The famous Jat people

Baba Ghasi Ram - Hindu Dharm Rakshak

Baba Ghasi Ram - Hindu Dharm Rakshak

Baba Ghasi Ram (born:1629 - death:18 June 1684 AD) hailed from village Akola,the the famous village of Chahar Jats, situated in Agra district in Uttar Pradesh. He devoted his life opposing the oppressions of Mugal rule in India and protection of Hinduism. During 17th centiry , unsuccessful in his attempts to convert Hindus to Islam, the fury of Mughal Emperor Aurangzeb was directed towarsds a massive destruction of the Hindu temples. At this moment the black marble statue of Shrinathji was brought from Mathura by Baba Ghasi Ram to save it from the fanatic inconoclasm of Aurangzeb. The statue has one of its arms raised, giving an impression of Lord Krishna holding the Govardhan Mountain. The other arm seems to be giving a blessing as well as holding a dance posture. The place where this statue of Shrinathji was installed has developed into popular Hindu pilgrimage known as Nathdwara temple.

A monumental temple in his name is built as Shree Ghasi Baba Jat Mandir Akola, Agra, Uttar Pradesh.

बाबा घासीराम का जीवन परिचय

महा पराक्रमी बाबा घासीराम का जन्म पौष बदी नवमी मंगलवार संवत १६८६ (सन १६२९) को हुआ. बाल्य काल से ही उन्हें गौ-सेवा, सत्संग, पहलवानी, बल प्रदर्शन, साधू सेवा से बहुत लगाव था. वे पंचायत व्यवस्था के पूर्ण हिमायती थे.

महावीर की उपाधि

आगरा शहर के दक्षिण में २० किमी दूर जंगल में ५ नवंबर १६५३ को दो समूहों में सशस्त्र भिडंत हुई. इनमें एक समूह चाहर वाटी के प्रमुख गाँव अकोला से लेकर रिठौरी गाँव तक के १०-१२ गाँवो के चाहर गोत्र के जाट थे, तो दूसरी और राजपूतों के प्रमुख गाँव अयेला एवं निकटवर्ती १५-२० गांवों के सिकरवार गोत्र के राजपूत थे.

जाट और राजपूत की यह लडाई एक तालाब को लेकर थी. यह तय हुआ कि जो युद्ध में जीतेगा तालाब उसी का होगा. घासी राम के नेतृत्व में २०० जाट योद्धा लगभग २५० राजपूत योद्दाओं के समक्ष आ डटे. घासी राम को छोड़कर सभी जाट पैदल थे. जबकि सामने ६ घुड़सवार योद्धा भी थे. घासी राम में जाटों को पूरा भरोसा था. घासी राम ६ फ़ुट लम्बा, छरहरे शारीर का सुडौल , सुदर्शन, नौजवान था. २४ वर्ष आते आते उसने ब्रज के पहलवानों में अच्छा स्थान बना लिया था. उसने आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत धारण किया था. कई घंटे संघर्ष चला. घासी राम का घोड़ा जिधर से निकलता काई सी फट जाती थी. शाम होने को थी. जाटों का पक्ष कमजोर नजर आ रहा था. उन्होंने १८-२० पहलवान योद्धाओं को घुड़ सवारों पर वार करने का निर्देश दिया. दुश्मन के एक घुड़स्वार पर तीन योद्धा नियत किये. एक योद्धा दुश्मन के घोड़े के पैरों में लात मारेगा, जिससे घोड़ा सवार सहित गिर जायेगा या बिदक जायेगा. दूसरा घुड़सवार पर वार करेगा. तीसरा पहले दो योद्धाओं की सुरक्षा करेगा. यह योजना सफल रही, दुश्मन के पांच सवार नीचे गिरा लिए गए. एक घुड़ सवार मैदान से भाग गया. सूर्यास्त होते होते जाट विजयी रहे. अकोला की चौपाल पर पंचायत ने मल्ल घासी राम का अभूतपूर्व सम्मान किया. उन्हें 'महावीर' की उपाधि से विभूषित किया गया. धीरे-धीरे वह चाहरों के २४२ गांवों में भीम की भांति शक्ति के प्रतीक बन गए.
सन १६६८ का काल ब्रज के लिए प्रलयकारी था. औरंगजेब का धर्मांध शासन रोजी-रोटी , इज्जत और धर्म का लुटेरा हो गया था. उसकी कट्टर धार्मिक नीतियों के कारण हिन्दुओं की मान-मर्यादा और पूजा स्थलों का अस्तित्व ही खतरे में था. मुसलमान कसाइयों ने चाहरवाटी के गायों के झुंड को मुग़ल हकीमों की शह पर जबरदस्ती ग्वालों से छीन लिया था. महावीर घासीराम को यह सूचना मिली तो आगरा और मथुरा के मध्य 'फरह' पर १२ कसाइयों को मार भगाया. घासीराम उस समय ३८ वर्ष के हो गए थे.

