अरै भाई, ये ख्वामखाह की बात करने के लिए मेरे को क्वोट करने की जरूरत नहीं थी। अब आपकी बातों का जवाब दूंगा तो और कोई एसके खर्ब बरगा मेरे को क्वोट कर देगा, बेकार के तर्कों के साथ। खैर इस बार जवाब दे रहा हूं, अब आगे से मेरे को क्वोट मत करना ऐसे कमजोर तर्कों के साथ। हरियाणे में यदि बीजेपी की सरकार बनती है तो वहां का चीफ मिनिस्टर ऐसा कोई फैसला नहीं ले सकता जो मोदी को मंजूर न हो, जिस तरह से भूपिंदर सिंह हूडा ऐसा कोई फैसला नहीं ले सकता जो कांग्रेस आला कमान को मंजूर न हो।
अगर इतने ही पढ़-लिख जाते हैं जाट तो फिर किसी जाति/धर्म विशेष के नाम, रीति-रिवाज क्यों इस्तेमाल करते हैं? ऐसे नाम और रीति-रिवाज क्यों इस्तेमाल नहीं करते, जो किसी भी जाति/धर्म से संबंधित न हों? आपके नाम को सुनके कोई भी आपको हिंदू समझेगा। दम है तो ऐसा नाम रखो, जो किसी भी धर्म का न लगे।
क्या आपके लिए चौधर का मतलब सिर्फ अजित और जयंत चौधरी हैं? क्या अब जो बाग़पत का सांसद है, वो हमारा जाट भाई नहीं है? जितने जाट सांसद वर्तमान में उत्तर प्रदेश में हैं, इतने संभवतः पहले कभी नहीं रहे और ये सब बीजेपी की वजह से हैं। इतने जाट सांसद वर्तमान में हरियाणे में भी नहीं हैं।