भी नहीं आता था..या अगर भेज भी दिए थे तो समय आने पर रातों-रात ज्यानी बना देते जैसे हमारे काली दास जी रातों-रात विद्वान बन गए थे(यहाँ तो सिद्ध हो गया कि हमारी काली माँ इनके अल्लाह से ज्यादा शक्तिशाली हैं)..एक बात और कि अल्लाह और इनके बीच भी जिब्राइल नाम का फरिश्ता सम्पर्क-सूत्र के रुप में था.इतने शर्मीले हैं इनके अल्लाह या फिर इनकी तरह ही डरे हुए.!.? वो कोई ईश्वर थे या भूत-पिशाच.?? सबसे महत्त्वपूर्ण बात ये कि अगर अल्लाह को मानव के हित के लिए कोई पैगाम देना ही था तो सीधे एक ग्रंथ ही भिजवा देते जिब्राइल के हाथों जैसे हमें हमारे वेद प्राप्त हुए थे..!ये रुक-रुक कर सोच-सोच कर एक-एक आयत भेजने का क्या अर्थ है..!.? अल्लाह को पता है कि उनके इस मंदबुद्धि के कारण कितना घोटाला हो गया..! आने वाले कट्टर मुस्लिम शासक अपने स्वार्थ के लिए एक-से-एक कट्टर बात डालते चले गए कुरान में..एक समानता देखिए हमारे चार वेद की तरह ही इनके भी कुरान में चार धर्म-ग्रंथों का वर्णन है जो अल्लाह ने इनके रसूलों को दिए हैं..कभी ये कहते हैं कि धर्म अपरिवर्तनीय है वो बदल ही नहीं सकता तो फिर ये समय-समय पर धर्मग्रंथ भेजने का क्या मतलब है??अगर उन सब में एक जैसी ही बातें लिखी हैं तो वे धर्मग्रंथ हो ही नहीं सकते...जरा विचार करिए कि पहले मनुष्यों की आयु हजारों साल हुआ करती थी वो वर्त्तमान मनुष्य से हर चीज में बढ़कर थे,युग बदलता गया और लोगों के विचार,परिस्थिति,शक्ति-सामर्थ्य सब कुछ बदलता गया तो ऐसे में भक्ति का तरीका भी बदलना स्वभाविक ही है..राम के युग में लोग राम को जपना शुरु कर दिए,द्वापर युग में कृष्ण जी के आने के बाद कृष्ण-भक्ति भी शुरु हो गई.अब कलयुग में चूँकि लोगों की आयु तथा शक्ति कम है तो ईश्वर भी जो पहले हजारों वर्ष की तपस्या से खुश होते थे अब कुछ वर्षों की तपस्या में ही दर्शन देने लगे.. धर्म में बदलाव संभव है अगर कोई ये कहे कि ये संभव नहीं है तो वो धर्म हो ही नहीं सकता.. यहाँ मैं यही कहूँगा कि अगर हिंदु धर्म सजीव है जो हर परिस्थिति में सामंजस्य स्थापित कर सकता है(पलंग पर पाँव फैलाकर लेट भी सकता है और जमीन पर पाल्थी मारकर बैठ भी सकता है) तो मुस्लिम धर्म उस अकड़े हुए मुर्दे की तरह जिसका शरीर हिल-डुल भी नहीं सकता...हिंदु धर्म संस्कृति में छोटी से छोटी पूजा में भी विश्व-शांति की कमना की जाती है तो दूसरी तरफ मुसलमान ये कामना करते हैं कि पूरी दुनिया में मार-काट मचाकर अशांति फैलानी है और पूरी दुनिया को मुसलमान बनाना है... हिंदु अगर विष में भी अमृत निकालकर उसका उपयोग कर लेते हैं तो मुसलमान अमृत को भी विष बना देते हैं.. मैं लेख का अंत कर रहा हूँ और इन सब बातों को पढ़ने के बाद बताइए कि क्या कुरान ईश्वरीय वाणी हो सकती है और क्या इस्लाम धर्म आदि धर्म हो सकता है...?? ये अफसोस की बात है कि कट्टर मुसलमान भी इस बात को जानते तथा मानते हैं कि मुहम्मद के चाचा हिंदु थे फिर भी वो बाँकी बातों से इन्कार करते हैं.. इस लेख में मैंने अपना सारा ध्यान अरब पर ही केंद्रित रखा इसलिए सिर्फ अरब में वैदिक संस्कृति के प्रमाण दिए यथार्थतः वैदिक संस्कृति पूरे विश्व में ही फैली हुई थी..-ये राम-सीता और लक्षमण के चित्र हैं जो इटली से मिले हैं.इसमें इन्हें वन जाते हुए दिखाया जा रहा है.सीता माँ के हाथ में शायद तुलसी का पौधा है क्योंकि हिंदु इस पौधे को अपने घर में लगाना बहुत ही शुभ मानते हैं..... यह चित्र ग्रीस देश के कारिंथ नगर के संग्रहालय में प्रदर्शित है.कारिंथ नगर एथेंस से ६० कि.मी. दूर है.प्राचीनकाल से ही कारिंथ कृष्ण-भक्ति का केंद्र रहा है.यह भव्य भित्तिचित्र उसी नगर के एक मंदिर से प्राप्त हुआ है .इस नगर का नाम कारिंथ भी कृष्ण का अपभ्रंश शब्द ही लग रहा है..अफसोस की बात ये कि इस चित्र को एक देहाती दृश्य का नाम दिया है यूरोपिय इतिहासकारों ने..ऐसे अनेक प्रमाण अभी भी बिखरे पड़े हैं संसार में जो यूरोपीय इतिहासकारों की मूर्खता,द्वेशभावपूर्ण नीति और हमारे हुक्मरानों की लापरवाही के कारण नष्ट हो रहे हैं.जरुरत है हमें जगने की और पूरे विश्व में वैदिक संस्कृति को पुनर्स्थापित करने की..
 
