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मरना पड़े देशहित अगर मुझको सहश्त्रो बार भी,
तो भी ना इसे निज ध्यान में लाऊं कभी,
हे ईश शत बार भारत वर्ष में मेरा जन्म हो
कारण सदा ही मृत्यु का देशोपरक कर्म हो.

-अमर शहीद पंडित रामप्रसाद बिस्मिल
 
What's life? a poem or a poet itself .. this wonderful n' touching poem try to explain it n' clear the confusion.


ज़िन्दगी : कविता या कवयित्री - सुरेन्द्र प्रताप सिंह


सोचता हूँ पल प्रति पल
कि ज़िन्दगी एक कविता है
या, स्वयं एक कवयित्री !

जन्म से मरण तक
न जाने कितने उतार-चढ़ाव,
कितने हादसे, कितने ग़म, कितनी खुशियाँ !
कभी इच्छाओं की मौत
कभी मौत की इच्छा !
कभी ह्रदय को बहलाते क्षण
कभी दहलाते !

संदेह, विश्वास, भय, प्रेम,
वात्सल्य, करूणा, ममता आदि
रसों और भावों को
अपने में संजोए
ज़िन्दगी एक कविता ही तो है !
परन्तु कौन, किस पर,
कैसे लिखता है?
क्या स्वयं ज़िन्दगी ?
शायद हाँ !
शायद नहीं !

फिर बार-बार
सोचता हूँ पल प्रति पल
कि ज़िन्दगी एक कविता है
या स्वयं एक कवयित्री ?
प्रश्न है अब तक
अनुत्तरित,
अनिर्णीत !


Rock on
Jit
 
What's life? a poem or a poet itself .. this wonderful n' touching poem try to explain it n' clear the confusion.


ज़िन्दगी : कविता या कवयित्री - सुरेन्द्र प्रताप सिंह


सोचता हूँ पल प्रति पल
कि ज़िन्दगी एक कविता है
या, स्वयं एक कवयित्री !

जन्म से मरण तक
न जाने कितने उतार-चढ़ाव,
कितने हादसे, कितने ग़म, कितनी खुशियाँ !
कभी इच्छाओं की मौत
कभी मौत की इच्छा !
कभी ह्रदय को बहलाते क्षण
कभी दहलाते !

संदेह, विश्वास, भय, प्रेम,
वात्सल्य, करूणा, ममता आदि
रसों और भावों को
अपने में संजोए
ज़िन्दगी एक कविता ही तो है !
परन्तु कौन, किस पर,
कैसे लिखता है?
क्या स्वयं ज़िन्दगी ?
शायद हाँ !
शायद नहीं !

फिर बार-बार
सोचता हूँ पल प्रति पल
कि ज़िन्दगी एक कविता है
या स्वयं एक कवयित्री ?
प्रश्न है अब तक
अनुत्तरित,
अनिर्णीत !


Rock on
Jit

Dear Jeet beautiful poem, Thanks for Sharing.
 

An Inspirational poem by RashtraKavi Ramdhari Singh Dinkar-

सच है, विपत्ति जब आती है,
कायर को ही दहलाती है,
सूरमा नही विचलित होते,
क्षण एक नहीं धीरज खोते,

विघ्नों को गले लगाते हैं,
काँटों में राह बनाते हैं

मुँह से न कभी उफ़ कहते हैं,
संकट का चरण न गहते हैं,
जो आ पड़ता सब सहते हैं,
उद्योग-निरत नित रहते हैं,

शूलों का मूल नसाते हैं,
बढ़ खुद विपत्ति पर छाते हैं।

है कौन विघ्न ऐसा जग में,
टिक सके आदमी के मग में?
खम ठोक ठेलता है जब नर,
पर्वत के जाते पाँव उखड़,

मानव जब ज़ोर लगाता है,
पत्थर पानी बन जाता है।

गुण बड़े एक से एक प्रखर,
है छिपे मानवों के भीतर,
मेंहदी में जैसे लाली हो,
वर्तिका-बीच उजियाली हो,