सन्यास लिया

घासीराम ने पिछले वर्ष अपने ब्रह्मण मित्र परदमुनी के साथ सुप्रसिद्ध महात्मा ब्रह्म्वेता तपसी बाबा से गुरु-दीक्षा लेकर सन्यास ले लिया था. वह अब 'घासी बाबा' नाम से प्रसिद्द थे. विष्णव संप्रदाय के सिद्ध 'तपसी बाबा' भगवान श्री कृष्ण के अनन्य भक्त थे. वह वीर गोकुला के प्रसंशक थे और उनके किस्से वह अपने शिष्यों को सुनाते रहते थे. पिछले वर्षों में बाबा से प्रेरणा लेकर एवं चाहर वाटी पंचायत की और से महावीर घासी राम ने गोकुला के कई अभियानों में बढ़ चढ़ कर भाग लिया था. गोकुला भी इनको जानते थे.
महावीर घासी राम से 'घासी बाबा' बनने के बाद अब उनकी दिनचर्या कुछ बदल गयी थी. गाँव के बाहर दक्षिणी मंदिर में उनका निवास था. घर परिवार त्याग चुके थे. अब वे युवाओं को अखाड़ों में दांव पेंच सिखाते थे. बाकी समय भगवत भक्ति में लीन रहते थे.

हर माह शुक्ल पक्ष की चौदस को बाबा अकेले ही अकोला से वृन्दावन के लिए निकलते थे. दूसरे दिन प्रथम स्नान करके गोविन्द देव जी के दर्शन करते थे. मंदिर के पुजारी बाबा की भक्ति और शक्ति से प्रभावित थे. गोविन्द देवजी का मंदिर जयपुर के राजा मान सिंह द्वारा निर्मित किया गया था. यह हिन्दू संस्कृति एवं शिल्प का अनुपम नमूना था. बाबा घासी राम मंदिर के दर्शन करके मुख्य मार्ग पर आये तो शाही फौज से घिरे रस्सों से बंधे एक युवक को देखा. दिसम्बर १९६९ में अंतिम सप्ताह में ठिठुरते दिनों में भी उस तेजस्वी युवक के शरीर से पसीना बह रहा था. उस गर्वीले युवक को देख कर घासी राम को विश्वास नहीं हुआ कि वह गोकुल सिंह थे. गोकुल सिंह की हालत देख कर बाबा की रोष और क्रोध से भुजाएं फ़ड़्फड़ाने लगी. मंदिर में आकर बाबा ने नागा एवं गुसाइयों से बात की.एक छोटी सी टोली तैयार गो गई जो गोकुल सिंह को ले जारही सेना की टुकड़ी पर तलवार से टूट पड़ी. शाही सेना की ताकत के समक्ष गोकुल सिंह को छुड़ाना आसान न था. गोकुल सिंह से बाबा की नजर मिली. उन्होंने नजरों में ही बाबा को जाने के लिए कहा.

धर्म रक्षा

मंदिर के गर्भगृह में मुख्य पुजारी, नागा, गुसाईं और विठ्ठल संप्रदाय के मनीषियों के मध्य गंभीर चर्चा हुई. अब यह निश्चित था कि गोकुल सिंह के युद्ध में बंदी बनाये जाने के बाद ब्रज भूमि सुरक्षित नहीं है. गोकुल सिंह के भय के कारण मथुरा, वृन्दावन और दाउजी के मंदिर अब तक सुरक्षित थे. मंदिर निर्माता राजा-महाराजाओं के वंशज भी इस समय अपने को असहाय पा रहे थे. बचने का कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था. काफी सोच विचार के बाद निर्णय लिया कि मंदिर को तो नहीं बचाया जा सकता , किन्तु मंदिर की अन्य मूर्तियों को ही खंडित होने से बचाया जाये. मूर्तियों को मंदिर से हटाकर किसी सुरक्षित स्थान पर ले जाना आसान काम न था. श्रीनाथ जी की मूर्तियों को जतीपुरा गोपालपुर से अन्यत्र स्थानांतरण के लिए हर दृष्टि से घासी बाबा को उपयुक्त समझा. घासी बाबा ने इसे अपना सोभाग्य मानते हुए सहर्ष स्वीकार किया. घासी बाबा ने विक्रम संवत १७२६ आश्विन शुक्ला १५ शुक्रवार को श्रीनाथजी की मूर्ति लेकर ब्रज से प्रस्थान किया. [1]