जुमे की नमाज़ के बाद ये पर्चे बांटे जा रहे है भारत में ....!


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Kaaba a hindu temple taken over by muslims !

[h=3]KAABA A HINDU TEMPLE TAKEN OVER BY MUSLIMS[/h]

KING VIKRAMADITYA INSCRIPTION ON A GOLD DISH HUNG INSIDE THE KAABA

In pure scientific study about the Historical Muhammad raises basic questions concerning the prophet's role as a moral paragon; the sources of Islamic law; and the God-given nature of the Koran. The scientists even doubt the existence of Muhammad. Scientists say that the Koran is a not a product of Muhammad or even of Arabia, but a collection of materials stitched together to meet the needs of a later age. There was no Islam until two or three hundred years after the traditional version at around 830CE. The Arab tribesmen who conquered in the seventh century vast territory were not Moslems, but were persons who worshiped idols and are scientists call them pagans.

Even though Prophet Muhammad was born in the full light of history the earliest document date about a century and a half after his death. Not only does this long lapse of time cast doubt on their accuracy, but internal evidence strongly suggests the Arabic sources were composed in the context of intense partisan quarrels over the prophet's life. The earliest sources like papyri, inscriptions, and coins on the prophet's life, contradict the standard biography. An inscription and a Greek account fix Muhammad's birth in 552, not 570. Muhammad's career took place not in Mecca but hundreds of kilometers to the north. Yehuda Nevo. The classical Arabic language was developed not in today's Saudi Arabia but in the Levant.
Long before Islam came in to existence, Kaaba, in Mecca in Saudi Arabia was a pilgrimage site. The word Kaaba might have come from the Tamil Language which originated around 1700BC. In Tamil Nadu Kabaalishwaran temple is Lord Shiva’s temple and Kabaali refers to Lord Shiva. The black stone at Kaaba is held sacred and holy in Islam and is called "Hajre Aswad" from the Sanskrit word Sanghey Ashweta or Non-white stone.

