Hindi Kavita

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पाबंदियाँ - बालकृष्ण मिश्रा
​

होंठ पर पाबन्दियाँ हैं
गुनगुनाने की।

निर्जनों में जब पपीहा
पी बुलाता है।
तब तुम्हारा स्वर अचानक
उभर आता है।
अधर पर पाबन्दियाँ हैं
गीत गाने की।

चाँदनी का पर्वतों पर
खेलना रुकना
शीश सागर में झुका कर
रूपको लखना।
दर्पणों को मनाही
छबियाँ सजाने की।

ओस में भीगी नहाई
दूब सी पलकें,
श्रृंग से श्यामल मचलती
धार सी अलकें।
शिल्प पर पाबन्दियाँ
आकार पाने की।

केतकी सँग पवन के
ठहरे हुए वे क्षण,
देखते आकाश को
भुजपाश में, लोचन।
बिजलियों को है मनाही
मुस्कुराने की।

हवन करता मंत्र सा
पढ़ता बदन चन्दन,
यज्ञ की उठती शिखा सा
दग्ध पावन मन।
प्राण पर पाबन्दियाँ
समिधा चढाने की।
 
एक भी आँसू न कर बेकार !

एक भी आँसू न कर बेकार !
- रामावतार त्यागी

एक भी आँसू न कर बेकार
जाने कब समंदर मांगने आ जाए!

पास प्यासे के कुआँ आता नहीं है
यह कहावत है, अमरवाणी नहीं है
और जिस के पास देने को न कुछ भी
एक भी ऐसा यहाँ प्राणी नहीं है

कर स्वयं हर गीत का श्रृंगार
जाने देवता को कौनसा भा जाय!

चोट खाकर टूटते हैं सिर्फ दर्पण
किन्तु आकृतियाँ कभी टूटी नहीं हैं
आदमी से रूठ जाता है सभी कुछ
पर समस्यायें कभी रूठी नहीं हैं

हर छलकते अश्रु को कर प्यार
जाने आत्मा को कौन सा नहला जाय!

व्यर्थ है करना खुशामद रास्तों की
काम अपने पाँव ही आते सफर में
वह न ईश्वर के उठाए भी उठेगा
जो स्वयं गिर जाय अपनी ही नज़र में

हर लहर का कर प्रणय स्वीकार
जाने कौन तट के पास पहुँचा जाए!


:)
 
एक भी आँसू न कर बेकार
जाने कब समंदर मांगने आ जाए!

और जिस के पास देने को न कुछ भी
एक भी ऐसा यहाँ प्राणी नहीं है


आदमी से रूठ जाता है सभी कुछ
पर समस्यायें कभी रूठी नहीं हैं

वह न ईश्वर के उठाए भी उठेगा
जो स्वयं गिर जाय अपनी ही नज़र में

:)

Very Meaningful Lines.... aur sab kuch ruth jaye to samasyan to aur badh jati hain... wo kahan ruthengi.
 
my fav one by harivansh ji

Jeevan Main Ek Sitara Tha
Maana Vah Behad Pyara Tha
Vah Doob Gaya To Doob Gaya
Ambar Kay Aanan Ko Dekho
Kitne Iskay Taare Toote
Kitne Iskay Pyare Choote
Jo Choot Gaye Fir Kahan Mile
Par Bolo Toote Taaron Par
Kab Ambar Shok Manata Hai
Jo Beet Gayi So Baat Gayi
Jeevan Main Vah Tha Ek Kusum
They Us Par Nitya Nichavar Tum
Vah Sookh Gaya TO Sookh Gaya
Madhuvan Ki Chaati Ko Dekho
Sookhi Kitni Iski Kaliyan
Murjhaayi Kitni ballriyan
Jo Murjhayi Woh Fir Kahan Khili
Par Bolo Sookhe Phoolon Par
Kab Madhuban Shor Machata hai
Jo Beet Gayi So Bat Gayi
jeevan Main Madhu Ka Pyala Tha
Tumnay Tan Man De Daala Tha
Wah Toot Gaya To Toot Gaya
Madiralya Kay Aangan Ko Dekho
Kitne Pyale Hil Jaate Hain
Gir Mitti Main Mil Jaate Hain
Jo Girte Hain Kab Uthte Hain
Par Bolo Toote Pyalo Par
Kab Madiralaya Pachtata Hai
Jo Beet Gayi So Baat Gayi
 
A beautiful poem with a melancholic touch that describes true image of Materialistic Relations in today's world.


