मेहनत के तो कुछ ख़ास मायने ही नहीं हैं, भाग्य भी कुछ बिना करे थोड़े ही साथ देता है
इस दुनिया में कुछ लोग कुछ विशेष करना चाहते हैं. ऐसे लोग कई बार दूसरों से प्रेरित होकर कुछ बनने की सोचते हैं, जबकि कईयों के साथ हालात ऐसे बन जाते हैं. अब बात ये है कि जो भी हम बनना चाहते हैं, उसके लिए ठीक रास्ता क्या हो. बहुत से लोग कहते हैं कि मेहनत करो. कुछ लोगों का मानना है कि सब किस्मत का खेल है.
मेरा मानना है कि मेहनत कोई ज्यादा मायने नहीं रखती, इसके अलावा भी कई और बातें अहम् हैं. सबसे पहले तो ये देखना जरूरी है कि हम बनना क्या चाह रहे हैं. यदि हमारा मकसद कोई अच्छी नौकरी हासिल करने का है तो इसके लिए तो केवल मेहनत से ही काम चल जाएगा और 4-5 साल के प्रयासों से सफल होने के अवसर बन जाएंगे, बशर्ते कि गंभीरता से प्रयास किए गए हों. लेकिन यदि किसी का मकसद है कि वो तो किसी खेल में विश्व चैंपियन बनेगा तो इसके लिए खाली मेहनत से काम नहीं चलने वाला.
दरअसल मेहनत अपने आप में किसी आनंद से कम नहीं. यदि कोई बड़ी नौकरी हासिल करने वाला कहता है कि उसने बड़ी मेहनत की है, वो रात-रात भर जागकर पढ़ता था, तो वो बेकार की बात करता है. यदि पढ़ाई में किसी की दिलचस्पी हो जाए तो फिर पढने में मजा आने लगता है और जब पढने में मजा आने लगे तो फिर पढ़ाई करना मेहनत कहां रह गया, वो तो मजा बन गया. ऐसे ही यदि कोई खिलाड़ी कहे कि उसने बड़ी मेहनत की है, कई-कई घंटे व्यायाम किया है तो वो भी बेकार की बात करता है. एकाध साल तो उसकी मेहनत को मेहनत कहा जा सकता है, लेकिन एक बार जब उसे व्यायाम करने का शौंक हो जाता है तो उसकी मेहनत एक मजा बन जाती है. मेहनत करने में, पसीना बहाने में मजा आता है और इस दुनिया में मजे के बदले मजा नहीं मिलता. फूलों भरे रास्ते के लिए पहले कांटों पर चलना पड़ता है. कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है. बचपन में हम क्रिकेट खेलते हुए लड़ते हैं, मेरी बारी, मैं बल्लेबाजी करूंगा, मैं ओवर फेंकूंगा. तो अगर कोई क्रिकेटर ये कहे कि उसने क्रिकेट में बड़ी मेहनत की है तो वो बेकार की बात करेगा, उसने तो क्रिकेट खेलने का मजा लिया है.
जो लोग इस दुनिया में बड़ी सफलता हासिल करते हैं, उनमें से अधिकतर भाग्य के बल पर ऐसा करते हैं. ये भाग्य भी दरअसल उनकी किसी करनी का ही फल होता है. अब देखिए ना, कोई अच्छा इंसान किसी सड़क हादसे में अपंग हो गया और उसने पूरा जीवन दुखों में गुजारा तो तथाकथित मेहनतियों से तो वो बहुत आगे निकल गया. मेहनत करने में तो मजा आता है, लेकिन अपंग होकर जीना तो मेहनत करने से कहीं अधिक कष्ट भरा है. लेकिन चूंकि वह अपनी मर्जी से अपंग नहीं बना, इसलिए उसे भी कोई बहुत बड़ी सफलता नहीं दी जा सकती. महत्व उसका है जो कोई बड़ा सुख ले तो सकता हो, लेकिन न लेता हो.
