Gazals "The Finest Ever"

Mai Chahta Bhi Yehi Tha, Wo Bewafaa Nikle
Use Samajhne Ka Koi To Silsila Nikle

Kitaab-e-maazi Ke Panne Ulat Ke Dekh Zara
Na Jaane Kaun Sa Panna Muda Hua Nikle

Jo Dekhne Mein Bahut Hee Karib Lagtaa Hai
Usi Ke Baare Mein Socho To Faasila Nikle​
 
Mujhe Khabar Thi...

Mujhe khabar thi woh mera nahin paraya tha
Par dhadkanon ne ussi ko khuda banaya tha

Main khwab khwab jisse dhundta phira barson
Woh ashq ashq meri aankh mein samaya tha

Tera qasaar nahin jaan meri tanhai
ye rog mane hi khud jaan ko lagaya tha

Taman shahar mein ek woh hai ajnabee mujhse
Ki jisne geet mera shahar ko sunaya tha
 
Last edited:
Donon ke dil hain majboor pyaar se...

Donon ke dil hain majboor pyaar se
Hum kya karein meri jaan; tum kya karo
Meri jaan, tum kya karo

Hum to sanam tumko chaahe umar bhar dekhe
Dil ki pyaas kehti hai, aur ek nazar dekhe

Ho, dekho hamaara bhi haal, har dam tumhaara khayaal
Dekho hamaara bhi haal, har dam tumhaara khayaal
Dil mein uthaata hai toofaan, hum kya kare

Tum kya karo

Dono ke dil hai majboor pyaar se
Hum kya karein meri jaan tum kya karo
Meri jaan, tum kya karo

Lekar tumhara naam aise khoye rehte the
Aaj humko deewaana hanste log kehte hain

Ho, jis dil mein hota hai pyaar, kaise na ho beqaraar
Jis dil mein hota hai pyaar, kaise na ho beqaraar
Yeh dil agar hai pareshaan, hum kya kare

Tum kya karo

Dono ke dil hai majboor pyaar se
Hum kya karein meri jaan, tum kya karo
Meri jaan, tum kya karo
 
Tu nahin to zindagi mein aaur kya reh jaayega?

Tu nahin to zindagi mein aaur kya reh jaayega?
door tak tanahaiyon ka silsila reh jayega

dard ki sari tahe aur saare gujare haadse
sab dhuwaan ho jaayenge, yeh ek waakiyaa reh jayega

yun bhi hoga woh mujhe dil se bhula dega magar
ye bhi hoga khudh usi mein yeh ek khala reh jayega

daayre inkaar ke ikaraar ke sargoshiyaan
yeh agar tute kabhi to faasala reh jayega
 
मुसाफ़िर के रस्ते बदलते रहे

मुसाफ़िर के रस्ते बदलते रहे
मुक़द्दर में चलना था चलते रहे

कोई फूल सा हाथ काँधे पे था
मेरे पाँव शोलों पे चलते रहे


मेरे रास्ते में उज़ाला रहा
दीये उस की आँखों के जलते रहे

वो क्या था जिसे हमने ठुकरा दिया
मगर उम्र भर हाथ मलते रहे

मुहब्बत अदावत वफ़ा बेरुखी
किराये के घर थे बदलते रहे

सूना है उन्हें भी हवा लग गई
हवाओं के जो रुख़ बदलते रहे


लिपट के चरागों से वो सो गए
जो फूलों पे करवट बदलते रहे



बशीर बद्र
 
मिटा दे तू मेरे खेतों से खरपतवार चुटकी में

मिटा दे तू मेरे खेतों से खरपतवार चुटकी में
तो फ़स्लें मेरे सपनों की भी हों तैयार चुटकी में

हवा के रुख़ से वो भी हो गये लाचार चुटकी में
हवा का रुख़ बदल देते थे जो अख़बार चुटकी में

कभी अँधियार चुटकी में कभी उजियार चुटकी में
कभी इनकार चुटकी में कभी इक़रार चुटकी में

भले मिल जाएगा हर चीज़ का बाज़ार चुटकी में
नहीं बिकता कभी लेकिन कोई ख़ुद्दार चुटकी में

बहुत थे वलवले दिल के मगर अब सामने उनके
उड़न-छू हो गई है ताक़त-ए-गुफ़्तार चुटकी में

