हालात बताने चाहिए थे. किन हालात में मां और मातृभूमि में से किसी एक को चुनना था. यदि कोई युद्ध हो रहा था और किसी फौजी के सामने हालात ऐसे थे कि या तो वो अपनी मां को बचा सकता था या फिर मातृभूमि को. ऐसे में अगर मैं होऊँ तो फिर अपनी मां पर अपनी मातृभूमि को तरजीह दूंगा, क्योंकि मातृभूमि बचेगी तो फिर पता नहीं और कितने भाईयों की मां भी बचेंगी. लेकिन अगर मैं अपनी मां के साथ कहीं दूसरे देश में रहता हूं और हालात ऐसे हैं कि मेरी मां कह रही है कि या तो विदेश में रह मां के साथ या फिर मां को छोड़कर अपने देश में रह तो फिर मैं मां को चुनूंगा. जब कभी मां की उम्र पूरी हो जाएगी तो फिर मातृभूमि की सोचूंगा.
वैसे भी उपेंदर भाई , जननी और मातृभूमि की तुलना कैसी और कैसा चुनाव,जब वे परस्पर अतुलनीय हैं!
मैंने अपनी प्रथम पोस्ट में एक वीडियो लिंक प्रेषित किया था, जिस में आचार्य वेदप्रकाश जी ने मातृभूमि पर डाक्टर सुभाष वेदालंकार रचित एक संस्कृति गीत, जिसे नन्हे हविश्क्रित ने गाया था, की व्याख्या की थी,
जो इस प्रकार है :
जीवात्मा माता की छोटी सी कोख में, सर्वप्रथम जब माता के हृदयस्थ प्राणों को जब सवीकार करता है, उस छोटी सी कोख में ही सम्पूर्ण बेहद शारीर को प्राप्त करता है और अपने अंगो और उपांगो को पाता है !
जब उस प्राप्त शारीर को लेकर गर्भ से बाहर आता है, तो वही माता की जो छोटी सी कोख है,
उसी का नाम वेद में भूमि के नाम से कहा कहा गया है , जहाँ सर्वप्रथम प्राणों का सपंदन प्राप्त किया था ! जहाँ मैंने प्राणों की सत्ता पाई थी, वही भूमि कहलाती है और कहूँगा, बेटा तुम इस मातृभूमि की नमन करने के लिए यदि आगे आओगे , उससे पूर्व , जिस माँ की छोटी कोख की भूमि में तुमने; प्राण पाए थे,
आहार पाया था, रस पाया था
विचार पाए थे, भाव पाया था
हाव पाया था, अनुभाव पाया था
संचारी भावों की रसों की उत्पत्ति पाई थी, तुम यदि उस की लाज रख सकते हो
तब अपनी सम्पूर्ण मातृभूमि की लाज रखने में भी समर्थ बन सकते हो !
--आचार्य वेदप्रकाश श्रोतर्या जी
खुश रहो!