The Shiva Lingam is also called Sanghey Ashweta. So what is in Kaaba could be the same what Hindus worship. The pedestal Maqam-E-Ibrahim at the centre of the Kaaba is octagonal in shape. In Hinduism, the pedestal of Brahma the creator is also octagonal in shape. Muslim pilgrims visiting the Kaaba temple go around it seven times. In no other mosque does the circumambulation prevail. Hindus invariably circumambulate or Pradakshina, around their deities. This is yet another proof that the Kaaba shrine is a pre-Islamic. In Shiva temples Hindus always practice circumambulation or Pradakshina. Just as in Hinduism, the custom of circumambulation by muslim pilgrims around the entire Kaaba building seven times shows that the claim that in Islam they don’t worship stones is not true.

Allah was one of the deities in Kaaba long before Islam was founded. It might come as a stunning revelation to many that the word ‘ALLAH’ itself is Sanskrit. In Sanskrit language Allah, Akka and Amba are synonyms. They signify a goddess or mother. The term ‘ALLAH’ forms part of Sanskrit chants invoking goddess Durga, also known as Bhavani, Chandi and Mahishasurmardini. The Islamic word for God is., therefore, not an innovation but the ancient Sanskrit appellation retained and continued by Islam. Allah means mother or goddess and mother goddess.

The King Vikramaditya inscription was found on a gold dish hung inside the Kaaba shrine in Mecca, proving beyond doubt that the Arabian Peninsula formed a part of his Indian Empire. (Ref: page 315 of a volume known as ‘Sayar-ul-Okul’ treasured in the Makhtab-e-Sultania library in Istanbul, Turkey). King Vikrama’s preachers had succeeded in spreading the Vedic Hindu sacred scriptures in Arabia and Arabs were once followers of the Indian Vedic way of life. The annual fair known as OKAJ which used to be held every year around the Kaaba temple in Mecca and the present annual hajj of the Muslims to the Kaaba is of earlier pre-Islamic congregation. . Even to this day ancient Siva emblems can be seen. It is the Shankara (Siva) stone that Muslim pilgrims reverently touch and kiss in the Kaaba.

Muslims shave their head and beard and don special sacred attire that consists of two seamless sheets of white cloth. One is to be worn round the waist and the other over the shoulders. Both these rites are remnants of the old Vedic practice of entering Hindu temples clean and with holy seamless white sheets. According to the Encyclopedia Britannica, the Kaaba has 360 idols. Traditional accounts mention that one of the deities among the 360 destroyed when the place was stormed was that of Saturn; another was of the Moon and yet another was one called Allah. That shows that in the Kaaba the Arabs worshipped the nine planets in pre-Islamic days. In India the practice of ‘Navagraha’ puja, that is worship of the nine planets, is still in vogue. Two of these nine are Saturn and Moon. In India the crescent moon is always painted across the forehead of the Siva symbol. Since that symbol was associated with the Siva emblem in Kaaba it came to be grafted on the flag of Islam.

The Hindu Vedic letter in Sanskrit "OM" if seen in a mirror one can see the Arabic numbers 786 and this is the most sacred number for Muslims and copies of the Arabic Koran have the mysterious figure 786 imprinted on them. In their ignorance simply they do not realize that this special number is nothing more than the holiest of Vedic symbols misread and none of the Arabic scholar has been able to determine how they chose 786 as the sacred for them. In short muslims are also going around Siva Lingam at Kaaba, seven times as Hindus go around it seven times.

A few miles away from Mecca are a big signboard which bars the entry of any non-Muslim into the area. This is a reminder of the days when the Kaaba was stormed and captured solely for the newly established faith of Islam. The object in barring entry of non-Muslims was obviously to prevent its recapture. Kaaba is clothed in a black shroud. This custom also originated from the days when it was thought necessary to discourage its recapture by camouflaging it.