बत्ती जो नही जलाता है,
रोशनी नहीं वह पाता है।


 
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।
जिस दिन मेरी चेतना जगी मैंने देखा
मैं खड़ा हुआ हूँ इस दुनिया के मेले में,
हर एक यहाँ पर एक भुलाने में भूला
हर एक लगा है अपनी अपनी दे-ले में
कुछ देर रहा हक्का-बक्का, भौचक्का-सा,
आ गया कहाँ, क्या करूँ यहाँ, जाऊँ किस जा?
फिर एक तरफ से आया ही तो धक्का-सा
मैंने भी बहना शुरू किया उस रेले में,
क्या बाहर की ठेला-पेली ही कुछ कम थी,
जो भीतर भी भावों का ऊहापोह मचा,
जो किया, उसी को करने की मजबूरी थी,
जो कहा, वही मन के अंदर से उबल चला,
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।

by Harivansh Rai Bachchan
 
मेरे साथ जुड़ी हैं कुछ मेरी ज़रूरतें
उनमें एक तुम हो।

चाहूँ या न चाहूँ :

जब ज़रूरत हो तुम,
तो तुम हो मुझ में
और पूरे अन्त तक रहोगी।

इससे यह सिद्ध कहाँ होता कि

मैं भी तुम्हारे लिए
उसी तरह ज़रूरी।

देखो न!

आदमी को हवा चाहिए ज़िन्दा रहने को
पर हवा तो
आदमी की अपेक्षा नहीं करती,
वह अपने आप जीवित है।

डाली पर खिला था एक फूल,

छुआ तितली ने,
रस लेकर उड़ गई।
पर
फूल वह तितली मय हो चुका था।

झरी पँखुरी एक : तितली।

फिर दूसरी भी : तितली।
फिर सबकी सब : तितली।
छूँछें वृन्त पर बाक़ी
बची ख़ुश्की जो : तितली।

कोमलता

अंतिम क्षण तक
यह बताकर ही गई :
'मैं वहाँ भी हूँ,
जहाँ मेरी कोई ज़रूरत नहीं।'



------ अजित कुमार
 
एक सुनहली किरण उसे भी दे दो
भटक गया जो अंधियारे के वन में,
लेकिन जिसके मन में,
अभी शेष है चलने की अभिलाषा
एक सुनहली किरण उसे भी दे दो

मौन कर्म में निरत

बध्द पिंजर में व्याकुल
भूल गया जो
दुख जतलाने वाली भाषा
उसको भी वाणी के कुछ क्षण दे दो

तुम जो सजा रहे हो

ऊंची फुनगी पर के ऊर्ध्वमुखी
नव पल्लव पर आभा की किरनें
तुम जो जगा रहे हो
दल के दल कमलों की ऑंखों के
सब सोये सपने

तुम जो बिखराते हो भू पर

राशि राशि सोना
पथ को उद्भासित करने

एक किरण से

उसका भी माथा आलोकित कर दो

एक स्वप्न

उसके भी सोये मन में
जागृत कर दो।

------कीर्ति चौधरी
 
अथक प्रयास के उजले विचार से निकली
हमारी जीत, निरंतर जुझार से निकली

हरेक युद्ध किसी संधि पर समाप्त हुआ
अमन की राह हमेशा प्यार से निकली

जो मन का मैल है, उसको तो व्यक्त होना है
हमारी कुण्ठा हजारों प्रकार से निकली

ये अर्थ—शास्त्र भी कहता है, अपनी भाषा में—
नकद की राह हमेशा उधार से निकली

नजर में आने की उद्दंड युक्ति अपनाकर ,
वो चलते—चलते अचानक कतार से निकली

हमारी चादरें छोटी, शरीर लंबे है
हमारे खर्च की सीमा पगार से निकली

ये सोच कर ही तुम्हें रात से गुजरना है
सुहानी भोर सदा अंधकार से निकली



जहीर कुरैशी
 
घर छिन गए तो सड़कों पे बेघर बदल गए
आँसू, नयन— कुटी से निकल कर बदल गए


अब तो स्वयं—वधू के चयन का रिवाज़ है
कलयुग शुरू हुआ तो स्वयंवर बदल गए


मिलता नहीं जो प्रेम से, वो छीनते हैं लोग
सिद्धान्त वादी प्रश्नों के उत्तर बदल गए


धरती पे लग रहे थे कि कितने कठोर हैं
झीलों को छेड़ते हुए कंकर बदल गए


होने लगे हैं दिन में ही रातों के धत करम
कुछ इसलिए भि आज निशाचर बदल गए


इक्कीसवीं सदी के सपेरे हैं आधुनिक
नागिन को वश में करने के मंतर बदल गए


बाज़ारवाद आया तो बिकने की होड़ में
अनमोल वस्तुओं के भी तेवर बदल गए.




जहीर कुरैशी
 
मुस्कुराना भी एक चुम्बक है,
मुस्कुराओ, अगर तुम्हें शक है!

