Gazals "The Finest Ever"

आसमानों में गरजना और है
पर ज़मीं पे भी बरसना और है

सिर्फ़ तट पर ही टहलना और है

और लहरों में उतरना और है

दिल में शोलों का सुलगना और है

और शोलों से गुज़रना और है

बिजलियाँ बन टूट गिरना और है

बिजलियाँ दिल में लरज़ना और है

रतजगे मर्ज़ी से करना और है

रोज़ नींदों का उचटना और है

है जुदा घर में उगाना कैक्टस

रोज़ काँटों में गुज़रना और है

ख़ुशबुओं से ढाँपना ख़ुद को जुदा

पर पसीने से महकना और है

इस घुटन में साँस लेना है अलग

आग सीने में सुलगना और है

जाम भर कर पिलाना है जुदा

क़तरे— क़तरे को तरसना और है
 
bhut khoob anjali ji

ज़नाब वासिम बरेलवी की एक उम्दा ग़ज़ल यहाँ पेश कर रही हूँ , उम्मीद है आप सभी को पसंद आएगी

अपने हर हर लफ़्ज़् का ख़ुद आईना हो जाऊँगा
उसको छोटा कह के मैं कैसे बड़ा हो जाऊँगा

तुम गिराने में लगे थे तुम ने सोचा भी नहीं
मैं गिरा तो मसअला बनकर खड़ा हो जाऊँगा

मुझ को चलने दो अकेला है अभी मेरा सफ़र
रास्ता रोका गया तो क़ाफ़िला हो जाऊँगा

सारी दुनिया की नज़र में है मेरा अह्द—ए—वफ़ा
इक तेरे कहने से क्या मैं बेवफ़ा हो जाऊँगा?
bhut badhiya anjali ji......ye sab aapne likha hai kya?.....if yes then keep it up:)
 
Originally Posted by malikseema
bhut badhiya anjali ji......ye sab aapne likha hai kya?.....if yes then keep it up:)



seema gazal ke upar hi likha hai anjali ne writer ka naam bhi...........gazal chahe nahi lkhi par pasand aur parakh ki daad detti hu.

सीमा जी, अगर सभी लिखेंगे तो पढेगा कौन ? ( सहज भावः में लेना )
सीमा जी व रितू जी जो रचनायें मुझे भाती हैं वह मैं यहाँ पर आप सबके साथ बाँट लेती हूँ
इस उम्मीद के साथ की आप सब भी उनका लुत्फ़ उठा सके . मेरे पास कुछ चुनिन्दा किताबे हैं उन्ही से लेकर यहाँ पर छाप देती हूँ
ये रचनाये आपको अच्छी लगी, इस बात से मुझे ख़ुशी मिली. इसके लिए मैं तहे दिल से आप का शुक्रिया अदा करती हूँ
 
ज़नाब मख्मूर सईदी की कलम से....

चल पड़े हैं तो कहीं जा के ठहरना होगा
ये तमाशा भी किसी दिन हमें करना होगा

रेत का ढेर थे हम, सोच लिया था हम ने
जब हवा तज़ चलेगी तो बिखरना होगा

हर नए मोड़ प' ये सोच क़दम रोकेगी
जाने अब कौन सी राहों से गुज़रना होगा

ले के उस पार न जाएगी जुदा राह कोई
भीड़ के साथ ही दलदल में उतरना होगा

ज़िन्दगी ख़ुद ही इक आज़ार * है जिस्मो-जाँ का
जीने वालों को इसी रोग में मरना होगा

क़ातिले-शहर के मुख़बिर दरो-दीवार भी हैं
अब सितमगर उसे कहते हुए डरना होगा

आए हो उसकी अदालत में तो 'मख़्मूर' तुम्हें
अब किसी जुर्म का इक़रार तो करना होगा



*आज़ार ( रोग)
 
जनाब जैदी जाफ़र रज़ा की एक खुबसूरत ग़ज़ल




जिस्म के ज़िन्दाँ में उम्रें क़ैद कर पाया है कौन.
दख्ल कुदरत के करिश्मों में भला देता है कौन.

चाँद पर आबाद हो इन्सां, उसे भी है पसंद,
उसकी मरज़ी गर न हो, ऊंचाइयां छूता है कौन.

