What's life? a poem or a poet itself .. this wonderful n' touching poem try to explain it n' clear the confusion.
ज़िन्दगी : कविता या कवयित्री - सुरेन्द्र प्रताप सिंह
सोचता हूँ पल प्रति पल
कि ज़िन्दगी एक कविता है
या, स्वयं एक कवयित्री !
जन्म से मरण तक
न जाने कितने उतार-चढ़ाव,
कितने हादसे, कितने ग़म, कितनी खुशियाँ !
कभी इच्छाओं की मौत
कभी मौत की इच्छा !
कभी ह्रदय को बहलाते क्षण
कभी दहलाते !
संदेह, विश्वास, भय, प्रेम,
वात्सल्य, करूणा, ममता आदि
रसों और भावों को
अपने में संजोए
ज़िन्दगी एक कविता ही तो है !
परन्तु कौन, किस पर,
कैसे लिखता है?
क्या स्वयं ज़िन्दगी ?
शायद हाँ !
शायद नहीं !
फिर बार-बार
सोचता हूँ पल प्रति पल
कि ज़िन्दगी एक कविता है
या स्वयं एक कवयित्री ?
प्रश्न है अब तक
अनुत्तरित,
अनिर्णीत !
Rock on
Jit
कब ऐसा सोचा था मैंने मौसम भी छल जाएगा
सावन-भादों की बारिश में घर मेरा जल जाएगा
रंजोग़म की लम्बी रातों इतना मत इतराओ तुम
निकलेगा कल सुख का सूरज अंधियारा टल जाएगा
अक्सर बातें करता था जो दुनिया में तब्दीली की
किसे ख़बर थी वो दुनिया के रंगों में ढल जाएगा
नफ़रत की पागल चिंगारी कितनों के घर फूँक चुकी
अगर न बरसा प्यार का बादल सारा शहर जल जाएगा
दुख की इस नगरी में आख़िर रैन-बसेरा है सबका
आज रवाना होगा कोई और कोई कल जाएगा
देवमणि पाण्डेय
Really touching & amazing. I found all your poems pasted here very senstive.
Bahut Dino ke baad aaj jatland par aaya aur aap kee kavita padee, Greate collection Anjali. Simply Greate!!!!!!!!!!!!!!
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