क्या कहिये - दुष्यन्त कुमार

कौन सा रिश्ता सच्चा है अब
किस रिश्ते को क्या कहिये
अपने ही जब ज़ख्म दे रहे
बेगानों को क्या कहिये
ना जाने क्या किया है हमने
किसी से कोई बैर नहीं
क़त्ल किया है हमको जिसने
यारों वो भी ग़ैर नहीं
झूठ की नैया तैर रही है
सच का माझी सोया है
हर रिश्ते ने ग़म के सागर
मे बस हमें डुबोया है
माला के मोतियों से बिखरे
अरमानों को क्या कहिये
अपने ही जब ज़ख्म दे रहे
बेगानों को क्या कहिये !


Rock on
Jit
 
Last edited:
एक भी आँसू न कर बेकार !
- रामावतार त्यागी

एक भी आँसू न कर बेकार
जाने कब समंदर मांगने आ जाए!
:)

Very beautiful sharing Vijay Ji. Thanks a lot for sharing it.... :) :)
 
ओ अमर शहीद!, ओ शक्तिमान!

नीलम जी, विजय सिंह व् जीतेंदर

आप सभी ने बहुत सुंदर कविता दुंड निकली हैं
यहाँ पेषित करने के लिए धन्यवाद ! मुझे भी एक सुंदर कविता , अमर शाही मोहन चंदर शर्मा के सम्मान में लिखी ये कविता आर्य समाज फॉरम से मिली , जो आप सब के लिए यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ !


Submitted by AnandBakshi on Sat, 2008-09-20 11:39. Bhajan/Kavita

आज विदायी देते तुमको
ओ अमर शहीद!, ओ शक्तिमान!
ओ वीर बहादुर देशभक्त!
तुम थे भारत के स्वाभिमान!

इस देश के दुश्मन, दुष्टों को
निरपराध जनों के भक्षक को
तुमने न्योंछावर कर, अपने प्राण
कर दिये दाँत, खट्टे उनके
जो भारत पर छाये, बन शैतान

कितने ही शत्रू अरिदल को
थी धूल चटाई, जीवन भर
अब तुम्हीँ चले, तज कर भारत
कर रहे, छोड़ सबको, प्रयाण

हम भूल न पायेगें तुमको
अब सदा तुम्हें हम देखेंगे
नभ पर, चमकोगे ध्रुव समान!

तुम प्रेरक बन इस भारत के
अनगिनित युवा और बच्चों के
मन* पर ऐसे छा जाओगे
भर दोगे नव जीवन उनमें
उत्साह नया और स्वाभिमान

ऐ वीर! छोड़, भरे पूरे घर को
किस और किया, तुमने प्रयाण
पत्नि और बच्चे, अश्रु भर
छलके जो, जैसे गंगाजल
कर रहे नमन, कर रहे विदा
संग उनके, एक समुद्र बना
भारत विराट के जन जन का
उमढ़ा है करने, तुम्हें विदा

ओ भारत के अमर वीर सपूत!
शहादत का तुमने
एक नया इतिहास रचा
सौ बार करें तुमको प्रणाम
मन में ले यादों की माला
आखोँ में भर भर अश्रुजल

आज विदायी देते तुमको
ओ अमर शहीद!, ओ शक्तिमान।
ओ वीर बहादुर देशभक्त!
तुम हो, भारत के स्वाभिमान! ||


Khush raho!
 
Last edited:
One Simple, Inspiring & deep touching poem, quite thought provoking as well! :)

जरूरी है - महेश

गगन चूमती आशाओ के
नभ का विस्तार जरूरी है
हर ऊंची इमारत की
नींव में सुधार जरूरी है...

हर पल खिंचती है ज़िन्दगी
शायद खींच - तान जरूरी है
पलभर में टूटते है रिश्ते
रिश्तो का मान जरूरी है...

मिलने से,
बढ़ती है उमंगें
नजदीकी में भी,
कुछ दूरी दरमियाँ जरूरी है...

कौन नहीं उदास यहाँ ???
उदासी का निशान जरूरी है
लेकिन, उदासी भरे हर चेहरे में
ख़ुशी का गुमान जरूरी है...

मांगने से मिलता नहीं हक
छीनो...तो मिल भी जाए
अपने हक के लिए
इस दुनिया से घमासान जरूरी है...

हारना बुरा नहीं
लड़ना जरूरी है
मौत में भी हम कहें
जीने का अरमान जरूरी है...

यहाँ,
हर इंसान मरा हुआ है
इसीलिए....शायद
इंसानों की बस्ती में
शमशान जरूरी है ! ...


