nddudimumbai
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आज एक महान वीराँगना की जन्मतिथि है
19 नवम्बर 1835 को बनारस में मोरोपंत तांबे व
भगीरथी बाई की पुत्री रूप मे लक्ष्मीबाई का जन्म हुआ।
उनका बचपन
का नाम मणिकर्णिका था, पर प्यार से लोग उन्हे मनु कहकर
पुकारते थें। काशी में रानी लक्ष्मीबाई के जन्म पर
प्रथम
वीरांगना रानी चेनम्मा को याद
करना लाजिमी है। 1824 में कित्तूर (कर्नाटक)
की रानी चेनम्मा ने अंगेजों को मार भगाने के लिए
’फिरंगियों भारत छोड़ो’ की ध्वनि गुंजित की थी और
रणचण्डी का रूप धर कर अपने
अदम्य साहस व फौलादी संकल्प की बदौलत अंग्रेजों के
छक्के छुड़ा दिये थे।
कहते हैं कि मृत्यु से पूर्व रानी चेनम्मा काशीवास
करना चाहती थीं पर उनकी यह चाह
पूरी न हो सकी थी। यह संयोग
ही था कि रानी चेनम्मा की मौत के 6 साल बाद काशी में
ही लक्ष्मीबाई का जन्म हुआ।
बचपन में ही लक्ष्मीबाई अपने पिता के साथ बिठूर आ गईं।
वस्तुतः 1818 में तृतीय मराठा युद्ध में अंतिम
पेशवा बाजीराव द्वितीय की पराजय पश्चात उनको 8 लाख
रूपये की वार्षिक
पेशन मुकर्रर कर बिठूर भेज दिया गया।
पेशवा बाजीराव द्वितीय के साथ उनके सरदार मोरोपंत तांबे
भी अपनी पुत्री लक्ष्मीबाई के साथ बिठूर आ गये।
लक्ष्मीबाई का बचपन नाना साहब के साथ कानपुर के बिठूर
में ही बीता। लक्ष्मीबाई की शादी झांसी के राजा गंगाधर राव
से हुई। 1853 में अपने पति राजा गंगाधर राव की मौत
पश्चात् रानी लक्ष्मीबाई ने झाँसी का शासन सँभाला पर
अंग्रेजों ने
उन्हें और उनके दत्तक पुत्र को शासक मानने से इन्कार कर
दिया। अंग्रेजी सरकार ने रानी लक्ष्मीबाई को पांच हजार
रूपये मासिक पेंशन लेने को कहा पर महारानी ने इसे लेने से
मना कर दिया। पर बाद में उन्होंने इसे लेना स्वीकार
किया तो अंग्रेजी हुकूमत ने यह शर्त जोड़ दी कि उन्हें अपने
स्वर्गीय पति के कर्ज
को भी इसी पेंशन से अदा करना पड़ेगा, अन्यथा यह पेंशन
नहीं मिलेगी।
इतना सुनते ही महारानी का स्वाभिमान ललकार उठा और
अंग्रेजी हुकूमत को उन्होंने संदेश भिजवाया कि जब मेरे
पति का उत्तराधिकारी न मुझे माना गया और न ही मेरे पुत्र
को,
तो फिर इस कर्ज के उत्तराधिकारी हम कैसे हो सकते हैं।
उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत को स्पष्टतया बता दिया कि कर्ज
अदा करने की बारी अब अंग्रेजों की है न कि भारतीयों की।
इसके बाद घुड़सवारी व हथियार चलाने में माहिर
रानी लक्ष्मीबाई ने ब्रिटिश सेना को कड़ी टक्कर देने
की तैयारी आरंभ कर दी और उद्घोषणा की कि-‘‘मैं
अपनी झांसी नहीं दूंगी।”
रानी लक्ष्मीबाई द्वारा गठित सैनिक दल में तमाम महिलायें
शामिल थीं।
उन्होंने महिलाओं की एक अलग ही टुकड़ी ‘दुर्गा दल’ नाम से
बनायी थी।
इसका नेतृत्व कुश्ती, घुड़सवारी और धनुर्विद्या में माहिर
झलकारीबाई के हाथों में था। झलकारीबाई ने कसम
उठायी थी कि जब तक झांसी स्वतंत्र नहीं होगी, न ही मैं
श्रृंगार करूंगी और न ही सिन्दूर लगाऊँगी। अंग्रेजों ने जब