सब नताइज हैं हमारे नेको-बद आमाल के,
किसके हिस्से में है इज्ज़त, दर-ब-दर रुसवा है कौन.

अक़्ल ने अच्छे-बुरे की दी है इन्सां को तमीज़ ,
अपने घर से दुश्मनी पर फिर भी आमादा है कौन.

हो न गर ईमान, फिर मज़हब से है क्या फ़ायदा,
दिल में रखकर मैल, क्या समझे कोई अच्छा है कौन।
 
ज़िन्दगी के लिए इक ख़ास सलीक़ा रखना

ज्ञान प्रकाश विवेक द्वारा ज़िन्दगी के बारे में बहुत ही खूबसूरत बात;



ज़िन्दगी के लिए इक ख़ास सलीक़ा रखना
अपनी उम्मीद को हर हाल में ज़िन्दा रखना

उसने हर बार अँधेरे में जलाया ख़ुद को
उसकी आदत थी सरे-राह उजाला रखना

आप क्या समझेंगे परवाज़ किसे कहते हैं
आपका शौक़ है पिंजरे में परिंदा रखना

बंद कमरे में बदल जाओगे इक दिन लोगो
मेरी मानो तो खुला कोई दरीचा रखना

क्या पता राख़ में ज़िन्दा हो कोई चिंगारी
जल्दबाज़ी में कभी पाँव न अपना रखना

वक्त अच्छा हो तो बन जाते हैं साथी लेकिन
वक़्त मुश्किल हो तो बस ख़ुद पे भरोसा रखना
 
कच्चा मकान उसपे बरसात का भी डर है
छ्त सर पे गिर न जाए सहमी हुई नज़र है



तपती हुई ज़मीं की सुन ली है आसमाँ ने
बरसा है अपनी धुन मे हर कोना तर-ब-तर है

भीगे लिबास में से झलका बदन जो उसका
उसपे सब आशिकों की ठहरी हुई नज़र है

ग़म की तपिश से यारो थी सुर्ख़ लाल आँखें
ठंडक मिली है दिल को कुछ आँख आज तर है

टूटा है कहर उसपे सैलाब में घिरा जो
उसका ख़याल किसको जो शख़्स दर-ब-दर है.



सतपाल

 
Liked this inspiring Gajal, thou it feels more of a urdu poem. :)



हादिसों के साथ चलना है
ठोकरें खा कर संभलना है

मुश्किलों की आग में तप कर
दर्द के सांचों में ढलना है

हों अगर कांटे भी राहों में
हर घडी बे-खौफ चलना है

जो अंधेरों को निगल जाए
बन के ऐसा दीप जलना है

वक़्त की जो क़द्र भूले, तो
जिंदगी भर हाथ मलना है

हासिले-परवाज़ हो आसाँ
रुख हवाओं का बदलना है

इन्तेहा-ए-आरजू बन कर
आप के दिल में मचलना है

जिंदगी से दोस्ती कर लो
दूर तक जो साथ चलना है

रात भर तू चाँद बन 'मुफलिस'
सुब्ह सूरज-सा निकलना है.


Rock on
Jit
 
अभी जो कोंपलें फूटी हैं छोटे-छोटे बीजों पर
कहानी कल लिखेंगी ये समय की देहलीजों पर

किताबों में हैं उलझे ऐसे अब कपड़े नये कोई
जरा ना माँगते बच्चे ये त्योहारों व तीजों पर

हैं देते खुश्बू अब भी तेरी हाथों वाली मिहदी की
वो टाँके थे बटन जो तू ने मेरी कुछ कमीजों पर

न पूछो दास्तां महलों में चिनवायी मुहब्बत की
लुटे हैं कितने तख्तो-ताज यां शाही कनीजों पर

वो नजदीकी थी तेरी या थी मौसम में ही कुछ गर्मी
तू ने जो हाल पूछा तो चढ़ा तप और मरीजों पर

लेगा ये वक्त करवट फिर नया इक दौर आयेगा
हँसेगी ये सदी तब चंद लम्हों की तमीजों पर

भला है जोर कितना,देख,इन पतले-से धागों में
टिकी है मेरी दुनिया मां की सब बाँधी तबीजों पर