उसी दिन रात्रि के तीसरे पहर में गोविन्द देव मंदिर के पिछले दरवाजे से निकल कर बगीचे की दक्षिणी चार दिवारी की और टोकरी सर पर उठाये एक ग्रामीण निकला, उसके पीछे ८-१० लोग निकले, जो कि चार दिवारी तक आकर रुक गए. सभी ने हाथ जोड़कर नमस्कार किया. कई रोने लगे. चार दिवारी का छोटा दरवाजा निःशब्द खोल दिया गया और वह ग्रामीण दीर्घकाय पुरुष बाहर निकले. घासी बाबा ने गोवर्धन पर्वत के दर्शन किये. ऊँचे स्थान पर टोकरी राखी और नित्यकर्म से निवृत हो राधाकुंड में स्नान किया. सर पर गोपालजी बैठे ही थे, उनके ध्यान में तुंरत यात्रा प्रारंभ की. टोकरी में लगुन सम्बन्धी सामान रखा था ताकि कोई पूछे तो बता दें की नाई लगुन लेकर जा रहा है. गांवों एवं मुख्य मार्गों से बचते-बचाते हुए १४ दिन निकल चुके थे. उस समय वे कहीं चित्तोड़ और उदयपुर की पहाडियों में विचरण कर रहे थे. १५ वें दिन उन्हें ऐसा आभाष हुआ कि वह स्थान आ गया है जहाँ तक उन्हें पहुँचना था. दोपहर को चलते-चलते उन्हें यकायक टोकरे का वजन कई गुना अधिक लगने लगा. कुछ दूर चलने के पश्चात उन्होंने टोकरा एक स्वच्छ शिला पर रख दिया. मूर्तियाँ वहीँ जंगल में स्थापित कर दी. इस जगह का नाम सिंहाड़ था. कई माह तक अराध्य देव कृष्ण की पूजा-अर्चना की. बाद में पुजारियों के वृन्दावन से आ जाने पर पूजा का कार्य उन्हें सौंप दिया. उन्होंने अपने कुछ वंशज बुलाकर मंदिर और पुजारियों की सुरक्षा के लिए बसा दिए. बाद में यही स्थान राजस्थान के प्रसिद्द नाथद्वारा मंदिर के नाम से प्रसिद्द हुआ.

नाथद्वारा की चर्चा राजस्थान की जनता और राजवंशों में होने लगी और वृन्दावन की भांति यहाँ भी दर्शनार्थी आने लगे.

अंतिम समय

नाथद्वारा से निश्चिंत होकर बाबा अकोला में अपने मंदिर पर रहने लगे. घासी बाबा भी वर्ष में एक बार अपनी घोडी से श्रीनाथ जी के दर्शन करने अवश्य जाते थे. एक बार गाँव में खटिकों के घर में आग लगी. बाबा अपने शिष्यों के साथ आग बुझाने दोडे. एक घर में बच्चा सोता रह गया. परोपकारी बाबा से न रुका गया. वे बच्चे को बचाने आग में कूद पड़े. बच्चे को सुरक्षित बचा लाये परन्तु वे खुद बहुत जल गए थे. उन्होंने उपचार करने से भी मना कर दिया और कहा कि मेरी आयु अब पूर्ण हो चुकी है.
वह सात दिन तक धार्मिक ग्रंथों को सुनते रहे. समस्त क्षेत्र के लोग दर्शन करने आते रहे. १८ जून १६८४ के दिन उन्होंने अपने प्राण त्यागे.
चाहर वाटी क्षेत्र में हर जाती के लोगों की उनमें बहुत आस्था है. उनके नाम से महिला एवं पुरुष मनौतियाँ मांगते हैं.