उसको छू कर कभी नहीं देखा,
उससे सम्बन्ध बोलने तक है।
डाक्टर की सलाह से लेना,
ये दवा भी ज़हर-सी घातक है।

दिन में सौ बार खनखनाती है
एक बच्चे की बंद गुल्लक है।
उससे उड़ने की बात मत करना,
वो जो पिंजरे में अज बंधक है।

हक्का-बक्का है बेवफ़ा पत्नी,
पति का घर लौटना अचानक है!
'स्वाद' को पूछना है 'बंदर' से,
जिसके हाथ और मुँह में अदरक है।







जहीर कुरैशी
 
maile ho jaatein hain rishte bhi libaason ki tarah
dosti har din ki mehnat hai chalo yun hi sahi
bhool thi apni ... aadmi ko farishta samjha
aadmi mein aadmiyat hai chalo yun hi sahi
 
आसमान लाल-लाल हो रहा,
धरती पर घमासान हो रहा।

हरियाली खोई है,
नदी कहीं सोई है,
फसलों पर फिर किसान रो रहा।

सुख की आशाओं पर,
खंडित सीमाओं पर,
सिपाही लहू लुहान हो रहा।

चिनगी के बीज लिए,
विदेशी तमीज लिए,
परदेसी धान यहाँ बो रहा।

-- भारतेंदु मिश्र
 

कब ऐसा सोचा था मैंने मौसम भी छल जाएगा
सावन-भादों की बारिश में घर मेरा जल जाएगा

रंजोग़म की लम्बी रातों इतना मत इतराओ तुम

निकलेगा कल सुख का सूरज अंधियारा टल जाएगा

अक्सर बातें करता था जो दुनिया में तब्दीली की

किसे ख़बर थी वो दुनिया के रंगों में ढल जाएगा

नफ़रत की पागल चिंगारी कितनों के घर फूँक चुकी

अगर न बरसा प्यार का बादल सारा शहर जल जाएगा

दुख की इस नगरी में आख़िर रैन-बसेरा है सबका

आज रवाना होगा कोई और कोई कल जाएगा





देवमणि पाण्डेय
 
कब ऐसा सोचा था मैंने मौसम भी छल जाएगा
सावन-भादों की बारिश में घर मेरा जल जाएगा

रंजोग़म की लम्बी रातों इतना मत इतराओ तुम
निकलेगा कल सुख का सूरज अंधियारा टल जाएगा

अक्सर बातें करता था जो दुनिया में तब्दीली की
किसे ख़बर थी वो दुनिया के रंगों में ढल जाएगा

नफ़रत की पागल चिंगारी कितनों के घर फूँक चुकी
अगर न बरसा प्यार का बादल सारा शहर जल जाएगा

दुख की इस नगरी में आख़िर रैन-बसेरा है सबका
आज रवाना होगा कोई और कोई कल जाएगा




देवमणि पाण्डेय

Really touching & amazing. I found all your poems pasted here very senstive.
 
Really touching & amazing. I found all your poems pasted here very senstive.

संजय जी, शुक्रिया कुछ कविताये दिल को छू जाती हैं , तो यहाँ पर छाप देते हैं
 
बड़ी होती बेटी के माध्यम से कवि बहुत कुछ कह गया है, आप भी पढ़िए

अभी पिछले फागुन में
उसकी आंखों में कोई रंग न था
पिछले सावन में
उसके गीतों में करुणा न थी
अचानक बड़ी हो गयी है बेटी
सेमल के पेड़ की तरह
हहा कर बड़ी हो गयी है
देखते ही देखते।

जब वह जन्मी थी
तब कितना पानी होता था
कुआं तालाब में
नदी तो हरदम लबालब भरी रहती थी
भादों में कैसी झड़ी लगती थी
वैसी ही एक रात में पैदा हुई थी
ऐसी झपासी थी कि एक पल के लिए भी
लड़ी नहीं टूट रही थी

अब बड़ी हुई बेटी
तब तक सूख चुके हैं सारे तालाब
गहरे तल में चला गया है कुएं का पानी
नदी हो गयी है बेगानी
कांस और सरकंडों के जंगल में
कहीं कहीं बहती दिखती हैं पतली पतली धाराएं।

पलकें झुका कर
सपनों को छोटा करो मेरी बेटी
नींद को छोटा करो
देर से सूतो
पर देर तक न सूतो
होठों से बाहर न आये हंसी
आंखों तक पहुंच न पाये कोई खुशी
कलेजे में दबा रहे दुःख
भूख और विचारों को मारना सीखो
अपने को अपने ही भीतर गाड़ना सीखो

कोमल कोमल शब्दों में
जारी होती रहीं क्रूर हिदायतें
फिर भी बड़ी हो गयी बेटी
बड़े हो गये उसके सपने!