Another Hindu tradition associated with the Kaaba is that of the sacred stream Ganga (sacred waters of the Ganges river). According to the Hindu tradition Ganga is also inseparable from the Shiva emblem as the crescent moon. Wherever there is a Siva emblem, Ganga must co-exist. True to that association a sacred fount exists near the Kaaba. Its water is held sacred because it has been traditionally regarded as Ganga since pre-Islamic times (Zam-Zam water).
 
Arabia Was Hindu Land Before Muhammad & ISlam Came

Many centuries before prophet Muhammad and the destructive advent of Islam, Arabia or Arabistan was an extremely rich and glorious center of Vedic civilization. In this article, I will prove to you point by point that pre-Islamic Arabia was in fact a flourishing civilization which revered Vedic culture.
It is the prophet Muhammad and the followers of Islam who are fully responsible for the dissemination and destruction of this once glorious culture.
In learning about this most ancient heritage, let's begin with the word Arabistan itself. Arabistan is derived from the original [COLOR=#009900 !important]Sanskrit[/COLOR] term Arvasthan which means[COLOR=#009900 !important]The Land of[/COLOR] Horses. Since time immemorial proponents of the Vedic culture used to breed exceptional horses in this region. Thus eventually the land itself began to be called Arva (Horses)-Sthan (place). The people who lived in this land were called Semitic. Semitic comes from the Sanskrit word Smritic. Arabs followed the ancient Vedic Smritis such as Manu-Smriti as their revered religious guides and thus they were identified as Smritic which has been corrupted into Semitic.
[COLOR=#009900 !important]At that time[/COLOR] the Uttarapath (Northern Highway) was the [COLOR=#009900 !important]international[/COLOR] highway to the North of India. It was via Uttarapath that Arabia and other [COLOR=#009900 !important]Middle Eastern countries[/COLOR]drew their spiritual, educational and material sustenance from India. Besides, this Sea-links were formed with India at least 800 years before the advent of Islam. Basra was the ancient gateway to India because it was at this port that the Arab lands recieved Indian goods and visitors. At that time the spoken language wasSanskrit, which later dwindled into the local variation that we now call Arabic. The proof of this is that thousands of words that were derived from Sanskrit still survive in Arabic today. Here is a sampling of some:
Sanskrit Arabic English
Sagwan Saj Teakwood
Vish Besh Poison
Anusari Ansari Follower
Shishya Sheikh Disciple
Mrityu Mout Death
Pra-Ga-ambar Paigambar One from heaven
Maleen Malaun Dirty or soiled
Aapati Aafat Misfortune
Karpas Kaifas Cotton
Karpur Kafur Camphor
Pramukh Barmak Chief
 
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That the Vedas were the religious scriptures to which the Arabs owed allegiance as early as 1800 B.C. proves not only the antiquity of the Vedas but also the existence of Indian rule over the entire region from the Indus to the Mediterranean, because it is a fact of history that the religion of the ruler is practised by his subjects.
Vedic culture was very much alive just before the birth of Muhammad. Again let's refer to the Sair-Ul-Okul. The following poem was written by Jirrham Bintoi who lived 165 years before the prophet Muhammed. It is in praise of India's great King Vikramaditya who had lived 500 years before Bintoi.(The English translation is in red).
"Itrasshaphai Santul
Bikramatul phehalameen Karimun
Bihillahaya Samiminela
Motakabbenaran Bihillaha
Yubee qaid min howa
Yaphakharu phajgal asari
nahans Osirim Bayjayholeen
Yaha sabdunya Kanateph natephi
bijihalin Atadari Bilala masaurateen
phakef Tasabahu. Kaunni eja majakaralhada
walhada Achimiman, burukan, Kad, Toluho
watastaru Bihillaha yakajibainana
baleykulle amarena
Phaheya jaunabil amaray Bikramatoon"
-(Sair-ul-Okul, Page 315)
"Fortunate are those who were born
during King Vikram's reign, he was
a noble generous, dutiful ruler devoted
to the welfare of his subjects. But at
that time, We Arabs oblivious of divinity
were lost in sensual pleasures. Plotting
& torture were rampant. The darkness of
ignorance had enveloped our country.
Like the lamb struggling for its life
in the cruel jaws of a wolf, we Arabs
were gripped by ignorance. The whole
country was enveloped in a darkness as
intense as on a New moon night. But the
present dawn & pleasant sunshine of
education is the result of the favor of
that noble king Vikram whose benevolence
did not lose sight of us foreigners as we
were. He spread his sacred culture amongst
us and sent scholars from his own land
whose brilliance shone like that of the sun
in our country. These scholars & preceptors
through whose benevolence we were once again
made aware of the presence of god, introduced
to his secret knowledge & put on the road to
truth, had come to our country to initiate us
in that culture & impart education."

