"Market" in Indian context
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"बाजार" या "मार्केट" अपने आप में कोई बुरी चीज नहीं है । पर आजकल इसके कई मतलब हो गये हैं । जब हर चीज, यहां तक कि धर्म, संस्कृति पर बाजार हावी हो जाता है तो इसके भयंकर परिणाम निकलते हैं और वही हो रहा है । इस पोस्ट में सिर्फ एक-दो पहलुओं पर चर्चा करूंगा ।
मो. रफी का एक गीत सुनते थे - "यहां हर चीज बिकती है, कहो जी तुम क्या-क्या खरीदोगे?" बाजार का स्वभाव निर्दयी होता है इसलिये इंसानी रिश्तों का वह विरोधी होता है । प्याऊ लगाकर लोगों को मुफ्त में पानी पिलाना पहले धर्म, पुण्य माना जाता था । आज वह भी बाजार की भेंट हो गया है - जेब में पैसे हैं तो पानी खरीद लो वर्ना प्यासे मरो ।
“बाजार” की नजर में सारे नौजवान "ब्वाय" हैं और सारी कन्यायें "गर्ल" । बाजार भाई-बहन, बेटे-बेटी, पति-पत्नी, मामा-मामी के रिश्ते नहीं मानता । उसके नजर में वे एक ग्राहक (consumers) हैं, उससे ज्यादा कुछ नहीं । बंबई की अपनी कोई संस्कृति नहीं पर वह भारत की व्यापारिक राजधानी है । यहां करोड़ों अरबों की फिल्में बनती हैं, काला धन यहां गोरा बनता है । फिल्मों में जो पहनावा दिखाया जाता है या जैसी भाषा बोली जाती है, नई पीढ़ी उसी को लपक लेती है । फिल्मी बाजार ने सिखाया कि कम से कम कपड़े पहनो, और भारत की बहू-बेटियों ने उसको तुरन्त लपक लिया । फिल्मी अभिनेता लाखों करोड़ों लेकर एक खास ब्रांड की बनियान और जांघिया पहन कर पर्दे पर आते हैं और हम उसी ब्रांड को "अन्दर की बात" मानकर खरीद लेते हैं । एक खास कंपनी को अपनी शराब बेचनी हो तो उसके विज्ञापन पर एक अर्धनग्न युवती की फोटो जरूर होती है । जन्म देनी वाली देवी एक वस्तु (object) बन कर रह गई । नारी का चीरहरण जारी है, महाभारत की द्रौपदी की तरह वह कोई बदला लेने की बात भी नहीं कर रही । नई द्रौपदियां अपना दुपट्टा खुद उतार रही हैं - "हमारा बदन सुन्दर है तो लोगों को दिखाने में हर्ज ही क्या है ?" भारत तो हजारों साल पहले "सत्यम, शिवम, सुन्दरम" के समुद्र में गोता लगा चुका है, पर ये बातें उनको कौन समझाये ?
राजनीति "दंगा युग" लेकर आई और टी.वी. और फिल्मों की कृपा से अब "नंगा युग" का दौर है । अश्लीलता का एक मजबूत अर्थशास्त्र है और इस अर्थशास्त्र ने एक नया समाजशास्त्र भी गढ़ दिया है । नग्न तस्वीरें और "गर्लफ्रैंड" जैसी फिल्में आज के बाजार के स्वाभाविक हिस्से हैं । बाजार रोज नई-नई चीजें निकाल रहा है और ज्यादा नग्न हो जाने की खोज जारी रहती है । समृद्धि (prosperity) जब संस्कृति विहीन होती है तो ऐसा ही होता है । दुनियां के 30-40 करोड़ लोगों के पास बेशुमार दौलत आ गई है, उनमें से कुछ लाख भारतीय भी हैं । ये सब 'ग्लोबल' हो गये हैं, देश या संस्कृति से इनको कोई मतलब नहीं । अमरीका इनका नेता है और कंपनियां इनकी रखवाली । अमरीका सर्वशक्तिमान है, जो वह कहता है वह ठीक, बाकी सब गलत । WTO और IMF इनके नए तीर्थस्थान और देवी-देवता हैं । यह ऐसा गुट बन चुका है जो दूसरों की पूंजी को हड़पना अपना हक समझता है । अमरीका में हाल में ही कुछ बड़ी कंपनियों का जो दिवाला पिटा, उससे इनका यह चेहरा बेनकाब हो चुका है पर इससे उनकी सेहत पर कुछ असर नहीं होने वाला ।
हमें क्या खाना है, क्या पहनना है, इसका फैसला "बाजार" ही तय करता है । आपका बच्चा स्कूल में क्या पढ़ेगा, यह भी बाजार ही तय करेगा । बच्चा शरीर से तगड़ा है, उसका मन एक अच्छा खिलाड़ी बनने का है, पर मां-बाप उसे डांटकर चुप कर देते हैं । घूंसेबाज या पहलवान बनकर क्या करेगा, कंप्यूटर-साइंस पढ़ - आजकल इसी की "डिमांड" है । हिन्दी-संस्कृत पढ़ने से क्या मिलेगा, बस अंग्रेजी महारानी की सेवा करो ।
हर चीज बिक रही है - गीत, संगीत, शर्म, मर्यादा, इज्जत-आबरू भी । सुना है कि भारत में रात को कुछ "खास" प्रोग्रामों को इजाजत देने की बात चल रही है । यानि दिन में जो दिखाना गलत है, रात को वही ठीक है । जो बच्चों के लिए अश्लील है, बड़ों के लिए नहीं । तो क्या भारत के नौजवान इस अश्लीलता के आदी हो चुके हैं ? नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं है । असल समस्या बाजार की है, बाजार में आजकल बहुत ताकत है । ऐसे टी.वी. प्रोग्राम और फिल्में हमारी संस्कृति पर सीधा हमला हैं । सन् 1991 में भारत के economic liberalisation के बाद यह हमला और तेज हो गया है । जो लोग इसके बारे में बहस करते हैं, उनको "तालिबानी" कहकर दरकिनार कर दिया जाता है ।
कंपनियां बाजार की रखवाली हैं । कंपनियों में नौकरी करो और 'ऐश' करो । फौज में भर्ती होकर, देशभक्ति के जज्बे में आकर जान दे देना कौन सी समझदारी है ?
अन्त में महमूद का गीत याद आ रहा है - दि होल थिंग इज दैट कि भैया सबसे बड़ा रुपय्या ।
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