_____________


बड़ी हो रही है बेटी
बड़ा हो रहा है उसका एकांत

वह चाहती है अब भी
चिड़ियों से बतियाना
फूलों से उलझना
पेड़ों से पीठ टिका कर सुस्ताना
पर सब कुछ बदल चुका है मानो

कम होने लगी है
चिड़ियों के कलरव की मिठास
चुभने लगे हैं
फूलों के तेज रंग
डराने लगी हैं
दरख्तों की काली छायाएं

बड़ी हो रही है बेटी
बड़े हो रहे हैं भेड़िए
बड़े हो रहे है सियार

मां की करुणा के भीतर
फूट रही है बेचैनी
पिता की चट्टानी छाती में
दिखने लगे हैं दरकने के निशान
बड़ी हो रही है बेटी!

______________


बाबा बाबा
मुझे मकई के झौंरे की तरह
मरुए में लटका दो

बाबा बाबा
मुझे लाल चावल की तरह
कोठी में लुका दो

बाबा बाबा
मुझे माई के ढोलने की तरह
कठही संदूक में छुपा दो

मकई के दानों को बचाता है छिलकोइया
चावल को कण और भूसी
ढोलने को बचाता है रेशम का तागा
तुझे कौन बचायेगा मेरी बेटी !!!!!


मदन कश्यप
 
अंधविश्वासों से पूर्ण वह देश दयनीय है
जो जागृतावस्था में
सपनों में तिरस्कृत इच्छाओं के वशीभूत हो जाता है

दयनीय है वह देश

जो अपना अन्न स्वयं नहीं उगाता
अपना कपड़ा स्वयं नहीं बुनता

वह देश भी दयनीय है

जहां जुलूस केवल मृत्यु का निकलता है
और नारे केवल 'रामनाम सत्त है' के लगते हैं

जहां बगावत कभी नहीं होती

तब भी नहीं
जब गर्दन बलिवेदी पर रख दी जाती है



दयनीय है वह देश भी
जिसके राजनीतिज्ञ लोमड़ी हैं

दार्शनिक बाजीगर

और कलाकार बहुरूपिए

दयनीय है वह देश

जिसके महात्मा इतिहास के साथ गूंगे हो गए हैं
और शूरवीर अभी पालने में झूल रहे हैं!

मदन कश्यप



 
Last edited:
माँ बनकर ये जाना मैनें,

माँ बनकर ये जाना मैनें,
माँ की ममता क्या होती है,
सारे जग में सबसे सुंदर,
माँ की मूरत क्यूँ होती है॥

जब नन्हे-नन्हे नाजु़क हाथों से,
तुम मुझे छूते थे...
कोमल-कोमल बाहों का झूला,
बना लटकते थे...
मै हरपल टकटकी लगाए,
तुम्हें निहारा करती थी...
उन आँखों में मेरा बचपन,
तस्वीर माँ की होती थी,
माँ बनकर ये जाना मैनें,
माँ की ममता क्या होती है॥


जब मीठी-मीठी प्यारी बातें,
कानों में कहते थे,
नटखट मासूम अदाओं से,
तंग मुझे जब करते थे...
पकड़ के आँचल के साये,
तुम्हें छुपाया करती थी...
उस फ़ैले आँचल में भी,
यादें माँ की होती थी...
माँ बनकर ये जाना मैनें,
माँ की ममता क्या होती है॥


देखा तुमको सीढ़ी दर सीढ़ी,
अपने कद से ऊँचे होते,
छोड़ हाथ मेरा जब तुम भी
चले कदम बढ़ाते यों,
हो खुशी से पागल मै,
तुम्हे पुकारा करती थी
कानों में तब माँ की बातें,
पल-पल गूँजा करती थी...
माँ बनकर ये जाना मैनें,
माँ की ममता क्या होती है॥


आज चले जब मुझे छोड़,
झर-झर आँसू बहते हैं,
रहे सलामत मेरे बच्चे,
हर-पल ये ही कहते हैं,
फ़ूले-फ़ले खुश रहे सदा,
यही दुआएँ करती हूँ...
मेरी हर दुआ में शामिल,
दुआएँ माँ की होती हैं,...
माँ बनकर ये जाना मैने,
माँ की ममता क्या होती है॥



सुनीता
 
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