Thus we can see that Vedic religion and culture were present in Pre-Islamic Arabia as early as 1850 B.C., and definitely present at the time of Mohammed's birth.

In his book Origines, Volumes 3 & 4", Sir W. Drummond adds:
"Tsabaism was the universal language of mankind when Abraham received his call, their doctrines were probably extended all over the civilized nations of Earth."

Tsabaism is merely the corruption of the word Shaivism which is Vedic religion. On page 439 of this book, Sir Drummond mentions some of gods of pre-Islamic Arabs, all of which were included in the 360 idols that were consecrated in the Kaba shrine before it was raided and destroyed by Muhammad and his followers. Here are some of the Vedic deities and their original Sanskrit names:
Arabic Sanskrit English
Al-Dsaizan Shani Saturn
Al-Ozi or Ozza Oorja Divine energy
Al-Sharak Shukra Venus
Auds Uddhav -
Bag Bhagwan God
Bajar Vajra Indra's thunderbolt
Kabar Kuber God of wealth
Dar Indra King of gods
Dua Shara Deveshwar Lord of the gods
Habal Bahubali Lord of strength
Madan Madan God of love
Manaph Manu First Man
Manat Somnath Lord Shiv
Obodes Bhoodev Earth
Razeah Rajesh King of kings
Saad Siddhi God of Luck
Sair Shree Goddess of wealth
Sakiah Shakrah Indra
Sawara Shiva-Eshwar God Shiva
Yauk Yaksha Divine being
Wad Budh Mercury
 
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The Kaba temple which was misappropriated and captured by Muslims was originally an International Vedic Shrine. The ancient Vedic scripture Harihareswar Mahatmya mentions that Lord Vishnu's footprints are consecrated in Mecca. An important clue to this fact is that Muslims call this holy precint Haram which is a deviation of the Sanskrit term Hariyam, i.e. the precint of Lord Hari alias Lord Vishnu. The relevant stanza reads:
"Ekam Padam Gayayantu
MAKKAYAANTU Dwitiyakam
Tritiyam Sthapitam
Divyam Muktyai Shuklasya Sannidhau"
The allusion is to the Vamana incarnation of Lord Vishnu whose blessed feet were consecrated at three holy sites, namely Gaya, Mecca and Shukla Teertha. Worshipping such carved, holy foot impressions is a holy Vedic custom which convert Muslims are inadvertently perpetuating. But in doing this they delude themselves and mislead others that these foot-impressions which are on reverential display in several mosques and tombs around the world are in fact Muhammad's own. There are several snags in this argument. Firstly worshipping a foot -impression amounts to idolatry and should therefore be taboo for a true Muslim. Secondly Muhhamad disclaimed having performed any miracles. Therefore there can be no foot-impression of his on stone. Thirdly foot-impressions must always be in pairs like shoes. Yet in most of these shrines, it is usually a single footprint which suggests that Muhammad walked on only one foot. Another question that crops up is whether the foot-impression is of the same size and foot in all the shrines. The fact appears to be that when the Vedic Kaba shrine in Mecca was invaded by Muhammad, the pairs of foot impressions of Vedic deities there were plundered and later traded to the gullible and devout as Muhammad's own footprints for some favour, reward or personal gain by unscrupulous muslims. That is why they are single and not in pairs.
 