झांसी का किला घेरा तो झलकारीबाई जोशो-खरोश के साथ
लड़ी।
चूँकि उसका चेहरा और कद- काठी रानी लक्ष्मीबाई से
काफी मिलता-जुलता था, सो जब उसने रानी लक्ष्मीबाई
को घिरते
देखा तो उन्हें महल से बाहर निकल जाने को कहा और स्वयं
घायल सिहंनी की तरह अंग्रेजों पर टूट पड़ी और शहीद
हो गई।
रानी लक्ष्मीबाई अपने बेटे को कमर में बाध घोडे पर सवार
किले से बाहर निकल गई और कालपी पहुची, जहां तात्या टोपे
के साथ मिलकर ग्वालियर के किले पर कब्जा कर
लिया।....अन्ततः 18 जून 1858
को भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम की इस अद्भुत वीरांगना ने
अन्तिम सांस ली पर अंग्रेजों को अपने पराक्रम
का लोहा मनवा दिया।
तभी तो उनकी मौत पर जनरल ह्यूगरोज ने कहा- ‘‘यहाँ वह
औरत सोयी हुयी है,
जो व्रिदोहियों में एकमात्र मर्द थी।”
बुंदेलखण्ड की वादियों में आज भी दूर-दूर तक लोक लय
सुनाई देती है-
''खूब लड़ी मरदानी अरे झाँसी वारी रानी
पुरजन पुरजन तोपें लगा दई, गोला चलाए असमानी
अरे झाँसी वारी रानी, खूब लड़ी मरदानी
सबरे सिपाइन को पैरा जलेबी, अपन चलाई गुरधानी
छोड़ मोरचा जसकर कों दौरी, ढूढ़ेहूँ मिले नहीं पानी
अरे झाँसी वारी रानी, खूब लड़ी मरदानी।''
माना जाता है कि इसी से प्रेरित होकर ‘झाँसी की रानी’
नामक अपनी कविता में सुभद्राकुमारी चैहान ने 1857
की उनकी वीरता का बखान किया हैं-
''चमक उठी सन् सत्तावन में
वह तलवार पुरानी थी
बुन्देले हरबोलों के मुँह हमने
सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी।
19 नवम्बर 1835 को बनारस में मोरोपंत तांबे व
भगीरथी बाई की पुत्री रूप मे लक्ष्मीबाई का जन्म हुआ।
उनका बचपन
का नाम मणिकर्णिका था, पर प्यार से लोग उन्हे मनु कहकर
पुकारते थें। काशी में रानी लक्ष्मीबाई के जन्म पर
प्रथम
वीरांगना रानी चेनम्मा को याद
करना लाजिमी है। 1824 में कित्तूर (कर्नाटक)
की रानी चेनम्मा ने अंगेजों को मार भगाने के लिए
’फिरंगियों भारत छोड़ो’ की ध्वनि गुंजित की थी और
रणचण्डी का रूप धर कर अपने
अदम्य साहस व फौलादी संकल्प की बदौलत अंग्रेजों के
छक्के छुड़ा दिये थे।
कहते हैं कि मृत्यु से पूर्व रानी चेनम्मा काशीवास
करना चाहती थीं पर उनकी यह चाह
पूरी न हो सकी थी। यह संयोग
ही था कि रानी चेनम्मा की मौत के 6 साल बाद काशी में
ही लक्ष्मीबाई का जन्म हुआ।
बचपन में ही लक्ष्मीबाई अपने पिता के साथ बिठूर आ गईं।
वस्तुतः 1818 में तृतीय मराठा युद्ध में अंतिम
पेशवा बाजीराव द्वितीय की पराजय पश्चात उनको 8 लाख
रूपये की वार्षिक
पेशन मुकर्रर कर बिठूर भेज दिया गया।
पेशवा बाजीराव द्वितीय के साथ उनके सरदार मोरोपंत तांबे
भी अपनी पुत्री लक्ष्मीबाई के साथ बिठूर आ गये।
लक्ष्मीबाई का बचपन नाना साहब के साथ कानपुर के बिठूर
में ही बीता। लक्ष्मीबाई की शादी झांसी के राजा गंगाधर राव
से हुई। 1853 में अपने पति राजा गंगाधर राव की मौत
पश्चात् रानी लक्ष्मीबाई ने झाँसी का शासन सँभाला पर
अंग्रेजों ने