"मेजर गौतम राजरिशी"

 
liked this inspiring gajal, thou it feels more of a urdu poem. :)



हादिसों के साथ चलना है
ठोकरें खा कर संभलना है


rock on
jit

बहुत खूब लिखा है,
 
वो अपने तौर पे देता रहा सजा मुझको
हज़ार बार लिखा और मिटा दिया मुझको

ख़बर है अपनी न राहों कुछ पता मुझको
लिये चली है कोई दूर कि सदा मुझको

अगर है ज़िस्म तो छूकर मुझे यकीन दिला
तू अक्स है तो कभी आइना बना मुझको

चराग़ हूँ मुझे दामन की ओट मे ले ले
खुली हवा मे सरे-राह न जला मुझको

मेरी शिकस्त का उसको ग़ुमान तक न हुआ
जो अपनी फ़तह का टीका लगा गया मुझको

तमाम उम्र मैं साया बना रहा उसका
इस आरजू मैं कि वो मुड़के देखता मुझको
 
wo mere aas paas tha...kyun tha
aur ....behad udaas tha..kyun tha.

pyaas thi bepanaah ..aur mai thi
fir bhi ..khaali gilaas tha...kyun tha.

khwaab taabeer ho ke aayaa tha
aur.. ye dil udaas tha...kyun tha.

shokh rangon ka tha ..jo deewaanaa
aaj saadaa libaas tha...kyun tha.

wo udaataa tha hosh logon ke
aaj khud bad-hawaas tha...kyun tha.

yun to rishta koi na tha,lekin..
meri khaatir.. wo khaas tha...kyun tha.....
 
Last edited:
अब कहाँ रस्म घर लुटाने की

बर्कतें थी शराबख़ाने की


कौन है जिससे गुफ़्तुगु कीजे

जान देने की दिल लगाने की


बात छेड़ी तो उठ गई महफ़िल

उनसे जो बात थी बताने की


साज़ उठाया तो थम गया ग़म-ए-दिल

रह गई आरज़ू सुनाने की


चाँद फिर आज भी नहीं निकला

कितनी हसरत थी उनके आने की
 
तुम्हारी अंजुमन से उठ के दीवाने कहाँ जाते
जो वाबस्ता हुए तुमसे वो अफ़साने कहाँ जाते

तुम्हारी बेरुख़ी ने लाज रख ली बादाख़ाने की
तुम आँखों से पिला देते तो पैमाने कहाँ जाते

चलो अच्छा हुआ काम आ गई दीवानगी अपनी
वगरना हम ज़माने भर को समझाने कहाँ जाते

"क़तील" अपना मुक़द्दर ग़म से बेगाना अगर होता
फिर तो अपने-पराये हमसे पहचाने कहाँ जाते

Kateel Shifai
 
A B'ful nazam by Shakeel, deep touching with hint of melancholy!

है दर्द और दर्द की कहानी ही तो है
ज़िन्दगी अपनी यूँ सुहानी ही तो है
अब भी वही जादू वही अंदाज़ हैं
ज़रा तस्वीर तेरी पूरानी ही तो है
दे पैमाने में शराब और सिर्फ शराब दे
मिलाता हूँ अश्क भी इसमें पानी ही तो है
ढूंढता हूँ कब से मैं खुशियाँ इस दयार में
नादान हूँ दिल की ज़मीं विरानी ही तो है
ले आती हैं खुश्बुए जाने कहाँ से उनकी
ज़ख्म ताजा और हवाएँ दीवानी ही तो है
हुआ हर गुलाब पर तेरी रंगत का भरम
दिल है तो दिल पर दौरे जवानी ही तो है
चलो उठाकर हाथ मांग लें दुआए “शकील”
रस्मे दुनिया है ये तुम्हे निभानी ही तो है!..
 
Mujhe Khabar Thi

Mujhe Khabar Thi woh mera nahi paraya tha
Par dharkano ne usi ko khuda banaya tha


Mai khwab khwab jise dhoondh ta phira barson
Woh ashq meri ankh me samaya tha


Tera qasur nahin jaan meri tanhai
ye rog maine hi khud jaan ko lagaya tha


Tamam shehar me ek woh hai ajnabee mujhse
Ke jisne geet mera shehar ko sunaya tha
 
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