दरअसल गांव में एक विचार बहुत पहले से अपनी जड़ें जमाए हुए है कि खेती में क्या रखा है. यही कारण है कि मैं बहुत से ऐसे जाट देख चुका, जिनके नाम गांव में अच्छी-खासी जमीन होती है, इसके बावजूद वे शहर में कोई मामूली नौकरी करना और किराए पर रहना मंजूर कर लेते हैं. दरअसल गांव में ही कुछ ऐसा माहौल है कि युवक एक-दूसरे को चिढाते हैं कि 'अक रै बस रह ग्या गाम का गाम मैं इ...तू भी कुछ नी बा...' ऐसी सोच गांव में खेती के प्रति तिरस्कारपूर्ण माहौल पेश करती है.
इस दुनिया की एक सोच बहुत ही निर्मम है. इस दुनिया में ऐसा काम करने वालों को ज्यादा तरजीह नहीं दी जाती, जिसे कोई भी कर ले. खेती को भी ऐसा ही काम समझा जाता है. इस दुनिया में ज्यादा सम्मान उसी को मिलता है जो कुछ ऐसा कर सके जिसे कोई और न कर सके या फिर ज्यादा लोग न कर सकें. इसके बावजूद ये सारा संसार एक-दूसरे की सेवा कर रहा है. सबका मकसद अपने जीवन को सुखपूर्वक पूरा करना है. एक जूता सीलने वाले के बिना भी ये दुनिया परेशान हो जाएगी, फिर खेती करके लोगों का पेट भरने का इंतजाम करने वाले किसान की अहमियत की तो बात ही क्या करें...कोई भी इंसान सारे काम नहीं करता, न ही कर सकता...सब अलग-अलग काम करके एक-दूसरे की सेवा कर रहे हैं...सारे ही काम जरूरी हैं (कुछेक बुरे कामों को छोड़कर)...
101% sahi baat keh bhai Upender Singh. kati ji sa laga diya thare lekh ne...