zamindaar
धन जोड़ रहे मुख मोड़ रहे या मौज उडावे संसार,
जगत में बोहत दुखी ज़मींदार...
आधी रात पहर का तड़का देक्खे बाहर लिकड़ कै नै,
ढाई गज का पाट्या खंडवा ऊपर गोस्सा धर कै नै,
एक बाज्जू का कुड़ता पहरया ऊंची धोत्ती कर कै नै,
करे चलन की तियारी खेत में दोन्नु बैल पकड़ कै नै,,
ऊपर धुप पडे निच्चे धरती त्प्पे ..
अर यो बीच में तपै ज़मींदार जगत में बोहत दुखी ज़मींदार...
दोहफारे की रोट्टी ले कै ज़मिदारनी आई ,
गंठा-रोट्टी ल्याई खेत में वा साग बनावन ना पाई,
अर ज़मींदार नै आपणे करम मैं वें ऐ सोचय कै खायी..
तारयाँ की छांह हाली आया ना नहाया ना खाया,
थोडी सी वार में जगा दिया वो सोवण बी ना पाया,
ठा कै कस्सी चाल्या खेत मैं नाक्का-बंधा लाया,
एक नाक्के मैं आप डेह पडया मरता हुआ जडाया,,
यें सरकारी- यें पटवारी सब सोवें पैर पसार जगत मैं बोहत दुखी ज़मींदार...
करी लामणी पैर गेर लिया जेट्ठ-साढ़ के म्हीने मैं,
ज़मींदार का सारा कुणबा हो रहया दुखी पसीने मैं,
आंधी अर तूफ़ान आग्या बह्ग्यी रास्य जोहड़ के मेंह..
चार धडी भुरली के दाणे इईब रहे से बाक्की,
लुहार बी न्यू कहां लाग गया जडी थी मन्नें दरांत्ति,
ग्गाड्डी ऊंघी जुआ बनाया कहन लाग्गया खात्ती,
चुहडी अर चमारी दोन्नु पैर लेवन नै आई सें,
इब भुरली के दाणे चुगरदे नै जाने यें भी लेग्ये खात्ती-लुहार..
जगत मैं बोहत तै घणा दुखी ज़मींदार...
धन जोड़ रहे मुख मोड़ रहे या मौज उडावे संसार,
जगत में बोहत दुखी ज़मींदार...
आधी रात पहर का तड़का देक्खे बाहर लिकड़ कै नै,
ढाई गज का पाट्या खंडवा ऊपर गोस्सा धर कै नै,
एक बाज्जू का कुड़ता पहरया ऊंची धोत्ती कर कै नै,
करे चलन की तियारी खेत में दोन्नु बैल पकड़ कै नै,,
ऊपर धुप पडे निच्चे धरती त्प्पे ..
अर यो बीच में तपै ज़मींदार जगत में बोहत दुखी ज़मींदार...
दोहफारे की रोट्टी ले कै ज़मिदारनी आई ,
गंठा-रोट्टी ल्याई खेत में वा साग बनावन ना पाई,
अर ज़मींदार नै आपणे करम मैं वें ऐ सोचय कै खायी..
तारयाँ की छांह हाली आया ना नहाया ना खाया,
थोडी सी वार में जगा दिया वो सोवण बी ना पाया,
ठा कै कस्सी चाल्या खेत मैं नाक्का-बंधा लाया,
एक नाक्के मैं आप डेह पडया मरता हुआ जडाया,,
यें सरकारी- यें पटवारी सब सोवें पैर पसार जगत मैं बोहत दुखी ज़मींदार...
करी लामणी पैर गेर लिया जेट्ठ-साढ़ के म्हीने मैं,
ज़मींदार का सारा कुणबा हो रहया दुखी पसीने मैं,
आंधी अर तूफ़ान आग्या बह्ग्यी रास्य जोहड़ के मेंह..
चार धडी भुरली के दाणे इईब रहे से बाक्की,
लुहार बी न्यू कहां लाग गया जडी थी मन्नें दरांत्ति,
ग्गाड्डी ऊंघी जुआ बनाया कहन लाग्गया खात्ती,
चुहडी अर चमारी दोन्नु पैर लेवन नै आई सें,
इब भुरली के दाणे चुगरदे नै जाने यें भी लेग्ये खात्ती-लुहार..
जगत मैं बोहत तै घणा दुखी ज़मींदार...