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Figure 1.
The Shiv Ling at The Kaba. It was broken in seven
places and now is held together by a silver band.
The Black Stone which is the Shiv Emblem (also known as Sange Aswad which is a corrupted form of the Sanskrit word Sanghey Ashweta--meaning non-white stone) still survives in the Kaba as the central object of Islamic veneration. All other Vedic Idols could be found buried in the precincts or trampled underfoot in labyrinthine subterranean corridors if archaeological excavations are undertaken. The Black Stone has been badly mutilated, its carved base has disappeared and the stone itself is broken at seven places. It's parts are now held together by a silver band studded with silver nails. It lies half buried in the South Eastern portion of the Kaba Wall (Refer to Figure 1). The term Kaba itself is a corruption of the Sanskrit word Gabha (Garbha + Graha) which means Sanctum.
In addition, in the inscriptions from Hajja and its neighborhood was found a votive vessel dedicated by members of two tribes called Rama and Somia. Rama and Soma are Vedic deities, Rama is of the Solar dynasty and Soma is of the Lunar Dynasty. The moon god was called by various names in pre-Islamic times , one of them was Allah. Allah had 3 children, Al-Lat, Al-Uzza and Manat. Al-Lat and Al-Uzza were both feminine deities. Alla is another name for the Hindu goddess Durga. It is obvious that the goddess Al-Lat was Alla (Durga) and Al-Uzza was Oorja (energy or life force also known as Shakti). Manat was none other than Somnath which is another name for Lord Shiva. One significant point to note that Soma in Sanskrit means Moon and Nath means Lord. Thus the Kaba itself was dedicated to the Moon God Somnath alias Shiv and the word Somnath was corrupted to Manat. The famous Black Stone is none other than the ShivLing of Makkeshwar alias Mecca. Lord Shiva is always shown with a crescent Moon on his head and every Shiva temple is supposed to have a sacred water spring representing the Ganges. The Crescent Moon pinnacle of the Kaba and the Zamzam spring (actually Zamza from Ganga) are irrefutable testaments to the Vedic origins of the Kaba.
 
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Figure 2 below depicts the image of Maqam-E-Ibrahim in the Kaba.
Figure 2.

Maqam-E-Ibrahim or more appropriately the pedestal of Brahma.
Muslims from all over the world pay homage to this shrine. This shrine is actually the pedestal of Brahma. Notice that the word, Ibrahim is actually a corruption of the word, Brahma. The octogonal grill which is a Vedic design, protects the holy footprints which represent the start of the creation nearly 2000 million years ago. Before it was captured by the Muslims it was an international shrine of the Vedic trinity.
In fact the names of the holiest of Muslim cities Mecca and Medina come from the Sanskrit words Makha-Medini which means the land of Fire-Worship. Even the most ancient names of these 2 cities were Mahcorava- which came from Mahadeva (Lord Shiva) and Yathrabn - which came from Yatra-Sthan (place of pilgrimage).

Islam came into being about 1372 years ago. It is well known that over 7500 years ago, at the time of the Mahabharat War, Kurus ruled the world. The scions of that family administered the different regions. Prophet Muhammed himself and his family were adherents of Vedic culture. The Encyclopedia Islamia admits as much when it says: "Muhammed's grandfather and uncles were hereditary priests of the Kaba temple which housed 360 idols!"
According to Arab traditions, Muhammad is a title. We do not know what name his parents had given him. We do however know that the central object of worship which survives at the Kaba today is a Shivling. That was allowed to remain there because that was the faceless family deity of Muhammad's family. One of the original names of Lord Shiv is Mahadev (The Great God) therefore it is entirely possible Muhammad came from Mahadev. This appears fairly certain because the Arabs still have a Mahadevi sect. Moreover the title Mehdi of a Muslim chief is also a malpronounciation of the term Mahadeva. According to Sanskrit etymology the term Muhammad implies 'a person of great inspiration'-'Mahan Madah yasya assau Muhammadah' In a hostile sense it also implies 'a person of a proud and haughty temperament'.
 
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