Rock on
Jit

 
One Simple, Inspiring & deep touching poem, quite thought provoking as well! :)

जरूरी है - महेश

गगन चूमती आशाओ के
नभ का विस्तार जरूरी है
हर ऊंची इमारत की
नींव में सुधार जरूरी है...

हर पल खिंचती है ज़िन्दगी
शायद खींच - तान जरूरी है
पलभर में टूटते है रिश्ते
रिश्तो का मान जरूरी है...

मिलने से,
बढ़ती है उमंगें
नजदीकी में भी,
कुछ दूरी दरमियाँ जरूरी है...

कौन नहीं उदास यहाँ ???
उदासी का निशान जरूरी है
लेकिन, उदासी भरे हर चेहरे में
ख़ुशी का गुमान जरूरी है...

मांगने से मिलता नहीं हक
छीनो...तो मिल भी जाए
अपने हक के लिए
इस दुनिया से घमासान जरूरी है...

हारना बुरा नहीं
लड़ना जरूरी है
मौत में भी हम कहें
जीने का अरमान जरूरी है...

यहाँ,
हर इंसान मरा हुआ है
इसीलिए....शायद
इंसानों की बस्ती में
शमशान जरूरी है ! ...


Rock on
Jit


Beautiful....................
 
हर पल खिंचती है ज़िन्दगी
शायद खींच - तान जरूरी है
पलभर में टूटते है रिश्ते
रिश्तो का मान जरूरी है...

मिलने से,
बढ़ती है उमंगें
नजदीकी में भी,
कुछ दूरी दरमियाँ जरूरी है...

कौन नहीं उदास यहाँ ???
उदासी का निशान जरूरी है
लेकिन, उदासी भरे हर चेहरे में
ख़ुशी का गुमान जरूरी है...

Wonderful lines...very realistic n meaningful.
 
मुझे पुकार लो - बच्चन​
इसीलिए खड़ा रहा कि तुम मुझे पुकार लो!

ज़मीन है न बोलती न आसमान बोलता,
जहान देखकर मुझे नहीं जबान खोलता,
नहीं जगह कहीं जहाँ न अजनबी गिना गया,
कहाँ-कहाँ न फिर चुका दिमाग-दिल टटोलता,
कहाँ मनुष्य है कि जो उमीद छोड़कर जिया,
इसीलिए खड़ा रहा कि तुम मुझे पुकार लो

इसीलिए खड़ा रहा कि तुम मुझे पुकार लो!

तिमिर-समुद्र कर सकी न पार नेत्र की तरी,
विनष्ट स्वप्न से लदी, विषाद याद से भरी,
न कूल भूमि का मिला, न कोर भोर की मिली,
न कट सकी, न घट सकी विरह-घिरी विभावरी,
कहाँ मनुष्य है जिसे कमी खली न प्यार की,
इसीलिए खड़ा रहा कि तुम मुझे दुलार लो!

इसीलिए खड़ा रहा कि तुम मुझे पुकार लो!

उजाड़ से लगा चुका उमीद मैं बहार की,
निदघ से उमीद की बसंत के बयार की,
मरुस्थली मरीचिका सुधामयी मुझे लगी,
अंगार से लगा चुका उमीद मै तुषार की,
कहाँ मनुष्य है जिसे न भूल शूल-सी गड़ी
इसीलिए खड़ा रहा कि भूल तुम सुधार लो!

इसीलिए खड़ा रहा कि तुम मुझे पुकार लो!
पुकार कर दुलार लो, दुलार कर सुधार लो!

​
 
आज नदी बिलकुल उदास थी - केदारनाथ अग्रवाल​
आज नदी बिलकुल उदास थी।
सोयी थी अपने पानी में,
उसके दर्पण पर -
बादल का वस्त्र पड़ा था।
मैंने उसे नहीं जगाया,
दबे पाँव घर वापस आया।

​
 
आशा का दीपक - रामधारी सिंह "दिनकर"

वह प्रदीप जो दीख रहा है झिलमिल दूर नही है
थककर बैठ गये क्या भाई मन्जिल दूर नही है
चिन्गारी बन गयी लहू की बून्द गिरी जो पग से
चमक रहे पीछे मुड देखो चरण-चिनह जगमग से
बाकी होश तभी तक, जब तक जलता तूर नही है
थक कर बैठ गये क्या भाई मन्जिल दूर नही है
 
Last edited:
Gud one ... Quite inspiring indeed !! :)

आशा का दीपक - रामधारी सिंह "दिनकर"

वह प्रदीप जो दीख रहा है झिलमिल दूर नही है
थककर बैठ गये क्या भाई मन्जिल दूर नही है
चिन्गारी बन गयी लहू की बून्द गिरी जो पग से
चमक रहे पीछे मुड देखो चरण-चिनह जगमग से
बाकी होश तभी तक, जब तक जलता तूर नही है
थक कर बैठ गये क्या भाई मन्जिल दूर नही है
 
Beauteous !! :)
Awe-inspiring !!! :) :)


मुझे पुकार लो - बच्चन​
इसीलिए खड़ा रहा कि तुम मुझे पुकार लो!