अजब तक़रीर की है रहनुमा ने अम्न पर यारो !
निकल आए हैं चाकू तीर और तलवार चुटकी में

तरीक़ा, क़ायदा, क़ानून हैं अल्फ़ाज़ अब ऐसे
उड़ाते हैं जिन्हें कुछ आज के अवतार चुटकी में

कभी ख़ामोश रहकर कट रहे रेवड़ भी बोलेंगे
कभी ख़ामोश होंगे ख़ौफ़ के दरबार चुटकी में

वो जिनकी उम्र सारी कट गई ख़्वाबों की जन्न्त में
हक़ीक़त से कहाँ होंगे भला दो-चार चुटकी में

नतीजा यह बड़ी गहरी किसी साज़िश का होता है
नहीं हिलते किसी घर के दरो-दीवार चुटकी में

डरा देगा तुम्हें गहराइयों का ज़िक्र भी उनकी
जो दरिया तैर कर हमने किए हैं पार चुटकी में

परिन्दे और तसव्वुर के लिए सरहद नहीं होती
कभी इस पार चुटकी में कभी उस पार चुटकी में.

बस इतना ही कहा था शहर का मौसम नहीं अच्छा
सज़ा का हो गया सच कह के ‘द्विज’ हक़दार चुटकी में


द्विजेन्द्र 'द्विज'



 
Inteha aaj ishq ki kardi (gazal from Jagjit's latest album "Inteha")

Inteha aaj ishq ki kardi
Aapke naam zindagi kardi

Tha andhera garibkhane mein
Aapne ake roshni kardi

Dene wale ne unko hushn diya
Aur atah mujhko ashiqui kardi

Tumne zulfo ko rukh pe bikhra kar
Sham rangeen aur bhi kardi

Aapke naam zindagi kardi
Inteha aaj ishq ki kardi
 
very nice potery so true
मिटा दे तू मेरे खेतों से खरपतवार चुटकी में
तो फ़स्लें मेरे सपनों की भी हों तैयार चुटकी में

हवा के रुख़ से वो भी हो गये लाचार चुटकी में
हवा का रुख़ बदल देते थे जो अख़बार चुटकी में

कभी अँधियार चुटकी में कभी उजियार चुटकी में
कभी इनकार चुटकी में कभी इक़रार चुटकी में

भले मिल जाएगा हर चीज़ का बाज़ार चुटकी में
नहीं बिकता कभी लेकिन कोई ख़ुद्दार चुटकी में

बहुत थे वलवले दिल के मगर अब सामने उनके
उड़न-छू हो गई है ताक़त-ए-गुफ़्तार चुटकी में

अजब तक़रीर की है रहनुमा ने अम्न पर यारो !
निकल आए हैं चाकू तीर और तलवार चुटकी में

तरीक़ा, क़ायदा, क़ानून हैं अल्फ़ाज़ अब ऐसे
उड़ाते हैं जिन्हें कुछ आज के अवतार चुटकी में

कभी ख़ामोश रहकर कट रहे रेवड़ भी बोलेंगे
कभी ख़ामोश होंगे ख़ौफ़ के दरबार चुटकी में

वो जिनकी उम्र सारी कट गई ख़्वाबों की जन्न्त में
हक़ीक़त से कहाँ होंगे भला दो-चार चुटकी में

नतीजा यह बड़ी गहरी किसी साज़िश का होता है
नहीं हिलते किसी घर के दरो-दीवार चुटकी में

डरा देगा तुम्हें गहराइयों का ज़िक्र भी उनकी
जो दरिया तैर कर हमने किए हैं पार चुटकी में

परिन्दे और तसव्वुर के लिए सरहद नहीं होती
कभी इस पार चुटकी में कभी उस पार चुटकी में.

बस इतना ही कहा था शहर का मौसम नहीं अच्छा
सज़ा का हो गया सच कह के ‘द्विज’ हक़दार चुटकी में


द्विजेन्द्र 'द्विज'
 
अंजाम आज खुद़ से अनजान हो रहा है



अंजाम आज खुद़ से अनजान हो रहा है
आगाज़ ही अजल का सामान हो रहा है


कुछ और कह रही हैं लोहूलुहान राहें
कुछ और मंज़िलों से ऐलान हो रहा है


है चोर ही सिपाही मुंसिफ़ है खुद़ ही क़ातिल
किस शक्ल में नुमायाँ इंसान हो रहा है


जिनको मिली है ताक़त दुनिया सँवारने की
ख़ुदगर्ज आज उनका ईमान हो रहा है


देखा पराग तुमने दुनिया का रंग बोलो
इन हरक़तों से किसका नुक़सान हो रहा है।







ओमप्रकाश चतुर्वेदी 'पराग'
 