सन्दर्भ

* http://shreenathjee.com/historyofshreenathji/nathdawara_prasthan.htm

* राजेंद्र फौजदार:जाट समाज पत्रिका, आगरा, अक्टूबर-नवम्बर २००१, पृष्ठ १४-१७

नोट - अधिक जानकारी के लिए जाटलैंड विकी पर यहाँ पढें -

http://www.jatland.com/home/Baba_Ghasi_Ram
 
Baba Shahmal Tomar - Revolutionary freedom fighter

Baba Shah Mal was a Tomar Jat resident of village Bijraul in the pargana of Barout in Uttar Pradesh.

The farmers of the area had suffered from over-taxation by the British in the months before the uprising of first freedom movement in 1857. Shah Mal put together a combined force of Jat and Gujar farmers. His army attacked and plundered the tahsil of Barout and the bazaar at Baghpat. [1] Within a short period he took hold of 84 villages of Tomar Desh Khap. During the revolution of 1857, he made his headquarters at bungalow of Irrigation Department on Yanuna River and controlled his operations from there. The British army could not face the army of Shahmal. The British officer Dunlap could escape very marginally in a war with army of Shahmal in July 1857. Unfortunately the turban of Shahmal got entangled with legs of his horse. En English officer named Parkar who new Shahmal took advantage of this situation. He not only killed Shahmal but also cut his body to pieces and chopped his head off. The British army hanged the head of Shahmal on a jawline to terrify the public on 21 July 1857.
 
Baba Shahmal Tomar - Revolutionary freedom fighter

बाबा शाहमल का जीवन परिचय

बाबा शाहमल जाट (तोमर) बागपत जिले में बिजरौल गांव के एक साधारण परन्तु आजादी के दिवाने क्रांतिकारी किसान थे । वे मेरठ और दिल्ली समेत आसपास के इलाके में बेहद लोकप्रिय थे। मेरठ जिले के समस्त पश्चिमी और उत्तर-पश्चिमी भाग में अंग्रेजों के लिए भारी खतरा उत्पन्न करने वाले बाबा शाहमल ऐसे ही क्रांतिदूत थे। गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के लिए इस महान व्यक्ति ने लम्बे अरसे तक अंग्रेजों को चैन से नहीं सोने दिया था।

अंग्रेज हकुमत से पहले यहाँ बेगम समरू राज्य करती थी. बेगम के राजस्व मंत्री ने यहाँ के किसानों के साथ बड़ा अन्याय किया. यह क्षेत्र १८३६ में अंग्रेजों के अधीन आ गया. अंग्रेज अदिकारी प्लाउड ने जमीन का बंदोबस्त करते समय किसानों के साथ हुए अत्याचार को कुछ सुधारा परन्तु मालगुजारी देना बढा दिया. पैदावार अच्छी थी. जाट किसान मेहनती थे सो बढ़ी हुई मालगुजारी भी देकर खेती करते रहे. खेती के बंदोबस्त और बढ़ी मालगुजारी से किसानों में भारी असंतोष था जिसने १८५७ की क्रांति के समय आग में घी का काम किया.

शाहमल का गाँव बिजरौल काफी बड़ा गाँव था . १८५७ की क्रान्ति के समय इस गाँव में दो पट्टियाँ थी. उस समय शाहमल एक पट्टी का नेतृत्व करते थे. बिजरौल में उसके भागीदार थे चौधरी शीश राम और अन्य जिन्होंने शाहमल की क्रान्तिकरी कार्रवाइयों का साथ नहीं दिया. दूसरी पट्टी में ४ थोक थी. इन्होने भी साथ नहीं दिया था इसलिए उनकी जमीन जब्त होने से बच गई थी.

शाहमल की क्रान्ति प्रारंभ में स्थानीय स्तर की थी परन्तु समय पाकर विस्तार पकड़ती गई. आस-पास के लम्बरदार विशेष तौर पर बडौत के लम्बरदार शौन सिंह और बुध सिंह और जौहरी, जफर्वाद और जोट के लम्बरदार बदन और गुलाम भी विद्रोही सेना में अपनी-अपनी जगह पर आ जामे. शाहमल के मुख्य सिपहसलार बगुता और सज्जा थे और जाटों के दो बड़े गाँव बाबली और बडौत अपनी जनसँख्या और रसद की तादाद के सहारे शाहमल के केंद्र बन गए.

१० मई को मेरठ से शुरू विद्रोह की लपटें इलाके में फ़ैल गई. शाहमल ने जहानपुर के गूजरों को साथ लेकर बडौत तहसील पर चढाई करदी. उन्होंने तहसील के खजाने को लूट कर उसकी अमानत को बरबाद कर दिया. बंजारा सौदागरों की लूट से खेती की उपज की कमी को पूरा कर लिया. मई और जून में आस पास के गांवों में उनकी धाक जम गई. फिर मेरठ से छूटे हुये कैदियों ने उनकी की फौज को और बढा दिया. उनके प्रभुत्व और नेतृत्व को देख कर दिल्ली दरबार में उसे सूबेदारी दी.

12 व 13 मई 1857 को बाबा शाहमल ने सर्वप्रथम साथियों समेत बंजारा व्यापारियों पर आक्रमण कर काफी संपत्ति कब्जे में ले ली और बड़ौत तहसील और पुलिस चौकी पर हमला बोल की तोड़फोड़ व लूटपाट की। दिल्ली के क्रांतिकारियों को उन्होंने बड़ी मदद की। क्रांति के प्रति अगाध प्रेम और समर्पण की भावना ने जल्दी ही उनको क्रांतिवीरों का सूबेदार बना दिया। शाहमल ने बिलोचपुरा के एक बलूची नवीबख्श के पुत्र अल्लादिया को अपना दूत बनाकर दिल्ली भेजा ताकि अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ने के लिए मदद व सैनिक मिल सकें। बागपत के थानेदार वजीर खां ने भी इसी उद्देश्य से सम्राट बहादुरशाह को अर्जी भेजी। बागपत के नूर खां के पुत्र मेहताब खां से भी उनका सम्पर्क था। इन सभी ने शाहमल को बादशाह के सामने पेश करते हुए कहा कि वह क्रांतिकारियो के लिए बहुत सहायक हो सकते है और ऐसा ही हुआ शाहमल ने न केवल अंग्रेजों के संचार साधनों को ठप किया बल्कि अपने इलाके को दिल्ली के क्रांतिवीरों के लिए आपूर्ति क्षेत्र में बदल दिया।

अपनी बढ़ती फौज की ताकत से उन्होंने बागपत के नजदीक जमुना पर बने पुल को नष्ट कर दिया. उनकी इन सफलताओं से उन्हें ८४ गांवों का आधिपत्य मिल गया. उसे आज तक देश खाप की चौरासी कह कर पुकारा जाता है. वह एक स्वतंत्र क्षेत्र के रूप में संगठित कर लिया गया और इस प्रकार वह जमुना के बाएं किनारे का राजा बन बैठा, जिससे कि दिल्ली की उभरती फौजों को रसद जाना कतई बंद हो गया और मेरठ के क्रांतिकारियों को मदद पहुंचती रही. इस प्रकार वह एक छोटे किसान से बड़े क्षेत्र के अधिपति बन गए.

कुछ अंग्रेजों जिनमें हैवेट, फारेस्ट ग्राम्हीर, वॉटसन कोर्रेट, गफ और थॉमस प्रमुख थे को यूरोपियन फ्रासू जो बेगम समरू का दरबारी कवि भी था, ने अपने गांव हरचंदपुर में शरण दे दी। इसका पता चलते ही शाहमल ने निरपत सिंह व लाजराम जाट के साथ फ्रासू के हाथ पैर बांधकर काफी पिटाई की और बतौर सजा उसके घर को लूट लिया। बनाली के महाजन ने काफी रुपया देकर उसकी जान बचायी। मेरठ से दिल्ली जाते हुए डनलप, विलियम्स और ट्रम्बल ने भी फ्रासू की रक्षा की। फ्रासू को उसके पड़ौस के गांव सुन्हैड़ा के लोगों ने बताया कि इस्माइल, रामभाई और जासूदी के नेतृत्व में अनेक गांव अंग्रेजों के विरुद्ध खड़े हो गए है। शाहमल के प्रयत्नों से हिंदू व मुसलमान एक साथ मिलकर लड़े और हरचंदपुर, ननवा काजिम, नानूहन, सरखलान, बिजरौल, जौहड़ी, बिजवाड़ा, पूठ, धनौरा, बुढ़ैरा, पोईस, गुराना, नंगला, गुलाब बड़ौली, बलि बनाली (निम्बाली), बागू, सन्तोखपुर, हिलवाड़ी, बड़ौत, औसख, नादिर असलत और असलत खर्मास गांव के लोगों ने उनके नेतृत्व में संगठित होकर क्रांति का बिगुल बजाया।
कुछ बेदखल हुये जाट जमींदारों ने जब शाहमल का साथ छोड़कर अंग्रेज अफसर डनलप की फौज का साथ दिया तो शाहमल ने ३०० सिपाही लेकर बसौड़ गाँव पर कब्जा कर लिया. जब अंग्रेजी फौज ने गाँव का घेरा डाला तो शाहमल उससे पहले गाँव छोड़ चुका था. अंग्रेज फौज ने बचे सिपाहियों को मौत के घाट उतार दिया और ८००० मन गेहूं जब्त कर लिया. इलाके में शाहमल के दबदबे का इस बात से पता लगता है कि अंग्रेजों को इस अनाज को मोल लेने के लिए किसान नहीं मिले और न ही किसी व्यापारी ने बोली बोली. गांव वालों को सेना ने बाहर निकाल दिया पर दिल्ली से आये दो गाजी एक मस्जिद में मोर्चा लेकर लड़ते रहे और सेना नाकामयाब रही। शाहमल ने यमुना नहर पर सिंचाई विभाग के बंगले को मुख्यालय बना लिया था और अपनी गुप्तचर सेना कायम कर ली थी। हमले की पूर्व सूचना मिलने पर एक बार उन्होंने 129 अंग्रेजी सैनिकों की हालत खराब कर दी थी।

इलियट ने १८३० में लिखा है कि पगड़ी बांधने की प्रथा व्यक्तिको आदर देने की प्रथा ही नहीं थी, बल्कि उन्हें नेतृत्व प्रदान करने की संज्ञा भी थी. शाहमल ने इस प्रथा का पूरा उपयोग किया. शाहमल बसौड़ गाँव से भाग कर निकलने के बाद वह गांवों में गया और करीब ५० गावों की नई फौज बनाकर मैदान में उतर पड़ा.

दिल्ली दरबार और शाहमल की आपस में उल्लेखित संधि थी. अंग्रेजों ने समझ लिया कि दिल्ली की मुग़ल सता को बर्बाद करना है तो शाहमल की शक्ति को दुरुस्त करना आवश्यक है. उन्होंने शाहमल को जिन्दा या मुर्दा उसका सर काटकर लाने वाले के लिए १०००० रुपये इनाम घोषित किया.
डनलप जो कि अंग्रेजी फौज का नेतृत्व कर रहा था, को शाहमल की फौजों के सामने से भागना पड़ा. इसने अपनी डायरी में लिखा है -

"चारों तरफ से उभरते हुये जाट नगाड़े बजाते हुये चले जा रहे थे और उस आंधी के सामने अंग्रेजी फौजों का जिसे 'खाकी रिसाला' कहा जाता था, का टिकना नामुमकिन था."

एक सैन्य अधिकारी ने उनके बारे में लिखा है कि -

"एक जाट (शाहमल) ने जो बड़ौत परगने का गवर्नर हो गया था और जिसने राजा की पदवी धारण कर ली थी, उसने तीन-चार अन्य परगनों पर नियंत्रण कर लिया था। दिल्ली के घेरे के समय जनता और दिल्ली इसी व्यक्ति के कारण जीवित रह सकी।"

छपरा गांव के त्यागियों, बसोद के जादूगर और बिचपुरी के गूर्जरों ने भी शाहमल के नेतृत्व में क्रांति में पूरी शिरकत की। अम्हेड़ा के गूर्जरों ने बड़ौत व बागपत की लूट व एक महत्वपूर्ण पुल को नष्ट करने में हिस्सा लिया। सिसरौली के जाटों ने शाहमल के सहयोगी सूरजमल की मदद की जबकि दाढ़ी वाले सिख ने क्रांतिकारी किसानों का नेतृत्व किया।

जुलाई 1857 में क्रांतिकारी नेता शाहमल को पकड़ने के लिए अंग्रेजी सेना संकल्पबद्ध हुई पर लगभग 7 हजार सैनिकों सशस्त्र किसानों व जमींदारों ने डटकर मुकाबला किया। शाहमल के भतीजे भगत के हमले से बाल-बाल बचकर सेना का नेतृत्व कर रहा डनलप भाग खड़ा हुआ और भगत ने उसे बड़ौत तक खदेड़ा। इस समय शाहमल के साथ 2000 शक्तिशाली किसान मौजूद थे। गुरिल्ला युद्ध प्रणाली में विशेष महारत हासिल करने वाले शाहमल और उनके अनुयायियों का बड़ौत के दक्षिण के एक बाग में खाकी रिसाला से आमने सामने घमासान युद्ध हुआ.

डनलप शाहमल के भतीजे भगता के हाथों से बाल-बाल बचकर भागा. परन्तु शाहमल जो अपने घोडे पर एक अंग रक्षक के साथ लड़ रहा था, फिरंगियों के बीच घिर गया. उसने अपनी तलवार के वो करतब दिखाए कि फिरंगी दंग रह गए. तलवार के गिर जाने पर शाहमल अपने भाले से दुश्मनों पर वार करता रहा. इस दौर में उसकी पगड़ी खुल गई और घोडे के पैरों में फंस गई. जिसका फायदा उठाकर एक फिरंगी सवार ने उसे घोड़े से गिरा दिया. अंग्रेज अफसर पारकर, जो शाहमल को पहचानता था, ने शाहमल के शरीर के टुकडे-टुकडे करवा दिए और उसका सर काट कर एक भाले के ऊपर टंगवा दिया.

फिरंगियों के लिए यह सबसे बड़ी विजय पताका थी. डनलप ने अपने कागजात पर लिखा है कि अंग्रेजों के खाखी रिशाले के एक भाले पर अंग्रेजी झंडा था और दूसरे भाले पर शाहमल का सर टांगकर पूरे इलाके में परेड करवाई गई. चौरासी गांवों के 'देश' की किसान सेना ने फिर भी हार नहीं मानी. और शाहमल के सर को वापिस लेने के लिए सूरज मल और भगता स्थान-स्थान पर फिरंगियों पर हमला करते रहे. इसमें राजपूतों और गुजरों ने भी बढ़-चढ़ कर साथ दिया. शाहमल के गाँव सालों तक युद्ध चलाते रहे.

21 जुलाई 1857 को तार द्वारा अंग्रेज उच्चाधिकारियों को सूचना दी गई कि मेरठ से आयी फौजों के विरुद्ध लड़ते हुए शाहमल अपने 6000 साथियों सहित मारा गया। शाहमल का सिर काट लिया गया और सार्वजनिक रूप से इसकी प्रदर्शनी लगाई गई। पर इस शहादत ने क्रांति को और मजबूत किया तथा 23 अगस्त 1857 को शाहमल के पौत्र लिज्जामल जाट ने बड़ौत क्षेत्र में पुन: जंग की शुरुआत कर दी। अंग्रेजों ने इसे कुचलने के लिए खाकी रिसाला भेजा जिसने पांचली बुजुर्ग, नंगला और फुपरा में कार्रवाई कर क्रांतिकारियों का दमन कर दिया। लिज्जामल को बंदी बना कर साथियों जिनकी संख्या 32 बताई जाती है, को फांसी दे दी गई।

शाहमल मैदान में काम आया, परन्तु उसकी जगाई क्रांति के बीज बडौत के आस पास प्रस्फुटित होते रहे. बिजरौल गाँव में शाहमल का एक छोटा सा स्मारक बना है जो गाँव को उसकी याद दिलाता रहता है.

शाहमल पर डॉक्यूमेंट्री फिल्म

महाराजा सूरजमल स्मारक शिक्षा संस्थान दिल्ली क्रांतिकारी बाबा शाहमल पर डॉक्यूमेंट्री फिल्म तैयार करा रहा है। फिल्म निर्माता डॉ. केसी यादव एवं गुलबहार सिंह के निर्देशन में फिल्म तैयार की जा रही है। फिल्म क्रांतिकारी बाबा शाहमल के जीवन पर आधारित है। बाबा शाहमल ने अंग्रेजों के खिलाफ लम्बी जंग लड़ी थी। देश की आजादी में उनके बलिदान को लोग भूल नहीं पायेंगे। डॉक्यूमेंट्री फिल्म तैयार करने के लिए महाराज सूरजमल अनुसंधान एवं प्रकाशन केन्द्र दिल्ली ने कुछ शॉट वहां फिल्माये। बाबा शाहमल जिस कुएं पर बैठकर अपने साथियों के साथ रणनीति तय करते थे, वहां के शॉट फिल्माये गये। इसके अलावा बाबा शाहमल के गांव व घर के शॉट तैयार किये गये। इस दौरान गांव के लोगों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। फिल्म निर्माता ने बताया कि फिल्म शोध करने में भी काम में आयेगी तथा क्रांतिकारी शाहमल पर अभी तक कोई फिल्म तैयार भी नहीं हुई है।[2]