जो लोग पूरी जिंदगी मेहनत करते हैं, संघर्ष करते हैं और अच्छे कर्म भी करते हैं, लेकिन उन्हें उन सबका फल नहीं मिल पाता तो ये कहना कि उनका वो प्रयास बेकार गया, गलत है. वो कभी ना कभी भाग्य के रूप में उन्हें मदद देगा. इस दुनिया में सब एक समान हैं, सबके लिए एक समान नियम हैं. यह ठीक उसी प्रकार है, जिस प्रकार किसी कंपनी में हज़ारों लोग काम करते हों, कोई 2 घंटे, कोई 4 घंटे और कोई इससे भी ज्यादा घंटे. कोई ज्यादा महत्वपूर्ण काम करता हो और कोई कम तो उन सभी को उस कंपनी का मालिक एक समान वेतन कैसे दे सकता है. यदि वो ऐसा करेगा तो जो लोग ज्यादा देर काम करते हैं और ज्यादा जरूरी काम करते हैं, वो ऐतराज करेंगे. यही हाल इस दुनिया का है. हम सभी यहां मजदूर है. ये पृथ्वी एक कंपनी है. इस दुनिया को चलाने वाली ताकत मालिक है. सबका मालिक एक. यदि यहां कम मेहनत करने वाले को भी बड़ी सफलता दे दी गई तो फिर उसे क्या मिलेगा जो उससे ज्यादा मेहनत करेगा और यदि मेहनत करने वालों को बड़ी सफलता दे दी गई तो फिर उन्हें क्या मिलेगा, जो मेहनत के साथ तपस्या भी करेगा. यदि कोई इस दुनिया में कुछ ऐसा कर दिखाएगा जो न तो पहले कभी किसी ने किया हो और न ही कभी कोई भविष्य में कर सकेगा तो फिर वो इस कंपनी का मालिक ही बन जाएगा और ऐसा करने के लिए उसे अपना एक जीवन तो होम करना ही पड़ेगा (ऐसा आज तक कोई नहीं कर सका है).
तो छोटी सफलता निरंतर मेहनत के बल पर हासिल की जा सकती है, लेकिन बड़ी सफलता के लिए भाग्य भी चाहिए होता है, जो और कुछ नहीं हमारी कभी की कोई अच्छी करनी ही होती है.
इस दुनिया में सफलता वो है जो किसी को भी यूं ही न मिल जाती हो. मेहनतकश मजदूर मजबूरी की वजह से ऐसा बनते हैं और उनके जैसे बेशुमार होते हैं. यदि उन्हें भी शानदार जीवन दे दिया गया तो फिर उन्हें क्या मिलेगा, जो यहां कुछ ऐसा करेंगे जो बहुत ही कम लोग कर पाते हों. हम में से अधिकतर लोग गाड़ी चलाना जानते होंगे, लेकिन सचिन तेंदुलकर या वीरेन्द्र सहवाग की तरह क्रिकेट खेलना नहीं जानते होंगे. जिसके जैसे इस दुनिया में कम हों वे सफल हैं, जिसके जैसा इस दुनिया में कोई न हो वो सबसे सफल है. जो लगातार मेहनत करे और भले ही कुछ भी फल न मिले, इसके बावजूद लगा ही रहे, साथ ही अपने कर्म भी अच्छे रखे और दूसरों के साथ कुछ भी ऐसा न करे जैसा कि वो अपने साथ नहीं चाहता कि दूसरे करें तो फिर वो बिना भाग्य की मदद के भी बहुत बड़ी नहीं तो मध्यम दर्जे की सफलता तो हासिल कर ही लेगा. सबको ये देखना चाहिए कि जितना पैसा वो कमा रहा है, उतना ही काम भी कर रहा है या नहीं. यदि वो ऐसा नहीं कर रहा तो दुख पाएगा. पैसा कमाओ, अच्छा मकान बनाओ, बैंक बैलेंस बनाओ, लेकिन कड़ी मेहनत की कमाई से. यदि कुछ भी न कर सको तो बस अच्छे इंसान बन जाओ. अच्छा इंसान बनना किसी बड़े पैसे वाला बनने से भी कहीं ज्यादा मुश्किल है और जो ज्यादा मुश्किल है, उसका उतना ही महत्व है.
सफल बनने के लिए गरीबी या अमीरी कोई मायने नहीं रखती.
नोट : ये मेरे अपने विचार हैं. दूसरों के विचार भिन्न हो सकते हैं.