Nice One

Bahut Hi Yaad Aata Hai Mere Dil ko Tadpata Hai
Wo Tera Paas Na Hona Bahut Mujhko Rulata Hai
Wo Mera Teri Aankhon Ke Samundar Mein Utar Jana
Aur Teri Muskurahat Ke Bhanwar Mein Doobte Jana
Teri Awaz Ke Seher Se Na Nikal Paana
Tujhko Dekhna Aur Be-Khudi Se Dekhte Jaana
Bahut Chaha In Guzre Hue Lamhon Ko Na Sochun
Na Teri Yaad Mein Rehke Tere Sath Ka Sochun
Bhula Dun Saari Yaadon Ko Ke Jinse Dil Tadapta Hai
Ke Jinse Thes Uthti Hai Ke Jinse Dard Hota Hai
Magar Jab Raat Aati Hai To Teri Yaad Aati Hai
Tere Hi Khwaab Hote Hai Teri Hi Baat Hoti Hai
To Tay Paya Ab Mumkin Nahi Tujhko Bhula Dena
Teri Yaad Mein Rehna Tujhe Hi Sochte Rehna
Tujhe Jab Yaad Karte Hai To Dil Apna Tadapta Hai
Wo Tera Paas Na Hona Bahut Mehsoos Hota Hai
 
जब भी अपने आपसे ग़द्दार हो जाते हैं लोग
ज़िन्दगी के नाम पर धिक्कार हो जाते हैं लोग

सत्य और ईमान के हिस्से में हैं गुमनामियाँ

साज़िशें बुन कर मगर अवतार हो जाते हैं लोग

बेच देते हैं सरे—बाज़ार वो जिस्मो—ज़मीर

भूख से जब भी कभी लाचार हो जाते हैं लोग

रात भर मशगूल रहते हैं अँधेरों में कहीं

और अगली सुबह का अखबार हो जाते हैं लोग

फिर कबीलों का न जाने हश्र क्या होगा, जहाँ

नोंक पर बंदूक की सरदार हो जाते हैं लोग

मतलबों की भीड़ जब—जब कुलबुलाती है यहाँ

हमने देखा है बड़े मक़्क़ार हो जाते हैं लोग

साहिलों पर बैठ तन्हा ‘द्विज’ ! भला क्या इन्तज़ार

आज हैं इस पार कल उस पार हो जाते हैं लोग




द्विजेन्द्र 'द्विज'

 
Last edited:
न मंदिर में सनम होते, न मस्जिद में खुदा होता


न मंदिर में सनम होते, न मस्जिद में खुदा होता
हमीं से यह तमाशा है, न हम होते तो क्या होता

न ऐसी मंजिलें होतीं, न ऐसा रास्ता होता
संभल कर हम ज़रा चलते तो आलम ज़ेरे-पा* होता

घटा छाती, बहार आती, तुम्हारा तज़किरा होता
फिर उसके बाद गुल खिलते कि ज़ख़्मे-दिल हरा होता

बुलाकर तुमने महफ़िल में हमको गैरों से उठवाया
हमीं खुद उठ गए होते, इशारा कर दिया होता


तेरे अहबाब तुझसे मिल के भी मायूस लॉट गये
तुझे 'नौशाद' कैसी चुप लगी थी, कुछ कहा होता

*
ज़ेरे-पा: under feet

'नौशाद'लखनवी
 

न मंदिर में सनम होते, न मस्जिद में खुदा होता
हमीं से यह तमाशा है, न हम होते तो क्या होता

न ऐसी मंजिलें होतीं, न ऐसा रास्ता होता
संभल कर हम ज़रा चलते तो आलम ज़ेरे-पा* होता

घटा छाती, बहार आती, तुम्हारा तज़किरा होता
फिर उसके बाद गुल खिलते कि ज़ख़्मे-दिल हरा होता

बुलाकर तुमने महफ़िल में हमको गैरों से उठवाया
हमीं खुद उठ गए होते, इशारा कर दिया होता