ज़मीन है न बोलती न आसमान बोलता,
जहान देखकर मुझे नहीं जबान खोलता...
 
My Last Post

I am posting my last pasandeeda kavita in this thread, and with this I request the Moderators to please close the thread.
Well I started this thread to share some classic, very famous and meaningful poems, and I think most of them are explored now. Thou there is no dearth of literature, and still can find a no. of more b'ful and meaningful poems, but the idea behind this thread was not to bring all the available Hindi Kavya here.
My purpose is served, by sharing some classic poems with all; which otherwise we are not in touch with after once over with Hindi as a subject. If anyone feels that they still like to share more, they can with a new thread. As this last poem 'Lo Din Beeta, Lo Raat Gayi' by Harivansh Rai Bachhan also gives the message of a new beginning . I am very glad and highly grateful to all contributors and readers who made it such a huge success.Thank you all very much. :)-

लो दिन बीता, लो रात गई - बच्चन ​
लो दिन बीता, लो रात गई,
सूरज ढलकर पच्छिम पहुँचा,
डूबा, संध्या आई, छाई,
सौ संध्या-सी वह संध्या थी,
क्यों उठते-उठते सोचा था,
दिन में होगी कुछ बात नई।
लो दिन बीता, लो रात गई।

धीमे-धीमे तारे निकले,
धीरे-धीरे नभ में फैले,
सौ रजनी-सी वह रजनी थी
क्यों संध्या को यह सोचा था,
निशि में होगी कुछ बात नई।
लो दिन बीता, लो रात गई।

चिड़ियाँ चहकीं, कलियाँ महकी,
पूरब से फिर सूरज निकला,
जैसे होती थी सुबह हुई,
क्यों सोते-सोते सोचा था,
होगी प्रातः कुछ बात नई।
लो दिन बीता, लो रात गई |

​
 
Last edited by a moderator:
Hey Neels, this thread by far one of the finest and my fav of all time, please dont close it ... let it go, it'll be heart-breaking if it gets closed ! :(

So Please let it go, if you dont wanna contribute you can refrain but let me keep contributing to this wonderful and beautiful thread !! :)

Think about it !


Rock on
Jit




I am posting my last pasandeeda kavita in this thread, and with this I request the Moderators to please close the thread.
Well I started this thread to share some classic, very famous and meaningful poems, and I think most of them are explored now. Thou there is no dearth of literature, and still can find a no. of more b'ful and meaningful poems, but the idea behind this thread was not to bring all the available Hindi Kavya here.
My purpose is served, by sharing some classic poems with all; which otherwise we are not in touch with after once over with Hindi as a subject. If anyone feels that they still like to share more, they can with a new thread. As this last poem 'Lo Din Beeta, Lo Raat Gayi' by Harivansh Rai Bachhan also gives the message of a new beginning -

लो दिन बीता, लो रात गई - बच्चन ​
लो दिन बीता, लो रात गई,
सूरज ढलकर पच्छिम पहुँचा,
डूबा, संध्या आई, छाई,
सौ संध्या-सी वह संध्या थी,
क्यों उठते-उठते सोचा था,
दिन में होगी कुछ बात नई।
लो दिन बीता, लो रात गई।

धीमे-धीमे तारे निकले,
धीरे-धीरे नभ में फैले,
सौ रजनी-सी वह रजनी थी
क्यों संध्या को यह सोचा था,
निशि में होगी कुछ बात नई।
लो दिन बीता, लो रात गई।

चिड़ियाँ चहकीं, कलियाँ महकी,
पूरब से फिर सूरज निकला,
जैसे होती थी सुबह हुई,
क्यों सोते-सोते सोचा था,
होगी प्रातः कुछ बात नई।
लो दिन बीता, लो रात गई |

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Lo Din Beeta Lo Raat Gayi'' What an excellent work to conclude such a shining thread which includes some of my favourite poems as well.Since Dr Neelam herself requested to close this thread and morever as like she said most of classic works has been explored in this regards.:) This is the best conclusive post I have even seen.Thread is being closed. I hope she would come with something new and interesting.:)
 
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