संत गंगा दास की कुण्डलियाँ
(१)
बोए पेड़ बबूल के, खाना चाहे दाख ।
ये गुन मत परकट करे, मनके मन में राख ।।
मनके मन में राख, मनोरथ झूठे तेरे ।
ये आगम के कथन, कदी फिरते ना फेरे ।।
गंगादास कह मूढ़ समय बीती जब रोए ।
दाख कहाँ से खाए पेड़ कीकर के बोए ।।
(२)
माया मेरे हरी की, हरें हरी भगवान ।
भगत जगत में जो फंसे, करें बरी भगवान ।।
करें बरी भगवान, भाग से भगवत अपने ।
इसे दीनदयाल हरी-हर चाहियें अपने ।।
गंगादास परकास भया मोह-तिमिर मिटाया ।
संत भए आनंद ज्ञान से तर गए माया ।।
(३)
अन्तर नहीं भगवान में, राम कहो चाहे संत ।
एक अंग तन संग में, रहे अनादि अनंत ।।
रहे अनादि अनंत, सिद्ध गुरु साधक चेले ।
तब हो गया अभेद भेद सतगुरु से लेले ।।
गंगादास ऐ आप ओई मंत्री अर मंतर ।
राम-संत के बीच कड़ी रहता ना अन्तर ।।
(४)
जो पर के अवगुण लखै, अपने राखै गूढ़ ।
सो भगवत के चोर हैं, मंदमति जड़ मूढ़ ।।
मंदमति जड़ मूढ़ करें, निंदा जो पर की ।
बाहर भरमते फिरें डगर भूले निज घर की ।।
गंगादास बेगुरु पते पाये ना घर के ।
ओ पगले हैं आप पाप देखें जो पर के ।।
(५ )
गाओ जो कुछ वेद ने गाया, गाना सार ।
जिसे ब्रह्म आगम कहें, सो सागर आधार ।।
सो सागर आधार लहर परपंच पिछानो ।
फेन बुदबुद नाम जुडे होने से मानो ।।
गंगादास कहें नाम-रूप सब ब्रह्म लखाओ ।
अस्ति, भाति, प्रिय, एक सदा उनके गुन गाओ ।।
६
ऐ अविनाशी ! आपका, जन्म नहीं, ना नास ।
सदा एक निर्भय अचल , भगवत सर्व-निवास ।।
भगवत सर्व-निवास विषय बानी ना मन के ।
नर तन धारण करो हेत हरि अपने जन के ।।
गंगादास जन कहें आप सब के परकासी ।
भक्त्वत्सली नाम भरम मेटो अविनाशी ।।
७
महाघोर आया कली, पड़ी पाप की धूम ।
पंथ वेद के छिप गए, ना होते मालूम ।।
ना होते मालूम पाप ने दाबी परजा ।
फ़िर सुख कैसे होय धर्म का हो गया हरजा ।।
गंगादास जन कहें नाथ ! हे नन्द किशोर ।
कैसे होगी गुजर कली आया महा घोर ।।
८
मोहताजों की ख़बर ले, तेरी लें भगवान ।।
जस परगट दो लोक में, होगा निश्चय जान ।।
होगा निश्चय जान, मान वेदों का कहना ।
जो ठावे उपकार उदय होता है लहना ।।
गंगादास ले ख़बर राम उनके काजों की ।
जो लेते हैं ख़बर जगत में मोहताजों की ।।
९
माला फेरो स्वास की, जपो अजप्पा जाप ।
सोहं सोहं सुने से, कटते हैं सब पाप ।।
कटते हैं सब पाप जोग-सरमें कर मंजन ।
छः चक्कर ले शोध अंत पावें मनरंजन ।।
गंगादास परकास होय खुलतेई घट-ताला ।
मनो मेरा कहा, भजो स्वासों की माला ।।
१०
पावैं शोभा लोक में , जो जन विद्यामान ।
जिन विद्या बल हैं नहीं, सो नर भूत मसान ।।
सो नर भूत मसान पशु पागल परवारी ।
बिन विद्या नर सून ताल जैसे बिन वारी ।।
गंगादास ये जीव जाति नर पशु कहावैं ।
बिना सुगंधी सुमन कहीं आदर ना पावैं ।।
नोट - संत गंगादास के बारे में अधिक जानकारी के लिए पढ़ें जाटलैंड विकी के लेख
http://www.jatland.com/home/Ganga_Das
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Pandit Jagdev Singh Sidhanthi (पंडित जगदेव सिंह सिद्धान्ती) (1900-1979) was born in 1900 on the day of Vijayadashami in the family of Ch. Preet Ram Ahlawat at village Bahraja (Gugnan) in Jhajjar district Haryana. ....
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