तेरे अहबाब तुझसे मिल के भी मायूस लॉट गये
तुझे 'नौशाद' कैसी चुप लगी थी, कुछ कहा होता

*
ज़ेरे-पा: under feet

'नौशाद'लखनवी

Bahut hi kaabil-e-tareef gazal hai.
Thanks for sharing it. :)
 
आपको चेहरे से भी बीमार होना चाहिए
इश्क़ है तो इश्क़ का इज़हार होना चाहिए

आप दरिया हैं तो फिर इस वक़्त हम ख़तरे में हैं
आप कश्ती हैं तो हम को पार होना चाहिए

ऐरे-ग़ैरे लोग भी पढ़ने लगे हैं इन दिनों
आपको औतर नहीं अख़बार होना चाहिए

ज़िन्दगी तू कब तलक दर-दर फिराएगी हमें
टूटा- फूटा ही सही घरबार होना चाहिए

अपनी यादों से कहो एक दिन की छुट्टी दें मुझे
इश्क़ के हिस्से में भी इतवार होना चाहिए





' मुन्नवर राणा '
 
bahut khoob anjali ji....

bahut khoob anjali ji....
आपको चेहरे से भी बीमार होना चाहिए
इश्क़ है तो इश्क़ का इज़हार होना चाहिए

आप दरिया हैं तो फिर इस वक़्त हम ख़तरे में हैं
आप कश्ती हैं तो हम को पार होना चाहिए

ऐरे-ग़ैरे लोग भी पढ़ने लगे हैं इन दिनों
आपको औतर नहीं अख़बार होना चाहिए

ज़िन्दगी तू कब तलक दर-दर फिराएगी हमें
टूटा- फूटा ही सही घरबार होना चाहिए

अपनी यादों से कहो एक दिन की छुट्टी दें मुझे
इश्क़ के हिस्से में भी इतवार होना चाहिए




' मुन्नवर राणा '
 
ये दिल कुटिया है संतों की यहाँ राजा भिकारी क्या
वो हर दीदार में ज़रदार है गोटा किनारी क्या


ये काटे से नहीं कटते ये बांटे से नहीं बंटते
नदी के पानियों के सामने आरी कटारी क्या


उसी के चलने-फिरने, हंसने-रोने की हैं तस्वीरें
घटा क्या, चाँद क्या, संगीत क्या, बाद-ए-बहारी क्या


किसी घर के किसी बुझते हुए चूल्हे में ढूँढ उसको
जो चोटी और दाढ़ी में रहे वो दीनदारी क्या


हमारा मीर जी से मुत्तफ़िक़ होना है नामुमकिन
उठाना है जो पत्थर इश्क़ का तो हल्का-भारी क्या
 
ज़नाब वासिम बरेलवी की एक उम्दा ग़ज़ल यहाँ पेश कर रही हूँ , उम्मीद है आप सभी को पसंद आएगी

अपने हर हर लफ़्ज़् का ख़ुद आईना हो जाऊँगा
उसको छोटा कह के मैं कैसे बड़ा हो जाऊँगा

तुम गिराने में लगे थे तुम ने सोचा भी नहीं
मैं गिरा तो मसअला बनकर खड़ा हो जाऊँगा

मुझ को चलने दो अकेला है अभी मेरा सफ़र
रास्ता रोका गया तो क़ाफ़िला हो जाऊँगा

सारी दुनिया की नज़र में है मेरा अह्द—ए—वफ़ा
इक तेरे कहने से क्या मैं बेवफ़ा हो जाऊँगा?
 
very nice....gazal and your profile pic as well
ज़नाब वासिम बरेलवी की एक उम्दा ग़ज़ल यहाँ पेश कर रही हूँ , उम्मीद है आप सभी को पसंद आएगी

अपने हर हर लफ़्ज़् का ख़ुद आईना हो जाऊँगा
उसको छोटा कह के मैं कैसे बड़ा हो जाऊँगा

तुम गिराने में लगे थे तुम ने सोचा भी नहीं
मैं गिरा तो मसअला बनकर खड़ा हो जाऊँगा

मुझ को चलने दो अकेला है अभी मेरा सफ़र
रास्ता रोका गया तो क़ाफ़िला हो जाऊँगा

सारी दुनिया की नज़र में है मेरा अह्द—ए—वफ़ा
इक तेरे कहने से क्या मैं बेवफ़ा हो जाऊँगा?
 
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