संदर्भ

1.↑ http://www.csas.ed.ac.uk/mutiny/history5.html
2.↑ http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttarpradesh/4_1_5029067_1.html

अधिक जानकारी के लिए जाटलैंड विकी पर पढें -

http://www.jatland.com/home/Baba_Shahmal_Tomar
 
u have forgotten few more jats.... my grandfather ICS Rai Bahadur Ragubir Singh who was from Ballabgarh(Faridabad,Haryana).He was a collector in Uttar Pradesh and after retirement he became a Revenue Minister in Bharatpur state.His son Dr.Ranveer Singh Mann who is a chemical engineer and the head of the chemical department in ottawa,Canada.He was also visiting proffesor of Delhi IIT.My nani Shri Subhashini Devi and her father Bhagat Phool Singh who has a university on his name in Gohana,Sonipat.
This university is the first girls university in Haryana and my nani Subhashini Devi got the Padam Shri award in 1976 and she fought lok sabha elections in 1977 on congress ticket....please indorse their name ..as they are also jats from Haryana
I am Sunil Bisla from Haryana staying in Delhi,i do farming and am in politics in Haryana..to know more about them ..please let us know
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Welcome Sunil ji on Jatland. !!!

You have added nice info here. Kindly give some more details about each personality so that we can create pages on Jatland Wiki also.

Regards,
 
The list is going to remain non-exhaustive as there is hardly any criteria. The missed names of DGs of ICAR the two Parodas and Prof. AL Chaudhary all from Nagore can be cited. So, the point should be among the class be of those Jats whom the people of other communities have adored. Perhaps it can be the best indicator.
 
Dear Burdak Sahib,

I would like to add Narendra Pal Singh Choudhary from Nathdwara district Rajasamand Rajasthan. He was a famous freedom fighter in Rajasthan. He started a school in Nathdwara where he used to provide free education to children from various communities. He was also elected as MLA from Mavli assembly constituency in 1977. He was active in social service till his death.

I will send you more information about him.

Regards,
Tej Ram
 
Dear Burdak Sahib,

I would like to add Narendra Pal Singh Choudhary from Nathdwara district Rajasamand Rajasthan. ....
Regards,
Tej Ram

Tejramji, provide some more info about his village gotra and achievements so that we can create a page for him.

Regards,
 
I ALSO LIKE TO ADD 1 MORE FAMOUS PERSONALITY TO THIS THREAD...........
CH.PIRU SINGH
VILLAGE-MATINDU
KHARKHODA,DISTT.-SONEPAT
HE WAS BORN IN A JAT FAMILY N WAS ARYA SAMAJI AND A FREEDOM FIGHTER.
HE LAID STONE OF FIRST GURUKUL OF NORTH INDIA---GURUKUL MATINDU IN 1904,ON HIS LANDS.
LATER ON HE DID SO MANY SOCIAL REFORMS.......HE WAS THE YONGEST "JAT PRADHAN " OF DAHIYA KHAAP.
HE HEADED THE FIRST MAHAPANCHYAT ---SARVKHAAP MAHAPANCHYAT IN 1911,IN VILLAGE BARONA...IN THIS PANCHAYAT 25 RULES WERE MADE FOR PROPER WORKING'S OF SOCIETY........
a) educating girls.....
b)abolition of DHAEJ PRATHA.....
c)bal-vivah par rok...
d)less expenditure on marriages.....
d)taking steps on eradication on tambakoo n liqiours...
e)regular organising HAWANS........
F)preaching ARYASAMAJ.....
and many more........
HE WAS THE FIRST MEMBER OF AICC--ALL INDIA CONGRESS COMMITEE FRON JOINT PUNJAB ,WHO ATTENDED A CONGRESS ADHIVASHAN HELD ON RAAVI NADI BANKS IN 1929.
HE WAS A GREAT SOCIAL REFORMER WHO LAID HIS LIFE FOR SOCIETY UPLIFTMENT.
 
The famous Jat People

Laxman Ji,
I suggest the name of Professor Ranbir Singh, Vice -Chabcellor of the National Law University, Delhi.Before this he was Vice-Chancellor of the Law University at Hyderabad.The present University is located in Dwarka, a sub-city in Delhi.It mainly runs five year Hons degree courses in Law. Admissions are after passingTen plus two examination through an entrance test. The Registrar of the university is also a Jat, Professor Ghanshyam Singh.
 
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