उन्हें और उनके दत्तक पुत्र को शासक मानने से इन्कार कर
दिया। अंग्रेजी सरकार ने रानी लक्ष्मीबाई को पांच हजार
रूपये मासिक पेंशन लेने को कहा पर महारानी ने इसे लेने से
मना कर दिया। पर बाद में उन्होंने इसे लेना स्वीकार
किया तो अंग्रेजी हुकूमत ने यह शर्त जोड़ दी कि उन्हें अपने
स्वर्गीय पति के कर्ज
को भी इसी पेंशन से अदा करना पड़ेगा, अन्यथा यह पेंशन
नहीं मिलेगी।
इतना सुनते ही महारानी का स्वाभिमान ललकार उठा और
अंग्रेजी हुकूमत को उन्होंने संदेश भिजवाया कि जब मेरे
पति का उत्तराधिकारी न मुझे माना गया और न ही मेरे पुत्र
को,
तो फिर इस कर्ज के उत्तराधिकारी हम कैसे हो सकते हैं।
उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत को स्पष्टतया बता दिया कि कर्ज
अदा करने की बारी अब अंग्रेजों की है न कि भारतीयों की।
इसके बाद घुड़सवारी व हथियार चलाने में माहिर
रानी लक्ष्मीबाई ने ब्रिटिश सेना को कड़ी टक्कर देने
की तैयारी आरंभ कर दी और उद्घोषणा की कि-‘‘मैं
अपनी झांसी नहीं दूंगी।”
रानी लक्ष्मीबाई द्वारा गठित सैनिक दल में तमाम महिलायें
शामिल थीं।
उन्होंने महिलाओं की एक अलग ही टुकड़ी ‘दुर्गा दल’ नाम से
बनायी थी।
इसका नेतृत्व कुश्ती, घुड़सवारी और धनुर्विद्या में माहिर
झलकारीबाई के हाथों में था। झलकारीबाई ने कसम
उठायी थी कि जब तक झांसी स्वतंत्र नहीं होगी, न ही मैं
श्रृंगार करूंगी और न ही सिन्दूर लगाऊँगी। अंग्रेजों ने जब
झांसी का किला घेरा तो झलकारीबाई जोशो-खरोश के साथ
लड़ी।
चूँकि उसका चेहरा और कद- काठी रानी लक्ष्मीबाई से
काफी मिलता-जुलता था, सो जब उसने रानी लक्ष्मीबाई
को घिरते
देखा तो उन्हें महल से बाहर निकल जाने को कहा और स्वयं
घायल सिहंनी की तरह अंग्रेजों पर टूट पड़ी और शहीद
हो गई।
रानी लक्ष्मीबाई अपने बेटे को कमर में बाध घोडे पर सवार
किले से बाहर निकल गई और कालपी पहुची, जहां तात्या टोपे
के साथ मिलकर ग्वालियर के किले पर कब्जा कर
लिया।....अन्ततः 18 जून 1858
को भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम की इस अद्भुत वीरांगना ने
अन्तिम सांस ली पर अंग्रेजों को अपने पराक्रम
का लोहा मनवा दिया।
तभी तो उनकी मौत पर जनरल ह्यूगरोज ने कहा- ‘‘यहाँ वह
औरत सोयी हुयी है,
जो व्रिदोहियों में एकमात्र मर्द थी।”
बुंदेलखण्ड की वादियों में आज भी दूर-दूर तक लोक लय
सुनाई देती है-
''खूब लड़ी मरदानी अरे झाँसी वारी रानी
पुरजन पुरजन तोपें लगा दई, गोला चलाए असमानी
अरे झाँसी वारी रानी, खूब लड़ी मरदानी
सबरे सिपाइन को पैरा जलेबी, अपन चलाई गुरधानी
छोड़ मोरचा जसकर कों दौरी, ढूढ़ेहूँ मिले नहीं पानी
अरे झाँसी वारी रानी, खूब लड़ी मरदानी।''
माना जाता है कि इसी से प्रेरित होकर ‘झाँसी की रानी’
नामक अपनी कविता में सुभद्राकुमारी चैहान ने 1857
की उनकी वीरता का बखान किया हैं-
''चमक उठी सन् सत्तावन में
वह तलवार पुरानी थी
बुन्देले हरबोलों के मुँह हमने
सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी।